माओवादियों की राह आसान नहीं

अपने पिछ्ले लेख वामपंथी इस्लामवादी गठजोड में मैने आशंका व्यक्त की थी कि जिस प्रकार भारत में कुछ प्रमुख समाचार पत्र नेपाल में माओवादियों की विजय को लेकर भारत में एक बौद्धिक वातावरण बनाकर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं उससे यह आभास होता है कि यह एक सुनियोजित प्रयास है। इस आशंका को बल तब और मिला जब अंग्रेजी के एक अग्रणी समाचार पत्र ने नेपाल में माओवादियों के नेता प्रचण्ड  का एक लम्बा साक्षात्कार दो दिनों की श्रृखला में प्रकाशित हुआ। इसी समाचार पत्र ने अपने सम्पादकीय और लेखों द्वारा देश के बौद्धिक और राजनेता वर्ग को समझाने का प्रयास किया था कि नेपाल में माओवादियों की विजय से भारत में नक्सलवादियों और माओवादियों को भी लोकतंत्र के मार्ग पर लाना सरल होगा और इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए नेपाल में माओवादियों की नयी सरकार का हरसम्भव सहयोग भारत को करना चाहिये। जिस प्रकार इस समाचार पत्र के संवाददाता ने प्रचण्ड के साथ पूरे साक्षात्कार में समस्त स्थितियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है उससे तो यह साक्षात्कार कम प्रचण्ड के लिये अपनी ओर से किया गया जनसम्पर्क का प्रयास अधिक लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस समाचार पत्र को या इसके कुछ लोगों को माओवादियों की छवि भारत में ठीक करने की बहुत शीघ्रता है। वैसे इस समाचार पत्र के प्रचण्ड से अच्छे सम्बन्ध काफी पहले से दिखते हैं क्योंकि इसी समाचार पत्र के इसी संवाददाता ने नेपाल में माओवादियों के आन्दोलन के समय भी 2006 में प्रचण्ड का साक्षात्कार लिया था जिसकी काफी चर्चा हुई थी।

 

 

यह तथ्य इस कारण महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी आन्दोलनकारी या भूमिगत उग्रवादी का साक्षात्कार लेने का अर्थ उससे सहानुभूति रखना होता है परंतु भारत में एक ऐसी विचारधारा अवश्य है जो माओवाद और नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति रखती है और उसे कानून व्यवस्था के स्तर से हल करने के स्थान पर आन्दोलन के रूप में देखने का आग्रह करती है। प्रचण्ड का साक्षात्कार लेने वाले समाचारपत्र ने अपनी सम्पादकीय और लेखों द्वारा छ्त्तीसगढ में सल्वा जुदूम अभियान को जमकर कोसा और अपने तर्क की पुष्टि में रा के एक पूर्व अधिकारी को भी उतार दिया। इन घटनाक्रमों को आपस में जोड्ने से ऐसा लगता है कि निश्चय ही यह पत्रकारिता से अधिक विचारधारा के प्रति निष्ठा है। क्योंकि यह तथ्य नहीं भूला जा सकता कि भारत में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय अब भी चरमपंथी वामपंथियों का गढ है और प्रचण्ड ने भी अपनी शिक्षा यहीं पूरी की थी तो निश्चय ही उस समय के कामरेड आज भी समाज में तो होंगे ही।

 

माओवादियों का विषय उठाने के पीछे एक प्रमुख कारण यह भी है कि भारत के तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया में जहाँ नेपाल में माओवादियों की विजय का उल्लास मनाया जा रहा है या उसके पक्ष में देश में अनुकूल वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है तो वहीं माओवादियों के विरुद्ध नेपाल और भारत के हिन्दू संगठनों द्वारा नेपाल में राजा की शक्तियों को क्षीण न होने देने और माओवादियों के उत्पात को रोकने के संकल्प को स्थान ही नहीं दिया जा रहा है। समाचारों के प्रति यह चयनित रवैया हमारी इस धारणा को पुष्ट करता है कि भारत के मीडिया में भी अब भी वामपंथियों का वर्चस्व है जो नेपाल में माओवादियों की विजय में वामपंथ का उत्थान देख रहे हैं और ऐसा प्रदर्शित करना चाहते हैं कि मानों नेपाल में माओवादियों की विजय नेपाल की जनता का जनादेश है। नेपाल में माओवादियों की विजय को लेकर भारत में मीडिया ने पूरे तथ्य सामने नहीं आने दिये कि माओवादियों की विजय का एक बडा कारण यंग कम्युनिष्ट मूवमेंट नामक माओवदियों की व्यक्तिगत सेना के आतंक का भी रहा। इसके आतंक की स्वीकारोक्ति प्रचण्ड ने अपने साक्षात्कार में भी की है।

 

अभी पिछ्ले रविवार को उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जनपद में देवीपाटन नामक स्थान पर विश्व हिन्दू महासंघ नामक संगठन का तीन दिवसीय अधिवेशन समाप्त हुआ। इस सम्मेलन में विश्व हिन्दू महासंघ के नेपाल के प्रतिनिधि और भारत में विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं ने भाग लिया। विश्व हिन्दू महासंघ की स्थापना 1981 में नेपाल के दिवंगत राजा बीरेन्द्र ने की थी और यह संगठन तब से भारत और नेपाल के मध्य हिन्दुत्व के विषय पर परस्पर सहमति से कार्यरत है। इस अधिवेशन की समाप्ति पर प्रस्ताव पारित किया गया कि नेपाल में माओवादियों की विजय के उपरांत भी यह संगठन राजा को किनारे लगाकर माओवादियों के देश पर शासन के किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देगा। इस अधिवेशन में विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंहल ने कहा कि यदि माओवादियों को ऐसा करने की छूट दी गयी तो वे और शक्ति एकत्र कर लेंगे और फिर भारत में प्रवेश कर हिन्दू संस्कृति को सदा सर्वदा के लिये नष्ट कर देंगे। सिंहल ने कहा कि तराई क्षेत्र में सशस्त्र गुट बनाने वाले मधेशियों ने बडे पैमाने पर विश्व हिन्दू महासंघ और विश्व हिन्दू परिषद को समर्थन दिया है। यह अधिवेशन गोरखपुर के गोरक्षनाथ मन्दिर में आयिजित हुआ था जिसमें भारत और नेपाल के 200 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। नेपाल में राजशाही के पतन के बाद से विश्व हिन्दू महासंघ के अध्यक्ष भारत केशर सिम्हा ने भारत और काठमाण्डू के मध्य अनेक दौरे कर राजा के पक्ष में समर्थन जुटाने का प्रयास किया।

 

इस अधिवेशन में राजा ज्ञानेन्द्र के विश्वासपात्र रायल नेपाल आर्मी के सेवानिवृत्त अधिकारी 72 वर्षीय हेम बहादुर कार्की को विश्व हिन्दू महासंघ का नया अध्यक्ष बनाया गया। कार्की ने कहा कि अब भी रायल आर्मी के सदस्य बडी मात्रा में राजा के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि इन अधिनायकवादियों और हिन्दू विरोधी शक्तियों के विरुद्ध युद्ध कर सकें। इस अधिवेशन में राजा ज्ञानेन्द्र को भी आना था परंतु नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए वे नहीं आये परंतु इस अधिवेशन के लिये उन्होंने अपना सन्देश भेजा और कहा कि वे अधिवेशन के प्रस्तावों का पालन करेंगे। अधिवेशन में पूर्व अध्यक्ष सिम्हा ने नेपाल में माओवादियों की सहायता के लिये भारत सरकार की आलोचना की और कहा कि सात दलों का गठ्बन्धन भारत सरकार के सहयोग से ही सम्भव हो सका। इस अवसर पर विश्व हिन्दू महासंघ के भारत के अध्यक्ष योगी आदित्यनाथ ने कहा कि वे सदैव से माओवादियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की बात करते रहे हैं।

 

 

इस अधिवेशन के सम्बन्ध में भारत में मीडिया में कोई बात न तो प्रकाशित हुई और न ही इसका कोई उल्लेख हुआ जबकि अधिवेशन की उपस्थिति और इसके प्रस्तावों के अपने निहितार्थ हैं। अधिवेशन में हुई चर्चा स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि नेपाल में राजा के प्रति ऐसा वातावरण नहीं है जैसा माओवादी समस्त विश्व को प्रदर्शित कर रहे हैं। यदि माओवादी अब भी राजा को अपमानित करने या उन्हें देश से बाहर निकालने का यत्न करते हैं तो इसका उल्टा परिणाम होगा। यह बात माओवादियों को भी पता लग चुकी है और यही कारण है कि चुनाव से पहले बढ चढ कर बातें करने वाले माओवादी अब राजा के साथ किसी फार्मूले की तलाश में जुट गये हैं।

 

 

 

भारत में मीडिया में बैठे वामपंथी विचारों के चिंतक और लेखक नेपाल में माओवादियों की विजय को भले ही स्थायी मानकर चल रहे हों परंतु भारत सरकार को अपने देश की सुरक्षा की दृष्टि से नेपाल में माओवादी उग्रवाद की समाप्ति और नेपाल में राजा की शक्ति के विकल्प पर विचार करना चाहिये।

 

 

वैसे नेपाल में संवैधानिक सभा के पूरे परिणाम आने के बाद पूरी संविधान सभा में माओवादियों को बहुमत नहीं मिला है और उन्हें नेपाली कांग्रेस, यूएमएल और उपेन्द्र यादव की मधेशी जनाधिकार मोर्चा पर भी निर्भर होना पडेगा। उधर विश्व बाजार में तेल की बढ्ती कीमतों, मंहगाई के चलते भी माओवादी सरकार के सामने चुनौती है जिसके चलते उनका तेवर नरम पडा है पर उनकी बात पर भरोसा करना मुश्किल है विशेषकर तब जबकि अपने साक्षात्कार में प्रचण्ड ने भारत और ब्रिटेन जैसे लोकतंत्र को औपचारिक लोकतंत्र बताया है जो सभी वर्गों के लिये प्रतिनिधित्वकारी नहीं है और इस कारण माओवादी नेपाल में बहुदलीय व्यवस्था रखते हुए भी किसी अन्य विकल्प पर विचार करेंगे अर्थात पिछ्ले दरवाजे से अपना एजेण्डा लागू करने की सम्भावना दिखती है। दूसरा खतरनाक पक्ष है कि नेपाल की सेना में माओवादी लडाकों को समायोजित किया जायेगा और इसका आधार केवल प्रचण्ड का केवल यह आश्वासन होगा कि इन लडाकों को पेशेवर बना दिया जायेगा। यह कितना अस्पष्ट आधार है और इसका परिणाम कितना घातक है। जब नेपाल की सेना माओवादी विचार की होगी तो अपने पडोसी पर भारत कितना भरोसा कर सकता है कि वह कब चीन के हाथ का खिलोना न बन जाये। प्रचण्ड यह भी कह्ते हैं कि नेपाल की सेना का आकार भी कम किया जायेगा अर्थात नेपाल के सुरक्षा पूरी तरह माओवादियों के हाथ में होगी।

 

पहले लोकतंत्र के बने स्वरूप में परिवर्तन फिर सेना में माओवादी लडाकों के भर्ती फिर सेना का स्वरूप छोटा किया जाना अर्थात अधिनायकवादी शासन की पूरी तैयारी। इसके अतिरिक्त प्रचण्ड ने इस बात की गारण्टी भी नहीं दी है कि वे भारत के माओवादियों या नक्सलियों को उनका रास्ता अपनाने की सलाह देंगे उनके अनुसार भारत में नक्सलियों और माओवादियों के लक्ष्य अलग है इसलिये यदि वे उनसे प्रेरित होकर बुलेट छोड्कर बैलेट के रास्ते पर आते हैं तो अच्छा है। इससे साफ जाहिर है कि नेपाल में माओवादियों को समर्थन का असर भारत में नक्सलियों या माओवादियों पर नहीं पड्ने वाला है लेकिन इस बात के पैरवी करने वालों को यह बात समझ में क्यों नहीं आती। कुलमिलाकर नेपाल में स्थिति अब भी साफ नहीं है और माओवादियों को भी अनेक चुनौतियों का सामना करना बाकी है ऐसे में भारत के पास अब भी अवसर है कि वह नेपाल में अपने हित पहचान ले और जो भूल पिछ्ले तीन चार वर्षों में की है उसे सुधार कर नेपाल में माओवादियों की शक्ति कम करने का प्रयास करे। भारत के सहयोग के बिना माओवादियों का नेपाल में शासन करना सम्भव नहीं है इसी कारण प्रचण्ड भारत सरकार को सन्देश दे रहे है कि वह अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों का उपयोग कर नेपाल माओवादियों को आतंकवादी सूची से हटवा दे। लेकिन भारत सरकार को ऐसा कोई कदम उठाने से पहले इसके हानि लाभ पर विचार कर लेना चाहिये।

सोनिया के निशाने पर हिन्दू नेता

न्यूयार्क। न्यूयार्क स्थित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश ने न्यूयार्क राज्य के सर्वोच्च न्यायालय में तीन प्रमुख हिन्दू कार्यकर्ताओं नारायण कटारिया, अरीश साहनी और भरत बराई के विरुद्ध 100मिलियन डालर का मानहानि का दावा दायर किया है। इन कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया है कि इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गान्धी द्वारा पिछ्ले वर्ष अक्टूबर में अमेरिका की यात्रा के समय अमेरिका के प्रमुख समाचार पत्र न्यूयार्क टाइम्स में पूरे एक पेज का विज्ञापन प्रकाशित कराया था और उसमें श्रीमती सोनिया गान्धी और उनके पुत्र राहुल गान्धी का कथित अपमान किया गया था।

 

इस मामले के वादी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी डा. सुरेन्द्र मल्होत्रा ने अपनी शिकायत में न्यायालय के समक्ष कहा है कि पिछ्ले वर्ष 6 अक्टूबर को न्यूयार्क टाइम्स में श्रीमती सोनिया गान्धी और उनके पुत्र राहुल गान्धी के सम्बन्ध में विज्ञापन में गलत सूचनायें प्रकाशित की गयी थीं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने मुकदमे की पैरवी के लिये उसी कानूनी फर्म की सेवायें ली हैं जिसने टाइम पत्रिका  के विरुद्ध इजरायल के एरियल शेरोन का प्रतिनिधित्व किया था।

 

दूसरी ओर अपने मुकदमे की पैरवी के लिये नारायण कटारिया और अरीश साहनी ने कोर्नस्टॆन वीज वेक्स्लर एण्ड पोलार्ड को नियुक्त किया है जो कि अपनी कुशलता के लिये जानी जाती है। उधर इस मुकदमे में प्रतिवादी बनाये गये एक अन्य सदस्य भरत बराय ने दावा किया है कि वह किसी भी प्रकार से विज्ञापन का हिस्सा नहीं थे और स्वतंत्र रूप से इस मुकदमे के विरुद्ध पैरवी कर रहे हैं।  

 

डा. भरत बराय ने इस मुकदमे में अपना नाम घसीटने के लिये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश के विरुद्ध जवाब में मान हानि का दावा करने का निश्चय किया है। डा. भरत का कहना है कि उनका विज्ञापन से कुछ भी लेना देना नहीं है न तो उन्होंने इसका डिजाइन बनाया और न हि उन्होंने इसके लिये धन दिया और विज्ञापन में सम्पर्क के लिये जिनका नाम था उस सूची में भी उनका नाम नहीं था।

 

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विदेश के इस फैसले के बाद अमेरिका में इस विषय पर ध्रुवीकरण तेज हो गया है। इन तीनों का समर्थन करने वाले हिन्दू नेता इस निर्णय पर सवाल उठा रहे है और उनका आरोप है कि जब यह विज्ञापन सार्वजनिक रूप से प्रकाशित हुआ था और लोगों के सामने यह काफी लम्बे समय तक आता रहा और विभिन्न मीडिया माध्यमों में बार बार प्रकाशित होता रहा तो फिर यह मुकदमा दायर करने के पीछे प्रमुख उद्देश्य क्या है। इन नेताओं का मानना है कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सोनिया गान्धी और सुरेन्द्र मल्होत्रा इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता प्रथम संविधान संशोधन के द्वारा प्रत्येक अमेरिकी नागरिक का अधिकार  है। कटारिया और साहनी भारतीय जनता पार्टी के ओवरसीज फ्रेण्ड्स के नेता भी हैं और इसके अतिरिक्त वे इण्डियन अमेरिकन इंटेलेक्चुअल फोरम भी चलाते हैं। इन लोगों ने पिछ्ले वर्ष गान्धी हेरिटेज फाउण्डेशन की स्थापना भी की थी जिसने सोनिया गान्धी के संयुक्त राष्ट्र संघ में सोनिया गान्धी के आगमन का विरोध किया था।

 

 

न्यूयार्क के एक प्रभावी हिन्दू नेता का मानना है कि यह मुकदमा केवल कुछ व्यक्तियों को निशाना बनाकर दायर नहीं किया गया है वरन इसके निशाने पर समस्त अनिवासी भारतीय हैं। उनके अनुसार इस मुकदमे के पीछे प्रमुख उद्देश्य अमेरिका में हिन्दू नेताओं की उत्साह भंग करना, उन्हें जबरन चुप कराना, आर्थिक दृष्टि से उन्हें दीवालिया बनाना, प्रताडित कर उन्हें झुकने के लिये विवश कर देना। इसके अतिरिक्त एक और प्रमुख उद्देश्य यह है कि भारत से बाहर सोनिया खानदान के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज को सख्ती से कुचल देना यहाँ तक कि उन देशों में भी जहाँ के संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारण्टी दी गयी है’’|

 

 

अमेरिका के अधिकतर हिन्दू मानते हैं कि नारायण कटारिया और अरीश साहनी दशकों से हिन्दू हितों के लिये संघर्ष कर रहे हैं और वे ऐसे दबावों के आगे झुकने वाले नहीं हैं। नारायण कटारिया 78 वर्षीय एक सेवानिवृत्त व्यक्ति हैं और इस बात के लिये संकल्पबद्ध हैं कि वे इस मुकदमे को अंत तक लडेंगे भले ही इसके लिये उन्हें अपनी पेंशन के फण्ड से धन खर्च करना पडे।

 

ऐसा प्रतीत होता है कि यह मुकदमा कटारिया सहित उन लोगों को नीचा दिखाने की योजना है हिन्दुओं के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं। पिछ्ले कुछ वर्षों मे नारायण कटारिया उत्तरी अमेरिका में एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिसने जिहाद जैसे विषय पर मुखर होकर हिन्दुओं की चिंतायें लोगों के समक्ष रखीं तथा  संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष सोनिया गान्धी के विरुद्ध प्रदर्शन करवाया और हिन्दू देवी देवताओं की नग्न चित्र बनाने वाले पेंटर मकबूल फिदा हुसैन की अनेक प्रदर्शनियों को रूकवाया। कटारिया और साहनी को ब्रिटेन, यूरोप, मध्य पूर्व और अफ्रीका के अनेक देशों से सहायता प्राप्त हो रही है। इन हिन्दू नेताओं के मित्रों ने इनके मुकदमे के लिये आर्थिक सहायता एकत्र करने हेतु एक समिति गठित की है तथा मुकदमा लडने के लिये भी एक समिति बनाई है।

 

 

आप भी इस कार्य में अपना योगदान कर सकते हैं। इसके लिये अपना चेक इस पते पर Narain Kataria, 41-67 Judge Street, Apt-5P, Elmhurst, New York 11373 ‘Hindu support fund’ के नाम पर भेजें। प्राप्त धन का प्रबन्धन समुदाय के नेताओं द्वारा किया जायेगा और इसका अंकेक्षण भी स्वतत्र रूप से होगा।

हरभजन ने नाक कटाई

April 26, 2008 · Filed Under अवर्गीकृत · Comment 

अब जबकि यह स्पष्ट हो गया है कि 25 अप्रैल को मोहाली में मुम्बई इण्डियन और किंग्स इलेवन के मध्य हुए मैच के उपरांत मुम्बई इण्डियन के कार्यवाहक कप्तान हरभजन सिंह ने किंग्स एलेवन की टीम के सदस्य और भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज और अपने सहयोगी श्रीकुमारन श्रीसंत को झापड मार दिया था तो हरभजन सिंह मुसीबत में फँसते नजर आ रहे हैं। कल तक इस विषय पर ना नुकुर करने वाली बीसीसीआई और किंग्स इलेवन फ्रेंचाइजी की स्वामिनी प्रीती जिंटा ने अब इस घटना को स्वीकार किया है और श्रीसंत की टीम ने औपचारिक शिकायत बीसीसीआई को भेजकर स्पष्ट किया है कि हरभजन सिंह ने यह हरकत बिना किसी उकसावे के की है और इसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। किंग्स इलेवन की शिकायत पर बीसीसीआई ने स्पष्ट किया है कि पूरे मामले की जाँच मैच रेफरी फारूख इंजीनियर करेंगे और मामले में दोषी पाये जाने पर हरभजन सिंह के विरुद्ध आईसीसी के नियमों के अंतर्गत कार्रवाई होगी। इस नियम के अंतर्गत हरभजन सिंह पर शेष मैचों के लिये प्रतिबन्ध लग सकता है।

इस घटना से समस्त देश के क्रिकेट प्रेमी हतप्रभ हैं और कुछ ही महीने पहले एंड्र्यू सायमण्ड्स के साथ आस्ट्रेलिया दौरे में हुए विवाद के समय जिस हरभजन के साथ राष्ट्र की प्रतिष्ठा के नाम पर एकसाथ खडे थे वही क्रिकेट प्रेमी आज देश के विभिन्न हिस्सों में हरभजन सिह का पुतला फूँक रहे हैं।

इस घटनाक्रम में सर्वाधिक रोचक और अपमानजनक तथ्य यह है कि जिस टूर्नामेंट में हरभजन सिंह ने यह हरकत की है उसमें अधिकाँश आस्ट्रेलियाई खिलाडी भी भाग ले रहे हैं जिन्होंने अभी कुछ महीने पूर्व ही हरभजन सिंह पर असभ्य आचरण का आरोप लगाते हुए उन्हें नस्लभेदी और जंगली घास फूस तक कह डाला था। आज आस्ट्रेलिया के ये खिलाडी निश्चय ही मन ही मन मुस्करा रहे होंगे कि हरभजन सिंह ने अपने आचरण से समस्त विश्व को सन्देश दे दिया है कि उन्हें अपने ऊपर नियंत्रण नहीं है और वे मैदान पर अपना आपा खो देते हैं। हरभजन सिंह ने इस बार अपने आचरण का निशाना अपनी ही टीम के एक सदस्य को बनाया जो टीम में उन्हें बडे भाई के समान देखते हैं।

 

इस घटनाक्रम से क्रिकेट के नये तेवरों पर सवाल उठता है। आस्ट्रेलिया में अपने शानदार प्रदर्शन के बाद एकदिवसीय मैचों के लिये टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने बडे जोर शोर से दावा किया था कि आज क्रिकेट केवल मैदान का ही खेल नहीं रह गया है और इसमें स्लेजिंग भी हिस्सा हो गया है और उन्हें इस बात की खुशी है कि उनकी टीम में अनेक ऐसे खिलाडी हैं जो अपने जज्बात पर काबू रखते हुए दूसरी टीम के खिलाडियों को हर दृष्टि से जवाब देने में सक्षम हैं। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान के ऐसे विचारों को भारतीय क्रिकेट में नये युग की संज्ञा दी गयी और क्रिकेट प्रेमी भी इस बात पर फूले भी नहीं समाये कि अब भारतीय टीम भी गाली गलौज में गोरी चमडी को शिकस्त देने में सक्षम है परंतु शायद हम यह भूल गये कि शालीनता छोड्कर आक्रामक व्यवहार अपनाने के अपने लाभ हैं तो उससे हानि भी है। हरभजन सिंह की असभ्यता यही संकेत देती है कि वास्तव में भारत में क्रिकेट का तेवर बदल रहा है।

 

इस घटना से एक और आशंका को बल मिलता है कि अब क्रिकेट का स्वरूप बदल रहा है और यह यूरोप के फुटबाल की शक्ल लेता जा रहा है जहाँ हार के तनाव में खिलाडियों का आपा खोना आम बात है। आई पी एल को जिस प्रकार चालाकी से फुटबाल का यूरोपीय संस्करण बनाया जा रहा है उससे क्रिकेट की हत्या सुनिश्चित है। यहाँ तक कि प्रसिध्द क्रिकेट विश्लेषक और कमेंटेटर हर्ष भोगले ने भी एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र में अपने स्तम्भ में आई पी एल को एक स्वाभाविक विकास बताया और कहा कि परिवर्तन होना अवश्यंभावी होता है आप चाहें या नहीं। हर्ष भोगले की बात से सहमति रखते हुए भी ऐसा लगता है कि यह परिवर्तन उतना स्वाभाविक नहीं है जितना इसके पीछे बाजारी शक्तियों की पैतरेबाजी है। आज क्रिकेट बाजार का एक हिस्सा हो गया है जो दूसरे सन्दर्भ में ही की गयी पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान शोएब मलिक की इस टिप्पणी को न्यायसंगत ठहराता है कि आईपीएल एक बालीवुड का शो जैसा लगता है।

 

हरभजन सिंह की हरकत तो एक संकेत मात्र है जो आने वाले दिनों में क्रिकेट में होने वाले परिवर्तन को इंगित करता है। अभी तो इसी प्रकार का उन्माद और जुनून यूरोप में फुटबाल क्लबों की भाँति आईपीएल की टीमों के समर्थकों में भी देखने को मिलेगा। कुल मिलाकर बाजार और पैसे की ताकत ने क्रिकेट के स्वभाव को बदलने का मन बना लिया है और अब खिलाडियों की प्रेरणा राष्ट्र ध्वज नहीं होकर उनपर लगने वाली बोली हुआ करेगी और अपनी ही टीम के खिलाडी एक दूसरे को प्रतिद्वन्दी के रूप में देखेंगे और महेन्द्र सिंह धोनी के नये तेवरों का जमकर प्रयोग करेंगे।

वामपंथी-इस्लामवादी गठजोड

नेपाल में माओवादियों की विजय के उपरांत अनेक प्रकार के विचार सामने आने लगे हैं। भारत में इस विषय पर विभिन्न समाचार पत्रों में जो लेख या सम्पादकीय लिखे जा रहे हैं उससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि नेपाल में माओवादियों की विजय को दो सन्दर्भों में देखा गया हैं। एक विचार के अनुसार नेपाल में माओवादियों की विजय का लाभ उठाकर भारत में वामपंथी उग्रवादियों नक्सलवादियों या फिर माओवादियों को भी मुख्यधारा में शामिल करने के प्रयास करने चाहिये। अनेक बडे समाचार पत्रों ने अपनी सम्पादकीय और लेखों के द्वारा सरकार को सलाह दी है कि नेपाल में माओवादियों की विजय से एक स्वर्णिम अवसर भारत को मिला है कि वह भारत में नक्सलियों को लोकतंत्र का मार्ग अपनाने को प्रेरित करे। इसके अतिरिक्त नेपाल में माओवादियों की विजय को लेकर एक दूसरी विचारधारा भी है जो मानती है कि अब नेपाल भारत की सुरक्षा की दृष्टि से एक बडा खतरा बन जायेगा और भारत का हित इसी में है कि नेपाल में माओवादी हिंसा को नष्ट करने की दिशा में भारत प्रयास जारी रखे और बदली परिस्थितियों में भी राजा को नेपाल में प्रासंगिक बना कर रखे। इन दोनों ही विचारों में से कौन सा विचार आने वाले समय में प्रभावी होने वाला है यह कहने की आवश्यकता नहीं है।

हमारे लेख का विषय यह है कि नेपाल में माओवादियों की विजय का भारत की सुरक्षा पर दीर्घगामी स्तर पर क्या प्रभाव पडने वाला है। अभी हाल के अपने अंक में प्रसिद्ध पत्रिका तहलका ने भारत में नक्सलियों के समर्थक और उनके बौद्धिक प्रवक्ता माने जाने वाले बारबरा राव का एक साक्षात्कार प्रकाशित किया है और इसमें उनसे जानने का प्रयास किया है कि नेपाल में माओवादियों की विजय का भारत के नक्सल आन्दोलन पर क्या प्रभाव पडने वाला है। पूरे साक्षात्कार में बारबरा राव ने अनेक बातें की हैं परंतु जो अत्यंत मह्त्वपूर्ण बात है वह यह कि नेपाल और भारत के माओवादियों के लक्ष्य में मूलभूत अंतर है एक ओर नेपाल के माओवादियों का उद्देश्य जहाँ नेपाल में राजशाही समाप्त कर गणतंत्र की स्थापना था वहीं भारत में नक्सली या माओवादी एक व्यवस्था परिवर्तन या समानांतर राजनीतिक प्रणाली का आन्दोलन चला रहे हैं। इस व्यस्था परिवर्तन के मूल में शास्त्रीय साम्यवादी सोच है कि उत्पादन के साधनों पर सर्वहारा समाज का अधिकार हो। बारबरा राव का मानना है कि अभी यह देखना होगा कि नेपाल का शासन किस प्रकार चलाया जाता है। इस साक्षात्कार से एक बात स्पष्ट होती है कि नेपाल के माओवादियों के प्रति भारत के नक्सली कोई दुर्भाव नहीं रखते जैसा कि भारत में कुछ समाचार पत्रों ने नेपाल में माओवादियों की विजय के बाद समाचारों में लिखा था कि भारत स्थित माओवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आने से नेपाली माओवादियों से खिन्न हैं। बारबरा राव की बातचीत से स्पष्ट है कि भारत स्थित नक्सली या माओवादी नेपाल की परिस्थितियों पर नजर लगाये रखेंगे।

 

भारत में जिस प्रकार नेपाल में माओवादियों की विजय के उपरांत उनको अवसर देने के नाम पर या फिर भारत में नक्सलियों को लोकतांत्रिक बनाने के नाम पर जिस प्रकार माओवादियों की विजय को स्वीकार कराया जा रहा है और उससे भी आगे बढकर भारत सरकार पर एक बौद्धिक दबाव बनाया जा रहा है कि वह माओवादियों को हाथोंहाथ ले इसके बाद भी कि माओवादी नेता प्रचण्ड अपनी विजय के उपरांत दहाड दहाड कर कह रहे हैं कि वे भारत के साथ पुरानी सभी सन्धियाँ भंग कर भारत के साथ नेपाल के सम्बन्धों की समीक्षा नये सन्दर्भ में करेंगे। इस प्रकार भारत विरोधी वातावरण के बाद भी नेपाल में माओवादियों की विजय को भारत के लिये उपयुक्त ठहराने वाले कौन लोग हैं और इसके पीछे इनका उद्देश्य क्या है?

 

यही वह बिन्दु है जो हमें सोचने को विवश करता है और देश में वामपंथी विचारधारा के झुकाव को स्पष्ट करता है। इसमें बात में कोई शक नहीं है कि भारत के बडे समाचार पत्रों में निर्णायक पदों पर वही लोग बैठे हैं जो शीतकालिक युद्ध की मानसिकता के हैं और उस दौर के हैं जब वामपंथी विचारधारा कालेज कैम्पस में फैशन हुआ करती थी। इस विचारधारा को पिछले 25 वर्षों में अनेक उतार चढाव देखने पडे हैं। पहले राम मन्दिर के रूप में हिन्दुत्व आन्दोलन ने फिर सामाजिक न्याय के मण्डल आन्दोलन ने समाज का ध्रुवीकरण इस आधार पर कर दिया कि वामपंथी विचारधारा हाशिये पर चली गयी। ऐसी परिस्थितियों में यही वामपंथी विचार के पत्रकार जातिवादी दलों और हिन्दुत्व विरोधी शक्तियों के साथ चले गये और सेकुलरिज्म के नाम पर एक नया मोर्चा बना लिया जिसका एक साझा कार्यक्रम हिन्दुत्व विरोध था। फिर भी यह विचारधारा पूरी तरह वामपंथ पर आधारित नहीं थी।

 

2000 के बाद समस्त विश्व में एक नया परिवर्तन आया है और वैश्वीकरण के विरुद्ध प्रतिक्रिया और इस्लामी आतंकवाद का उत्कर्ष एक साथ हो रहा है। एक ओर जहाँ वैश्वीकरण के नाम पर सामाजिक असमानता बढ रही है तो वहीं एक वैकल्पिक विश्व व्यवस्था के नाम पर इस्लामवादी शक्तियाँ कुरान और शरियत पर आधारित विश्व व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं। वैश्वीकरण से उपजे सामाजिक असंतुलन के चलते समाज में आन्दोलन के लिये जो वातावरण पनप रहा है उसका कुछ हद तक उपयोग भारत में नक्सली कर रहे हैं। इस प्रकार नक्सलियों के आन्दोलन का सूत्र भी वर्तमान विश्व व्यवस्था का विरोध है और इस्लामवादी पुनरुत्थान आन्दोलन का लक्ष्य भी कुरान आधारित विश्व की स्थापना है। भारत में दोनों ही शक्तियाँ अर्थात नक्सली और इस्लामवादी हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक और अपना शत्रु मानती हैं।

 

यह निष्कर्ष मैंने अपने अनुभव के आधार पर निकाला है। आज से कोई दो वर्ष पूर्व मुझे नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ जाने का अवसर मिला और उन हिस्सों में भी जाने का अवसर मिला जो नक्सल प्रभावित या नक्सल प्रभाव वाले हैं। अपनी यात्रा के दौरान नक्सलियों के पूरे कार्य व्यवहार को जानने का अवसर मिला। नक्सलवादी एक समानांतर व्यवस्था पर काम कर रहे हैं। छ्त्तीसगढ जैसे क्षेत्र में जो भौगोलिक दृष्टि से काफी बिखरा है और कुछ गाँवों में तो केवल एक तो घर ही हैं और पिछ्डापन इस कदर है कि इन क्षेत्रों में रहने वाले निवासी देश क्या होता है यह तक नहीं जानते। ऐसे पिछ्डे क्षेत्रों में शिक्षा का बहुत बडा अभियान संघ परिवार के एकल विद्यालय चला रहे हैं जहाँ दूर दराज के घरों में भी आपको भारतमाता के कैलेण्डर मिल जायेंगे। खैर इसके बाद भी नक्सलवादियों का प्रभाव इन क्षेत्रों में बहुत अधिक है और उनके अपने विद्यालय हैं जहाँ वे जनजातिय लोगों के बच्चों को अपने पाठ्यक्रम के आधार पर शिक्षा देते हैं और बच्चों के अभिभावकों को धन भी देते हैं। इन पाठ्यक्रमों के अंतर्गत साम्राज्यवाद और हिन्दुत्व को सहयोगी सिद्ध करते हुए दोनों को समान रूप से शत्रु बताया जाता है। यही नहीं तो नक्सलियों की एक पत्रिका मुक्तिमार्ग  भी इस क्षेत्र से निकलती है जिसमें भी इसी प्रकार के भाव व्यक्त किये जाते हैं। इस अनुभव को पाठकों से बाँटना इसलिये आवश्यक था कि इन चीजों को देखकर दो वर्ष पूर्व जो विचार मेरे मन में आया था और जिसके बारे में उस समय भी मैने लिखा था वह यह कि नक्सलियों का यह भाव एक बडे संकट को जन्म दे सकता है और वह यह कि भारत में और विश्व स्तर पर वामपंथ और इस्लामवाद के समान उद्देश्य होने के कारण किसी स्तर पर आकर वे एक दूसरे के सहयोगी बन सकते है।

 

 नेपाल में माओवादियों की विजय के उपरांत जिस प्रकार की प्रतिक्रिया भारत में तथाकथित बुद्धिजीवियों और पत्रकारों के मध्य हुई है उससे एक आशंका को बल मिलता है कि वामपंथ के थके सिपाही एक बार फिर विश्व स्तर पर साम्राज्यवाद को और भारत में हिन्दुत्व को निशाना बना कर इस्लामवादियों के साथ आ सकते हैं।

 

वैसे वामपंथियों का मुस्लिम साम्प्रदायिकता का सहयोग देने का पुराना इतिहास रहा है और भारत के विभाजन के लिये मुस्लिम लीग को वैचारिक अधिष्ठान प्रदान करने का कार्य वामपंथियों ने ही किया था। भारत में पिछ्ले 25-30 वर्षों से हाशिये पर आ गये वामपंथियों को सुनहरा अवसर 2004 में मिला जब वे केन्द्र में सत्तासीन दल के प्रमुख घटक बने और विदेश नीति सहित अनेक मुद्दों पर वीटो लगाने में सफल रहे। वामपंथियों ने नेपाल में माओवादियों को नेपाल की सत्ता तक लाने में भारत की ओर से मध्यस्थता की और राजतंत्र समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया। कुछ वर्षों पहले भारत के दक्षिणी राज्य केरल में हुए विधानसभा चुनावों में वामपंथियों ने विदेश नीति को मुद्दा बनाकर चुनाव लडा और आई ए ई ए में भारत द्वारा ईरान के विरुद्ध किये गये मतदान को मुस्लिम वोट से जोडा और फिलीस्तीन के आतंकवादी नेता और अनेकों इजरायलियों की हत्या कराने वाले इंतिफादा के उत्तरदायी यासिर अराफात का चित्र लगाकर वोट की पैरवी की। इसी प्रकार अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश की भारत यात्रा के दौरान मुम्बई और दिल्ली में इस्लामवादियों के साथ मिलकर बडी सभायें कीं और अमेरिका के राष्ट्रपति को संसद का संयुक्त सत्र सम्बोधित करने से रोक दिया। डेनमार्क में पैगम्बर मोहम्मद का आपत्तिजनक कार्टून प्रकाशित होने पर यही वामपंथी इस्लामवादियों के साथ सड्कों पर उतरे और केरल में इन्हीं वामपंथियों की सरकार ने कोयम्बटूर बम काण्ड के आरोपी कुख्यात आतंकवादी अब्दुल मदनी को जेल से रिहा करने के लिये विधानसभा का विशेष सत्र आहूत किया। ऐसा काम संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ होगा जब विधानसभा के विशेष सत्र द्वारा किसी आतंकवादी को छोड्ने का प्रस्ताव पारित किया जाये।

 

अब जबकि नेपाल की संविधान सभा में विजय के उपरांत माओवादियों के नेता प्रचण्ड ने अपना प्रचण्ड रूप दिखाना आरम्भ कर दिया है और उनका भारत विरोधी एजेण्डा सामने आ रहा है तो स्पष्ट है कि नेपाल में चीन और पाकिस्तान की जुगलबन्दी गुल खिलाने वाली है और इसकी तरफ उन लोगों का ध्यान बिलकुल नहीं जा रहा है जो भारत सरकार को सीख दे रहे है कि नेपाल में माओवादियों की विजय से भारत में नक्सलवादियों को भी लोकतांत्रिक बनाने में सहायता मिलेगी। इस तर्क से सावधान रहने की आवश्यकता है कहीं इस चिंतन के पीछे माओवादियों के सहारे मृतप्राय पडे वामपंथ को जीवित करने का स्वार्थ तो निहित नहीं है। वैसे भी विश्व स्तर पर आज वामपंथी इस्लामवादियों को अपना सहयोगी बनाने में नहीं हिचकते और अमेरिका, इजरायल सहित अनेक विषयों पर उनके सुर में बात करने में तनिक भी परहेज नहीं करते। नेपाल में माओवादियों की विजय को दक्षिण एशिया में इस्लामवादी-वामपंथी गठजोड की दिशा में एक मह्त्वपूर्ण कदम माना जाना चाहिये। आने वाले दिनों में यह गठज़ोड और अधिक मुखर और मजबूत स्वरूप लेगा।

क्या चाहते हैं आडवाणी ?

April 24, 2008 · Filed Under हिन्दुत्व · Comment 

आज जब मैं भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्थ नेता और आगामी लोकसभा चुनावों के लिये पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी श्री लालकृष्ण आडवाणी के बारे में कुछ लिखने बैठा हूँ तो निश्चय ही लोगों के मन में जिज्ञासा हो सकती है कि ऐसा मैंने तब क्यों नहीं किया जब अधिकाँश लोग आडवाणी के बारे में लिख रहे थे। जब से लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा माई कंट्री माई लाइफ का विमोचन हुआ है, आडवानी जी खबरों में हैं। पुस्तक को जैसे जैसे लोग पढते गये उसी अनुपात में कुछ नया समाचार उस सम्बन्ध में आता गया। कुल मिलाकर आडवाणी जी स्वयं और उनके सलाहकार जो चाहते थे वह पूरा होता गया और तकरीबन महीने भर खबरों के केन्द्र में आडवाणी बने रहे। इस दौरान कभी भी मेरी इच्छा आडवानी जी पर कुछ लिखने की नहीं हुई। इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं एक तो मैने स्वयं आडवाणी जी की आत्मकथा पढी नहीं थी और दूसरा मैने आडवाणी जी को कभी क्रांतिकारी और व्यवस्था परिवर्तन का अग्रदूत नहीं माना। आडवाणी एक ऐसे नेता हैं जो कांग्रेस की यथास्थितिवादी व्यवस्था में सत्ता परिवर्तन के एक माध्यम थे जो कुछ वैसा ही है जैसे गर्मी की तपती दोपहरी में शीतल हवा का एक झोंका आ जाता है और मन प्रसन्न हो जाता है। आडवाणी जी को लेकर अपनी इस अवधारणा के चलते आडवाणी की आत्मकथा भी मुझे एक छवि निर्माण के प्रयास से अधिक कुछ नहीं दिखी।

 

आडवाणी जी पर लिखने का कोई प्रयास अब भी नहीं करता यदि पिछ्ले कुछ दिनों में आडवाणी जी द्वारा दिये गये कुछ साक्षात्कार विचलित न करते। पिछ्ले दिनों आडवाणी जी ने भारत के कुछ प्रमुख टी.वी चैनलों को साक्षात्कार दिया और उसके बाद पाकिस्तान के एक प्रमुख समाचार पत्र को साक्षात्कार दिया और दोनों स्थानों पर उन्होंने पाकिस्तान की अपनी यात्रा के दौरान जिन्ना के सम्बन्ध में की गयी अपनी टिप्पणियों को सही ठहराया और फिर दुहराया कि इस विषय पर उन्हें ठीक से नहीं समझा गया और पूरे विचार परिवार( संघ परिवार) ने एक ऐसा स्वर्णिम अवसर गँवा दिया जब मुसलमानों को समझाया जा सकता था कि विचार परिवार इस्लाम विरोधी या मुस्लिम विरोधी नहीं होते हुए भी हिन्दुत्व के प्रति आग्रही है।

 

आडवाणी के ऐसे विचारों से स्पष्ट है कि वह अपनी हिन्दुत्ववादी छवि तोडने के लिये व्यग्र हैं और इसके लिये तरह-तरह के प्रयास कर रहे हैं।

 

आडवाणी जी की इस स्थिति को समझने के लिये यदि हम आडवाणी की आत्मकथा की प्रस्तावना में अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा की गयी उस टिप्पणी का मर्म समझने का यत्न करें तो बात स्पष्ट हो जायेगी जिसमें अटल जी ने कहा था कि आडवाणी को गलत समझा गया और वे अपनी छवि के शिकार हो गये। आडवाणी की यही विवशता है। सोमनाथ से अयोध्या के लिये रथ लेकर चलने वाला आडवाणी किसी क्रांति के लिये नहीं निकला था और उनका उद्देश्य भी काँग्रेस द्वारा अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के चलते हिन्दुओं में पनप रहे असंतोष को राम जन्मभूमि आन्दोलन के प्रतीक के चलते भुनाकर संसदीय व्यवस्था में भाजपा के लिये विपक्ष की भूमिका सृजित करने से अधिक कुछ नहीं था और यही कारण है कि इस आन्दोलन की चरम परिणति के रूप में 6 दिसम्बर 1992 को जब मुगल कालीन ढाँचा ध्वस्त हो गया तो आडवाणी अत्यंत व्यथित हुए और तत्काल इसे अपने जीवन का काला दिन तक घोषित कर दिया। वास्तव में आडवाणी जी बाबरी ढाँचे के ध्वस्त होने हो लेकर अपराध बोध से ग्रस्त हैं और इसे अपने जीवन का पाप मानकर उसके प्रायश्चित के लिये जुटे हैं। कुछ वर्ष पूर्व पाकिस्तान की अपनी यात्रा के दौरान जिन्ना को सेकुलर घोषित करने के पीछे भी उनकी यही मानसिकता काम कर रही थी।

अभी हाल में पाकिस्तान के एक प्रमुख समाचार पत्र डान के साथ साक्षात्कार में आडवाणी ने पुनः वही बातें दुहरायीं कि यदि पाकिस्तान जिन्ना के रास्ते पर चलता तो आज भी सेकुलर रहता और साथ ही उन्होंने अपनी एक काफी पुरानी अवधारणा को भी दुहराया कि आने वाले समय में भारत और पाकिस्तान का एक महासंघ बन सकता है।

 

आडवाणी के इन बयानों के पीछे आपत्तिजनक क्या है? एक तो यह कि जिन्ना के प्रति अपनी बात को वे यह कह कर न्यायसंगत ठहराते हैं कि इससे भाजपा सहित पूरे संघ परिवार के सम्बन्ध में मुसलमानों की सोच बदल जाती अर्थात आडवाणी भी मानते हैं कि भारत का मुसलमान भारत से अधिक पाकिस्तान की परिस्थितियों और घटनाक्रम से प्रभावित होता है। आडवाणी की इस स्वीकारोक्ति से 1990 के दौरान अल्पसंख्यकवाद के विरुद्ध गढे गये उनके ही मुहावरे गलत सिद्ध होते हैं जब भारतीय मुसलमानों की पाकिस्तान के प्रति निष्ठा को आधार बनाकर हिन्दुत्व की धार तेज की जाती थी। इससे एक अर्थ तो यह निकलता है कि आडवाणी देश की समस्याओं के सन्दर्भ में काँग्रेस से भिन्न राय नहीं रखते और अल्पसंख्यकवाद का नारा मात्र वोट के लिये था और इस समस्या के समाधान को लेकर स्वयं आडवाणी भी गम्भीर नहीं हैं।

 

जिन्ना को सेकुलर सिद्ध कर आडवाणी पाकिस्तान की निर्मिति को शाश्वत बना देते हैं और भारत पाकिस्तान की समस्या को और उलझा देते हैं। भारत और पाकिस्तान की समस्या के सम्बन्ध में एक तथ्य पर कभी ध्यान नहीं दिया गया और वह यह कि पाकिस्तान और भारत की समस्या भी काफी कुछ इजरायल और फिलीस्तीन की भाँति है जहाँ एक देश दूसरे देश के अस्तित्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान आज भी स्वाधीनता पूर्व की मुस्लिम मानसिकता से ग्रस्त है और समस्त भारत को इस्लामी राष्ट्र के रूप में परिवर्तित करने का स्वप्न देखता है। यदि ऐसा नहीं होता तो भारत को हजारों घाव देने के योजना के आधार पर आतंकवाद को प्रश्रय क्यों देता? वास्तव में इस पूरी समस्या को इस नजरिये से देखने का प्रयास कभी हुआ ही नहीं और न ही उस मानसिकता को जानने का प्रयास किया गया जो भारत के प्रति शाश्वत शत्रुता को पाकिस्तान के अस्तित्व का आधार बनाती है। पाकिस्तान की इसी इस्लामपरक मानसिकता के चलते ही भारत का मुसलमान पाकिस्तान के अधिक निकट अपने को पाता है और इसके बाद भी आडवाणी का जिन्ना को सेकुलर सिद्ध करना और पाकिस्तान के रास्ते मुसलमानों के मध्य अपनी छवि बदलने का प्रयास करना यही प्रमाणित करता है कि या तो आडवाणी समस्याओं को सही सन्दर्भ में नहीं देख पा रहे हैं या फिर वे यथास्थितिवादी नेता हैं जो सत्ता परिवर्तन का माध्यम भर हैं।

 

इस बात की पुष्टि आडवाणी जी की आत्मकथा में इस्लामी उग्रवाद के सम्बन्ध में उनकी धारणा से भी होती है। अपनी आत्मकथा में इस्लामी आतंकवाद के लिये आडवाणी ने इस्लामी उग्रवाद शब्द का प्रयोग किया है और इस समस्या के पीछे एक विचारधारा की प्रेरणा की बात स्वीकार की है परंतु अपनी आत्मकथा के बाद छवि बदलने के अपने प्रयास में किसी भी साक्षात्कार में उन्होंने इस्लामी उग्रवाद या इस्लामी आतंकवाद की चर्चा ही नहीं की। यही नहीं तो राजनेता के रूप में भी आडवाणी जब भी इस्लामी आतंकवाद की चर्चा करते हैं तो इसके पीछे किसी विचारधारा की प्रेरणा सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते। ऐसा शायद वे राजनीतिक दृष्टि से सही होने के लिये या पोलिटिकल करेक्टनेस के कारण नहीं करते। इससे भी यही बात सिद्ध होती है कि आडवाणी यथास्थितिवादी व्यवस्था के लिये उपयुक्त राजनेता हैं जो सत्ता परिवर्तन तो कर सकते हैं परंतु उनसे किसी क्रांतिकारी बदलाव की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

 

आडवाणी स्वयं और उनके सलाहकार उनकी छवि बदलने के कार्य में लग गये हैं और इस प्रयास में वे ऐसे कदम भी उठाते जा रहे हैं जिससे उनके समक्ष अनेक प्रश्न भी खडे होते जा रहे हैं। भारत की संसदीय प्रणाली की व्यवस्था के चलते सम्भव है कि आडवाणी देश के सर्वोच्च पद तक पहुँच भी जायें परंतु उनके नये तेवर से स्पष्ट है कि छ्द्म धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा देने वाला यह राजनेता स्वयं धर्मनिरपेक्षता और छद्म धर्मनिरपेक्षता के मध्य विभाजन नहीं कर पा रहा है।

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