कश्मीर समस्या के विविध आयाम
Written by: अमिताभ त्रिपाठी | August 26, 2010 | Category: अंतरराष्ट्रीय राजनीति, आतंकवाद, इस्लामी राजनीति, कांग्रेस की राजनीति, धर्म, विदेश नीति | Comment
इन दिनों कश्मीर समस्या एक बार फिर पूरे विकराल् स्वरूप के साथ हमारे समक्ष उपस्थित है। आज कश्मीर समस्या का जो स्वरूप हमें दिखाई दे रहा है उसके अनेक ऐतिहासिक कारण हैं जिनकी चर्चा समय समय पर होती रहती है परंतु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज भी कश्मीर हमारे समक्ष इतिहास के अनसुलझे प्रश्न की तरह मुँह फैलाये खडा है।
कश्मीर समस्या निश्चित रूप से देश की स्वतंत्रता के बाद देश के नेतृत्व की उस मानसिकता का परिचायक ही है कि देश का नेतृत्त्व क़िस प्रकार उन शक्तियों के हाथ में चला गया जो न तो भारत को एक सांस्कृतिक और न ही आध्यात्मिक ईकाई मानते थे। वे तो भारत को एक भूखण्ड तक ही मानते थे जिसका सौदा विदेशी दबाव में या अपनी सुविधा के अनुसार किया जा सकता है। आज कश्मीर के सम्बन्ध में यह बात पूरी तरह समझने की है कि कश्मीर भारत की मूल पहचान और संस्कृति का अभिन्न अंग सह्स्त्रों वर्षों से रहा है। कश्मीर के सम्बन्ध में एक बडी भूल यही होती है कि हम इसे भारत का अभिन्न अंग मानते हुए भी इसे एक राजनीतिक ईकाई भर मान कर संतुष्ट हो जाते हैं जिसका इतिहास 194 से आरम्भ होता है। कश्मीर के प्रति भारत का भावनात्मक लगाव जब तक उसकी ऐतिहासिकता के साथ चर्चा मे नहीं लाया जाता तब तक इसका पक्ष अधूरा रहेगा। इसी पक्ष के अभाव के चलते इस समस्या को पूरी तरह राजनीतिक सन्दर्भ में देखा जाता है और भारत का एक वर्ग कहीं न कहीं जाने अनजाने इस सम्बन्ध में हीन भावना से ग्रस्त होता जा रहा है कि कश्मीर में स्वायत्तता या फिर स्वतंत्रता की माँग पर विचार किया जा सकता है। इस प्रकार कश्मीर समस्या का एक आयाम तो उसे उसके सांस्कृतिक सातत्य में न देखने की भूल है। Read more
देश की सेक्युलर राजनीति के पुनर्मूल्याँकन का समय ?
Written by: अमिताभ त्रिपाठी | July 25, 2010 | Category: अंतरराष्ट्रीय राजनीति, आतंकवाद, इस्लामी राजनीति, कांग्रेस की राजनीति, संस्कृति, हिन्दुत्व | Comment
पिछले वर्ष देश में हुए आम चुनावों के बाद से सामान्य तौर पर एक नारा देश की सेक्युलर शक्तियाँ लगा रही हैं कि अब भारत बदल गया है और लोग विकास चाहते हैं और पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति से तंग आ चुके हैं। यह बाद कहते समय जो बात इन तत्वों के ध्यान में रहती है वह यह कि अब विश्व में वैश्वीकरण का युग है और विश्व में एक क्षेत्र को दूसरे से पूरी तरह अलग थलग नहीं रखा जा सकता। ऐसे में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है कि जो कुछ रुझान समस्त विश्व मे हमें देखने को मिल रहा है उस पृष्ठभूमि में ही यदि भारत की राजनीति को समझने का प्रयास किया जाये तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सम्मुख हमारे उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर हमें देना ही होगा। इन प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि सेक्युलर परिभाषा और राजनीति का स्वरूप क्या होना चाहिये? इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार यूपीए सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में और फिर अपने दूसरे कार्यकाल में अभी तक पूरी तरह पश्चिम की शक्तियों के प्रभाव में अपनी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति को क्रियांवित करने का प्रयास किया है ठीक उसके विपरीत आतंकवाद और इस्लाम व मुस्लिम जनता के साथ सम्बन्धों को परिभाषित करने में इस माड्ल को अपनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। Read more
हिन्दू आतंकवाद के मिथक का पर्दाफाश
Written by: अमिताभ त्रिपाठी | July 20, 2010 | Category: आतंकवाद, धर्म, संस्कृति, हिन्दुत्व | 1 Comment
बी शांतनु
हिन्दी अनुवाद- अमिताभ त्रिपाठी
http://satyameva-jayate.org/2010/07/19/myth-of-hindutva-terror/
आज कल एक नया भूत सामने लाया गया है और वह है हिन्दुत्व आतंकवाद ( उर्फ हिन्दू आतंकवाद)। सम्भव है यह शब्द आपने पहले भी सुना हो , सम्भव है कि आपको इस पर क्रोध आया हो लेकिन आप क्रोधित होकर अपने कार्य में लग गये होंगे। सम्भव है कि आपने यह सोचने का प्रयास भी नहीं किया होगा कि यह हिन्दुत्व आतंकवाद है क्या? अभी कुछ दिन पूर्व मैं कुछ लोगों के मध्य था और जब उन्होंने यह शब्द सुना तो वे क्रुद्ध हो गये शायद इससे भी अधिक क्रुद्ध हों लेकिन वे अपने कार्य में लग जायेंगे।
अभी पिछले सप्ताह एक जागरूक पाठक ने आउटलुक की हिन्दू आतंकवाद सम्बन्धी आवरण कथा की ओर मेरा ध्यान दिलाया। इस कहानी को लेकर अपनी जल्दबाजी की संक्षिप्त प्रतिक्रिया में मैने लिखा, “ इस लेख को भयंकर ढंग से हिन्दू आतंक का शीर्षक दिया गया है परंतु यह नहीं बताया गया है कि यह हिन्दू सिद्धांतों और हिन्दू परम्पराओ से किस प्रकार प्रेरित है। इसी प्रकार कुछ स्थानों पर हिन्दुत्व का भी सन्दर्भ लिया गया है परंतु इसके प्रयास नहीं हुए हैं कि हिन्दुत्व से उनका आशय क्या है और लेखक के अनुसार इसका अर्थ क्या है? “ लेकिन इसके उपरांत मैंने इस कहानी को फिर से पढा और मुझे पता लगा कि इसे बिकाऊ बनाने के लिये सनसनीखेज बनाया गया है। लेकिन इस लेख में इसके तथ्यों पर चर्चा की जायेगी।
यदि हम आउटलुक की कहानी पर लौटें हालाँकि न तो इस विषय पर यह पहली कथा है और न ही अंतिम होगी लेकिन इस कथा की समाप्ति इस कथन के साथ हुई कि जब सीबीआई सारे बिखरे हुए सूत्रों को एकसाथ जोडेगी तभी हिन्दुत्व आतंकवाद का समग्र चित्र सामने आ सकेगा। 2000 शब्दों के इस लेख को स्मृति कोप्पिकर, देबर्षि दासगुप्त और स्निग्धा हसन ने सहयोग दिया है “ हिन्दू आतंकवाद एक वास्तविकता है फिर भी भारत इस वास्तविकता को नाम नहीं देना चाहता”।
यह कथा मई में प्रवीन स्वामी के आउटलुक के ही लेख “ The Rise of Hindutva Terror” | पहले लेख की समीक्षा करना अधिक उचित होगा। प्रवीन स्वामी की यह रिपोर्ट आन्ध्र प्रदेश में हैदराबाद मे मक्का मस्जिद पर आक्रमण के सिलसिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक देवेन्द्र गुप्ता को उनके राजनीतिक सहयोगियों विष्णु प्रसाद और चन्द्रशेखर पाटीदार के साथ इस आक्रमण के लिये योजना बनाने के सन्देह में पकड्ने पर आधारित थी। Read more
हिन्दू आतंकवाद का मिथक
Written by: अमिताभ त्रिपाठी | July 19, 2010 | Category: आतंकवाद, इस्लामी राजनीति, कांग्रेस की राजनीति, वामपंथ, संस्कृति, हिन्दुत्व | 1 Comment
देश में इन दिनों आतंकवाद पर चर्चा जारी तो है पर इसका स्वरूप और परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। आज आतंकवाद को हिन्दुत्व और हिन्दू के साथ जोडकर प्रस्तुत किया जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से इस तरह के समाचार समाचार पत्रों और टीवी मीडिया में आये हैं कि देश में अनेक मस्जिदों और मुस्लिम क्षेत्रों में हुए आक्रमणों में कुछ हिन्दू तत्वों का हाथ रहा है। इन समाचारों को आधार बनाकर और कुछ छुटपुट पुरानी घटनाओं जैसे बम बनाने के प्रयास आदि को मिलाकर कुछ प्रमुख पत्रिकाओं ने हिन्दुत्व आतंकवाद, हिन्दू आतंकवाद , भगवा आतंकवाद जैसे मिथक और अवधारणायें चलाने का अभियान चलाया है।
विशेष रूप से आउटलुक पत्रिका के ऐसे कुछ लेखों में बतायी गयी घटनाओं की तकनीकी व्याख्या और समीक्षा भी आगे के आलेख में की जायेगी परंतु यहाँ हिन्दू आतंकवाद की परिभाषा और उससे जुडे मिथक के राजनीतिक और विचारधारागत पहलू पर चर्चा की जायेगी।
हिन्दू आतंकवाद की इस परिभाषा और इस मिथक को समग्र रूप से हम तब तक नहीं समझ सकते जब तक इसके पीछे के विचारधारागत आग्रह को नहीं समझ सकते। जिन लोगों को ऐसे आक्रमणों के लिये आरोपी बनाया गया है उनके मामले में न्यायिक प्रक्रिया चल रही है इसलिये उस पर चर्चा करना उचित नहीं होगा। चर्चा का विषय यह है कि क्या इन घटनाओं के आधार पर हिन्दू आतंकवाद , हिन्दुत्व आतंकवाद या भगवा आतंकवाद की बात करना उचित है? Read more
पत्रकारिता के ठेकेदारों कुछ तो शर्म करो
Written by: अमिताभ त्रिपाठी | July 18, 2010 | Category: हिन्दुत्व | Comment
इस देश में कुछ शब्द ऐसे हैं जिनका उपयोग ठीक इसके विपरीत आचरण के लिये किया जाता है। अभियव्यक्ति की स्वतंत्रता उसमें से एक है। लोकतांत्रिक अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इनका हनन किया जाता है और ठीक इसके विपरीत आचरण करने वाला इसका ठेकेदार हो जाता है। देश की स्वतंत्रता के उपरांत राजनीतिक आधार पर नेहरू परिवार और कम्युनिष्ट की सेक्युलरिज्म की परिभाषा को संस्थागत स्वरूप दे दिया गया और घोर फासीवादी स्वरूप में विरोधी विचार को दबाया गया और पत्रकारिता , अकादमिया और तथाकथित बौद्धिक संस्थानों पर नियंत्रण के द्वारा बौद्धिक बह्स को भी एकाँगी बना दिया गया और महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू को पैगम्बर और गान्धी के अहिंसा सिद्धांत को एक मजहब बना दिया गया और लोकतंत्र के नाम पर एक फासीवादी व्यवस्था को देश के राजनीतिक और बौद्धिक जगत पर लाद दिया गया कि इन पर प्रश्न उठाना ईश निन्दा माना जायेगा और इनके सेक्युलरिज्म की व्याख्या और नेहरू के कम्युनिष्ट और कमाल अतातुर्क( लेकिन अतातुर्क का प्रयोग उन्होंने हिन्दुओं के लिये किया) प्रेम को ही भारत की नयी सोच मानी जायेगी।
इसके परिणामस्वरूप भारत को कहने को तो पाँच हजार वर्ष पुरानी संस्कृति माना गया परंतु व्यवहार रूप में इसकी उत्पत्ति का श्रेय गाँधी और नेहरू को ही दिया गया और इसके पहले के इतिहास यहाँ तक कि बंकिमचंद्र चटर्जी और लोकमान्य तिलक को भी सेक्युलरिज्म के दायरे से बाहर मान लिया गया। लोकतन्त्र , सेक्युलरिज्म , अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर खोखले शब्दों के अतिरिक्त और क्या सम्मान है उसके प्रति इन तथाकथित पत्रकारों और संस्थागत बौद्धिक वर्ग में। Read more

