कौन है साम्प्रदायिक आप ही निर्णय करें?
कुछ दिनों पूर्व मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा था कि भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को उभारने का व्यापक षड्यंत्र हो रहा है। यह कार्य सुनियोजित ढंग से किया जा रहा है ताकि देश में शरियत और क़ुरान आधारित व्यवस्था का सूत्रपात किया जा सके। इसी क्रम में इसी विचार पर कार्यरत कुछ लोगों ने गोयबल्स के प्रचार सिद्धांत को स्वीकार कर इस्लामिक सर्वोच्चता के सिद्धांत को प्रतिपादित करने का कार्य आरम्भ कर दिया है। ऐसे तत्वों ने पहले तो हिन्दू मुस्लिम एकता का स्वाँग रचते हुए धार्मिक बह्स को आधार बनाया और उस आधार पर अपनी पह्चान ब्लाग जगत में बनाने के बाद अपना वास्तविक साम्प्रदायिक खेल खेलना आरम्भ कर दिया। ऐसे ही एक ब्लाग में हिन्दू साम्प्रदायिकता का निवारण करने की अपील करते हुए जो तर्क दिये गये हैं उन्हीं तर्कों के आधार पर मैंने पाया कि किस प्रकार शब्दों का खेल खेलने में ये खिलाडी अभी कच्चे हैं और अपने ही शब्दजाल में फँस जाते हैं। हिन्दू साम्प्रदायिकता के विरुद्ध लिखी गयी पोस्ट के इन कुछ शब्दों के आधार पर आप भी निर्णय करें कि साम्प्रदायिक कौन है?
लेख का अंश- साम्प्रदायिक तत्व अफवाहों के सहारे इसका प्रसार करते हैं। इसके प्रसार के कारणों को रोका जाना चाहिए।
अर्थात सेंसरशिप - अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन। दूसरा साम्प्रदायिक तत्व कौन है इसका निर्णय कैसे होगा। आपके समाधान के अनुसार जो इस्लाम की आलोचना करे और हिन्दुओं पर मुस्लिम अत्याचार की बात करे वह साम्प्रदायिक है तब तो भारत के प्रत्येक हिन्दू को धिम्मी बन कर जीना पडेगा क्योंकि इसके विपरीत तो 1 प्रतिशत हिन्दू भी देश में नहीं मिलेगा।
लेख का अंश - सच बात तो यह है कि मुगलों ने तो कोई कत्लेआम भी नहीं किया।
इतिहास की नयी व्याख्या के लिये धन्यवाद। लेकिन इसके लिये कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो आपने दिया नहीं क्योंकि अब सभी पूर्व इतिहासकारों को असत्य सिद्ध करना होगा।
लेख का अंश - औरंगजेब ने कोई मंदिर नहीं तुड़वाया बल्कि अनेक उदाहरण ऐसे भी मिल जायेंगे जहां स्वयं हिन्दू राजाओं द्वारा मंदिरों को ध्वस्त कराया गया था।
पुनः प्रमाण देते तो बात की प्रामाणिकता बढ जाती।
लेख का अंश - देश का विभाजन हुआ इसके लिए मुसलमान दोषी नहीं है। यदि गहराई से खोज की जाय तो तथ्य यही सामने आते हैं कि इसकी योजना तो सावरकर जैसे हिन्दू नेताओं के घरों में बनायी गयी थी।
यह योजना कब बनी, किस घर में बैठक हुई और उसका क्या लिखित प्रमाण है?
लेख का अंश - संविधान में भी स्पष्ट लिखा गया है कि किसी भी धार्मिक संगठन को सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यों के अतिरिक्त किसी भी प्रकार साम्प्रदायिकता उभारने की अनुमति नहीं दी जायगी।
संविधान के किस अनुच्छेद में साम्प्रदायिकता शब्द का उल्लेख किया गया है। मुझे जानने की जिज्ञासा है।
लेख का अंश - धर्म की राजनीति करने वाले चाहे वे व्यक्ति हों, चाहे संगठन इन पर रोक लगायी जाय और इनका दमन किया जाय।
एक बार फिर आपने निष्पक्षता का प्रदर्शन नहीं किया। यदि आप दमन चाहते हैं तो निश्चय ही यह अलोकतांत्रिक प्रक्रिया है फिर आप बार बार अपने लेख में प्रजातंत्र शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हैं जब आपको हिन्दू साम्प्रदायिकता रोकने के लिये अलोकतांत्रिक कदम पसन्द हैं। दूसरा क्या यह दमन का सिद्धांत आप उलेमा काउंसिल, जमायते इस्लामी हिन्द, केरल और तमिलनाडु के उन राजनीतिक दलों पर प्रयोग करेंगे जो खुलेआम इस्लाम के नाम पर मुस्लिम समाज को वोट देने की अपील करते हैं।
लेख का अंश - हिन्दू की मानसिकता यह बन चुकी है कि मुसलमान पाकिस्तान लेकर अपने हिस्से का भाग ले चुके हैं अब उन्हें भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं है और यदि रहना है जो उनके अधीन होकर रहें। हमारे इस साम्प्रदायिक जुनून के लिए बहुत कुछ कानूनी व्यवस्था का अभाव और संवैधानिक निष्क्रियता भी दोषी है हमारा संविधान तो निष्क्रिय इसलिए हो रहा है क्योंकि वह 50-60 साल से ऐसे हाथों में ही रहा है जो साम्प्रदायिकता उत्प्रेरक और प्रयोग करने वाले ही थे।
अर्थात नेहरू से लेकर आज मनमोहन सिंह तक सभी कांग्रेसी सरकारें साम्प्रदायिक हैं। यहाँ आपने साम्प्रदायिक जूनून के साथ हमारे शब्द का प्रयोग किया है अर्थात आप भी स्वयं को साम्प्रदायिकता का दोषी मानते हैं।
लेख का अंश - हमारे यहां की न्याय व्यवस्था दूषित है।
आपको भारत की किसी भी व्यवस्था में विश्वास ही नहीं है।
लेख का अंश - यह सामंतवादी दर्शन हिन्दू समाज की आधारशिला है। इसमें सहनशीलता की कोई गुंजाइश नहीं है।
आप जरा बताइये कि भारत में कितने पुलिस स्टेशन हैं। यदि हिन्दू सहनशील नहीं है तो देश में 15 प्रतिशत मुस्लिम की रक्षा कौन कर रहा है ।
लेख का अंश - ये अपने धर्म को श्रेष्ठ मानते हैं।
यह तो कोई अपराध नहीं है। आखिर मुसलमान भी तो अपने पैगम्बर को ही श्रेष्ठ मानता है।
लेख का अंश - कुछ विचारकों की यह धारणा है कि साम्प्रदायिकता के विरुद्ध समाज को शिक्षित किया जाय और शिक्षा का स्तर बचपन से ही सुधारा जाय परंतु जहां शिक्षा के कोर्स में साम्प्रदायिकता उभाड़ने वाले पाठ होंगे, अंधविश्वास और धर्मांधता वाले पाठ बच्चों को पढ़ाएं जायेंगे वहां साम्प्रदायिकता बढ़ने के अतिरिक्त घटने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता है। इसीलिए यह आवश्यक है कि बच्चों के लिए शिक्षा का पाठ्यक्रम राष्ट्रीय सहमति के आधार पर निर्धारित किया जाय।
इस प्रस्ताव पर आप अपने मदरसों और मौलवियों में सहमति बना पायेंगे। यदि आप चाहें तो एक ब्लाग में मदरसों में पढाये जाने वाले पाठ्यक्रम का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित कर दूँ।
लेख का अंश - चूंकि सत्ता पर उच्चवर्ण हावी है और बूथ कैप्चर उन्हीं के लोग करते हैं तो वे इस पर क्यों रोक लगायें। यह भी साम्प्रदायिकता है। इसने तो प्रजातंत्रा को इतना दूषित बना दिया है कि दुर्गंध आने लगी है।
तथ्यों से रहित आज देश में कितने राज्यों में उच्च वर्ण के लोग मुख्यमंत्री हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री किस वर्ग से हैं जरा पता कर लें। बिना अधिक शोध के अनावश्यक आरोप न लगायें। दूसरा प्रजातंत्र से आपको एक बार फिर दुर्गन्ध आ रही है। ऐसा चौथी बार है जब आपने भारत की व्यवस्था को अस्वीकार किया है।
लेख का अंश - हिन्दू चाहते हैं कि मुसलमान हिन्दू की हर धारा को मान लें और अपनी शरियत कुरान सब छोड़ कर हिन्दू के नागरिक कानून को स्वीकार लें तभी वे राष्ट्र धारा से जुड़े माने जायेंगे।
आज देश का शासन हिन्दू नागरिक कानून से नहीं संविधान द्वारा निश्चित है। आपने स्वयं स्पष्ट कर दिया कि आप शरियत और क़ुरान छोडकर कुछ दूसरा मानने को तैयार नहीं हैं।
लेख का अंश - आज वहीं ज्यादा साम्प्रदायिकता दिखाई देती है जहां हिन्दू बहुसंख्यक हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जो हिन्दू बाहुल्य प्रांत हैं वही हिन्दू मुस्लिम दंगे अधिक होते हैं। तामिलनाडु, केरल, असम जैसे इलाकों में हिन्दू मुस्लिम तनाव नहीं के बराबर हैं क्योंकि यहां मुसलमान अधिक और हिन्दू बहुत कम हैं। इन इलाकों में मुसलमान और ईसाई द्रविड़ आदिवासी अधिक रहते हैं। यदि हिन्दू सहिष्णुता से काम लेना प्रारम्भ कर दें तो हिन्दू मुसलमान साम्प्रदायिकता की समस्या हल हो सकती।
इस पैराग्राफ के बाद कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है कि आपका हिन्दू मुस्लिम भाईचारा का सिद्धांत क्या है?
मालेगाँव विस्फोट से मुंतज़र अल जैदी तक
आज प्रातः काल जब एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र उठाकर देखा तो उसमें ठीक एक वर्ष पूर्व मालेगाँव में हुए विस्फोट में मारी गयी एक मुस्लिम बालिका के बारे में बताया गया था कि किस प्रकार उसके सपने अधूरे रह गये। सहानुभूति के इस ढंग पर मैं यह नहीं कहूँगा कि यह समाचार पत्र पक्षपातपूर्ण है क्योंकि इसी समाचार पत्र ने मुम्बई में हुए अनेक विस्फोटों की भी ऐसी ही कहानियाँ प्रकाशित की थीं जिनमें मारे गये लोग हिन्दू थे। मालेगाँव विस्फोट के एक वर्ष पूरे होने पर साध्वी प्रज्ञा सहित 11 लोगों पर मुकदमा चल रहा है और नासिक के एक न्यायालय द्वारा इन आरोपियों पर मकोका हटाये जाने के निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय ने स्टे दे दिया है। फिलहाल महाराष्ट्र एटीएस काफी कुछ साक्ष्य प्राप्त करने का दावा कर रही है देखना है इस मामले में पूरी वास्तविकता कब तक सामने आती है।
बीते एक वर्ष में वैश्विक स्तर पर अनेक परिवर्तन देखने को मिले। एक वर्ष पूर्व इस्लामी आतंकवाद शब्द को लेकर समस्त विश्व के मुसलमान दबाव में आये तो उन्होंने दोतरफा रणनीति अपनाई। एक ओर तो अनेक इस्लामी संगठनों ने फतवे जारी किये और इस्लाम को शांति का धर्म घोषित किया तो दूसरी ओर इस्लामी आतंकवाद शब्द पर आपत्ति करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर समस्त विश्व में अभियान चलाया कि इस शब्द के प्रयोग को रोका जाये क्योंकि यह आतंकवाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश की नीतियों की प्रतिक्रिया है। स्वाभाविक रूप से इसके कुछ परिणाम भी दिखने लगे और भारत में मालेगाँव विस्फोट में कुछ मुस्लिम लोगों के मारे जाने में हिन्दुओं का हाथ होने से भारत में पिछले दो दशक से चल रहा इस्लामी आतंकवाद का बदला पूरा हो गया और यह सिद्ध हो गया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और सभी धर्मों के कुछ कट्टरपंथी अपने धर्म का गलत प्रयोग और व्याख्या कर रहे हैं। कम से कम सामान्य बौद्धिक वर्ग तो इसी निष्कर्ष पर पहुँच गया लगता है।
अमेरिका में इस वर्ष के आरम्भ में इस देश की जनता ने जार्ज बुश की नीतियों को अस्वीकार कर बराक हुसैन ओबामा को नया राष्ट्रपति चुन लिया। जिस देश ने 2003 में इराक में सद्दाम हुसैन को सत्ताच्युत करने के लिये सैनिक अभियान चलाया उसी देश के लोगों ने पाँच वर्ष बाद हुसैन मध्यनामधारी एक व्यक्ति को अपना सर्वोच्च कमांडर चुन लिया तो यह कुछ संकेत ही है। वैसे इस्लामवादी आजकल हर घटनाक्रम का समाधान कुरान से ढूँढ कर दिखा देते हैं। निश्चय ही इसका समाधान उनके पास है कि अब विश्व में काफी कुछ बदलने वाला है।
लेकिन जो बदलाव पिछले एक वर्ष में हुआ है उसकी ओर हमें अवश्य ध्यान देने की आवश्यकता है। पिछले वर्ष के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश जब इराक की अपनी अंतिम यात्रा पर थे तभी एक प्रेसकांफ्रेंस में स्थानीय टीवी चैनल के पत्रकार मुंतजर अल जैदी ने उनके ऊपर जूता फेंक दिया और उसके बाद उनकी गिरफ्तारी हुई लेकिन अब उन्हें छोड दिया गया है। मुंतजर अल जैदी ने जेल से छोडे जाने के बाद एक पत्र में अपने विचार व्यक्त किये जिसका सार संक्षेप यही है कि उनके देश पर एक विदेशी शासन को वे सहन नहीं कर सके, अपने देश के लोगों का खून बहता देख उन्हें सहन नहीं हुआ और उनका व्यवसाय पीछे रह गया और उनकी देशभक्ति उन पर हावी हो गयी।
भारत में भी कुछ पत्रकारों ने इसे अनूदित किया और उसे यहाँ वहाँ प्रकाशित किया। कुछ मुस्लिम पत्रकारों की इस विषय में रुचि अवश्य आश्चर्यचकित करती है कि एक इराकी व्यक्ति की देशभक्ति से इतना प्रभावित होने के पीछे क्या आशय है?
मुंतजर अल जैदी को जिस प्रकार समस्त विश्व में सहानुभूति मिली और देखते देखते जार्ज बुश को खलनायक बना दिया गया वह एक विशेष मानसिकता की ओर संकेत करता है जिसका शिकार समस्त विश्व पिछले अनेक दशकों से होता चला आ रहा है और वह मानसिकता है प्रताडित होने का प्रदर्शन करने की। आज समस्त विश्व में यह भाव देखा जाता है कि अपराधी, उग्रवादी, आतंकवादी स्वयं को तर्कों के सहारे न्यायसंगत सिद्ध करने का प्रयास करते हैं और समस्त मीडिया, मानवाधिकार संगठन, बौद्धिक वर्ग उनके प्रति सहानुभूति का भाव रखता है।
वास्तव में द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत युद्ध नीति में आया यह बडा परिवर्तन है। इससे पूर्व दो महायुद्धों में विजित पक्ष अपनी शक्ति, पराक्रम, क्र्रूरता का प्रदर्शन कर शत्रु पक्ष के ह्रदय में भय उत्पन्न करता था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पारम्परिक युद्ध का स्वरूप बदल गया और विशेष रूप से शीतयुद्ध के काल में शक्ति संतुलन का सिद्धांत विकसित हुआ जिसके चलते युद्ध का स्थान लोगों का मन होने लगा। मीडिया, पुस्तक, बौद्धिक वर्ग और छवि निर्माण के लिये प्रचार तंत्र के सहारे युद्ध जीता जाने लगा। शीत युद्ध के दौरान समस्त विश्व में रूस की खुफिया एजेंसी और अमेरिकी खुफिया एजेंसी के बीच इसी प्रकार का छवि निर्माण का दौर चला। शीत युद्ध काल में कम्युनिज्म के प्रभाव के चलते विश्व के अनेक क्षेत्रों में कम्युनिष्ट विचारधारा से प्रभावित लोगों ने प्रताडित होने के भाव को पूरे बौद्धिक जगत में एक सिद्धांत के रूप में स्थापित किया ताकि राज्य व्यवस्था को प्रताडित करने वाला बता कर क्रांति और उपद्रव को न्यायसंगत सिद्ध किया जा सके। इसी का परिणाम है कि कम्युनिष्ट आन्दोलन के लिये सहयोगी तत्वों को अत्यंत निरीह, शोषित और प्रताडित सिद्ध किया जाता रहा है और कम्युनिष्ट आन्दोलन के लिये हथियार उठाने वालों को न केवल महिमामंडित किया जाता है वरन उनके गिरफ्तार होने या मारे जाने पर प्रताडित होने का भाव वाला सिद्धांत आगे रखकर समस्त मीडिय़ा, बौद्धिक जगत, मानवाधिकार संगठन एकजुट होकर उनके प्रति सहानुभूति का वातावरण बनाने का प्रयास करने लगते हैं।
पूरे विश्व में वामपंथ और दक्षिणपंथ का विभाजन कर दिया गया है और मानवाधिकार, नारी अधिकार, पर्यावरण विषय, पशु प्रेम, अल्पसंख्यक अधिकार,सर्वहारा अधिकार, व्यवस्था परिवर्तन् सहित सभी विषय वामपंथ की झोली में डाल दिये गये हैं । इससे उदारवादी वामपन्थी जिनका कम्युनिष्टों से कोई वास्ता नहीं है जैसे यूरोप के वामपंथी वे भी इस वैश्विक बहस में अनजाने ही हिस्सा बन जाते हैं।
वर्तमान युग में छवि निर्माण और प्रताडित होने के भाव से सहानुभूति प्राप्त कर एक ऐसे अन्यायपूर्ण वातावरण का निर्माण हो गया है कि कुछ पक्षों को पूरी तरह निर्दोष और कुछ को नरभक्षी मान लिया गया है। आज कोई भी निर्णय न्याय के आधार पर करने के स्थान पर प्रचार तंत्र के प्रभाव में आकर भावुकता के वशीभूत होकर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर किया जाता है।
समस्त विश्व में इस्लाम को निशाना बनाया जा रहा है। अमेरिका, पश्चिम और इजरायल उसे नष्ट करना चाहते हैं। भारत का मुसलमान अत्यंत गरीब और पिछडा है। आतंकवाद का किसी मजहब से कोई लेना देना नहीं वह तो गरीबी और बेबसी के शिकार लोग अपनी कुंठा में कर रहे हैं। अमेरिका और इजरायल जो कुछ फिलीस्तीनियों के साथ कर रहे हैं उसके बाद उनके विरुद्ध आतंकवाद न्यायसंगत है। ये कुछ इसी प्रकार के तर्क हैं जो बौद्धिक वर्ग और मीडिया के ह्र्दय में उतर चुके हैं।
वर्तमान युग में प्रचार तन्त्र का उपयोग किस प्रकार स्वयं को प्रताडित सिद्ध करने के लिये किया जाता है इसके कितने ही उदाहरण हमारे पास है। विश्व भर के इस्लामवादियों ने कहा कि इजरायल और अमेरिका की खुफिया एजेंसियों ने स्वयं ही 11 सितम्बर की घटना कर ली ताकि इस्लाम के विरुद्ध युद्ध किया जा सके और तेल के स्रोतों पर नियंत्रण किया जा सके। इसी प्रकार भारत में गोधरा में कारसेवकों को साबरमती रेलगाडी में जलाये जाने के बाद हुए दंगों के बाद स्वयं को प्रताडित सिद्द करने के लिये इस्लामवादियों और मुस्लिम पक्ष की ओर से तर्क आया कि रेल में आग तो अन्दर से लगी थी। फिर भारत में 2004 से लेकर लगातार हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमणों के बाद इनकी ओर से तर्क आया कि यह कार्य भी हिन्दू संगठनों का है। ऐसे ही न जाने कितने प्रचार विश्व भर में मुसलमानों के मध्य किये जाते हैं ताकि स्वयं को प्रताडित दिखाकर न केवल सहानुभूति प्राप्त की जाये वरन आतंकवाद को न्यायसंगत सिद्ध कर शेष समाज और सरकार पर दबाव डाला जाये कि हमारी प्रताडना और आर्थिक व सामाजिक अवनति का कारण आप लोग हैं इसलिये हमारे साथ विशेष व्यवहार हो और विशेषाधिकार दिया जाये। यदि यही तर्क है तब तो भारत में पिछडों और दलितों को मुस्लिम समाज से अपना अधिकार माँगना चाहिये कि 700 वर्षों तक उनके शासन में रहने के बाद भी उनका जीवन स्तर क्यों नहीं सुधरा?
मुंतजर अल जैदी के जूते के प्रति समस्त विश्व के बौद्धिक और मीडिया वर्ग ने जो सहानुभूति दिखाई उसने कभी सोचा कि इसका दूसरा पक्ष भी है। कोई भी सिद्धांत , देश या धर्म पूरी तरह निरपेक्ष सहानुभूति का पात्र कैसे हो सकता है और कोई भी सिद्धांत, देश , धर्म सतत निन्दा का पात्र कैसे हो सकता है। ये स्थितियाँ तो देश काल परिस्थितियों के सापेक्ष होती हैं। लेकिन समाज के बौद्धिक वर्ग और मीडिया के साथ यही हो रहा है। यदि मालेगाँव में विस्फोट करने वाले तर्क दें कि पिछले चार वर्षों से जिस प्रकार निर्दोष हिन्दुओं को निशाना बनाया गया और खुलेआम मीडिया में ईमेल के जरिये हिन्दू धर्म के विरुद्ध जेहाद की बात की गयी उससे हमारा मन बेचैन हो गया और हम सुध बुध खो बैठे और हमें लगा कि यदि अब सरकार कुछ नहीं कर सकती तो हिन्दुओं की रक्षा का दायित्व हमें अपने हाथों में लेना होगा। जरा कल्पना करिये कि बौद्धिक वर्ग और मीडिया की प्रतिक्रिया क्या होगी? लेकिन यदि इसी भाव से इराक का पत्रकार अमेरिका के सर्वोच्च सेनापति के ऊपर जूता फेंकता है तो उसे महिमामंडित किया जाता है। क्योंकि यह जूता अमेरिका पर फेंका गया है। मुंतजर अल जैदी के हाथ में उस समय केवल जूता था सो उसने फेंक दिया और जिसके हाथ में हथियार है वह जेहाद कर रहा है। अधिक तो छोडिये जरा कल्पना करिये कि भारत में कोई हिन्दू पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री पर जूता फेंक दे तो कितने पत्रकार उसे शाबासी देंगे।
प्रचार के इस युग में जिस प्रकार प्रताडित किये जाने का भाव निर्माण कर आतंकवाद का प्रच्छन्न युद्ध जीता जा रहा है उससे सावधान रहने की आवश्यकता है। मीडिया , सरकारें, मानवाधिकार संगठन सहित बौद्धिक समाज इसी ग्रंथि का शिकार है और सहज रूप में कभी माओवादी नेताओं, कभी संसद पर आक्रमण के लिये दोषी तो कभी मुम्बई में सैकडों निर्दोषों को जान लेने वाले के लिये मानवीय आधार पर सोचने लगते हैं। यही इस युद्द की सबसे बडी विजय है। इस तथ्य को हमें समझना होगा।
आज युद्ध के परम्परागत स्वरूप को भूलकर नये सन्दर्भ में इसे समझने की आवश्यकता है। आज इस्लामी आतंकवाद और माओवाद को पराजित करने में इसीलिये कठिनाई हो रही है क्योंकि फासिस्टों, कम्युनिष्टों और नाजियों की भाँति इसका संचालन एक देश नहीं कर रहा है किस उस पर आक्रमण कर आप इसे नष्ट कर सकते हैं। आज इस्लामवाद और जेहाद किसी ओसामा बिन लादेन या जवाहिरी तक सीमित नहीं है यह ब्लागों, समाचार पत्रों, कालेज कैम्पसों, चैट रूम, एसएमएस से लेकर सभी आधुनिक सूचना तकनीकों तक पहुँच चुका है। जो भी किसी न किसी प्रकार मुस्लिम उत्पीडन के सिद्धांत को पुष्ट करता है या इस्लामिक सर्वोच्चता के सिद्धांत को प्रचारित करने का प्रयास करता है वह जाने अनजाने इस्लामवादी आन्दोलन को सशक्त कर रहा है। यही तथ्य माओवाद के सम्बन्ध में भी सत्य है। जिस प्रकार कोबाद गाँधी और लालगढ में माओवादियों की गिरफ्तारी पर मीडिया ने इनके प्रति सहानुभूति का रवैया अपनाया है वह चिंता का विषय है। लेकिन इसका समाधान सरकारी सेंसरशिप भी नहीं है इसका समाधान यही है कि उन तटस्थ लोगों को इन आत्ंकवादी आन्दोलनों की इस बौद्धिक खुराक की वास्तविकता से परिचित कराया जाये ताकि सहानुभूति के प्रवाह में बहने से पहले यह जाँच लें कि न्यायपूर्ण क्या है?
आज वैश्वीकरण, अमेरिका, इजरायल और हिन्दुत्व का विरोध करना तो आम फैशन है क्योंकि आप बौद्धिक विरादरी में तभी स्थान पा सकते हैं जब आपमें ये योग्यतायें हों। लेकिन जो लोग अपने कम्प्यूटर पर बैठकर इन तत्वों की आलोचना करते हैं उसी का लाभ उठाकर ऐसा कर पा रहे हैं। वैश्वीकरण ने राष्ट्र, राज्य, सरकार और सेंसरशिप जैसी परिकल्पनाओं को कालबाह्य कर दिया है और व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता प्रदान की है। जिस वैश्वीकरण के विरोध में कम्युनिष्ट और समाजवादी लामबन्द होते हैं क्या वे स्वतंत्रता के इसी सिद्धांत का पालन करने देंगे?
अमेरिका और इजरायल ने मध्य पूर्व में इस्लामवादी आन्दोलन को संगठित होने से रोक रखा है जिससे भारत में लोग सुकून से बैठकर अर्थसाधना कर पा रहे हैं। क्योंकि तेल अवीव से नई दिल्ली तक केवल दो लोकतांत्रिक देश हैं भारत और इजरायल और यही तथ्य यह प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त है कि इस क्षेत्र में इजरायल न हो तो भारत की सुरक्षा पर क्या प्रभाव होगा?
भारत में इस बात को काफी प्रचारित किया गया है कि इस्लामी आतंकवाद के वैश्विक स्वरूप से भारत को कोई खतरा नहीं है क्योंकि यह अरब देशों में पश्चिम की इजरायल परस्त नीतियों और उनके देशों में पश्चिम सैनिकों की तैनाती की प्रतिक्रिया है। लेकिन वास्तविकता तो यह है कि मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया की इस्लामवादी शक्तियों के साथ भारत के मुस्लिम संगठनों की सहानुभूति का पुराना इतिहास है। अंग्रेजों के समय 1909 से खिलाफत की पुनर्स्थापना के लिये भारत में अल्लामा इकबाल ने जबर्दस्त आन्दोलन चलाया और अंग्रेजों के विरुद्ध तुर्क सेना के लिये हर प्रकार की सहायता की। शाह वलीउल्लाह ने तो अंग्रेजों के विरुद्ध ईरान के शाह और अफगानिस्तान के शासकों को भारत पर आक्रमण के लिये मनाने का प्रयास किया। जिन दिनों मिस्र में सैयद कुत्ब मुस्लिम ब्रदरहुड के द्वारा जिहादी इस्लामी आतंकवादी आन्दोलन की पृष्ठभूमि रख रहे थे उसी कालखण्ड में भारतीय उपमहाद्वीप में मौदूदी जमायते इस्लामी की नींव रख रहे थे।
यह बात सत्य है कि 700 वर्षों तक भारत में शासन करने के दौरान इस्लाम ने अपने स्वरूप में कुछ परिवर्तन किया था और सूफी इस्लाम ने उसमें आध्यात्मिकता का कुछ पुट भर दिया था और अनेक मुगल शासकों ने अपनी अनेक विवशताओं के चलते शरियत के साथ कुछ समझौते किये थे परंतु अंग्रेजों के हाथ में शासन जाने के बाद भारत में जो भी जिहादी आन्दोलन चला वह वैश्विक इस्लामी आन्दोलन से गहराई से जुडा था और इसका उद्देश्य खिलाफत संस्था की पुनर्स्थापना, भारत को पुनः इस्लामी राज्य बनाना और कुरान और शरियत के आधार पर शासन व्यवस्था स्थापित करना था। इसलिये भारत के सम्बन्ध में यह तर्क सत्य से पूरी तरह परे है कि मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया की इस्लामी राजनीति या आन्दोलन का भारत के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। आज की परिस्थितियों में सूचना के अबाध प्रवाह के चलते यह और भी सरल हो गया है कि मध्य पूर्व की राजनीति के साथ स्वयं को जोडे रखा जाये।
मुस्लिम साम्प्रदायिकता सर उठा रही है
निश्चित रूप से मेरे इस लेख का शीर्षक बहुत लोगों को रुचिकर नहीं लगेगा क्योंकि इस देश में मुस्लिम समाज को शांति का दूत माना जाता है हो भी क्यों न उनका धर्म जो शांति और अमन का प्रतीक है। इसलिये यदि साम्प्रदायिक शब्द किसी के साथ उपयुक्त बैठता है तो वह हिन्दुओं के साथ है। लेकिन बीते कुछ माह में अनेक ऐसी घटनाओं को नजरान्दाज करने का प्रयास हो रहा है जो देश के वातावरण को विषाक्त बना सकती हैं।
19 सितम्बर को बाटला हाउस मुठभेड में मारे गये दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चन्द्र शर्मा के बलिदान दिवस के एक वर्ष पूरा होने पर इसे दिल्ली में अनेक स्थानों पर मनाया गया। आतंकवाद विरोधी मोर्चा के अध्यक्ष मनिन्दर जीत सिंह बिट्टा सहित भाजपा के वरिष्ठ नेता डा मुरली मनोहर जोशी ने भी इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजित कर बलिदानी मोहनचन्द्र शर्मा को श्रद्धाँजलि दी। लेकिन वास्तविक साहस अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कुछ कार्यक्रताओं ने दिखाया जिन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से बाटला हाउस तक मार्च निकाला और हाथों में मोहनचन्द्र शर्मा के चित्र और राष्ट्रीय ध्वज के साथ अनेक स्थानों पर श्रद्धाँजलि सभायें कीं। लेकिन इस दौरान इन कार्यकर्ताओं को जिस प्रतिकार और प्रतिरोध का सामना करना पडा वह वास्तव में इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि आखिर अभी तक बाटला हाउस मुठभेड का मुद्दा देश में मुस्लिम ध्रुवीकरण के लिये प्रयोग क्यों किया जा रहा है? बलिदान दिवस पर मार्च करने वाले कार्यकर्ताओं ने बताया कि उन्हें जामिया के अनेक छात्रों सहित बाटला हाउस के अनेक युवकों ने कहा कि आज तुम्हारा सौभाग्य है कि शनिवार का दिन होने से हम उचित प्रतिकार नहीं कर पा रहे हैं और संख्या भी कम है अन्यथा? इसी प्रकार खुलेआम यह बात कही गयी कि जिन बच्चों को बाटला हाउस में मुठभेड में मार गिराया गया वे तो शहीद हैं जो गुजरात के दंगों का बदला लेने आये थे।
बाटला हाउस मुठभेड के एक वर्ष बीत जाने के बाद भी आज तक यह मुद्दा ठण्डा होने को कौन कहे समस्त देश में मुस्लिम ध्रवीकरण का एक प्रमुख मुद्दा बन गया है। ओखला विधानसभा चुनाव के परिणाम आने पर इस परिणाम को लेकर जो भी मीडिया में आया उसमें कहीं भी इस बात का उल्लेख भी नहीं हुआ कि किस प्रकार इस विधानसभा चुनाव को देश मे इस्लामवादी आन्दोलन और राजनीतिक इस्लाम को स्थापित करने के प्रयास के आरम्भिक बिन्दु के रूप में मुस्लिम नेतृत्त्व द्वारा लिया गया था। राजद से जो सदस्य इस विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते हैं उन्होंने विजयी होने के बाद सबसे पहले उन आतंकवादियों की कब्र पर शिजदा किया जो बाटला हाउस मुठभेड में मारे गये थे। यह आखिर किस बात का संकेत है? जिस देश में सरकार मालेगाँव में हुए विस्फोट की जाँच में इतनी सक्रियता दिखाती है कि देश के संतों से लेकर हिन्दू संगठनों तक को खँगाल डालती है उसे देश के संवैधानिक ढाँचे में आये और विधानसभा का सद्स्य बने व्यक्ति के आतंकवादी की कब्र पर जाकर शिजदा करने पर आपत्ति नहीं होती? शायद ऐसा इसलिये है कि देश में आतंकवाद की परिभाषा का आधार ही अलग है और इसके लिये दो तरह के कानून हैं।
ओखला विधानसभा चुनाव जीतने वाले राजद विधायक आसिफ मोहम्मद खान का साम्प्रदायिक इतिहास रहा है। कोई दो वर्ष पूर्व दिल्ली नगर निगम का चुनाव कांग्रेस के नूरूद्दीन के हाथों हारने के बाद इन्होंने अपनी खोई साख प्राप्त करने के लिये मुस्लिम साम्प्रदायिकता का कार्ड खेला और बाटला हाउस, जामिया नगर और तैमूरनगर के आसपास के मुस्लिम क्षेत्रों में झूठी अफवाह फैला दी कि कुछ पुलिसवालों ने कुरान का अपमान किया है। इसके बाद आस पास के मुसलमानों ने स्थानीय पुलिस चौकी फूँक दी और काफी देर तक पुलिस के साथ इन लोगों की मुठभेड चली जिसमें मुस्लिम पक्ष की ओर से अनेक प्रकार के हथियारों का प्रयोग किया गया। इस घटना के बाद आसिफ मोहम्मद ने काफिर बनाम मोमिन के मुद्दे को खूब भुनाया और खुलेमान भडकाऊ पोस्टर दीवारों पर पाट दिये । दिल्ली में पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में आसिफ मोहम्मद ने तत्कालीन दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री परवेज हाशमी को कडी टक्कर दी थी और हाशमी अंतिम चरण में मात्र 500 मतों से विजयी हो सके थे।
बाटला हाउस , जामिया नगर जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की संरचना इस प्रकार की है कि कुछ किलोमीटर का क्षेत्र पूरी तरह किलानुमा है और तंग गलियों और मदरसों और मस्जिदों के जाल में यह समझ पाना अत्यंत कठिन है कि कौन धार्मिक कार्य के लिये, कौन राजनीतिक प्रशिक्षण के लिये है और कौन और दूसरे कार्यों के लिये है?
बाटला हाउस मुठभेड के बाद जिस प्रकार से यह मुद्दा पूरे देश में राजनीतिक इस्लाम के लिये एक प्रमुख मुद्दा बन गया है वह सामान्य बात नहीं है। यह देश में मुस्लिम साम्प्रदायिकता के उभार और इस्लामवादी आन्दोलन के और सशक्त होने का लक्षण है। इस समय देश में कम्युनिष्ट और इस्लामवादी गठबन्धन की वैचारिक और क्रियात्मक रणनीति पर काम हो रहा है। जामिया मिलिया विश्वविद्यालय देश में पनप रहे इस इस्लामवादी आन्दोलन का केन्द्रीय कार्यालय बन चुका है। जामिया विश्वविद्यालय के निकट बाटला हाउस, जामिया नगर की बनावट इस आन्दोलन के लिये अत्यंत सटीक स्थान है। जामिया नगर में अनेक ऐसे मदरसे हैं जहाँ ताजिक, उजबेक मुस्लिम के साथ अरबी मुसलमान भी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इन मदरसों में जिस प्रकार गैर मुस्लिमों के धर्मांतरण के लिये कार्यशालायें आयोजित की जा रही हैं वह इस पूरे आन्दोलन का एक अलग ही स्वरूप है। इन मदरसों की कार्यप्रणाली इस रणनीति पर बनायी गयी है कि दो मौलवी एक ही शहर के होने के बाद भी एक दूसरे के बारे में चार वर्ष बाद जान पाते हैं अर्थात इन मदरसों के लिये किसी केन्द्रीभूत नेतृत्व के आधार पर केन्द्रीभूत व्यवस्था से कार्य किया जा रहा है। क्योंकि यदि ये मदरसे स्वतः स्फूर्त होते तो अपने ढंग से कार्य करते। इसी प्रकार इनकी व्यवस्था और आतिथ्य देखकर लगता है कि इन मदरसों के पास धन का अबाध स्रोत है।
जामिया विश्वविद्यालय के निकट ही जाकिर नाइक का इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन है जो इस पूरे आन्दोलन को एक आर्थिक और वैचारिक आधार दे रहा है। यहाँ इस लेख में विषयान्तर न हो इस कारण ज़ाकिर नाइक के बारे में अधिक नहीं लिखना चाहता। लेकिन इतना अवश्य है कि भारत में भी जो लोग सोचते हैं कि ज़ाकिर नाइक इस्लाम में कोई सुधारवादी आन्दोलन चला रहे हैं इस कारण इस्लामी नेतृत्व में विभाजन की दृष्टि से उन्हें बढाना उचित होगा तो यह घातक सोच है क्योंकि ज़ाकिर नाइक धार्मिक से अधिक राजनीतिक इस्लाम के पैरोकार हैं जो इस्लाम को आधुनिक बनाने का दावा करते हैं लेकिन उनकी सोच पूरी तरह वहाबी विचारधारा से प्रेरित है जो सुन्नी शुद्धता के आधार पर इस्लाम की व्याख्या करता है। यह सोच पढे लिखे मुस्लिम वर्ग को और अधिक कट्टर और राजनीतिक इस्लाम और इस्लामवादी आन्दोलन के प्रति आकर्षित कर रही है।
जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय अनेक इस्लामी और मुस्लिम राजनीतिक संगठनों का केन्द्र है। सिमी के बाद मुस्लिम छात्रों के मध्य कार्य करने वाले स्टूडेंट्स इस्लामिक आर्गनाइजेशन या एस आई ओ के साथ कम्युनिष्ट छात्र संगठन भी एक साथ मिलकर इस्लामवादी उद्देश्यों के लिये कार्य कर रहे हैं। पिछले दो वर्षों में जमीनी स्तर पर नक्सलियों और इस्लामी संगठनों के साथ आने के बाद जामिया में यह एकता अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। जिस प्रकार पाकिस्तान के विभाजन के लिये कम्युनिष्टों ने तत्कालीन इस्लामी आन्दोलन को बौद्धिक तर्क प्रदान किया था ताकि द्विराष्ट्र के सिद्धांत को पुष्ट किया जा सके उसी प्रकार अब साम्राज्यवादी अमेरिका, इजरायल और फासीवादी हिन्दू भारत के काल्पनिक खतरे को सिद्ध कर इस्लामवाद और क्म्युनिष्ट एक साथ आ रहे हैं।
कम्युनिष्टों के प्रशिक्षण का परिणाम है कि अब अनेक मुस्लिम संगठन विकेन्द्रित स्तर पर स्थानीय मुद्दे उठाकर एक राजनीतिक चेतना उत्पन्न करने का प्रयास कर रहे हैं। इसका सबसे बडा उदाहरण यही है कि लोकसभा चुनावों से पूर्व उलेमा काउंसिल को एक राजनीतिक दल का स्वरूप देकर वैकल्पिक इस्लामी राजनीति का आरम्भ करने में जिस व्यक्ति ने सबसे सक्रिय भूमिका निभाई वे अमरेश मिश्र भाकपा ( माले) के सक्रिय सदस्य रहे हैं और लोकसभा चुनावों के बाद प्रसिद्ध पत्रिका इंडिया टुडे के साथ साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि उलेमा काउंसिल भारत में राजनीतिक इस्लाम की दिशा में एक कदम है जो कि कुरान और शरियत के आधार पर राजनीतिक , सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का समर्थन करता है। इन्हीं अमरेश मिश्र ने मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण को हिन्दूवादी संगठनों और देश की खुफिया एजेंसी का अन्दर का कार्य बताया था ताकि मालेगाँव बम विस्फोट की जाँच को समाप्त किया जा सके। इसी तर्क के आधार पर पाकिस्तान के कुछ तथाकथित सुरक्षा विशेषज्ञों ने यही बात दुहराई और बाद में भारत सरकार के केन्द्रीय मंत्री ए आर अंतुले ने भी हेमंत करकरे के बलिदान पर प्रश्नचिन्ह खडे किये।
देश में इस्लामवादी आन्दोलन और राजनीतिक इस्लाम की जमीन तैयार की जा रही है। पूरे देश में अनेक स्तरों पर छोटे छोटे मुस्लिम राजनीतिक दल खडे कर राजनीतिक आधार खडा किया जा रहा है ताकि अवसर आने पर इसे व्यापक आन्दोलन के साथ जोडा जा सके। इस पूरी प्रक्रिया में सभी एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य कर रहे हैं लेकिन योजना एक है और और सभी प्रमुख मुस्लिम नेता, इस्लामी नेतृत्व इस बात पर सहमत हैं कि देश में इस्लामी वर्चस्व बढना चाहिये। इस कार्य में उन्हें कम्युनिष्टों का खुलकर समर्थन मिल रहा है। पश्चिम बंगाल में यह गठबन्धन स्पष्ट है जहाँ जमायते इस्लामी और माओवादी एकसाथ ममता बनर्जी का साथ दे रहे हैं। इसी प्रकार मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात अमेरिका विरोध के नामपर इस्लामी संगठनों के साथ मिलकर कार्य करने के सबसे बडे पैरोकार हैं। जिन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में अनेक कुख्यात इस्लामी संगठनों और जमायते इस्लामी का समर्थन लिया था जिसके कारण कम्युनिष्ट पार्टी को क्षति भी उठानी पडी थी। इसी प्रकार प्रकाश करात अनेक बार जामिया विश्वविद्यालय में मुस्लिम मंचों पर आ चुके हैं जहाँ कार्यक्रम का आरम्भ कुरान की आयतों से हुआ है।
जो लोग पश्चिम बंगाल में कम्युनिष्ट पार्टी के पराभव से अत्यंत खुश हैं उन्हें यह स्मरण रखना चाहिये कि सत्ता की चाह में ममता बनर्जी ने ऐसे खतरनाक गठबन्धन को प्रश्रय दिया है जिसकी कीमत पूरे देश को आने वाले समय में चुकानी पडेगी।
पिछले अनेक वर्षों से देश में इस्लामवादी आन्दोलन चलाया जा रहा है और पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा की प्रराजय सुनिश्चित करने के लिये और कम्युनिष्टों के नेतृत्व में बन रहे तीसरे मोर्चे को सफल न होता देखकर देश में मुसलमानों ने कांग्रेस के साथ जाने का निश्चय किया और इसके लिये कुछ अप्रत्यक्ष शर्तें भी लगाईं। सच्चर कमेटी की सिफारिशों का क्रियांवयन, आतंकवाद के मामले में मुसलमानों के साथ मुरव्वत, आतंकवाद के साथ मुस्लिम समाज के जुडाव को लोगों के मस्तिष्क़ से हटाने का प्रयास। वास्तव में ये शर्तें इस्लामवादी आन्दोलन को सशक्त करती हैं और सरकार, सेना और पुलिस बल को दुविधा में डालती हैं। इस्लामवादियों के आन्दोलन को यह रणंनीति देने का कार्य कम्युनिष्ट कर रहे हैं।
ओखला विधानसभा चुनाव के परिणाम को जितना हल्के में लिया गया है वह अत्यंत घातक है। पूरे एक वर्ष तक इस प्रकार बाट्ला हाउस मुठभेड के मुद्दे को जीवित रखा गया और इसे पहले लोकसभा चुनाव में मुद्दा बनाया गया और फिर इसी मुद्दे पर एक विधानसभा सीट दिल्ली के उसी क्षेत्र में जीत ली गयी यह एक आन्दोलन का ही परिणाम हो सकता है । उत्तर प्रदेश में मोहम्मद आजम खान का समाजवादी पार्टी छोड्कर जाना और ओखला विधानसभा चुनाव में आसिफ मोहम्मद खान के लिये बाटला हाउस मुठभेड के नाम पर वोट माँगना और इस मुठभेड को भारत के लोकतंत्र की ह्त्या बताना आखिर किस बात की ओर सकेत करता है?
ओखला विधानसभा चुनाव परिणाम केवल अकेला संकेत नहीं है कि इस्लामवादी आन्दोलन को गति प्रदान की जा रही है। दिल्ली में पिछले तीन महीनों से कुतुबमीनार जो कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है वहाँ मुसमानों द्वारा बिना टिकट प्रवेश करना और इस परिसर को मस्जिद बताकर नमाज पढने की जिद करना स्थानीय स्तर पर मुस्लिम ध्रुवीकरण कर मुस्लिम साम्प्रदायिकता को उभारने का प्रयास नहीं है तो क्या है? इसी प्रकार मेहरौली क्षेत्र में जब जमाली कमाली मस्जिद में भी जब मुस्लिम युवकों ने जबरन घुसने का प्रयास किया और फिर सड्क पर ही नमाज पढी तो अनेक घण्टे ट्राफिक जाम रहा। इसके बाद जनता दल यू के नेता सैयद शहाबुद्दीन ने केन्द्र सरकार से आग्रह किया कि वे 1980 के दशक में प्रमुख मुस्लिम राजनीतिक संगठन मजलिसे मुशावरत के साथ भारत सरकार के समझौते का सम्मान करते हुए पुरातत्व विभाग के अधीन सभी मस्जिदों को मुसलमानों के लिये नमाज के लिये खोल दें।
यह कार्य करने का तरीका पूरी तरह कम्युनिष्टों से मेल खाता है कि एक सिंडीकेट तैयार किया जाये और किसी भी मुद्दे को बौद्धिक, राजनीतिक और क्रियात्मक ढंग से उठाया जाये ताकि उसके प्रभाव से अधिक उसका शोर हो और वह मुद्दा बन जाये। इन सभी प्रयासों के पीछे प्रयास यही है कि परम्परागत इस्लामी पद्धति का उपयोग करते हुए राजनीतिक और आन्दोलनात्मक तरीके से सामान्य मुसलमानों को यह सन्देश दिया जा सके कि देश में मुसलमानों के साथ भेदभाव हो रहा है फिर वह बाटला हाउस मुठभेड का मामला हो या फिर पुरातत्व विभाग की मस्जिदों में नमाज पढने का मामला हो।
देश के अनेक हिस्सों में विशेषकर दक्षिण के कुछ राज्यों में खाडी के देशों में कार्य करने वाले मुसलमानों के पास धन की प्रचुर मात्रा होने और इसी बहाने सउदी अरब का पैसा आने से अनेक क्षेत्रों में स्थिति अत्यंत विस्फोटक हो चुकी है। तमिलनाडु में भी पिछले कुछ वर्षो में अनेक मुस्लिम संगठनों ने राजनीतिक संगठन के भेष में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को नयी उडान दी है। अब यही प्रयोग उत्तर भारत में किया जा रहा है।
देश के सभी राजनीतिक दल जिस प्रकार एक संभ्रम की स्थिति में हैं और मूल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने में अपनी सारी ऊर्जा लगा रहे हैं वह अत्यंत निराशा का वातावरण है। आज अनेक ऐसे मुद्दे उठा दिये जाते हैं कि पत्रकार और बुद्धिजीवी उसी में उलझकर रह जाता है। जैसे समलैंगिकता को कानूनी दर्जा देना, आर्थिक बचत के लिये कम खर्च के साथ विमान या रेल में यात्रा करना। पिछके तीन महीनों में सरकार में बैठे लोग बडी चतुराई से निरर्थक मुद्दों में लोगों को उलझा रहे हैं और लोग उन्हीं बे सिर पैर के मुद्दों पर टीवी, समाचार पत्र और ब्लाग तक में पिल पडते हैं।
सरकार को आते ही पता लगा कि मँहगाई रोकना उसके बस का नहीं है और लोकसभा चुनावों में कन्धार विमान अपहरण के मामले में भाजपा की खिल्ली उडाने वाली और मुम्बई आक्रमण के बाद पाकिस्तान को दबाव में लेने का दावा करने वाली कांग्रेस अब सरकार में आने के बाद मुम्बई आक्रमण के दोषिय़ॉं का कुछ भी नहीं कर सकेगी, इसी प्रकार चीन के साथ युद्ध की नौबत नहीं होने पर भी उसकी धौंस देश की कमजोर पड्ती छवि को प्रदर्शित करती है। इन्हीं तथ्यों के प्रकाश में सरकार ने सबसे पहले धारा 377 का मुद्दा फेंका और मीडिया में तो मानों भूचाल आ गया और कुछ साधु संत भी इस बहस में कूद पडे। फिर मौका आया सच का सामना धारावाहिक का और फिर बहस होने लगी नैतिकता और अनैतिकता पर। इसी प्रकार सादगी और बचत का दौर चला और ट्विटर पर टीका टिप्पणी का।
आज इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि क्या भारत में बौद्धिक वर्ग और पत्रकार इतने खोखले और मौलिकताविहीन हो गये हैं कि भेड की तरह आचरण कर रहे हैं और अपने विवेक और बुद्दि का प्रयोग किये बिना निरर्थक मुद्दों में अपना मस्तिष्क़ और अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं जबकि देश के भीतर और बाहर इतनी चुनौतियाँ हैं। पिछले तीन महीनों में केवल दो तीन विषयों पर बहस हुई है- अब भाजपा का क्या होगा? क्या समलैंगिकता को मान्य होना चाहिये या नही? सच का सामना धारावाहिक हमारी परम्परा पर आक्रमण है क्या? और सोनिया और राहुल गाँधी ने जो इकोनोमी क्लास या रेल में यात्रा की वह दिखावा था या फिर क्या? आश्चर्य तो तब होता है जब देश के राजनीतिक दल भी इसी बहस में उलझ जाते हैं। निश्चित रूप से बौद्धिक संभ्रम की स्थिति से बाहर आकर ठोस मुद्दों पर चर्चा करनी होगी ताकि सरकार पर और राजनीतिक दलों पर दबाव बने।
इजरायल की निन्दा का दौर फिर आरम्भ
पिछले वर्ष इजरायल द्वारा हमास के विरुद्ध गाजा में की गयी कार्रवाई को लेकर समस्त विश्व ने इजरायल की निन्दा की थी। इजरायल की इस कार्रवाई पर संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार परिषद ने जो इस विश्व संस्था की नवोदित संस्था है उसने दक्षिण अफ्रीका के रिचर्ड गोल्ड्स्टोन के नेतृत्व में एक जाँच समिति निर्मित की थी जिसकी जाँच रिपोर्ट बीते दिनों 15 सितम्बर को प्रकाशित हुई। इस जाँच रिपोर्ट को लेकर दो प्रकार की प्रतिक्रियायें आनी स्वाभाविक थीं। एक ओर इजरायल ने जहाँ इस रिपोर्ट को एकतरफा और पूर्वाग्रहपूर्ण बताया है वहीं इजरायल विरोधी इसे इजरायल की निन्दा का एक और हथियार मानकर चल रहे हैं। वैसे अपनी स्थापना के बाद से पिछले 6 दशक में इजरायल की इतनी निन्दा हुई है कि अब इस देश को भी इस निन्दा की परवाह नहीं करनी चाहिये।
गोल्डस्टोन रिपोर्ट को लेकर इजरायल ने जो आपत्तियाँ उठाई हैं उनपर ध्यान दिये बिना इस रिपोर्ट को पूरी तरह स्वीकार कर लेना और इजरायल को युद्ध अपराधी मान लेना न तो नैतिक दृष्टि से उचित है और न ही अकादमिक दृष्टि से ही उचित है। गोल्डस्टोन रिपोर्ट पर विश्व भर में हुई प्रतिक्रिया पूरी तरह एकतरफा और भावुक है जिसमें इजरायल को पहले से ही दोषी सिद्ध किया जा चुका है। इजरायल ने जब गाजा पर कार्रवाई की थी तभी यह मान लिया गया था कि फिलीस्तीनी और हमास निर्दोष है और इजरायल फिलीस्तीन में नरसंहार कर रहा है। इसलिये पूरी तरह स्पष्ट है कि यदि गोल्ड्स्टोन रिपोर्ट में इजरायल पर आरोप न लगाये जाते तो शायद आज जो लोग गोल्डस्टोन की प्रशंसा करते नहीं थकते वही उसे अमेरिका और इजरायल का एजेण्ट सिद्द करने में पीछे नहीं रहते। इस रिपोर्ट को नकारते हुए इजरायल ने जो तर्क दिये हैं उन पर ध्यान तो दिया ही जा सकता है। जिस मानवाधिकार परिषद ने इस जाँच समिति को बनाया था वह पहले ही गाज़ा में इजरायल की कार्रवाई को युद्ध अपराध बताकर निन्दित कर चुकी थी ऐसे में इस परिषद की निष्पक्षता को सन्देह के दायरे से बाहर कैसे माना जा सकता है जब इसने जाँच आयोग बनाने से पूर्व ही इजरायल के सम्बन्ध में अपनी राय व्यक्त कर दी थी।
इसी प्रकार कुछ अन्य बातें भी हैं जिसके चलते इस जाँच रिपोर्ट को जाँच से अधिक एक राजनीतिक वक्तव्य माना जा सकता है। जाँच रिपोर्ट में हमास की ओर से पिछले कुछ वर्षों में फिलीस्तीन से दागे गये 1200 राकेटों का उल्लेख तक नहीं किया गया है और इसी के साथ जिस गाजा में हमास का इतना प्रभाव है वहाँ के लोगों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे जाँच समिति के समक्ष गवाही में किसी भी प्रकार से हमास के विरुद्ध कोई बात कहते जबकि पूरे अभियान में बात सामने आयी थी कि हमास ने सामान्य नागरिकों को आगे कर रखा था ताकि उनके मरने पर इसे नरसंहार बताया जा सके।
जिस प्रकार रिपोर्ट में हमास की उकसाने वाली कार्रवाई और 1200 राकेट अपने क्षेत्र में दागे जाने के बाद भी संयम बनाये रखने की इजरायल के पक्ष को पूरी तरह नजरअन्दाज किया गया है उससे तो यही खतरा उत्पन्न हो गया है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिये राज्यप्रायोजित आतंकवाद से निपटने के लिये आत्मरक्षा की कार्रवाई करना अत्यंत कठिन हो जायेगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार परिषद ने एक बार फिर उस मानसिकता का परिचय दिया है जो पूरी तरह विरोधाभासी है। वर्तमान समय में जब कुछ देश धर्म को एक राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग कर इस नीति को अपनी विदेश नीति का अंग बना रहे हैं तो ऐसे में किसी भी प्रतिरोध पर प्रश्नचिन्ह खडा करने से पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ या मानवाधिकार संगठन यह तो बतायें कि इस इस्लामवादी मानसिकता और इसके पीछे छुपे उद्देश्यों का मुकाबला कैसे किया जाये?
एक ओर समस्त विश्व में वामपंथी और इस्लामवादी बौद्धिक वर्ग गोल्डस्टोन रिपोर्ट पर इतना बावेला मचा रहा है वहीं ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के खुलेआम इजरायल को नष्ट करने की धमकी पर चुप है। अभी कुछ दिन पूर्व ही ईरान के राष्ट्रपति ने यूरोप में हुए यहूदी नरसंहार को एक काल्पनिक और तथ्य से परे बात कहा और इस आधार पर इजरायल के अस्तित्व को चुनौती दी। वास्तव में महमूद अहमदीनेजाद की बात को लेकर वे लोग उत्साहित हो सकते हैं जो वर्षों से इस्लाम के गठबन्धन से अमेरिका और पूँजीवाद को नष्ट करना चाहते हैं लेकिन विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि धार्मिक उन्माद के आधार पर स्थापित की गयी कोई व्यवस्था कितनी विनाशकारी होती है ।
समस्त विश्व में सोवियत रूस के पतन के बाद और वैश्वीकरण के विस्तार के बाद कम्युनिज्म के लिये वैचारिक धरातल पर कुछ बचा ही नहीं और अब कम्युनिज्म का एक ही आधार है अमेरिका विरोध। समस्त विश्व में वामपंथियों ने इस्लामवादी आन्दोलन के साथ मिलकर राजनीतिक इस्लाम को मजबूत करना आरम्भ किया है और भारत में यही कम्युनिष्ट बुद्धिजीवी धीरे धीरे माओवादियों और नक्सलियों के साथ इस्लामवाद और राजनीतिक इस्लाम को सशक्त कर रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में वैश्वीकरण के विस्तार के साथ विचारधाराओं के एजेण्डे भी वैश्विक हो रहे हैं। इसी सन्दर्भ में अब वैश्विक स्तर पर इजरायल और फिलीस्तीन विवाद में इजरायल का विरोध करना वामपन्थी होने का पहला लक्षण है इसलिये इजरायल की निन्दा करते हुए इस्लामवादियों को संतुष्ट रखते हैं। कम्युनिष्टों को लगता है कि अब समय आ गया है कि इस्लाम के आधार पर ब्याजमुक्त अर्थव्यवस्था की अवधारणा का समर्थन किया जाये ताकि पूँजीवाद को ध्वस्त किया जा सके।
वैश्विक स्तर पर वामपंथियों का इजरायल विरोध काफी पुराना है लेकिन भारत में इसके बारे में अधिक चर्चा तब से होने लगी जबसे 1991 में भारत ने इजरायल के साथ राजनयिक सम्बन्ध आरम्भ किये। भारत में कम्युनिज्म और इस्लाम का गठबन्धन काफी पुराना है और कम्युनिष्टों को सदा से यही लगा कि भारत में यदि कम्युनिज्म को स्थापित करना है तो भारत का मूल हिन्दू स्वरूप नष्ट करना होगा और इसलिये उन्होंने सेक्युलरिज्म की आड में भारत के इतिहास को पराजय की मानसिकता से भर दिया और इस्लाम को एक विजेता के धर्म के रूप में स्थापित किया। इसी गठबन्धन के चलते इजरायल के साथ रणनीतिक समानता होते हुए भी भारत को उसे राजनयिक दर्जा देने में 4 दशक से भी अधिक समय लग गया। अब इजरायल को राजनयिक दर्जा मिलने के बाद कम्युनिष्ट इस विषय को राजनीतिक और बौद्धिक दोनों मंचों पर एकसाथ उठाते हैं। पिछले दिनों सम्पन्न लोकसभा चुनाव में केरल में अनेक मुस्लिम संगठ्नों ने खुलकर कम्युनिष्टों का साथ दिया और वर्तमान केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर को हराने के लिये कम्युनिष्ट और मुस्लिम संगठन गोलबन्द हुए थे क्योंकि उन पर आरोप था कि वे इजरायल समर्थक हैं।
विश्व स्तर पर और भारत में इजरायल की निन्दा के फैशन को कम्युनिष्ट और इस्लामवादी प्रभाव के रूप में आँकना चाहिये। गोल्ड्स्टोन रिपोर्ट को लेकर यूरोप में जो प्रतिक्रिया आयी उससे स्पष्ट है कि यूरोप में कम्युनिष्ट प्रभाव क्षीण हो रहा है। भारत में अब भी बडी मात्रा में कम्युनिष्ट विचार के लेखक और पत्रकार हैं जो विचारधारा के स्तर पर इजरायल की निन्दा करते हैं लेकिन उसका आधार केवल इस्लामवादी आन्दोलन को सशक्त करना और उनके साथ एकता प्रदर्शित करना होता है। वैसे भारत में पश्चिम की तर्ज पर अनेक उदारवादी-वामपंथी भी हैं जो अपनी सार्वजनिक छवि को ध्यान में रखते हुए इजरायल विरोधी दिखना पसन्द करते हैं और व्यक्तिगत रूप से इजरायल की प्रशंसा करते हैं और उसकी प्रगति का पूरा लाभ उठाते हैं। यह वर्ग इजरायल की निन्दा किसी वैचारिक प्रतिबद्धता से अधिक राजनीतिक रूप से सही होने की ललक के कारण करता है परंतु जो कम्युनिष्ट इजरायल की निन्दा करते हैं वे बौद्धिक वास्तव में इस्लामवाद के साथ हैं और राजनीतिक इस्लाम का वर्चस्व बढता हुआ देखना चाहते हैं। यह वही वर्ग है जो भारत में हिन्दुत्व को भी गाली देते नहीं थकता, परंतु नक्सलवाद को व्यवस्था परिवर्तन का एक आन्दोलन मानता है।
भारत के सन्दर्भ में इजरायल के साथ सम्बन्धों का क्या महत्व है इस बात पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिये न कि इस बात पर कि इजरायल के बारे में समस्त विश्व का मुस्लिम समाज क्या सोचता है? भारत को अपनी सामरिक, रणनीतिक और विदेश नीति सम्बन्धी प्राथमिकतायें निर्धारित करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उसका हित किसमें है न कि अरब के मुसलमानों का हित किसमें है। आखिर इतने वर्षों में भारत के किसी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ने इजरायल की यात्रा नहीं की, संयुक्त राष्ट्र संघ में सदैव इजरायल विरोधी प्रस्ताव का समर्थन किया लेकिन भारत में 15 प्रतिशत से भी अधिक मुस्लिम जनस्ंख्या होने के बाद भी उसे आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कांफ्रेंस की सदस्यता नहीं मिली तो इसी कारण कि यह संगठन भारत के सभी प्रयासों के बाद भी इसे मुसलमानों का प्रतिनिधि नहीं मानता। इसी प्रकार इजरायल- अरब संघर्ष में अरब देशों का साथ देने के बाद भी ओआईसी ने सदैव कश्मीर मसले पर पाकिस्तान का पक्ष लिया क्यों क्योंकि यह संगठन मुद्दों को धर्म के आधार देखता है और भारत को गैर इस्लामिक देश मानकर उसे अपने से बाहर रखता है। इसके विपरीत भारत ने इजरायल के विषय को अपनी राष्ट्र्रीय नीति के बजाय एक धार्मिक विषय बना दिया और इस पूरे मामले को वोट बैंक के साथ जुड्ने दिया।
भारत के लिये समय आ गया है कि वह अपनी नीतियाँ अपने राष्ट्रीय हितों के सन्दर्भ में बनाये न कि किसी के तुष्टीकरण के लिये। आज इजरायल के साथ निकटतम और सामरिक सम्बन्ध या रक्षा समझौता ही इस्लामी आतंकवाद और पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद का प्रतिरोध है।
वैसे भी विचाधारा के स्तर पर जिस प्रकार कम्युनिष्ट और इस्लामवादी एकसाथ आ रहे हैं उसे देखते हुए इस बात की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आने वाले वर्षों में चीन, पाकिस्तान, ईरान और उत्तरी कोरिया एक खतरे के रूप में दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया में सामने आ जायें। क्योंकि आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध में चीन ने इस प्रकार खुलकर कभी भाग नहीं लिया कि उसे इस्लामी जगत के अविश्वास या घृणा का पात्र बनना पडे।
भारत में जो लोग आँखमूदकर इजरायल की निन्दा को सत्य मान लेते हैं उन्हें भारत सहित विश्व स्तर पर बन रहे कम्युनिष्ट इस्लामवादी गठजोड पर भी नजर रखनी चाहिये।
हिन्दू जीवन पद्दति नहीं धर्म है
इन दिनों धर्म पर बहस काफी तीव्र हो गयी है और भारत में पिछले 6 दशक में कम्युनिज्म और सेक्युलरिज्म के घालमेल ने बौद्धिक वर्ग में धर्म के विषय को लेकर एक विशेष प्रकार की ग्रंथि का निर्माण कर दिया है जिसके चलते वह धर्म को बहस के दायरे से बाहर रखना चाहता है। ऐसा विशेष रूप से हिन्दुओं में पाया जाता है। राजनीति पर तो काफी खुलकर चर्चा होगी लेकिन जब धर्म की बारी आयेगी तो उस पर कोई भी चर्चा करने से परहेज करते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दू धर्म के शिक्षण और प्रशिक्षण की सार्वजनिक प्रक्रिया पूरी तरह ठप सी हो गयी है। अब नयी पीढी के हिन्दू अपनी धार्मिक पहचान के प्रति आग्रह तो रखते हैं लेकिन अपने धर्म के मूलभूत स्वरूप को लेकर भ्रमित रहते हैं।
इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह है कि पिछले दो दशक में हिन्दूवादी संगठनों सहित अनेक मंचों से इस तथ्य को रूढ कर दिया गया है कि हिन्दू धर्म नहीं वरन जीवन दर्शन है। आज कोई भी बौद्धिक हिन्दू आपके मुँह से हिन्दू धर्म की बात निकलने से पहले ही उसे लपक कर कहता है कि हिन्दू धर्म नहीं वरन जीवन दर्शन है। यह भ्रम आखिर क्यों आया?
आज से कोई सौ वर्ष से पूर्व भी जब स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका और यूरोप में हिन्दू धर्म के बारे में अपने व्याख्यान दिये थे तो उन्होंने स्पष्ट रूप से हिन्दू धर्म को विश्व के सभी धर्मों के साथ तुलनात्मक दृष्टि से एक ऐसा धर्म सिद्ध किया था जिसमें आगे चलकर एक सार्वभौमिक धर्म बनने के गुण विद्यमान हैं। फिर स्वतंत्रता के बाद स्थिति बदल क्यों गयी? इसका कारण यही है कि हिन्दू धर्म को राजनीति और संविधान के दायरे में लाने के लिये उसकी नयी परिभाषा गढी जाने लगी और फिर सर्वोच्च न्यायालय का हिन्दुत्व के पक्ष में निर्णय आने के उपरांत इसे संवैधानिक पुष्टि मिल जाने के बाद तोता रटंत आरम्भ हो गया कि हिन्दुत्व जीवन पद्दति है।
वास्तव में वैश्विक स्तर पर अनेक ऐसे परिवर्तन होते हैं जिनकी दस्तक काफी पहले से मिलने लगती है। यही कुछ आज के सन्दर्भ में भी सत्य है। आज जिस प्रकार समस्त विश्व में धार्मिक पहचान का आग्रह तेजी से बढ रहा है उसका आरम्भ 1990 के दशक से ही हो गया था। कम्युनिज्म ने अपनी नास्तिक विचारधारा के चलते सेक्युलरिज्म को एक क़ृत्रिम आभास के रूप में जीवित रखा था। लेकिन सोवियत संघ के पतन के बाद से देश और लोग संस्कृति और राष्ट्र राज्य की अवधारणा से अधिक अपनी धार्मिक पहचान को आगे कर चल रहे हैं।
पश्चिम के देशों ने और इस्लामी देशों ने कभी भी सेक्युलरिज्म के नाम पर अपनी धार्मिक पहचान से समझौता नहीं किया था। किसी भी ईसाई देश में आज तक गैर ईसाई राष्ट्राध्यक्ष नहीं बना और ऐसा ही इस्लामी देशों के साथ भी है फिर भी भारत में सेक्युलरिज्म के नाम पर उसकी हिन्दू पहचान से उसे वंचित रखा गया और इसी प्रतिक्रिया में 1990 में हिन्दू आन्दोलन खडा हुआ।
हिन्दू आन्दोलन को संवैधानिक दायरे में और सेक्युलरिज्म के दायरे में रखने के लिये हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को पृथक बताया गया और इस घालमेल के परिणामस्वरूप सामान्य हिन्दू जनमानस ने हिन्दू धर्म को एक जीवन पद्धति के रूप में परिभाषित करना आरम्भ कर दिया।
जब धर्म को राजनीति के माध्यम से स्थापित करने का प्रयास किया जाता है तो इसी प्रकार की भ्रम की स्थिति का निर्माण होता है।
आज इस बात की आवश्यकता है कि हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के सम्बन्ध में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की जाये।
हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति बताने का प्रयास इस कारण भी हुआ कि हिन्दू धर्म अन्य सेमेटिक धर्मों की भाँति एक पुस्तक, पैगम्बर पर आधारित नहीं है लेकिन जीवन पद्धति के दायरे में कुछ नियम आते हैं जिन्हें धर्म की पुस्तक या पैगम्बर द्वारा निर्धारित किया जाता है और उसका पालन सुनिश्चित करने के लिये एक संस्थागत ढाँचा तैयार किया जाता है। जैसा कि इस्लाम धर्म में हमें देखने को मिलता है। शरियत और सुन्नत की अवधारणा इसी को प्रकट करते हैं। प्रत्येक इस्लाम धर्मावलम्बी के लिये इस्लाम, शरियत और सुन्ना ( अर्थात पैगम्बर के जीवन का अनुपालन) के आधार पर दिनचर्या और जीवन सुनिश्चित करने के लिये मौलवी, फतवे आदि की व्यवस्था है। इसी प्रकार इस्लाम एक आध्यात्मिक और दार्शनिक अवधारणा से अधिक शरियत के आधार पर जीवन जीने को प्रमुखता देता है। वैसे इस्लाम में भी रोजा, नमाज, जकात और हज आध्यात्मिक उन्नति के लिये ही है लेकिन योग पद्धति के अनुपात में उसका परिणाम अधिक देर से आता है। इसी प्रकार अल्लाह को ब्रह्म के रूप में स्थापित न करके पैगम्बर पर अधिक ध्यान दिया गया है।
वास्तव में सबसे प्राचीन सेमेटिक धर्म यहूदी धर्म में भी यहूदी कानूनों और जीवन पद्धति पर ही अधिक जोर दिया गया था जिसका काफी कुछ अंश इस्लाम में देखने को मिलता है। जैसे सुन्नत, एक ही दिशा में प्रार्थना ( इस्लाम में भी मक्का से पूर्व जेरुसलम की ओर मुँह करके ही प्रार्थना की जाती थी)। यहूदियों के सहस्रों वर्षों तक अपने मूल स्थान से दूर रहने के कारण उनके लिये मूल यहूदी जीवन पद्धति और कानूनों का पालन करना सम्भव नहीं हो सका और जिस देश में वे रहते थे उसी परिवेश के आधार पर उन्होंने स्वय़ं को ढाल लिया इसी कारण यहूदी आज अधिक विकसित और प्रगतिशील हैं। सम्भव है कि वे अपने ही देश में रहते तो उनका स्वरूप कुछ दूसरा होता।
हिन्दू धर्म के जीवन पद्धति के रूप मे परिभाषित करने से हिन्दू के लिये एक समान कानूनी संहिता, रहन सहन, पहनावा, खान-पान और आचार व्यवहार की आवश्यकता होती है। वास्तव में पिछले सहस्रों वर्षों से विश्व में धर्म पर चर्चा होते समय सेमेटिक धर्मों के प्रकाश में अन्य धर्मों के गुणों को परखा जाता है। इस आधार पर एकरूपता को धर्म की पहली शर्त माना जाता है। इसी बहस का परिणाम है कि कुछ धारणायें पूरी तरह उलट गयी हैं। जो धर्म जीवन पद्धति है उसे सर्वश्रेष्ठ धर्म के रूप में आँका जाता है और जिस धर्म में सार्वभौमिक धर्म होने की क्षमता है उसे जीवन पद्धति कहा जाता है।
आज के वैश्वीकरण और वैज्ञानिक युग में इस बात पर टकराव करने का कोई कारण नहीं है कि किसके पैगम्बर या अवतार श्रेष्ठ हैं और किसके कमतर हैं। इस युग में बहस इस बात पर होनी चाहिये कि धर्म के लक्षण क्या हैं और धार्मिक आधार पर टकराव समाप्त करने के लिये किसी सार्वभौमिक धर्म की कल्पना की जा सकती है क्या? लेकिन यदि कोई इसके उत्तर में कहे कि हमारा धर्म ही सार्वभौमिक है क्योंकि हमारे पैगम्बर को ही अंतिम मानो तब तो टकराव ज्यों का त्यों बना रहेगा। इसी प्रकार कोई कहे कि सबके चर्च की शरण में आये बिना सार्वभौमिक धर्म की अवधारणा सफल नहीं हो सकती तो भी टकराव समाप्त नहीं होगा। सार्वभौमिक धर्म वही हो सकता है जो व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करे और उस पर नियम, कायदे, उपासना पद्धति या फिर किसी पैगम्बर का बोझ न डाले।
निश्चित रूप से अभी वह समय नहीं आया है लेकिन वह समय भी अधिक दूर नहीं है। हिन्दू धर्म को लेकर जो दुविधा सदैव से बुद्धिजीवियो में रही है वह दो स्तरों पर है। प्रथम, यदि हिन्दू धर्म की दार्शनिक अवधारणा और उसके औपनिषदिक चिंतन के आधार पर उसकी व्याख्या करें तो उसके लिये एक भौगोलिक ईकाई के आधार पर हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को पुष्ट कर पाना कठिन हो जाता है। क्योंकि हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप आत्मा की अमरता, कर्मफल का सिद्धांत और सृष्टि के बहुत्व में एकत्व की ब्रह्म की अवधारणा है जो योग की अनेक शाखाओं के माध्यम से आत्मतत्व की प्राप्ति का क्रियात्मक पक्ष प्रस्तुत करता है। इस पूरी धारणा में किसी राष्ट्र, जाति, नस्ल या धर्म की सीमायें नहीं हैं और यह आधात्यामिक विज्ञान किसी के लिये भी खुला है लेकिन इस पूरी अवधारणा में भी राष्ट्रवाद के लिये स्थान है क्योंकि भारत में हिन्दुओं के पूर्वजों ने अध्यात्म विज्ञान की खोज की है जो सबसे बडा विज्ञान है कि सृष्टि में जो कुछ भी बहुलता दिखाई देती है उसके बाद भी एक ही तत्व उसकी एकता का आधार है जो सभी से जुडा है। इसी कारण व्यष्टि और समष्टि में समंवय का सिद्धांत हिन्दू धर्म का आधार है जिसका वर्तमान प्रकटीकरण हिन्दुत्व में होता है। अध्यात्म विज्ञान का पेटेंट हिन्दुओं का है इसलिये इसकी रक्षा करने का दायित्व भी उन्हीं का है।
स्वामी विवेकानन्द ने पहली बार किसी भी धर्म की आलोचना या किसी भी पैगम्बर की बहस में पडे बिना धर्म की एक सार्वभौमिक व्याख्या करने का प्रयास किया था। उन्होंने धर्म को पुस्तक और पैगम्बर की बहस के दायरे से बाहर लाकर कुछ मूलभूत सिद्धांतों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया था। वर्तमान वैज्ञानिक युग में और वैश्वीकरण के इस युग में जब सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर सार्वभौमिकता का सिद्धांत स्थापित हो रहा है तो धार्मिक स्तर पर भी सार्वभौमिकता का सिद्धांत स्थापित होना ही चाहिये।
आज जिस तीव्रता से पश्चिम में और अफ्रीकी देशों में हिन्दू धर्म को स्वीकार किया जा रहा है उसका मूलकारण उसकी सार्वभौमिकता और व्यापकता है। हिन्दू धर्म किसी एक अवतार या पुस्तक पर आधारित नहीं है। इसके कुछ मूलभूत सिद्धांत हैं जिसमें आत्मा की अमरता और ब्रह्म की व्यापकता है। इस सिद्धांत को सर्वस्वीकार्य बनाने के लिये और उसका सातत्य बनाये रखने के लिये जितनी दार्शनिक और बौद्धिक कसरत भारत में हमारे पूर्वजों ने की है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं हुई है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक दार्शनिक, पौराणिक और कर्मकाण्ड के स्तर पर एक ही सिद्धांत को प्रतिपादित करने का प्रयास हुआ। पुराणों की कथायें, कर्मकाण्ड ये भी उसी परम सत्ता के प्रति व्यक्ति को उन्मुख करते हैं। भारत में यदि कोई किसी देवता की आराधना करता है, पत्थर की उपासना करता है या फिर साँप की भी पूजा करता है तो वास्तव में उसमें विद्यमान उस ब्रह्म की आराधना करता है। विज्ञान भी तो सभी तत्वों को संचालित करने वाली शक्ति के अंवेषण में ही लगा है। विज्ञान के सभी आविष्कार एक ही दिशा की ओर संकेत करते हैं कि इस सृष्टि में बहुत्व में एकत्व है। लेकिन इस एकत्व को अनुभव करने का विज्ञान हिन्दू धर्म ने वर्षों पूर्व ही खोज निकाला था।
हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति सिद्ध करने का कारण केवल यही रहा है कि हिन्दू धर्म ने अपने मूलभूत सिद्धांतों को धर्म की परिभाषा का आधार बनाने का प्रयास ही नहीं किया। आयुर्वेद, अष्टाँग योग, गंगा, गायत्री, गोमाता, चारों धाम ये भारत की संस्कृति के नहीं हिन्दू धर्म की एकता के आधार हैं। आयुर्वेद, अष्टाँग योग व्यक्ति की वह आरम्भिक तैयारी है जब वह स्वयं को आत्मतत्व और ब्रह्म से साक्षात्कार के लिये तैयार करता है। इसी प्रकार चारों धाम, गंगा और गोमाता एक सामान्य हिन्दू को अपने बुद्धि विवेक के आधार पर हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों और ब्रह्म से जुडाव का आभास देते हैं। चारों धाम की यात्रा हिन्दू देश की सांस्कृतिक एकता का दर्शन करने के लिये नहीं करता वरन अपना परलोक सुधारने के लिये करता है। इसी प्रकार गंगा का दर्शन करने लोग इस भाव से नहीं जाते कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से भावविभोर हो जायें वरन इस भाव से जाते हैं कि गंगा स्वयं शिव की जटा से निकली हैं और इसमें स्नान करने से उनके पापों का मोचन होगा। भारत में सांस्कृतिक विविधता में भी एकता का भाव उसकी बहुत्व में एकत्व की आध्यात्मिक अवधारणा के कारण है और यही कारण है कि राम मन्दिर आन्दोलन में राम उसी ब्रह्म की एकता के प्रतीकरूप थे। राममन्दिर आन्दोलन में लोगों ने भाग विशुद्ध आध्यात्मिक भाव से लिया था।
अब अवसर आ गया है कि हिन्दुत्व को लेकर चल रही बहस पर कुछ ठहर कर विचार किया जाये और बिना सोचे समझे इसे जीवन पद्धति कहते रहने के स्थान पर तुलनात्मक धर्म का विमर्श आरम्भ किया जाये और धर्म के मूलभूत तत्वों के सन्दर्भ में सभी धर्मों की व्याख्या की जाये और जीवन पद्धति और धर्म का अंतर स्पष्ट किया जाये। इतने वर्षों में धर्म के आध्यात्मिक स्वरूप की अवहेलना करते रहने से धर्म का बाह्य स्वरूप ही धर्म का प्रतीक बनता जा रहा है और सारा झगडा बाह्य स्वरूप पर हो रहा है। धर्म के आधार पर खान-पान, रहन-सहन, आचार-व्यवहार को स्थापित करने के प्रयास के कारण विवाद पनपते हैं। भारत में हिन्दुओं में सांस्कृतिक आधार पर विविधता होते हुए भी आपस में एकता का आधार आध्यात्मिक संचेतना का मूलबिन्दु का एक होना है और सभी सांस्कृतिक विविधतायें इसी मूलबिन्दु पर केन्द्रित हैं। जबकि इसके विपरीत अन्य धर्मों का केन्द्रबिन्दु आध्यात्मिक न होने से मूल समस्या है और विषय यह उठाया जाता है कि इतनी सांस्कृतिक विविधताओं के लोग भारत में एक साथ रहते हैं तो फिर कुछ धर्मों के साथ क्या समस्या है? समस्या यही है कि एक तो उनका धार्मिक केन्र्् हिन्दू धार्मिक केन्द्र के साथ मेल नहीं खाता और वे अपनी धार्मिक श्रेष्ठता को भारत पर थोपने का प्रयास करते हैं।
वर्तमान वैश्वीकरण और वैज्ञानिक युग में वही विचारधारा या धर्म लोगों को संतुष्ट कर सकता है जो बहुत्व में एकत्व की बात करे और मानव मात्र को समभाव से देखे। हिन्दू धर्म ने जिस आध्यात्मिक विज्ञान की सर्जना की है वह देश काल परिस्थिति से परे सतत विकासमान धारा है जो शरीर, मन, बुद्धि से परे आत्मा के प्रदेश में ले जाती है और प्रकृति से भी स्वतंत्र कर पूर्ण मुक्ति प्रदान करती है।
इसी सिद्धांत के आधार पर विश्व को आगे बढना उसकी नीयति है। वैसे भी विश्व इतिहास पर यदि दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि जिहाद और क्रुसेड के काल के बाद से व्यक्ति दिनोंदिन स्वतंत्रता की ओर ही बढ रहा है। प्रबोधन युग में यूरोप ने चर्च की जडता को तोडा, फिर व्यक्ति की महत्ता को स्थापित किया गया, फ्राँसीसी क्रांति से पहले रूसो जैसे विद्वानों ने व्यक्ति की इच्छा का सिद्धांत स्थापित कर कहीं न कहीं व्यक्ति के भीतर विद्यमान स्वतंत्र सत्ता को ट्टोलने का प्रयास किया और फिर राजनीतिक संस्थाओं के द्वारा भी व्यक्ति को सार्वभौम सत्ता के रूप में स्थापित किया गया और आधुनिक युग में लोकतंत्र की सैद्धांतिक अवधारणा यही है कि व्यक्ति की इच्छा का सम्मान होना चाहिये। यह बात अलग है कि व्यावहारिक रूप से इसका प्रयोग अपने सिद्धांत के अनुरूप खरा उतरा या नहीं।
औपनिवेशिक काल का नस्ली श्रेष्ठता का विचार भी स्थायी नहीं रहा और फिर भौतिक द्वन्द्व का कम्युनिष्ट सिद्धांत भी अल्पकालिक सिद्ध हुआ। अब वैश्वीकरण का सिद्धांत स्थापित हो रहा है। अनेक पूर्वाग्रहों के चलते इस संक्रमण काल को अनेक रूपॉं में परिभाषित किया जा रहा है लेकिन वैश्वीकरण की यह संस्कृति शनैःशनैः सार्वभौमिकता के सिद्धांत को प्रबल कर रही है। अब राष्टृ राज्य और सरकारों की संस्कृति ढीली पड रही है और बहुराष्ट्रीय संस्कृति पनप रही है जहाँ व्यक्ति नस्ल, जाति, देश और सिद्धांतों की सीमाओं से परे व्यक्तिगत सम्बन्धों को मह्त्व दे रहा है। आज विश्व में अनेक स्थानों पर ऐसे निजी और व्यक्तिगत प्रयास सामने आ रहे हैं जिन्होने किसी भी राज्यगत संस्था से अधिक प्रभाव अर्जित किया है। शनैः शनैः विश्व एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ आने वाले वर्षों में अनेक प्रचलित अवधारणायें ध्वस्त होंगी और व्यक्ति अधिक स्वतंत्रता की ओर उन्मुख होगा और ऐसी स्थिति में शायद धर्म भी उसे सीमित नहीं कर सकेगा यदि उसकी सार्वभौमिक पहुँच नहीं है।

