क्या वरुण ने कुछ गलत कहा?

March 19, 2009 · Filed Under हिन्दुत्व · 5 Comments 

पिछले चौबीस घण्टों में वरुण गान्धी चर्चा में आ गये हैं। कारण ऐसा कि कुछ लोग उससे सहमत हो सकते हैं और कुछ लोग नहीं। लेकिन वरुण गान्धी के जिस भाषण को लेकर चर्चा है और उन्हें चुनाव आयोग का नोटिस भी मिल चुका है उसे लेकर अनेक प्रतिक्रियायें हैं। भाजपा जहाँ इस मामले में फूँकफूँककर कदम आगे बढा रही है वहीं समाज में इसे लेकर दो तरह का विचार है। एक खेमा तो ऐसा है जो इसे राजनीतिक दृष्टि से उचित नहीं मानता वहीं एक ऐसा वर्ग भी है जो इसे लेकर अत्यंत उत्साहित है। अनेक समाचार पत्रों की वेबसाइट पर यह विभाजन स्पष्ट दिखाई दे सकता है। भाजपा आधिकारिक रूप से इसे भले ही वरुण गान्धी और चुनाव आयोग के मध्य मामला मानती हो पर सामान्य रूप से पार्टी को वरुण के इस तेवर से अधिक दिक्कत नहीं दिखती। लेकिन वरुण गान्धी के ऊपर जिस प्रकार देश के प्रमुख दलों और मीडिया ने प्रहार आरम्भ कर दिया है उसने देश में एक बार फिर सेक्युलरवाद के एकांगी स्वरूप को स्पष्ट किया है।

कांग्रेस ने वरुण के बयान को सेक्युलर सिद्धांतों के विपरीत और नरेन्द्र मोदी से कहीं अधिक खतरनाक बताया है। इसी के साथ मीडिया भी सेक्युलर सिद्धांत का हवाला देकर वरुण पर पिल पडा ऐसा लगा मानों अभिमन्यु को कौरवों ने चक्रव्यूह में घेर लिया हो। वरुण ने अपने बयान की सफाई देते हुए मीडिया के सामने अपने उन दोनों बयानों का सच रखा जिसे मीडिया लगातार दिखा रहा है। एक भाषण जो उन्होंने सार्वजनिक रूप से दिया उसके बारे में उनका कहना है कि इसमें उनकी आवाज के साथ छेड्छाड की गयी है और दूसरे भाषण में जिसमें असामाजिक तत्वों को उन्होंने चेतावनी दी है उसे उन्होंने स्वीकार किया है। अधिक संतोषजनक बात यह है कि अपने तेवर और मुद्दों को लेकर वरुण ने मीडिया के दबाव में आये बिना उसे बरकरार रखा। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या वरुण ने कुछ गलत कहा? ऐसा नहीं लगता। क्योंकि वरुण ने कुछ सवाल उठाये हैं जो पिछले अनेक वर्षों से चर्चा में रहे है और उनमें से एक है देश में हिन्दुओं के मध्य बढ रही असुरक्षा की भावना। वरुण गान्धी ने स्पष्ट किया कि वे एक सीमांत क्षेत्र से आते हैं और यहाँ कुछ मोहल्ले हथियारों की तस्करी का अड्डा बन चुके हैं जो देश की सुरक्षा के लिये खतरा हैं। इसके साथ ही वरुण के भाषण में वोटबैंक के चलते हिन्दुओं के मुद्दे से परे रहने की प्रवृत्ति भी रेखाँकित होती है। वरुण गान्धी ने केवल देश के ऐसे क्षेत्र की समस्या को वाणी दी है जहाँ सामाजिक संतुलन बिगड रहा है और हिन्दुओं की अनदेखी की जा रही है।

जिस प्रकार वरुण गान्धी के भाषण को मुद्दा बनाया जा रहा है उसके पीछे दो कारण स्पष्ट रूप से दिखाई देते है। एक तो राजनीतिक दृष्टि से भाजपा को घेरने के लिये इसे तूल दिया जा रहा है ताकि चुनाव को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत किया जा सके और भाजपा को साम्प्रदायिक सिद्ध किया जा सके। यह बात और है कि ऐसी रणनीति सदैव भाजपा के विरोधियों को भारी पड्ती है। इसके साथ ही इस पूरे मामले के द्वारा वरुण गान्धी के मनोबल को तोड्ने का प्रयास हो रहा है ताकि उसे हतोत्साहित किया जा सके जिससे या तो वह अपनी लय छोड दे या मुद्दा छोड दे। दूसरे प्रयास के प्रति कोई भी रणनीति वरुण गान्धी को स्वयं बनानी होगी और यही उनकी परीक्षा होगी कि राजनीति में वे कितना आगे जायेंगे। वैसे इतना तय है कि वरुण ने अपने तेवरों से दिखा दिया है कि उन्हें मुद्दों की समझ भी है और देश के प्रति उन्हें चिंता भी है और वोटबैक की गुलाम राजनीति की जड्ता को तोड्ने का जो साहस उन्होंने दिखाया है उससे उनकी लोकप्रियता में वृद्धि ही होने वाली है।

वैसे कांग्रेस और अन्य दलों का वरुण गान्धी पर आरोप और भी हास्यास्पद तब लगता है जब इन राजनीतिक दलों का इतिहास हम देखते हैं। शाहबानो के मामले में मुस्लिम समाज के दबाव के आगे संविधान में संशोधन करना, बिहार के विधानसभा चुनावों में लोक जनशक्ति के अध्यक्ष रामविलास पासवान का ओसामा बिन लादेन जैसे दिखने वाले व्यक्ति को लेकर प्रचार करना, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के शासनकाल में एक मंत्री का डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के सिर पर एक करोड का इनाम घोषित करना, केन्द्र की सरकार के कैबिनेट मंत्री ए.आर. अंतुले का पाकिस्तान के सुर में बोलते हुए एटीएस प्रमुख की हत्या पर सवाल खडे करना, मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह का जामिया विश्वविद्यालय के कुलपति का आतंकवाद के आरोपी छात्र के लिये विश्वविद्यालय से धन एकत्र करने सम्बन्धी अभियान का समर्थन करना, केन्द्र सरकार के सहयोगी दलों का सिमी की खुले आम पैरवी करना आखिर साम्प्रदायिकता की श्रेणी में क्यों नहीं आता?
जब मुस्लिम संगठन खुले आम सरकार द्वारा मोहनचन्द्र शर्मा को अशोक चक्र दिये जाने का विरोध करते हैं और बाटला हाउस मुठभेड की सीबीआई से जाँच की माँग करते हैं तो इसे साम्प्रदायिक क्यों नहीं माना जाता। क्या केवल इसलिये कि यह माँग मुस्लिम समाज कर रहा है। जब रामविलास पासवान खुले आम बांग्लादेशी घुसपठियों को नागरिकता देने की माँग करते हुए राष्ट्रविरोधी बात करते हैं तो न तो मीडिया में बहस होती है और न सेक्युलरवादी शोर मचाते हैं केवल इसलिये कि यह मामला मुसलमानों से जुडा है। जब अरुन्धती राय खुले आम कश्मीर को भारत का अंग मानने से इंकार करती हैं तो इस पर बहस नहीं होती और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताया जाता है। क्योंकि अरुन्धती राय वामपंथी हैं और सदैव मुसलमानों के हित में बोलती हैं। क्या केवल साम्प्रदायिकता हिन्दुओं की रक्षा और सम्मान से जुडे विषयों को उठाने में ही झलकती है?

यदि इस देश में मुस्लिम समाज अपनी शिकायत सरकार से उलेमा एक्सप्रेस चला कर कर सकता है और मुस्लिम उत्पीडन का रोना रोकर आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार युवकों के लिये मुआवजे की माँग कर उन्हें महिमामंडित कर सकता है और उन्हें ऐसा करने की पूरी छूट मिलती है तो फिर हिन्दुओं से जुडे विषय उठाने पर इतना हो हल्ला क्यों? वरुण गान्धी ने बिलकुल ठीक कहा है कि हिन्दुओं से जुडी बात करने पर या हिन्दू स्वाभिमान का विषय उठाने वालों को साम्प्रदायिक घोषित करने का राजनीतिक षडयंत्र देश में चल रहा है और सेक्युलरवाद के नाम पर इसे बढाया जा रहा है। नेताओं और मीडिया को यह बात समझनी चाहिये कि पीलीभीत में वरुण गान्धी और गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ परिस्थितियों की उपज हैं जो हिन्दुओं की रक्षा करना चाहते हैं और अभी तक भारत के संविधान ने हिन्दुओं की रक्षा को अपराध घोषित नहीं किया है।