सामाजिक समरसता के उद्देश्य से दलितों को साथ लाने के जो प्रयास किये जा रहे हैं वह सराहनीय है पर जो सांकेतिक पहल हो रही है उससे साफ़ दिखता है कि इस पूरे मामले को देखने के नजरिये में जेनेरेशन गैप है |

जो सांकेतिक पहल अब हो रही है जैसे दलितों के संग भोजन , एक कुंए पर पानी भरना , एक शमशान में अंतिम संस्कार, मंदिर में सभी का प्रवेश | असल में यह सब जमीनी स्तर पर तीन पीढी पहले के मुद्दे थे और अब ये मुद्दे सवर्ण और दलितों के मध्य टकराव के मुद्दे हैं ही नहीं |
बीते अनेक दशकों में आर्थिक परिवर्तन ने चीजें कैसे बदली हैं इसका व्यावहारिक उदाहरण देखिये और यह तब पता चलता है जब आप जमीन से जुड़े हों| तीन पीढी पहले जो ठाकुर साहब या पंडित जी तथाकथित अश्प्रश्य को अपने बराबर नहीं बैठने देते थे उन्हीं की तीसरी पीढी में दोनों ओर के नौजवान साथ दूकान पर चाय पीते हैं ( मौक़ा पड़े तो रात को भी पीते हैं) , होटल में साथ खाते हैं और कई बार तो साथ में ऐसी नौकरी भी करते हैं कि अगर गाँव या शहर से बाहर रह रहे हैं तो एक ही कमरे में किराए पर रहते भी हैं| अगर तीन पीढी पहले नाई सामाजिक परम्परा के अनुसार अपना काम करते थे और शादी विवाह में अपनी भूमिका के लिए तथाकथित बड़े लोगों पर निर्भर थे तो अब उनकी ही तीसरी पीढी के लोगों की बाजार में या बड़े शहरों में फैंसी दूकान है और वे किसी भी प्रकार से सामाजिक तिरस्कार के शिकार नहीं हैं|

इसी प्रकार अन्य पारम्परिक जातियों के कार्य जैसे लोहार, कँहार( शादी में पालकी ढोने वाला), कुम्हार ( मिट्टी के बर्तन बनाने वाला) , मोची , धोबी , लोगों के खेतों में पढ़ी दर पीढी काम करने वाला अब पूरी तरह बदल गए हैं और तीसरी पीढी में अब कोई भी अपना परम्परागत काम नहीं करता और अधिकतर लोग तो साल के आठ नौ महीने अपने गाँव या शहर से बाहर ही रहते हैं|

भारत में जो परिवर्तन आये हैं उससे अब गाँव पूरी तरह बदल चुका है और अब भारत के ग्रामीण समाज को जो मदर इंडिया फिल्म या नदिया के पार के रूप में देख रहे हैं वे वही लोग हैं जो कभी न तो गाँव गए हैं और न गांवों में कभी रुके हैं|
इसी प्रकार सभी दलित बिरादरी की तीसरी पीढी अपने गाँव और शहर से बाहर कोई न कोई काम धंधा कर रहे हैं और अगड़े , पिछड़े दलित सभी साथ काम कर रहे हैं|

जो लोग कुएं पर साथ पानी पीने की बात कर रहे हैं वे यह भी नहीं जानते कि वर्षों पुराने अधिकतर कुएं सूख चुके है और हर गाँव में सरकारी नल लग गया है और मेरी जानकारी में पिछले बीस साल में ऐसी कोई घटना नहीं आयी है कि सरकारी नल पर कोई जातिगत भेदभाव हुआ हो|
असल में जो लोग अपनी पूरी शुभ इच्छा के साथ समाज को जोड़ने के अभियान में लगे हैं वे वास्तव में तीन पीढी पहले के सांकेतिक मुद्दों को पकड़कर उन ताकतों को मजबूत कर रहे हैं जो राजनीतिक कारण से इतिहास की मनमाफिक व्याख्या कर वर्तमान को अतीत का बंधक बनाकर रखना चाहते हैं|
मुझे तो बड़ा आश्चर्य होता है कि २०१६ में लोग किस पचड़े में फंस गए हैं यदि देश में दलित की स्थिति इतनी खराब है तो २००७ में जब मायावती जी देश के सबसे बड़े प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो उन्हें प्रदेश ने स्वीकार कैसे कर लिया और बिना किसी टकराव के उन्होंने अपना कार्यकाल कैसे पूरा किया ? मतलब साफ़ है ये सब राजनीतिक अधिक है और बेहतर तो यह होगा कि इस पूरे मामले का आर्थिक सर्वेक्षण हो कि देश में तथाकथित अगड़ी और पिछड़ी व दलित जातियों की स्थिति क्या है? किसके पास कितना राजनीतिक प्रतिनिधित्व है और आर्थिक स्थिति कैसी है ? स्थिति स्वयं स्पष्ट हो जायेगी|

कल्पना करिए कि ९० के दशक में यदि कोई सन्तान किसी ठाकुर , ब्राहमण या बनिया के घर पैदा हुई है और उसके पास न जमींदारी है, न धन है और न व्यापार तो उसे किस अपराध के लिए दण्डित किया जाता है कि तुम्हारे पुरखों ने कुछ ऐसा किया था कि अब तुम्हें सामान्य जीवन का सम्मान भी नहीं मिलेगा और इसके साथ ही पूरा जीवन इतिहास के एक अपराधी की तरह व्यतीत करोगे और हर नेता और तथाकथित समाज सुधारक तुम पर लानत देगा और ऐसे उदाहरण देगा जिसके लिए इस पीढी का दोष ही नहीं है|

आखिर ऐसा ही होता तो एक दलित मुख्यमंत्री न बन पाता , देश के कितने ही राज्यों के मुख्यमंत्री पिछड़े वर्ग के न होते और देश का प्रधानमंत्री स्वयं को बार बार पिछड़ा और दलित के लिए ही काम करने वाला ही न बता पाता| आज देश के कितने राज्यों के मुख्यमंत्री ब्राहमण , ठाकुर या बनिया हैं | तो फिर ऐसे अनावश्यक विषयों को कुरेद कर कौन सी सामाजिक समरसता की जा रही है?

यदि ऐसे ही चलता रहा तो जिस प्रकार देश में अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के विरुद्ध आन्दोलन खड़ा हो गया था उसी प्रकार जातिगत असंतुलन को लेकर आन्दोलन पनप जाएगा और हिन्दू एकता के लिए वर्षों तक काम करने वाले हिन्दू को जातियों में विभाजित करने के लिए दोषी बन जायेंगे |
गांधी जी भी देश को एक रखना चाहते थे पर उनका एकांगी झुकाव देश को भारी पडा |

यदि देश में बेरोजगार नौजवान को रोजगार नहीं मिलेगा और आर्थिक विकास नहीं होगा तो टकराव बढेगा इसलिए सारा ध्यान रोजगार बढाने पर होना चाहिए यदि इस पैमाने पर लोग खरे उतरे तो सफल होंगे वरना सामाजिक सुधार एक जटिल प्रक्रिया है क्योंकि इसमें परिभाषा भी अलग होती है और समाधान भी एक नहीं होता बल्कि समाधान देखने वाले के द्रष्टिकोण पर निर्भर करता है|