भाजपा की समस्या है क्या?

बीते तीन चार माह में इस बात पर काफी चर्चा हुई है कि अब भाजपा का क्या होगा? लोकसभा चुनावों का परिणाम आते ही जिस प्रकार सर्वत्र यह विषय चर्चा के केन्द्रबिन्दु में है यह दो बातों की ओर संकेत करता है। एक देश में एकदलीय शासन की सम्भावना से लोग आशंकित हैं तो वही देश में पिछले डेढ दशक में विचारधारा के आधार पर आये परिवर्तन का यह संकेत है। तीन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम आने से यह चर्चा फिर प्रासंगिक हो उठी है।

देश की स्वतंत्रता के उपरांत कांग्रेस पार्टी ने जिस विचारधारा को अपनाया वह पूरी तरह कम्युनिज्म, सेक्युलरिज्म पर केन्द्रित रही। शीतयुद्ध के काल में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ने विदेश नीति में एक छ्द्म निर्गुट नीति के आधार पर एक काल्पनिक व्यवस्था नव स्वतंत्र अरब देशों और अफ्रीका के देशों के साथ खडा करने का प्रयास किया। लेकिन यह भी यथार्थ के ठोस धरातल पर आधारित नहीं थी और नेहरू जी की इन्हीं रूमानी नीतियों के कारण भारत में कम्युनिज्म और सेक्युलरिज्म को देश के निर्माण का आधार बनाया गया। जबकि इसके विपरीत देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू इतिहास के जानकार होते हुए भी भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन की मूल चेतना को समझने में असफल रहे। भारत का स्वतंत्रता संघर्ष हिन्दू नवजागरण की अभिव्यक्ति थी जिसका आधार बंकिम चन्द्र चटर्जी के आनन्दमठ, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती के ठोस धरातल पर आधारित था। इस पूरे आन्दोलन की चेतना के मूल में एक ही आकाँक्षा निहित थी कि भारत को महमूद गजनवी से पूर्व के भारत की पहचान से जोडा जाये। कांग्रेस ने देश की स्वतंत्रता के उपरांत इसके विपरीत नीतियाँ अपनाईं और तुर्की के कमाल अतातुर्क की तर्ज पर पण्डित नेहरू को लगा कि धर्म भारत के विकास को अवरुद्ध कर देगा इस कारण देश का नया स्वरूप सेक्युलरिज्म के आधार पर हो। यह शब्द संविधान में भले ही बाद में जोडा गया हो लेकिन स्वतंत्रता के समय से ही स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि को ठीक सन्दर्भ में नहीं समझा गया। गान्धी जी ने अपना पूरा आन्दोलन भक्ति आन्दोलन की तर्ज पर चलाया और राम को देश की आध्यात्मिक एकता का सूत्र बनाकर उसे तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ जोड दिया लेकिन हिन्दू मुस्लिम समस्या को लेकर वे भी उलझ गये।

1970 के दशक से देश में लगातार कांग्रेस विरोधी राजनीति के विकल्प के आते रहने से राजनीतिक स्तर पर तो कांग्रेस विरोध का ध्रुव बन रहा था लेकिन वैचारिक स्तर पर विकल्प 1980 के दशक में खडा होना उस समय आरम्भ हुआ जब कांग्रेस ने नरम हिन्दुत्व का आधार छोडकर मुस्लिम तुष्टीकरण का रास्ता ग्रहण कर लिया। इसी प्रतिक्रिया में राममन्दिर आन्दोलन ने आकार ग्रहण करना आरम्भ किया। फिर भी राममन्दिर आन्दोलन में केवल एक ही पक्ष नहीं था।

वास्तव में आज भाजपा की विवशता का कारण यही है कि राममन्दिर आन्दोलन से जुडी अपनी पहचान को भुलाने के लिये वह आतुर है। भाजपा का विस्तार राममन्दिर आन्दोलन के साथ हुआ और इस विस्तार के अनेक आयाम हैं। शहरी क्षेत्रों में इस आन्दोलन से अधिकतर हिन्दू अल्पसंख्यकवाद के चलते असुरक्षा की भावना से जुडे थे तो ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के हिन्दू इस आन्दोलन के साथ आध्यात्मिक परम्परा के आधार पर जुडे थे। यही वह बिन्दु है जो आज भाजपा के संभ्रम का कारण है और इसी कारण हिन्दुत्व की अनेक व्याख्यायें हो रही हैं।

भारत की लाखों वर्ष पुरानी पहचान का आधार उसकी सांस्कृतिक एकता नहीं वरन आध्यात्मिक एकता है। संस्कृति तो रहन- सहन, खान पान, आचार व्यवहार के आधार पर बनती है जिसके सम्बन्ध में भारत में अत्यंत विविधता है फिर भी इस विविधता में एकता का कारण आध्यात्मिक संचेतना का केन्द्रबिन्दु एक होना है। देश में कोई भी भाषा बोलने वाला, कोई भी वस्त्र पहनने वाला, किसी भी प्रकार का आचार व्यवहार करने वाला एक सिद्धांत को अवश्य मानता है कि सभी मार्ग एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं और वह है आत्मतत्व। गूढ दार्शनिक सिद्धांतों को गाँव के लोग इतनी सरलता से अपनी कहावतों में कह जाते हैं जिस पर ग्रंथों की रचना की जा सकती है। भारत में हमारे पूर्वजों ने इस् गूढ दार्शनिक सिद्धांत को युगानुकूल और व्यावहारिक जीवन में प्रायोगिक बनाने के लिये अनेक वे नियम बनाये जिनका मूल उद्देश्य ही यह है कि व्यक्ति का जीवन इस प्रकार सुगठित हो कि वह इस सत्य को कभी न भूले कि यह जीवन अंतिम सत्य नहीं है। आयुर्वेद, अष्टाँग योग, चारों धाम, गाय, गंगा, गायत्री सभी इसी एक सत्य के साथ साक्षात्कार कराते हैं। परंतु देश में स्वतंत्रता के बाद स्वयं को सेक्युलरिज्म के दायरे में लाने के लिये हिन्दूवादी शक्तियों ने सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय हिन्दुत्व के सम्बन्ध में आने के बाद रटना आरम्भ कर दिया कि हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म दो अलग- अलग चीजें है और हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति जबकि सामान्य समाज में हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को पर्याय माना जाता है। इसी कारण हिन्दुत्व धीरे धीरे एक राजनीतिक अवधारणा बनती गयी और सामान्य हिन्दू समाज को इसमें मूल हिन्दू चेतना के गुण नहीं दिखे और जिसके जो मन में आया वह हिन्दुत्व की व्याख्या करता गया और अब हिन्दुत्ववादियों ने ही हिन्दुत्व को मखौल बना दिया है और मीडिया में आये दिन हिन्दुत्व का मजाक उडाया जाता है।

वास्तव में इसके पीछे कुछ कारण हैं। एक तो भारत को हिन्दू राष्ट्र मानते हुए भी उसकी आध्यात्मिक गूढता और उसके औपनिषदिक दर्शन के आधार पर राजनीति और समाज को संगठित करने का प्रयास नहीं हुआ और इससे भी दुखद यह कि पिछले कुछ सौ वर्षों में हिन्दू समाज ने आत्मग्लानि और पराजित मानसिकता का जो भाव अपने भीतर व्याप्त कर लिया है हिन्दुत्व आन्दोलन भी उसी ग्रंथि का शिकार हो गया है और वर्तमान समस्याओं का समाधान सेमेटिक धर्म और जीवन दर्शन के आधार पर देखा जाने लगा है। जैसे भारत की आध्यात्मिक साधना व्यक्ति को भौतिक जीवन से पलायन की शिक्षा देती है, इससे व्यक्ति कायर हो जाता है, इस विचारधारा पर चलकर राष्ट्रवाद के लिये कार्य सम्भव नहीं है। इसी के साथ एक पुस्तक , एक पैगम्बर, धार्मिक अनुयायियों की एकरूपता और एक जैसी जीवन पद्धति को ही आदर्श मानकर हिन्दू धर्म की व्याख्या इसी सन्दर्भ में होने लगी और सेमेटिक परम्परा को आदर्श मानने से कहीं न कहीं सेमेटिक धर्मों की भाँति धर्म का अर्थ न्याय की स्थापना के बजाय दूसरे धर्म के प्रति घृणा को हिन्दू धर्म की एकता का आधार बनाने की भावना विकसित होने लगी।

जनसंघ की स्थापना से लेकर राममन्दिर आन्दोलन तक हिन्दू धर्म के मूल तत्वों की स्थापना के लिये प्रयास करने के स्थान पर उसे संविधान के दायरे में लाने, कम्युनिष्ट सिद्धांत के समानांतर दर्शन विकसित करने की होड और फिर सेक्युलरिज्म का विरोध करने के स्थान पर अपने हिदुत्व को सेक्युलरिज्म के दायरे में लाने के चलते वैचारिक स्तर पर काफी गड्ड मड्ड हुई। हिन्दू समाज को संगठित करने का दावा करने वाली शक्तियों ने तो कभी हिन्दू को एक ईकाई माना ही नहीं। यदि ऐसा होता तो भाजपा जाति, अवर्ण, सवर्ण , पिछडा, दलित, आदिवासी, जनजाति ,उत्तर दक्षिण की राजनीति न करती वरन भारत की आध्यात्मिक एकता को अपनी राजनीति का आधार बनाती। आज वैचारिक स्पष्टता न होने का ही परिणाम है कि जो विचारधारा की रट लगाते हैं वे जानते ही नहीं कि इस विचारधारा को सामाजिक और राजनीतिक रूप से कैसे क्रियांवित किया जाये। आज तो विचारधारा और हिन्दुत्व की बात केवल अपना भाव बढाने या फिर किसी की नजर में अच्छा बने रहने के लिये की जाती है।

वास्तव में भाजपा ने हिन्दुत्व का नारा तो लगाया लेकिन हिन्दू एकता का प्रयास नहीं किया। वही गलती की जो पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने की थी कि अनेक सुन्दर शब्द गढे और स्वप्न देखे लेकिन आधार का पता ही नहीं था और परिणाम आज सामने है। इसी प्रकार हिन्दुत्व की बात तो खूब हुई पर हिन्दुत्व है क्या और उसे कैसे साकार करना है न तो इसका पता है और न ही कोई कार्यक्रम। इसी कारण जिसके जो मन में आये बोलता है और वही हिन्दुत्व हो जाता है। यह वैचारिक दीवालियापन पूरी तरह स्पष्ट है कि पाकिस्तान के विभाजन के लिये नेहरू और पटेल को दोषी ठहराया जा रहा है और मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्युलर बताया जा रहा है क्योंकि जो लोग भी जिन्ना की प्रशंसा कर रहे हैं उनके लिये भाजपा और कांग्रेस में एक ही अंतर है कि कांग्रेस का नेतृत्त्व गाँधी परिवार के हाथ में है और वहाँ उनके लिये कोई स्थान कभी नहीं था इसी कारण ये लोग जनसंघ के साथ आये। क्योंकि इन्हें पाकिस्तान बनाने वालों की मानसिकता से कोई समस्या नहीं है।

लेकिन आज समाज भाजपा को हिन्दू पक्ष के रूप में देखना चाहता है और इसके लिये सबसे पहले विचारधारा की स्पष्टता लानी होगी। आज विचारधारा के सम्बन्ध में भाजपा या हिन्दुत्ववादियों की स्थिति उस बालक की तरह है जो परीक्षा में प्रश्नों का उत्तर देता है तो न तो वह उसे समझ पाता है और न ही परीक्षा पुस्तिका जाँचने वाला।

कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद जिस प्रकार भाजपा के भविष्य़ को लेकर चर्चा हो रही है उससे स्पष्ट है कि अब कम्युनिज्म के पतन के बाद सेक्युलरिज्म का खोखला स्वरूप सामने आ गया है वैसे भी यूरोप ने कभी भी अपनी ईसाई पहचान को लेकर क्षमा भाव नहीं रखा और मुस्लिम देशों में तो लोग जानते ही नहीं कि सेक्युलरिज्म किस चिडिया का नाम है लेकिन भारत में हिन्दू पहचान को भुलाने के लिये सेक्युलरिज्म का ढॉंग चलता रहा। कम्युनिज्म के पतन के बाद धर्म की पहचान का आग्रह सतह पर आ गया है। इसी के साथ विश्व में एक नया परिवर्तन भी आ रहा है और वह है वैश्व्वीकरण का। आने वाले एक दशक के परिवर्तन की आहट मिलनी आरम्भ हो गयी है। पहले इण्टरनेट ने राष्ट्र , राज्य और सरकार की सीमायें तोड दीं और अब आई पी एल जैसे टूर्नामेंट सिद्ध कर रहे हैं कि बहुराष्ट्रवाद और वैश्वीकरण का सिद्धांत ही भविष्य़ है।

इस युग का सिद्धांत है स्वतंत्रता। स्वतंत्रता के सिद्दांत को स्थापित करने के लिये एकरूपता, खान पान, रहन सहन, आचार व्यवहार और कुछ हद तक चरित्र के सिद्धांत भी देश काल परिस्थितियों के सापेक्ष रखने होंगे। इस युग में व्यक्ति स्वतंत्र होना चाहता है सूचना का अबाध स्रोत इसी तथ्य को इंगित करता है कि व्यक्ति अपनी स्वतंत्र चेतना विकसित करना चाहता है और स्वतंत्रता पर किसी प्रकार का हस्तक्षेप उसे सहन नहीं है। वह किसी एक विचार या व्यक्ति के साथ बँधा रहना नहीं चाहता। लेकिन इसका समाधान स्वतंत्रता का हनन नहीं वरन हिन्दू धर्म के सिद्धांत का प्रचार ही है। वास्तव में स्वतंत्रता के इस काल में ही हिन्दुत्व की प्रासंगिकता अधिक है।

आज हिन्दू धर्म के वास्तविक स्वरूप को सामने लाने की आवश्यकता है न कि किसी सेमेटिक धर्म के प्रकाश में उसकी व्याख्या करने की। धर्म की पहचान के प्रति बढ्ते आग्रह के चलते अवसर आ गया है कि हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति कहना बन्द किया जाये और वैश्वीकरण के इस काल में इसे सार्वभौमिक धर्म बनने की ओर विकसित किया जाये जो कि व्यक्ति को स्वतन्त्र होते रहने की प्रेरणा देते हुए अंततः प्रकृति से भी मुक्त हो जाने का क्रियात्मक विधान भी बताता है।

सैद्धांतिक रूप से हिन्दुत्व की आध्यात्मिक गम्भीरता के साथ ही हिन्दू अपनी पहचान को लेकर भी आतुर है। ज्यों ज्यों भारत में मध्य वर्ग सशक्त हो रहा है और वैश्वीकरण के चलते शहर और गाँव का भेद कम हो रहा है। गाँव के निवासी भी अपने जीवन को भौतिक आधार पर विकसित करना चाहते हैं इस कारण परम्परा के स्थान पर हिन्दू धर्म के मूल को संरक्षित रखते हुए विकास और स्वतंत्रता के साथ उसका समायोजन करना होगा परंतु यह धारणा पूरी तरह भ्रांति पर आधारित है कि हिन्दू स्वाभिमान, हिन्दू रक्षा और हिन्दू धर्म का विषय आधुनिकता के साथ मेल नहीं खाता। इसके विपरीत वास्तविकता तो यह है कि वर्तमान हिन्दू पीढी अधिक स्पष्ट और आक्रामक है जो हिन्दू को विश्व में एक शक्ति के रूप के रूप में देखने की आकाँक्षी है। भौतिक उन्नति की आकाँक्षा के बाद भी अवचेतन मन की यही आकाँक्षायें सुप्त हुई हैं समाप्त नहीं और इसमें एक प्रमुख आकाँक्षा भारत को महमूद गजनवी के पूर्व के भारत की चेतना से जोडना है।

भाजपा को यदि प्रासंगिक बने रहना है तो उसे हिन्दू राजनीतिक दल बनना होगा और नयी परिस्थितियों में अपना विकास करना होगा जिसमें आधुनिकता, विकास और जीवन स्तर के उत्थान की अभिलाषा के साथ हिन्दुओं के अवचेतन मन को साकार करने के लिये पूरी ईमानदारी के साथ विश्वास पूर्वक नयी राजनीतिक परिभाषा गढनी होगी। लेकिन इसके लिये आवश्यक है कि भाजपा अपने कार्यक्रम , नीतियों और हिन्दुत्व पर विश्वास करना सीखे। भाजपा को समझना होगा कि कांग्रेस यथास्थितिवादी राजनीतिक दल है और भाजपा अवचेतन मन और सपनों की पार्टी है। जब जब भाजपा यथास्थिति को अपनाने का प्रयास करेगी इसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा। भाजपा को सपनों को साकार करना और अवचेतन मन की आकाँक्षा को पूर्ण करने का राजनीतिक समीकरण ढूँढना होगा अन्यथा इसका ह्रास ही होता जायेगा। दुखद पक्ष तो यह है कि भाजपा हर पराजय के बाद कुछ नया बहाना ढूँढ कर स्वयं को और अपने समर्थकों को दिलासा देती है और सत्य से भागना चाहती है।

भाजपा को सेक्युलरिज्म के दायरे से बाहर आकर आधुनिकता के साथ हिन्दुत्व को समायोजित करना होगा जो कि हिन्दू आग्रह पर आधारित हो न कि तुष्टीकरण पर।

दिल्ली में मदरसे कहीं बन न जायें सिरदर्द

October 9, 2009 · Filed Under आतंकवाद · 4 Comments 

सच्चर कमेटी की सिफारिशों को क्रियांवित करने के लिये केन्द्र सरकार समान अवसर आयोग का गठन करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है जो पूरी तरह अल्पसंख्यक मंत्रालय के अधीन होगा और इस आयोग के द्वारा सभी क्षेत्रों में राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायायिक सहित पुलिस बलॉं तक में मुस्लिम आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया जायेगा। सरकार की दृष्टि में मुस्लिम समाज का कम प्रतिनिधित्व देश के सेक्युलर ढाँचे के साथ मेल नहीं खाता इसलिये अब इस समस्या का साम्प्रदायिक हल ढूँढा जा रहा है। लेकिन इस आयोग के आने से पहले ही देश के प्रशासन में यह भावना घर करती जा रही है कि मुस्लिम समस्या से अब आँख मूँद लेनी चाहिये।

अमेरिका पर 11 सितम्बर 2001 को हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के उपरांत अमेरिका सहित समस्त विश्व इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि परम्परागत इस्लामी शिक्षा व्यवस्था और मदरसों में सुधार की आवश्यकता है क्योंकि मदरसों में जिस प्रकार क़ुरान और शरियत की शिक्षा दी जाती है वह मदरसे के छात्रों को बडी आसानी से इस्लाम के नाम पर आत्ंकवाद की ओर मोड देती है। यहाँ तक कि इस्लामी आतंकवाद के एक बडे स्रोत पाकिस्तान ने भी स्वीकार किया कि मदरसों की शिक्षा ही उनके यहाँ इस्लामी आतंकवाद का मूल कारण है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्र्रफ ने इस सम्बन्ध में अनेक कदम उठाये और मदरसों पर सरकार का नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। भारत सरकार के नये शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल ने भी केन्द्रीय मदरसा बोर्ड स्थापित करने का प्रयास किया लेकिन इस्लामी संगठनों के दबाव के आगे वे झुक गये।
देश में मदरसे जिस प्रकार की शिक्षा देते हैं वह तो किसी से छुपी नहीं है लेकिन मदरसे पर्सनल कानून की बात करके और अल्पसंख्यक राजनीति का लाभ लेकर देश के लिये एक बडा खतरा बनते जा रहे हैं। अभी हाल में दिल्ली में एक ऐसा ही मामला सामने आया है जिसमें धौला कुँआ स्थित एक मदरसे की शिकायत मसूद आलम नामक युवक ने पुलिस से करनी चाही तो उसकी एफ आई आर तक दर्ज नहीं की गयी। धौला कुँआ स्थित मदरसा तरतीलुल, कुरान मस्जिद कँगाल शाह का मसूद आलम कानूनी दृष्टि से प्रभारी है लेकिन उसका आरोप है कि उसे और उसकी पत्नी को छोड्कर परिवार के शेष लोग इस मदरसे में अनेक गैरकानूनी गतिविधियाँ चलाते हैं और उनमें से सर्वप्रमुख है कि मसूद आलम का भाई मेवात स्थिति अपने एक और मदरसे की आड में मेवात से गायें लाकर धौला कुँआ के मदरसे में रात के अँधेरे में काट्ते हैं और बकरे के माँस के साथ मिलाकर बाजार में बेचते हैं। साथ ही इस मदरसे में सोने की नकली ईंट और नकली गिन्नियों का धन्धा भी जोर शोर से चलाया जाता है। साथ ही अनेक सन्दिग्ध लोग रातों को बडे बडे बैग के साथ मदरसे में रुकते हैं।
मसूद आलम का आरोप है कि जब भी उसने इस चीजों का विरोध किया तो घर के अन्य लोगों ने उसे मारा पीटा और चुप करा दिया

मसूद आलम ने अपनी एफ आई आर जो अभी तक दर्ज नहीं हुई है उसमें कहा है कि उसने मदरसे से शिक्षा ग्रहण नहीं की है इस कारण उसकी सोच खुली और साफ है और इसी कारण वह स्वाभिमानी जीवन जीना चाहता है और हराम की कमाई नहीं खाना चाहता। मसूद आलम के अनुसार उसे धौला कुँआ स्थिति मदरसे के प्रभारी का प्रमाण पत्र दिल्ली वफ्फ बोर्ड ने दे दिया और वह कानूनी तौर पर इस मदरसे का प्रभारी हो गया और मदरसे में गैर कानूनी कार्यों का विरोध करने के कारण मसूद के पिता ने अपने दूसरे पुत्र महमूद को मदरसे की देखभाल के लिये बुला लिया और मसूद और उसकी पत्नी कानूनी रूप से मदरसे के प्रभारी होते हुए भी बाहर किराये के मकान में रहने लगे और कभी कभार मदरसे में आने लगे।

मसूद के पिता और भाई का आपराधिक इतिहास है और 12 जनवरी 2002 को आर के पुरम सेक्टर 12 में अवैध रूप से गाय चुराते हुए उन्हें रंगे हाथों पकडा गया और मामला दर्ज हुआ जो मुकदमा अब भी चल रहा है और यह मामला पटियाला कोर्ट में चल रहा है। मसूद के पिता ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों और पुलिस से पहचान बना रखी है और असामाजिक तत्वों के सहारे अपनी धाक जमा रखी है।

मसूद आलम का कहना है कि कानूनी रूप से मदरसे का प्रभारी होने के कारण पिछले माह की 7 तारीख को वह स्थाई रूप से अपने परिवार के साथ मदरसे में रहने लगा और रमजाने के दौरान 10 गायें लाकर काटी गयीं और मसूद आलम ने उसका विरोध किया तो उसे धमकी दी गयी। धीरे धीरे मसूद आलम का गाय काट्ने के मामले पर अपने पिता, भाई और उनके ग़ुट से झगडा बढ गया। मसूद ने अपनी बहन वहीदा के पति शफी खान पर आरोप लगाया है कि वह अश्लील सीडी का धन्धा करता है जिसका केन्द्र भी मदरसा ही है और विजय इंक्लेव में उनकी सीडी की दुकान है। 26 सितम्बर 2009 प्रातःकाल 9 बजे मसूद आलम की पिटाई होने लगी तो उसने 100 नम्बर पर पीसीआर वैन को फोन किया लेकिन कोई भी नहीं आया। स्थानीय थाने ने भी इसे रोज रोज का मामला बताकर प्रार्थना पत्र लेने से मना कर दिया। उसी शाम को चार बजे मसूद आलम के परिवार के अन्य लोग फिर दो गायें लेकर आये तो मसूद आलम ने विरोध किया तो उसे जवाब मिला कि स्थानीय पुलिस चौकी को इतना पैसा खिलाया है कि कोई तेरी सहायता के लिये आगे नहीं आयेगा। इसके बाद मसूद के ऊपर एक साथ हमला हुआ जिसमें उसे काफी चोटें आयी हैं। मसूद आलम ने अपने पिता हामिद रिवजर, भाई महमूद आलम, बहन वहीदा, उसके पति शजी खान, महमूद की बेटी हारूनी, चाचा हनीफ , नवाब उर्फ कसाई, छात्र अरशद और छात्र अहमद रजा के विरुद्ध एफ आई आर की है जो अभी तक दर्ज नहीं हुई है।

इस पूरे प्रकरण ने कुछ गम्भीर प्रश्न खडे किये हैं कि क्या पुलिस प्रशासन रिश्वत लेकर ऐसे मामले भी दबाने में जुट गया है जो न केवल साम्प्रदायिक रूप ले सकता है वरन देश की राजधानी की सुरक्षा के लिये भी खतरा बन सकता है। एक ओर इस्लामी आत्ंकवाद के नेट्वर्क को देखते हुए और दिन प्रतिदिन आत्ंकी घटनाओं की आशंकाओं के मध्य इस प्रकार मदरसों के खुले आम गैर कानूनी गतिविधियों में लिप्त होने पर पुलिस प्रशासन की लापरवाही आश्चर्यजनक है। आखिर मसूद आलम ने अपनी शिकायत में कहा है कि रात को उसने स्वयं संदिग्ध लोगों को बैग के साथ मदरसे में देखा है फिर भी पुलिस की चुप्पी सन्देह उत्पन्न करती है कि क्या पुलिस पर कोई दबाव है?

जाकिर नाइक का एक पक्ष यह भी है

October 8, 2009 · Filed Under इस्लामी राजनीति · 8 Comments 

पिछले कुछ वर्षों से इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के प्रमुख ज़ाकिर नाइक न केवल भारत में वरन समस्त विश्व में काफी चर्चा में हैं। तुलनात्मक धर्म के नाम पर दूसरे धर्मों को इस्लाम से कमतर सिद्ध करने के व्यापक अभियान से एकबारगी सभी को लगा कि शायद ज़ाकिर नाइक इस्लामी भाषा में “ दावा” या फिर तर्क के आधार पर इस्लाम की एक नयी धारा का प्रचार कर रहे हैं जो ओसामा बिन लादेन और तालिबान से भिन्न है। यही कारण है कि न केवल भारत में वरन समस्त विश्व में धीरे धीरे उन्हें सुनने वालों की संख्या बढने लगी। पीस टीवी सहित अपने आडियो और वीडियो कैसेट और सीडी के माध्यम से ज़ाकिर नाइक असंख्य मुस्लिम युवाओं को इस्लाम की श्रेष्ठता का प्रचार करने के लिये सूचना के नये माध्यमों का प्रयोग करने की शिक्षा दे रहे हैं। इंटरनेट पर वीडियो की पहुँच के चलते समस्त विश्व के मुसलमान ज़ाकिर नाइक को सुन और देख पाते हैं ।

यूँ तो ज़ाकिर नाइक का दावा है कि वे विशुद्ध धार्मिक बहस करते हैं लेकिन शरियत और क़ुरान के आधार पर विश्व व्यवस्था की पूरी वकालत करते हैं। लेकिन एक समाचार जो भारत सहित समस्त विश्व के माथे पर बल देने वाला सिद्ध हो सकता है लेकिन जिसे अधिक प्रचार नहीं मिला वह है आतंकवाद के आरोप को झेल रहे एक अफगानिस्तानी अप्रवासी अमेरिकी का ज़ाकिर नाइक से प्रभावित होना।

टाइम पत्रिका ने 1 अक्टूबर http://news.yahoo.com/s/time/20091001/us_time/08599192712600 2009 को अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि अमेरिका में जनसंहारक हथियारों से आक्रमण करने के षडयंत्र के आरोप में गिरफ्तार नजीबुल्लाह ज़ाजी को भारत में पीस टीवी के माध्यम से इस्लाम का प्रचार करने वाले ज़ाकिर नाइक से प्रेरणा मिली थी। इस पत्रिका में बताया गया है कि ज़ाकिर नाइक गैर परम्परागत इस्लाम और कट्टर इस्लाम का मिश्रण अपने भाषणों में प्रस्तुत करते हैं। इस पत्रिका में ज़ाकिर नाइक को विवादित भारतीय इस्लामी टीवी धर्मांतरक बताया गया है। इसके साथ ही ज़ाकिर नाइक के उन विवादित भाषणों का भी उल्लेख किया गया है जिसमें ज़ाकिर नाइक ने कहा है कि यदि ओसामा बिन लादेन सबसे बडे आतंकवादी अमेरिका को आत्ंकित कर रहा है तो मैं उसके साथ हूँ और सभी मुसलमानों को आतंकवादी होना चाहिये।

अमेरिका में आतंकवाद के गम्भीर आरोप में गिरफ्तार पाकिस्तान मूल के नजिबुल्लाह ज़ाजी का ज़ाकिर नाइक को अपना प्रेरणा स्र्रोत बताना अत्यन्त खतरनाक है क्योंकि ज़ाकिर नाइक भारत में भी वेबसाइटों के जाल के जरिये मुस्लिम युवाओं को एक विशेष प्रकार से इस्लाम का प्रचार करने और वैश्विक इस्लामवादी आन्दोलन के साथ सहानुभूति रखने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। निश्चित रूप से यह मुस्लिम युवाओं को कट्टर बना रहा है और जामिया मिलिया इस्लामिया और ज़ामिया नगर में इसका दर्शन भी हो रहा है।
टाइम्स की इस सनसनीखेज रिपोर्ट के बाद अमेरिका और इजरायल ज़ाकिर नाइक के विवादित वीडियो का अध्ययन करने लगे हैं जिसमें बहुविवाह को समलैंगिता का विकल्प, जार्ज बुश को विश्व का नम्बर एक आतंकवादी, जार्ज वाशिंगटन और बेंजामिन फ्रैंकलिन को भी आतंकवादी और 11 सितम्बर 2001 को बुश द्वारा कराई गयी घटना बताया गया है इसके साथ ही शरियत आधारित व्यवस्था को श्रेष्ठ बताया गया है।

ज्ञातव्य हो कि पिछले अनेक वर्षों से ज़ाकिर नाइक के भाषणॉं और तेवरों के आधार पर मैं लोगों को सावधान करता आया हूँ कि ज़ाकिर नाइक एक विशेष प्रकार की कट्टरता मुस्लिम युवकों में निर्माण कर रहे हैं जो उन्हें मध्य पूर्व के इस्लामी आतंकी संगठनों की ओर खींचती जा रही है। टाइम पत्रिका की इस रिपोर्ट के बाद लोगों को सावधान हो जाना चाहिये और ज़ाकिर नाइक के ऊपर नजर रखनी चाहिये ताकि भारत फिलीस्तीन और अफगानिस्तान न बन जाये।

कहीं हम आडम्बरी तो नहीं होते जा रहे हैं?

पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ महाविद्यालयों के पत्रकारिता से जुडे छात्रों के मध्य विदेश नीति और भारत की सामरिक चुनौतियों से सम्बन्धित विषय पर मुझे इन छात्रों को सम्बोधित करना था। कार्यक्रम के उपरांत राजस्थान की एक पत्रकारिता छात्रा ने अनौपचारिक वार्तालाप में अनेक प्रश्न किये लेकिन एक प्रश्न के उत्तर से ही मुझे यह लेख लिखने की प्रेरणा हुई। उस छात्रा ने कहा कि वह अपने जीवन में पहली बार घर से बाहर अकेले निकली है और उसे बताया गया है कि पत्रकारिता एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ लडकियों को काफी कठिनाई होती है और उन्हें अनेक समझौतों के लिये तैयार रहना चाहिये। उसने मुझसे सलाह माँगी कि उसे क्या करना चाहिये? मैंने बदले में उससे प्रश्न किया कि जब उसने पहली बार घर से बाहर कदम निकाले होंगे तो निश्चय ही उसके मन में अधिक आशंकायें रही होंगी जो धीरे धीरे कम ही हुई होंगी। सम्भव है कि पहले लगा हो कि किसी लडकी का घर से बाहर निकलना और फिर पत्रकारिता के लिये प्रयास करना ही नैतिकता के अनेक प्रश्नों से सरोकार रखता हो लेकिन अब उसके सामने यही प्रश्न है कि वह पत्रकारिता में लड्की होते हुए अपने मूल्यों और आदर्शों के साथ् सांमजस्य बिठाकर कैसे चले? इसका जो समाधान मेरे पास था मैंने उस छात्रा को बताया और वह यह कि आदर्श का व्यावहारिकता के साथ सांमजस्य होना चाहिये और व्यावहारिकता का आदर्श के साथ। दोनों का ही अतिवाद व्यक्ति को अलग थलग कर देता है। जैसे आदर्श का व्यावहारिकता के साथ सांमजस्य नहीं होने से व्यक्ति दोहरा चरित्र का जीवन व्यतीत करने लगता है उसी प्रकार व्यावहारिकता में आदर्श का पुट नहीं होने से भी सफलता स्थाई नहीं होती।

व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का अपना आदर्श और मूल्य होते हैं और यह व्यक्तिगत स्तर पर कठोर और सामूहिक स्तर पर लचीला होता जाता है इसलिये प्रत्येक व्यक्ति अपनी परम्परा और संस्कार के आधार पर अपना आदर्श निर्धारित करता है। समाज में कार्य करते हुए इस आदर्श का व्यावहारिकता के साथ समायोजन करने से तात्पर्य यह है कि यदि किसी की परम्परा और संस्कार के आधार पर माँसाहार करना, शराब पीना या फिर धूम्रपान करना आदर्श जीवन के विपरीत है तो यदि उस व्यक्ति को ऐसे लोगों के साथ रहने से कुछ सीखने को मिलता है या प्रगति होती है तो निश्चय ही सांमजस्य किया जाना चाहिये। इसी के साथ व्यावहारिकता को भी आदर्श के साथ सांमजस्य करना चाहिये और कुछ सार्वभौमिक मूल्य और आदर्श हैं जिनका पालन होना चाहिये। निश्चित रूप से आज भी समाज में लडकियों का कार्यक्षेत्र में जीवन अनेक कष्टदायक अनुभव दे जाता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि लडकियों को घर की चारदीवारी से बाहर नहीं निकलना चाहिये और सभी क्षेत्रों में अपना कौशल नहीं दिखाना चाहिये। ज्यों ज्यों लडकियों ने सार्वजनिक जीवन में अपनी सक्रियता बढाई है उसी अनुपात में पुरूषों के मन में उनकी प्रति कुण्ठा कम होने लगी है। यह कुण्ठा धीरे धीरे और कम होगी जैसे जैसे स्त्रियों का आत्मविश्वास बढता जायेगा।

इस विषय पर सोचते हुए मुझे देश की आज की अनेक समस्याओं का एक सूत्र भी पकड में आ गया। आदर्श और नैतिकता की सापेक्ष व्याख्या नहीं होने से हमारा समाज एक दोहरे चरित्र और आडम्बर का शिकार हो गया है।

हमने सार्वजनिक जीवन में आदर्श और नैतिकता के इतने कठोर मानदण्ड निर्धारित कर रखे हैं कि यह जानते हुए भी कि कोई भी व्यक्ति उनका पालन नहीं करता और हर व्यक्ति का दोहरा चरित्र है हम यह आभास लेकर प्रसन्न रहते हैं कि सर्वत्र आदर्श और नैतिकता का पालन हो रहा है।

वास्तव में आदर्श और नैतिकता के कुछ मूलभूत नियम हैं जो सार्वभौमिक हैं और जिनका पालन करने की अपेक्षा सभी धर्मों, विचारधारा और व्यक्तिगत जीवन से सार्वजनिक जीवन तक के लोगों से की जाती है। परंतु इन मूलभूत तत्वों के अतिरिक्त रहन सहन, पहनावा, खान पान, आचार व्यवहार यह पूरी तरह देश काल परिस्थितियों के सापेक्ष होता है लेकिन कुछ वर्षों में आदर्श और नैतिकता की बहस इन्हीं पर आकर टिक गयी है।

वैश्वीकरण के इस युग में जबकि स्थानीयता और वैश्विक दृष्टिकोण के मध्य एक ट्कराव की सी स्थिति दिखती है तो निश्चय ही हमें यह समझना होगा कि वे कौन से तत्व हैं जिनका प्रचलन समाज के लिये घातक हो सकता है और कौन से तत्व ऐसे हैं जिन्हें आत्मसात करना चाहिये।

हरियाणा के विधानसभा चुनावों में यह जानकर मुझे अत्यंत कष्ट हुआ कि भाजपा ने पश्चिमी संगीत सहित अनेक पश्चिमी चलन को प्रतिबन्धित करने का प्रस्ताव अपने घोषणापत्र में किया है। यह सोच एक जबर्दस्त भ्रम का परिणाम है। कुछ वर्ष पूर्व मुझे हरियाणा जाने का अवसर मिला और वहाँ एक गाँव मुंडोग़ढी है जहाँ 100 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या है। इस क्षेत्र में पूरी तरह शरियत का कानून चलता है और टीवी प्रतिबन्धित है, लड्कियों का स्कूल जाना प्रतिबन्धित है इसी के साथ अन्य प्रतिबन्ध भी हैं। हरियाणा अत्यंत परम्परावादी क्षेत्र है जहाँ अब भी पंचायत का राज्य चलता है। लेकिन अब वह अवसर आ गया है कि हिन्दू समाज अपनी अनेक सामाजिक जडताओं से बाहर आये क्योंकि 700 वर्षों की पराधीनता के काल में अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बचाये रखने के लिये कुछ कठोर सामाजिक नियम बनाये गये थे ताकि आक्रमणकारियों के साथ मिल कर हम अपनी पह्चान न खो दें परंतु अब अवसर आ गया है कि ऐसी जडताओं को तोडा जाये और हिन्दू धर्म की सबसे बडी सेवा यही है कि अन्धविश्वास, सामाजिक जड्ता और परम्परा के मध्य अंतर करना सीखा जाये।

यदि गंगा न रहे, गायत्री न रहे,गाय न रहे, चार धाम न रहे, योग और आयुर्वेद न रहे , गीता का सन्देश न रहे तो मानना पडेगा कि हिन्दू परम्परा नष्ट हो रही है और जो भी विचारधारा इनका अस्तित्व स्वीकार नहीं करती और स्वयं को श्रेष्ठ मनवाने का उपक्रम करती है ऐसी किसी भी विचारधारा से हिन्दू धर्म को खतरा है। । जिन हिन्दुओं के पूर्वजों ने हजारों वर्षों की साधना और तपस्या से आध्यात्मिकता का सिद्धांत दिया और आध्यात्मिक स्तर पर स्वतंत्रता का ज्ञान दिया उसे सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर कैसे पालन किया जाता था यह सब कुछ हम अपनी हजारों वर्षॉं की पराधीनता के चलते भूल चुके हैं और सेमेटिक धर्मों की भाँति रहन-सहन, खान-पान, आचार व्यवहार, पहनावे के आधार पर अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान नष्ट होने का खतरा भाँपने लगे हैं।

जिस प्रकार देश में वैश्वीकरण के विरुद्ध एक व्यापक बह्स चलायी जा रही है उसमें तथ्य कम और आधुनिकता और परिवर्तन को आत्मसात कर पाने की अक्षमता के चलते असुरक्षा की भावना अधिक दिखाई पड रही है। भारत में वैश्वीकरण के आधार पर परिवर्तन की आहट 1985 के आस पास से ही दिखने लगी थी और तब से क्रमबद्द तरीके से मैंने प्रत्येक परिवर्तन के विरुद्ध तर्क सुने कि यह भारत को सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से खोखला करने का अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र है। पहले कम्प्यूटर आया तो कहा गया कि अब भारत में बेरोजगारों की फौज खडी हो जायेगी क्योंकि क्लर्क का काम मशीनें करेंगी। आज कल्पना करिये कि यदि कम्प्यूटर न हो तो रेल आरक्षण, बैंक से पैसा निकालना या जमा करना कितना कठिन होता। मुझे याद है कि मैं बचपन में जब बैंक जाता था तो मुझे तीन से चार घण्टे लगते थे।

इसी प्रकार- वैश्वीकरण और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आने पर जब महिलायें अनेक प्रकार की नौकरी करने लगीं तो कहा गया कि यह भारत के परिवार तंत्र को तोडने का अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र है। आज तो महानगरों में यदि पति पत्नी दोनों न कमायें तो घर चलाना मुश्किल होता है और लोग सहजता से चाहते हैं कि पत्नी भी नौकरी करे अब तो कस्बों और गाँवों में भी यह चलन आम है। लेकिन इन दोनों के बाद भी भारतीय संस्कृति नष्ट तो नहीं हुई। इसी प्रकार टीवी क्रांति, फैशन शो से लेकर इंटरनेट तक यही बहस आम है कि भारतीय संस्कृति अब गयी कि तब गयी।

वास्तव में बहुत वर्षॉं की पराधीनता के कारण हमारी असुरक्षा की भावना अत्यंत अधिक है और हमारा आत्मविश्वास अत्यल्प है। न चाहते हुए भी हिन्दू समाज मुस्लिम समाज की भाँति आचरण कर रहा है जो आधुनिकता का विरोध करते हुए हर घटनाक्रम के पीछे अमेरिका और इजरायल का हाथ देखता है। मुस्लिम समाज की इस मानसिकता का कारण भौतिक विकास में उनका पिछडना है। केवल धर्म को ही केन्द्र में रखने और शरियत और क़ुरान के आधार पर ही चलते रहने के आग्रह से वे पश्चिम के विकास की गति को पकड नहीं सके और आज इस हीन भावना से निकलने के लिये अनेक प्रयास कर रहे हैं जो उनमें कुण्ठा और हिंसा भर रहा है।

हिन्दू समाज को इस हीन भावना से स्वयं को बचाने की आवश्यकता है। जींस, टीशर्ट पहनने से, उन्मुक्त जीवन जीने से , स्वतंत्रता के प्रति आग्रह रखने से कोई संस्कृति कभी नष्ट नहीं होती। समाज में नैतिक शिक्षा देने, चारित्रिक निर्माण करने, लोगों को आदर्श का पाठ पढाने के लिये प्रयास समाज में होते रहते हैं और मूल भूत मूल्यों और आदर्शों को छोडकर अन्य बाहरी तत्व परिवर्तित होते रहते हैं और जो इन परिवर्तनों को जितना शीघ्र अपना कर उन्हें अपने अनुकूल और स्वयं को उनके अनुकूल बना लेता है वही अपनी पहचान के साथ प्रगति कर पाता है।

आज हम अपनी ऊर्जा उन मूलभूत तत्वों की रक्षा के लिये नहीं लगा रहे हैं जो न केवल भारत के लिये वरन मानवता के लिये आवश्यक है और वह है आध्यात्मिकता के सिद्धांत को किस प्रकार समाज और राजनीति के आचरण में ढाला जाये। वैश्वीकरण का यह प्रवाह किसी एक देश का षडयंत्र है या नहीं यह मह्त्वपूर्ण नहीं है मह्त्वपूर्ण है कि क्या इसे रोकने की क्षमता हमारे पास है तो फिर इसका प्रतिरोध करने में समय नष्ट करने के स्थान पर इसे अपने अनुरूप ढालने का आन्दोलन क्यों नहीं चलाया जाता?

आखिर आज से सौ वर्ष पूर्व यदि कोई समुद्र पार कर जाता था तो उसका धर्म भ्रष्ट हो जाता था। वह व्यवस्था भी काल सापेक्ष थी लेकिन यदि स्वामी विवेकानन्द ने समुद्र पार नहीं किया होता तो भारत में पुनर्जागरण भी नहीं होता। इसी प्रकार आज से सौ वर्ष पूर्व एक जाति दूसरी जाति का छुआ नहीं खाती थी और यह भी धर्म और संस्कृति से जुडा विषय था लेकिन अब इस नियम में काफी ढिलाई आ गयी है तो भी तो न तो हिन्दू धर्म नष्ट हुआ और न ही हमारी संस्कृति।

वास्तव में भारत की विविधता को देखते हुए हर आंचलिकता और क्षेत्रीयता का अपना महत्व है लेकिन परिस्थितियों के आधार पर इनमें भी तो परिवर्तन आता रहता है।

लेकिन आज वैश्वीकरण के स्तर पर हो रहे इन परिवर्तनों के चलते आदर्श और नैतिकता का व्यावहारिकता के साथ सांमजस्य आवश्यक है। क्योंकि ऐसा नहीं होने से ही आज व्यक्तिगत स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक हम ढोंग का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जैसे व्यक्तिगत जीवन में यदि कार में खरोंच लग जाती है तो लोग खरोंच लगाने वाले को पीट पीट कर मार डालते हैं लेकिन यदि उनसे उनका आदर्श पूछा जाये तो वह महात्मा गाँधी को ही बतायेंगे क्योंकि उन्हें भी पता है कि आदर्श को जीवन में ढाला नहीं जाता इसलिये उसे इतना ऊँचा रखो कि उसका व्यावहारिक जीवन से कोई लेना देना ही न हो।

इसी मानसिकता का दर्शन हमें सर्वत्र होता है। इसी कारण व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक जीवन में भारी विरोधाभास होता है। आज सब कुछ बाजारवाद से ही संचालित है इसलिये मुनाफा कमाने वाले जानते हैं किस चीज का प्रचार करने से तथाकथित आदर्श और नैतिकता का आभास ध्वस्त होगा और उसे बचाने के लिये कौन लोग सामने आयेंगे। यही कारण है कि बीते कुछ वर्षों में देश के वास्तविक मुद्दों पर चर्चा होने के स्थान पर अनेक ऐसे मुद्दों पर चर्चा होती है जिससे दोनों पक्षों को मुनाफा होता है। आखिर धारा 377 को देश में तूल किसने दिया यदि इस विषय पर इतनी बहस न होती तो कोई नहीं जान पाता कि यह क्या बला है? इसी प्रकार सच का सामना धारावाहिक को लोकप्रियता भी तो इसी मानसिकता ने दी। ऐसा नहीं है कि ऐसे लोग जान बूझकर विरोध करते हैं या बाजारवाद को लाभ पहुँचाते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि अपनी ऊर्जा कहाँ लगाई जाये कि वास्तविक फल प्राप्त हो। एक बार इन बाहरी कारणों से धर्म और संस्कृति के नष्ट होने की असुरक्षा की मानसिकता छोड दी जाये तो ही वास्तव में वास्तविक खतरों से लडा जा सकता है।

स्वतंत्रता व्यक्ति की मूलभूत आकाँक्षा होती है और वह उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है और अवसर मिलते ही अपने आस पास के प्रत्येक बन्धन तोड देना चाहता है। यह युग स्वतन्त्रता का युग है जो भी मान्यता, मिथक जिज्ञासा उत्पन्न करेगी और स्वतंत्रता को बाधित करेगी व्यक्ति उस ओर जाने का प्रयास करेगा। इसलिये आज समाज को इस बात पर विचार करना चाहिये कि स्वतंत्रता और उच्श्रृखलता के बीच सीमा रेखा क्या हो? स्वतंत्रता के मानक बनाये जायें जो सभी को स्वीकार्य हों। लेकिन इन सबसे भी पहले अपने समय की और अपने पूर्वजों की परम्परा को टूटते हुए देखकर हमें यह कदापि नहीं मानना चाहिये कि अब जो परिवर्तन होगा वह विनाशकारी होगा। क्योंकि हर पुरानी पीढी अपनी नयी पीढी से यही कहती है कि हमारे समय में आदर्श और नैतिकता चरम पर थी और अब तो सब नष्ट हो गया। बालीवुड में ऐसी फिल्में पिछले दो तीन दशक से बन रही हैं। अब अवसर है कि हम विचार करें कि हमें अपनी शक्ति और ऊर्जा कहाँ लगानी है? कौन हमारा शत्रु है और किससे हमें खतरा है? यह विचार करते समय हमें यही ध्यान में रखना चाहिये कि हमारी अगली पीढी किस प्रकार के वातावरण में अपने धर्म, संस्कृति का पालन करते हुए प्रगति और विकास कर सकेगी

लाचार भारत या लाचार नेतृत्व ?

भारत के लिये कूटनीटिक समस्यायें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर के विषय को उठाने के बाद और इसे एक स्वतन्त्र देश का दर्जा देने की माँग उठाने के बाद विश्व के मुस्लिम देशों के संगठन आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कांफ्रेंस ने जम्मू कश्मीर के लिये विशेष राजदूत की नियुक्ति कर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की मुश्किलें और बढा दी हैं। ओआईसी के इस निर्णय का भारत की स्थिति पर दूरगामी प्रभाव पड्ने वाला है। इससे एक ओर तो पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले देश के रूप में विश्व भर में बन रही अपनी पहचान से लोगों का ध्यान हटाकर कश्मीर के विषय को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप का बना सकेगा और इसी के साथ कश्मीर में कार्यरत अलगाववादी संगठन नयी परिस्थितियों में कश्मीर के मुद्दे को पुनर्परिभाषित कर सकेंगे।

पिछले कुछ दिनों से भारत सरकार और कश्मीरी अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के मध्य नये सिरे से बातचीत के लिये प्रयास हो रहे हैं और अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि इस माह के अंतिम सप्ताह में इन दोनों पक्षों में बातचीत का दौर आरम्भ हो सकता है। कश्मीर के विषय पर भारत सरकार हुर्रियत के साथ जो बातचीत करना चाहती है उसके पीछे एक तो अमेरिका का दबाव काम कर रहा है तो वहीं पिछले दिनों पाकिस्तान की सरकार द्वारा गिलगित और बालटिस्तान के क्षेत्र को एक अध्यादेश द्वारा स्वायत्तता देने के बाद भी उसे प्रकारांतर से पाकिस्तान के अधीन कर लेने से भी स्थितियों में कुछ परिवर्तन आया है।

गिलगित और बालटिस्तान क्षेत्र जम्मू कश्मीर का अंग नहीं था वरन जम्मू कश्मीर का उत्तरी क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। भारत पाकिस्तान के विभाजन के उपरांत 1 नवम्बर 1948 को यह क्षेत्र् डोगरा राज्य से अलग हो गया और पाकिस्तान में विलय कर लिया परंतु पाकिस्तान ने इसे पाक अधिकृत कश्मीर का अंग नहीं बनाया और एक विशेष कानून के द्वारा इसे प्रशासित किया। इस पर लागू होने वाला कानून अंग्रेजों के समय का ही कानून था जिसने अंतर्गत इस क्षेत्र के लोगों को किसी भी प्रकार की प्रशासनिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं दी गयी और ये लोग लगभग मार्शल ला की स्थिति में जीने को विवश रहे। पाक अधिकृत कश्मीर ने से अपने क्षेत्र का अंग बनाने से मना कर दिया क्योंकि इसके निवासी शिया और इस्मायली थे और पाक अधिकृत कश्मीर के शासकों का आशंका थी कि इस क्षेत्र के आने से उनका सुन्नी प्रभाव क्षीण हो जायेगा।

1980 के दशक में इस क्षेत्र में जनरल जिया उल हक ने शिया और इस्मायली लोगों का दमन कर यहाँ सुन्नी प्रभाव बढाने का प्रयास किया जिसके चलते इस क्षेत्र में भी शिया सुन्नी संघर्ष हुआ जिससे कि इस दशक में पूरा पाकिस्तान प्रभावित था और खुफिया एजेंसियों का तो कहना है कि जनरल जिया उल हक के विमान की दुर्घटना में इसी क्षेत्र के शिया तत्वों का हाथ था क्योंकि उस समय तक विमान के लिये तकनीकी और सेवाकर्मियों के लिये इसी क्षेत्र के शिया लोगों की भर्ती की जाती थी।

इस घटना के बाद से पाकिस्तान के शासक वर्ग ने गिलगित और बालटिस्तान में कडे कानून और सेंसरशिप के जरिये इस क्षेत्र में किसी राजनीतिक आन्दोलन या यहाँ की सूचनायें बाहर नहीं जाने देने का पूरा प्रयास किया। इसके साथ ही यह पहाडी क्षेत्र पाकिस्तान के लिये रणनीतिक दृष्टि से भी काफी लाभदायक था और कराकोरम पहाडी क्षेत्र इसी क्षेत्र में होने के कारण 1980 के दशक में पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान ने इसी पहाडी क्षेत्र का उपयोग कर चीन, ईरान और उत्तर कोरिया के साथ परमाणु तकनीक का आदान प्रदान किया। 1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत रूस के विरुद्ध पाकिस्तान का उपयोग करते हुए अमेरिका ने पाकिस्तान की परमाणु तस्करी की ओर से आंखें मूँदें रखीं और अमेरिकी कांग्रेस प्रति वर्ष उसे परमाणु के सम्बन्ध में चरित्र प्रमाण पत्र देती रही। इसी के साथ गिलगित और बाल्टिस्तान में जो दमन चक्र चलाया गया उस ओर से भी शेष विश्व ने आँख मूँद ली।

2001 में अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद बदली हुए परिस्थितियों में विशेषकर अब्दुल कदीर खान के परमाणु तस्करी के नेटवर्क के खुलासे के बाद इस्लामी आतंकवादियों के हाथ में परमाणु तकनीक चले जाने के भय से अमेरिका और इजरायल सहित पश्चिमी देशों के पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर नजर रखे जाने से कराकोरम पहाडी क्षेत्र का रणनीतिक मह्त्व बढ गया और साथ ही पिछले अनेक दशक से गिलगित और बालटिस्तान में राजनीतिक और व्यक्तिगत अधिकारों के लिये चल रहे संघर्ष को कुछ हद तक शांत करने के लिये पाकिस्तान ने अब इस क्षेत्र को स्वायत्तता देने का नाटक रचा है जबकि इस बहाने इस क्षेत्र को पाकिस्तान के नियंत्रण में ले लिया गया है। इस क्षेत्र को लेकर पाकिस्तान में अनेक मत हैं और अनेक बार पाक अधिकृत कश्मीर के न्यायालय और पाकिस्तान के न्यायालय में टकराव हो चुका है कि इस क्षेत्र को विवादित माना जाये या फिर पाक अधिकृत कश्मीर का अंग माना जाये। कुल मिलाकर वर्तमान स्थिति यह है कि इसे एक राजनीतिक मुद्दा मान लिया गया है। क्योंकि 1 नवम्बर 1948 को पाकिस्तान में विलय के समय भी पाकिस्तान ने इसे अपना अंग नहीं बनाया था और इसे विवादित क्षेत्र ही माना था जिसके भाग्य का फैसला भविष्य़ में कश्मीर की स्थिति पर निर्भर करेगा।

ऐसी परिस्थिति में एक तो यह क्षेत्र पूरी तरह स्वायत्त है और 15 अगस्त 1947 से पूर्व की स्थिति के अनुसार इस क्षेत्र पर पाकिस्तान का कोई अधिकार नहीं बनता है। लेकिन इस पूरे मामले में भारत सरकार की ओर से जो भी ढीली ढाली प्रतिक्रिया आयी है उससे तो यही लगता है कि देश की संसद ने 1994 में जो प्रस्ताव पारित किया था कि पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेंगे उसके प्रति अब सरकार गम्भीर नहीं है और पाक अधिकृत कश्मीर तो दूर एक अन्य विवादित क्षेत्र के पाकिस्तान का अंग बना लेने पर भी भारत सरकार ने मुखर होकर इसका विरोध नहीं किया।

कश्मीर के मुद्दे को छोडकर गिलगित और बालटिस्तान का पहाडी क्षेत्र और कराकोरम का क्षेत्र रणनीतिक स्थिति से अत्यंत संवेदनशील है ऐसे में चीन की इस क्षेत्र में बढती भूमिका को देखते हुए भी इस क्षेत्र पर पाकिस्तान की प्रशासनिक पकड निश्चित रूप से भारत के लिये चिंता का कारण होना चाहिये परंतु भारत सरकार ने इस विषय को जनता से बचाने का ही प्रयास अधिक किया और मीडिया ने भी इस विषय को अधिक मह्त्व देना उचित नहीं समझा।

1980 के दशक की भाँति एक बार फिर अफगानिस्तान में अमेरिका को पाकिस्तान की आवश्यकता है साथ ही उसके पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और बलूचिस्तान में स्थित अल कायदा और तालिबान के लडाकों और नेतृत्व को समाप्त करने के लिये भी वह पूरी तरह पाकिस्तान पर निर्भर है। अमेरिका की इस लाचारी का लाभ उठाकर पाकिस्तान उसे अपने हित में उसी प्रकार प्रयोग कर रहा है जैसे 1980 के दशक में किया था।

अमेरिका के राष्ट्रपति और उनका प्रशासन भी पाकिस्तान के इस तर्क से सहमत हुआ सा लगता है कि यदि भारत से लगी सीमा पर शांति रहे तो पाकिस्तान को आतंकवाद से लड्ने में अधिक सहायता होगी। इस तर्क के सहारे पाकिस्तान भारत पर कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का दबाव डाल रहा है और बडी चालाकी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे इस्लामिक राजनीति से जोड रहा है।

भारत सरकार ने एक बार फिर हुर्रियत कांफ्रेस के साथ बातचीत का जो निर्णय लिया है उसके सकारात्मक परिणाम मिलने की सम्भावना अत्यंत क्षीण है क्योंकि हुर्रियत कांफ्रेंस एक ओर तो पाकिस्तान के नेताओं के निकट सम्पर्क में है और ओआईसी जैसे संगठनों के साथ मिलकर कश्मीर के मुद्दे को वैश्विक इस्लामी राजनीतिक के साथ जोड रहा है और दूसरी ओर इसी आक्रामक कूट्नीति के सहारे भारत को बातचीत के लिये विवश कर रहा है। ऐसे में पिछले दो दशक से चल रहे इस्लामी आतंकवाद और अलगाववादी आन्दोलन को नया आयाम प्राप्त हो जायेगा और इन तत्वों को लगेगा कि आतंकवाद के बल पर सरकारों को कूटनीतिक मेज पर घसीटा जा सकता है।

11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद जिस प्रकार आतंकवाद की परिभाषा उभर कर आयी थी और विश्व समुदाय में आतंकवाद की पुरानी अवधारणा कि एक के लिये आतंकवादी दूसरे के लिये स्वतंत्रता का संघर्ष करने वाला है ध्वस्त हो गयी थी और कश्मीर से लेकर चेचन्या तक सभी को आत्ंकवादी ही माना जाने लगा था। यह स्थिति अब बदल रही है। जो लोग जार्ज बुश की पराजय और बराक ओबामा की विजय से नये विश्व का उदय देख रहे हैं उन्हें ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद कश्मीर की स्थिति में आये बदलाव की ओर भी ध्यान देना चाहिये।

कश्मीर में उमर अब्दुल्ला की सरकार के गठन के साथ ही जम्मू कश्मीर में एक विशेष प्रकार की राजनीति के दर्शन हमें हो रहे हैं। जम्मू कश्मीर में उमर अब्दुल्ला ने एक नरम अलगाववाद की नीति अपनाकर हुर्रियत कांफ्रेस और पीडीपी का राजनीतिक विस्तार समाप्त करने का प्रयास किया लेकिन इस सरकार के गठन के बाद से ही पीडीपी और हुर्रियत कांफ्रेंस ने किसी न किसी विषय को लेकर रोज कश्मीर की सडकों पर प्रदर्शन और हिंसा को आम कर दिया है ताकि विश्व समुदाय को यह सन्देश दिया जा सके कि कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन चरम पर है और इस क्षेत्र के लोग स्वतंत्रता चाहते हैं। इसी स्थिति के मध्य पाकिस्तान की ओर से सीमा पार घुसपैठ की घटनायें तेज हो गयी हैं और रोज सैन्य बलों के साथ पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों की मुठभेड के समाचार आते हैं लेकिन सामान्य जनता को इससे कोई फर्क नहीं पडता क्योंकि उन्हें अब इस क्षेत्र के प्रति कोई संवेदना नहीं रही और उन्हें पता है कि यहाँ रोज ऐसी घटनायें होती रहती हैं। देश के लोगों की यही संवेदनहीनता भारत सरकार को कश्मीर के मामले पर ढुलमुल् रवैया अपनाने का साहस प्रदान करती है।

पिछले अनेक अवसरों पर हम देख चुके हैं कि हुर्रियत और सरकार के मध्य बातचीत का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता है सिवाय इसके कि हुर्रियत जैसे पाकिस्तान परस्त अलगाववादी संगठन को मान्यता देकर भारत सरकार प्रकारांतर से पाकिस्तान को भी कश्मीर की समस्या का अंग बना लेती है। कुछ लोगों का तर्क है कि यदि बातचीत नहीं तो इस समस्या का निदान क्या है? निश्चित रूप से बातचीत होनी चाहिये लेकिन देश को यह तो पता होना चाहिये कि आखिर सरकार इस बातचीत से हासिल क्या करना चाहती है? केवल किसी के कहने पर या दबाव में बातचीत का अर्थ ही क्या हुआ? क्या बातचीत के द्वारा हुर्रियत के इस तर्क को स्वीकार किया जायेगा कि आतंकवाद के आरोप में जेलों में बन्द लोग राजनीतिक कैदी हैं , या फिर कश्मीर से सेना हटाने के प्रस्ताव को माना जायेगा?

जितनी बार भी हुर्रियत जैसे संगठ्नों के साथ बातचीत का प्रस्ताव किया जाता है निश्चित रूप से उन इस्लामी आतंकवादी संगठनों को सन्देश जाता है कि लगातार आतंकवाद की नीति का परिणाम होता है और आतंकवाद से लड्ते लड्ते अंततः राज्य, सरकार और जनता बातचीत की मेज पर आ ही जाती है और ऐसे थके और हारे लोगों के साथ मनमानी शर्तों पर बातचीत की जा सकती है।

ऐसी स्थिति में जबकि भारत में पिछले वर्ष 26 नवम्बर को मुम्बई पर हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के बाद आज दस महीने व्यतीत हो जाने पर भी भारत सरकार पाकिस्तान को कुछ भी करने के लिये बाध्य नहीं कर पाई जबकि इसके विपरीत पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनेक माध्यमों से उठवाने में सफल रहा और अब भारत ने पाकिस्तान परस्त कश्मीरी अलगाववादी संगठन के साथ बातचीत के प्रस्ताव को मानकर अपनी कूटनीतिक विवशता का परिचय दे दिया है। आज की स्थिति में पाकिस्तान भारत के लिये एजेंडा बना रहा है और भारत उसका पालन करने के लिये विवश है। 110 करोड की जनसंख्या वाला, परमाणु सम्पन्न देश जो महाशक्ति बनने का स्वप्न देख रहा है उसकी यह विवशता देखकर कष्ट आश्चर्यजनक है क्योंकि यह विवशता इस देश के लोगों की नहीं है वरन इस देश के राजनीतिक नेतृत्व की है। यह विवशता तो तब और उजागर होती है जब हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ यदि शांति प्रक्रिया नहीं चली तो उसका अर्थ होगा युद्ध लेकिन शायद प्रधानमंत्री जी भूल जाते हैं कि पाकिस्तान तो भारत के साथ पिछले 62 वर्षों से नित्य प्रति प्रच्छ्न्न युद्ध लड रहा है और हम नये नये तर्कों के सहारे अपनी विवशता, लाचारी और कमजोरी को छिपा रहे हैं।