दीदी माँ

August 31, 2006 · Filed Under धर्म, संस्कृति · 1 Comment 

अभी कुछ दिनों पूर्व श्रीकृष्ण की लीला स्थली वृन्दावन जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ. श्रीकृष्ण की महक से सुवासित इस धार्मिक नगरी में अब भी एक अपना ही आकर्षण है. यहाँ मन्दिरों की बहुतायत और तंग गलियों के मध्य अब भी लोगों के ह्रदय में श्रीकृष्ण विद्यमान हैं. परन्तु इस नगरी में ही एक नये तीर्थ का उदय हुआ है और यदि वृन्दावन जाकर उसका दर्शन न किया तो समझना चाहिये कि यात्रा अधूरी ही रही.       यह आधुनिक तीर्थ दीदी माँ के नाम से विख्यात साध्वी ऋतम्भरा ने बसाया है. वृन्दावन शहर से कुछ बाहर वात्सल्य ग्राम के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान अपने आप में अनेक पटकथाओं का केन्द्र बन सकता है किसी भी संवेदनशील साहित्यिक अभिरूचि के व्यक्ति के लिये.      इस प्रकल्प के मुख्यद्वार के निकट यशोदा और बालकृष्ण की एक प्रतिमा वात्सल्य रस को साकार रूप प्रदान करती है. वास्तव में इस अनूठे प्रकल्प के पीछे की सोच अनाथालय की व्यावसायिकता और भावहीनता के स्थान पर समाज के समक्ष एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करने की अभिलाषा है जो भारत की परिवार की परम्परा को सहेज कर संस्कारित बालक-बालिकाओं का निर्माण करे न कि उनमें हीन भावना का भाव व्याप्त कर उन्हें अपनी परम्परा और संस्कृति छोड़ने पर विवश करे.         समाज में दीदी माँ के नाम से ख्यात साध्वी ऋतम्भरा ने इस परिसर में ही भरे-पूरे परिवारों की कल्पना साकार की है. एक अधेड़ या बुजुर्ग महिला नानी कहलाती हैं, एक युवती उसी परिवार का अंग होती है  जिसे मौसी कहा जाता है और उसमें दो शिशु होते हैं. यह परिवार इकाई परिसर में रहकर भी पूरी तरह स्वायत्त होती है. मौसी और नानी अपना घर छोड़कर पूरा समय इस प्रकल्प को देती हैं और वात्सल्य ग्राम का यह परिवार ही उनका परिवार होता है.         इसके अतिरिक्त वात्सल्य ग्राम ने देश के प्रमुख शहरों में हेल्पलाइन सुविधा में दे रखी है जिससे ऐसे किसी भी नवजात शिशु को जिसे किसी कारणवश जन्म के बाद बेसहारा छोड़ दिया गया हो उसे वात्सल्य ग्राम के स्वयंसेवक अपने संरक्षण में लेकर वृन्दावन पहुँचा देते हैं. दीदी माँ ने एक बालिका को भी दिखाया जिसे नवजात स्थिति में दिल्ली में कूड़ेदान में फेंक दिया गया था और उसक मस्तिष्क का कुछ हिस्सा कुत्ते खा गये थे. आज वह बालिका स्वस्थ है और चार वर्ष की हो गई है. ऐसे कितने ही शिशुओं को आश्रय दीदी माँ ने दिया है परन्तु उनका लालन-पालन आत्महीनता के वातावरण में नहीं वरन् संस्कारक्षम पारिवारिक वातावरण में हो रहा है. यही मौलिकता वात्सल्य ग्राम को अनाथालयों की कल्पना से अलग करती है.             दीदी माँ यह प्रकल्प देखकर जो पहला विचार मेरे मन में आया वह हिन्दुत्व की व्यापकता और उसके बहुआयामी स्वरूप को लेकर आया.ये वही साध्वी ऋतम्भरा हैं जिनकी सिंह गर्जना ने 1989-90 के श्रीराम मन्दिर आन्दोलन को ऊर्जा प्रदान की थी, परन्तु उसी आक्रामक सिंहनी के भीतर वात्सल्य से परिपूर्ण स्त्री का ह्रदय भी है जो सामाजिक संवेदना के लिये द्रवित होता है. यही ह्रदय की विशालता हिन्दुत्व का आधार है कि अन्याय का डटकर विरोध करना और संवेदनाओं को सहेज कर रखना.       सम्भवत: हिन्दुत्व को रात दिन कोसने वाले या हिन्दुत्व की विशालता के नाम पर हिन्दुओं को नपुंसक बना देने की आकांक्षा रखने वाले हिन्दुत्व की इस गहराई को न समझ सकें.

एक और फतवा

August 30, 2006 · Filed Under धर्म · 5 Comments 

अभी जब गणेश जी सहित देश के अनेक मन्दिरों में विभिन्न देवप्रतिमाओं ने दुग्ध पान किया तो सामान्य तौर पर हिन्दुओं ने इसे श्रद्धा के तौर पर नकारा भले न हो परन्तु धर्मगुरू और अन्य लोगों ने इसे अन्धविश्वास ही अधिक माना. इससे हिन्दू धर्म की तार्किकता प्रमाणित होती है.      परन्तु इसी देश में ऐसे धर्म के अनुयायी भी रहते हैं जो न केवल धर्म पालन में वरन् दिन प्रतिदिन के नियम पालन में भी धार्मिक कानून से ही संचालित होते हैं. अभी वन्देमातरम् पर फतवे की गूँज कम भी नहीं हुई थी कि सहारनपुर स्थित सुन्नी मुसलमानों के सबसे बड़े संस्थान दारूल उलूम देवबन्द ने लखनऊ के सलीम चिश्ती के प्रश्न के उत्तर में फतवा जारी किया है कि बैंक से ब्याज लेना या जीवन बीमा कराना इस्लामी कानून या शरियत के विरूद्ध है. दारूल उलूम के दो मुफ्तियों के साथ परामर्श कर मोहम्मद जफीरूद्दीन ने यह फतवा जारी किया . आल इण्डिया पर्सनल लॉ बोर्ड के अनेक सदस्यों ने इसे उचित ठहराया है. उनके अनुसार जीवन बीमा कराने का अर्थ है अल्लाह की सर्वोच्चता को चुनौती देना.       यह नवीनतम उदाहरण मुसलमानों की स्थिति पर फिर से विचार करने के लिये पर्याप्त है. आखिर जब इस आधुनिक विश्व में जब सभी धर्मावलम्बी लौकिक विषयों में देश के कानूनों का अनुपालन करते हैं तो फिर एक धर्म अब भी लौकिक सन्दर्भों में शरियत का आग्रह क्यों रखता है.      हो सकता है बहुत से लोगों का तर्क हो कि कितने मुसलमान शरियत के आधार पर चलते हैं, परन्तु प्रश्न शरियत के पालन का उतना नहीं है जितना यह कि शरियत का पालन कराने की इच्छा अब भी मौलवियों और मुस्लिम धर्मगुरूओं में है. यही सबसे खतरनाक चीज है क्योंकि शब्द और विचार ही वे प्रेरणा देते हैं  जिनसे व्यक्ति कुछ भी कर गुजरने का जज्बा पालता है. मुस्लिम समस्या का मूल यहाँ है, जब तक उनकी इस मानसिकता में बदलाव नहीं आयेगा प्रत्येक युग में इस्लामी कट्टरता का खतरा बना रहेगा.

August 30, 2006 · Filed Under अवर्गीकृत · Comment 

<a href=”http://www.technorati.com/claim/6e6xu7hn37” rel=”me”>Technorati Profile</a>

ह्रषीकेश दा

August 29, 2006 · Filed Under आत्मकथात्मक · 4 Comments 

किसी भी व्यक्ति के सामाजिक योगदान की समीक्षा इस आधार पर होती है कि उसके जीवनकाल से अधिक उसकी मृत्यु के बाद उसे समाज किस रूप में याद रखता है. इस कसौटी पर यदि प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ह्रषीकेश दा को परखें तो हम पाते हैं कि उनकी मृत्यु के साथ ही हिन्दी सिनेमा के एक ऐसे युग का अन्त हो गया है जिसमें फिल्में समाज के साथ जुड़कर आम दर्शक को उसके पात्रों के साथ आत्मसात् होने का अवसर प्रदान करती थीं. ह्रषीकेश दा की फिल्में गम्भीर मनोवैज्ञानिक चित्रण से लेकर गुदगुदाने वाले सजीव चित्रण तक विस्तृत थीं.          जिन भी दर्शकों ने अनुपमा फिल्म देखी होगी उन्हें अनुपमा और उसके पिता के मानसिक द्वन्द्व की यादें सदैव मस्तिष्क में ताजा रहेगी. इसी प्रकार अभिमान फिल्म के नायक के माध्यम से उन्होंने जिस प्रकार पुरूष प्रधान मानसिकता वाले कुण्ठित पति का जो स्वरूप लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया था वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है . इसी प्रकार आनन्द के बाबू मोशाय को भुला पाना किसी के लिये सम्भव हो पायेगा क्या. इसके साथ ही चुपके-चुपके फिल्म में ह्रषीकेश दा ने जिस सुन्दरता से हास्य व्यंग्य को प्रस्तुत किया वह उनकी बहुआयामी प्रतिभा और निर्देशन की कुशलता को प्रस्तुत करता है जब उन्होंने अपने समय के एक्शन हीरो को विनोदपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया. बावर्ची के राजेश खन्ना के माध्यम से दिया गया उनका सन्देश आज कहीं अधिक प्रासंगिक है जब व्यक्ति व्यावसायिक स्पर्धा में इस कदर लिप्त हो चुका है कि उसे खुलकर हंसना भी नहीं भाता.         लम्बे अन्तराल के उपरान्त जब ह्रषीकेश दा ने झूठ बोले कौवा काटे फिल्म बनाई तो उन्होंने दिखा दिया कि समय के साथ मनोरंजन के सिद्धान्तों में अन्तर नहीं आता और उनकी इस कला से उन निर्देशकों को शिक्षा लेनी चाहिये जो आज मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता, नग्नता और द्विअर्थी संवादों का सहारा लेते हैं.     ह्रषीकेश दा के निधन के बाद अब ऐसी फिल्में दुर्लभ हो जायेंगी जहाँ दर्शक फिल्म को स्वयं के साथ जोड़कर ओर स्वयं को फिल्म के साथ जोड़कर देख सकेगा.         ह्रषीकेश की आनन्द का नायक सामान्य व्यक्ति लगता था जो समुद्र के किनारे हाथ में गुब्बारों के साथ जब गाता था कहीं दूर पर जब दिन ढल जाये तो फिल्म देखने वाला सामान्य व्यक्ति नायक को अपनी पहुँच में पाता था, परन्तु आज जब कल हो न हो का नायक न्यूयार्क की सड़कों पर या डिस्को थेक में इट्स टाइम टू डिस्को गाता है तो यहीं फिल्मों के साथ जनता से जुड़ने की और जनता पर फिल्म थोपने की मानसिकता का अन्तर स्पष्ट हो जाता है.        ह्रषीकेश दा का यही योगदान समाज को है कि फिल्म निर्माण व्यवसाय नहीं सामाजिक दायित्व है परन्तु आज के निर्देशकों में इसी भावना का अभाव है. वे कहानी से लेकर जीवन शैली और पात्र से लेकर संवाद तक सब कुछ दर्शकों के मस्तिष्क में जबरन ठूँसना चाहते हैं.

हाय रे तुष्टीकरण

अपने पिछले चिट्ठे में जब मैंने वन्देमातरम् के विषय पर मुसलमानों द्वारा उठाई जा रही आपत्तियों के पीछे छुपी मानसिकता को उजागर करने का प्रयास किया था तो मुझे इस बात का भान नहीं था कि हमारे पूज्य सन्त भी इस विषय को लेकर व्यथित हैं. अभी दो दिन-तीन दिन पूर्व मुझे ज्ञात हुआ कि इस विषय पर मुसलमानों की हठधर्मिता पर कुछ प्रमुख सन्त न केवल क्षुब्ध हैं वरन् उन्होंने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से अपने क्षोभ को सार्वजनिक किया है.                           आर्ट ऑफ लिविंग फाउण्डेशन द्वारा जारी की गई गुरूवार दिनांक 25 अगस्त की गई प्रेस विज्ञप्ति में इस संस्था के संस्थापक श्री श्री रविशंकर व स्वामी चिदानन्द और स्वामी दयानन्द सरस्वती ने कुछ मुस्लिम संगठनों द्वारा वन्देमातरम् को इस्लाम विरोधी बताकर उसे न गाने के निर्णय को असहिण्णुता का एक उदाहरण बताते हुये प्रश्न किया है कि इस असहिण्णुता की कोई तो सीमा होनी चाहिये. कल हमसे कहा जायेगा कि नमस्ते मत बोलो फिर कहा जायेगा कि राष्ट्रीय ध्वज से भगवा रंग हटा दो.            प्राय: अनेक अवसरों पर शान्त रहने वाले सन्त भी इस विषय पर मुखर होकर बोल रहे हैं, जो इस विषय की गम्भीरता को स्पष्ट करता है. इतने विरोध के बाद भी कुछ राजनीतिक दलों को इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता कि मुसलमान इसे गाना नहीं चाहता.            वास्तव में यह विषय एक विचित्र मानसिकता को प्रतिबिम्बित करता है जिसमें वास्तविकता से मुँह चुराकर दूसरों पर आरोप मढ़कर स्वयं को सन्तुष्टि प्रदान कर दी जाती है. यह विचित्र रोग हमारे राजनेताओं और बुद्धिजीवियों को लग चुका है.             ऐसा प्रतीत होता है मानों शब्द अपनी सार्थकता खो चुके हैं. जैसे बारम्बार कहा जाता है कि हमारे देश में विधि का शासन है और सरकार के निर्णयों की समीक्षा करने का अन्तिम अधिकार न्यायालय को है , परन्तु राजनेता उसी हद तक न्यायालय की बात स्वीकार करते हैं जब तक न्यायालय के निर्णय उनके राजनीतिक हितों की पूर्ति करते हैं. अभी पिछले सप्ताह इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हज सब्सिडी रोकने का निर्णय दिया नहीं कि केन्द्र के सत्ताधारी दल ने इस निर्णय के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय जाने की बात कह दी, क्यों इसलिये कि यह निर्णय मुसलमानों के विरूद्ध है. यह रवैया तो यही स्पष्ट करता है कि मुसलमान और उन्हें वोट बैंक बनाकर उनकी जिद का पोषण करने वाले राजनीतिक दल कोई भी ऐसा निर्णय नहीं मानेंगे जो मुसलमानों से कर्तव्य पालन की अपेक्षा भी करेगा. यदि ऐसा ही है तो न्यायपालिका, व्यवस्थापिका या फिर संसद के ढाँचे से मुसलमानों को उन्मुक्ति दे देनी चाहिये.                शाहबानो प्रकरण से लेकर आज तक मुसलमानों ने किसी भी प्रगतिशील निर्णय को अपनी शरियत में हस्तक्षेप बताकर उसका प्रबल विरोध किया. ऐसे में इस बात की क्या गारण्टी है कि मुसलमान राम मन्दिर के विषय में अपने प्रतिकूल निर्णय होने पर स्वीकार करेगा.               आज वह अवसर आ गया है कि हम अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली इस संवैधानिक उदारता में छुपे अन्तर्निहित खतरे को भाँपे. विश्व में चल रहे इस्लामी आतंकवाद और इस मानसिकता में एक सम्बन्ध है. आखिर कहने से तो कुछ नहीं होता आचरण के आधार पर किसी का चरित्र प्रकट होता है. देश के प्रति लगाव के जो प्रतीक हैं आप उनकी अवहेलना करते हैं और रात-दिन गाते हैं कि हम सबसे पहले भारतीय हैं फिर मुसलमान, न्यायालय के निर्णय आपको स्वीकार नहीं, धर्म और राष्ट्रीय कर्तव्य में चयन के समय आपकी प्राथमिकता धर्म की मध्ययुगीन सोच है, देश के कानूनों मसलन, परिवार नियोजन, तलाक, सम
न नागरिक संहिता से आपको उन्मुक्ति चाहिये फिर किस आधार पर आपको देश से प्रेम है.
                     मुसलमानों के इस अलगाववादी विचार का पोषण करने वालों में हमारे तथाकथित बड़े नाम वाले पत्रकार भी हैं. अभी 26 अगस्त को इण्डियन एक्सप्रेस के सम्पादक ने अपनी कुशलता का परिचय देते हुये प्रसिद्ध शहनाई वादक स्व.उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की विशेषताओं के आधार पर इस्लामी आतंकवाद से मुसलमानों को अलग करने का प्रयास किया. यह विचित्र मानसिकता ही मुसलमानों को अलग-थलग करती है. आखिर भारत में रहने वाला व्यक्ति यदि अल्लाह के नाम पर रागभैरवी गाता है तो इसमें इतना अचरज क्यों, इस विषय को इतना महिमामण्डित करने की आवश्यकता क्या है, ऐसा इसलिये कि सेक्युलरिज्म के नाम पर मुसलमानों के मसीहा बनने वाले ये बड़े लोग स्वयं मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्य धारा का अंग नहीं मानते अन्यथा इस्लामी आतंकवाद की बहस में अब्दुल हमीद, उस्ताद या फिर स्वयं राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का नाम लेकर इस्लामी आतंकवाद बनाम मुसलमान की बहस की वास्तविकता से भागने का प्रयास न करते. यह किस भारतवासी को नहीं पता कि इस कोटि के मुसलमान अलगववाद या आतंकवाद के प्ररक नहीं है. इसके प्रेरक तो वे लोग हैं जो मस्जिदों में भाषण देकर मुस्लिम युवकों को को जेहाद के लिये प्ररित करते हैं या फिर वे मुस्लिम बुद्धिजीवी हैं जो मुस्लिम अत्याचार की झूठी कहानियाँ गढ़कर आम मुसलमान को उत्तेजित करते हैं.                   मुसलमानों के साथ देश में हो रहा विशेषाधिकारपूर्ण व्यवहार उन्हें मुख्यधारा में कभी नहीं ला सकता. क्योंकि यह व्यवहार उन्हें और जिद्दी और हठधर्मी ही बनायेगा. इसलिये आवश्यकता इस बात की है कि पूर्वाग्रह से मुक्त होकर मुस्लिम समस्या का समाधान खोजा जाये

Next Page »