हिन्दू आतंकवाद के मिथक का पर्दाफाश
बी शांतनु
हिन्दी अनुवाद- अमिताभ त्रिपाठी
http://satyameva-jayate.org/2010/07/19/myth-of-hindutva-terror/
आज कल एक नया भूत सामने लाया गया है और वह है हिन्दुत्व आतंकवाद ( उर्फ हिन्दू आतंकवाद)। सम्भव है यह शब्द आपने पहले भी सुना हो , सम्भव है कि आपको इस पर क्रोध आया हो लेकिन आप क्रोधित होकर अपने कार्य में लग गये होंगे। सम्भव है कि आपने यह सोचने का प्रयास भी नहीं किया होगा कि यह हिन्दुत्व आतंकवाद है क्या? अभी कुछ दिन पूर्व मैं कुछ लोगों के मध्य था और जब उन्होंने यह शब्द सुना तो वे क्रुद्ध हो गये शायद इससे भी अधिक क्रुद्ध हों लेकिन वे अपने कार्य में लग जायेंगे।
अभी पिछले सप्ताह एक जागरूक पाठक ने आउटलुक की हिन्दू आतंकवाद सम्बन्धी आवरण कथा की ओर मेरा ध्यान दिलाया। इस कहानी को लेकर अपनी जल्दबाजी की संक्षिप्त प्रतिक्रिया में मैने लिखा, “ इस लेख को भयंकर ढंग से हिन्दू आतंक का शीर्षक दिया गया है परंतु यह नहीं बताया गया है कि यह हिन्दू सिद्धांतों और हिन्दू परम्पराओ से किस प्रकार प्रेरित है। इसी प्रकार कुछ स्थानों पर हिन्दुत्व का भी सन्दर्भ लिया गया है परंतु इसके प्रयास नहीं हुए हैं कि हिन्दुत्व से उनका आशय क्या है और लेखक के अनुसार इसका अर्थ क्या है? “ लेकिन इसके उपरांत मैंने इस कहानी को फिर से पढा और मुझे पता लगा कि इसे बिकाऊ बनाने के लिये सनसनीखेज बनाया गया है। लेकिन इस लेख में इसके तथ्यों पर चर्चा की जायेगी।
यदि हम आउटलुक की कहानी पर लौटें हालाँकि न तो इस विषय पर यह पहली कथा है और न ही अंतिम होगी लेकिन इस कथा की समाप्ति इस कथन के साथ हुई कि जब सीबीआई सारे बिखरे हुए सूत्रों को एकसाथ जोडेगी तभी हिन्दुत्व आतंकवाद का समग्र चित्र सामने आ सकेगा। 2000 शब्दों के इस लेख को स्मृति कोप्पिकर, देबर्षि दासगुप्त और स्निग्धा हसन ने सहयोग दिया है “ हिन्दू आतंकवाद एक वास्तविकता है फिर भी भारत इस वास्तविकता को नाम नहीं देना चाहता”।
यह कथा मई में प्रवीन स्वामी के आउटलुक के ही लेख “ The Rise of Hindutva Terror” | पहले लेख की समीक्षा करना अधिक उचित होगा। प्रवीन स्वामी की यह रिपोर्ट आन्ध्र प्रदेश में हैदराबाद मे मक्का मस्जिद पर आक्रमण के सिलसिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक देवेन्द्र गुप्ता को उनके राजनीतिक सहयोगियों विष्णु प्रसाद और चन्द्रशेखर पाटीदार के साथ इस आक्रमण के लिये योजना बनाने के सन्देह में पकड्ने पर आधारित थी। Read More
अभी तक मक्का मस्जिद में विस्फोट के लिये ( अजमेर विस्फोट) यही माना जाता था कि यह कार्य इस्लामवादियों का है। इसी विस्फोट के सम्बन्ध में अपनी पूर्ववर्ती रिपोर्ट में प्रवीन स्वामी ने कहा था
“ गुरुवार को अजमेर में दरगाह पर हुआ बम विस्फोट जो कि 2006 को मालेगाँव में सूफी मस्जिद पर हुए विस्फोट के पश्चात उसी श्रृंखला में तीसरा विस्फोट है और इस साल गर्मियों में हैदराबाद में मक्का मस्जिद पर हुआ विस्फोट भारत में व्यापक रूप से साम्प्रदायिक युद्ध के प्रयास का परिणाम है। लेकिन यह विस्फोट एक और कम समझे गये प्रकल्प का परिणाम है कि यह इस्लामिक नियो कंजर्वेटिव धारा का उस परम्परा और सिद्धांतों के विरुद्ध युद्ध है जो कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोकप्रिय इस्लाम को दर्शाता है।
उस समय की अनेक मीडिया रिपोर्टों में अनेक सूत्रों के हवाले से बताया गया कि यह आक्रमण किस प्रकार एक गुट से जुडा है और इसी गुट ने इसे अंजाम दिया है और अधिकतर आशंका बांग्लादेश स्थित हुजी पर रही।
राजस्थान में देवेन्द्र गुप्ता की गिरफ्तारी अनेक मायनों में समाचार था। प्रवीन ने इस गिरफ्तारी का उपयोग अपनी उस बात को प्रमाणित करने के लिया जिसे वह, “ हिन्दू राष्ट्रवादियों और हिन्दू आतंकवाद का अभी तक नहीं समझा गया खतरा बताते हैं”
दुख की बात तो यह है कि अपने 2500 शब्दों के लेख में वे कहीं नहीं बताते और न ही परिभाषित करते हैं कि “ हिन्दुत्व आतंकवाद” से उनका अभिप्राय क्या है? हमें तो यही प्रतीत होता है कि इसके बजाय तमाम अनुमान और अप्रासंगिक इतिहास है। अनुमानों के उदाहरण के रूप में,
……… मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने घोषणा की कि उनके पास इस बात के प्रमाण हैं कि बजरंग दल के सदस्य जो कि आरएसएस का सहयोगी संगठन है आतंकवाद के कार्य में लिप्त हैं। इसका कोई कारण नहीं पता कि इन प्रमाणों का उपयोग इस संगठनो के सदस्यों को या किसी सन्दिग्ध को दंडित कराने में क्यों नहीं किया गया।
इन सारी रिपोर्टों में जो एक नाम उभरा है वह है अभिनव भारत। अभिनव भारत के बारे में काफी कुछ लिखा गया है और यह भी कि इसके संघ से सम्बन्ध हैं। फिर भी अभी तक एक भी ठोस प्रमाण नहीं उपलब्द्भ कराया गया है जो इस सम्बन्ध को पुष्ट कर सके और जहाँ तक मेरी समझ है कोई भी चार्जशीट भी इस दावे के आधार पर नहीं प्रस्तुत की गयी है। इसी प्रकार कोई भी रिपोर्ट इस बात की व्याख्या नहीं करती कि संघ से सम्बन्ध रखने वाला कोई संग़ठन संघ के ही वरिष्ठ सदस्यों की हत्या का षडयंत्र क्यों रचेगा?
इसके साथ ही यह बात भी स्पष्ट नहीं की जाती कि जो लोग गिरफ्तार हुए हैं वे अभिनव भारत की ओर से कार्य कर रहे थे , आरएसएस की ओर से या फिर स्वतंत्र रूप से। स्वामी की रिपोर्ट स्वयं अभिनव भारत में विरोध की बात की ओर ध्यान दिलाती है-
जून 2007 में पुरोहित ने सुझाव दिया कि समय आ गया कि जब मुसलमानों को आतंकवादी आक्रमणों के द्वारा निशाना बनाया जाना चाहिये लेकिन इस सुझाव को अभिनव भारत के अन्य लोगों ने अस्वीकार कर दिया। लेकिन जो प्रमाण पुलिस द्वारा एकत्र किये गये हैं उसके अनुसार गुट में अनेक सदस्य इस बात के लिये प्रतिबद्ध थे।
जब प्रवीन स्वामी विस्तार से लिखते हैं कि कर्नल पुरोहित का हिन्दू राज्य स्थापित करने का विचार था तो वे इस बारे में कुछ नहीं लिखते कि क्या इन प्रस्तावों को अभिनव भारत के नेतृत्व का समर्थन था या फिर आरएसएस या अन्य किसी हिन्दुत्व मंच समर्थन था या अन्य किसी औपचारिक मंच या संगठन का। फरवरी में उन्होंने सुझाव दिया कि सम्भव है कि ये लोग स्वतंत्र रूप से अपनी व्यक्तिगत क्षमता में कार्य कर रहे हों-
यह विषय पूरी तरह जटिल बन गया है इस तथ्य से कि अभिनव भारत के बारे में जिन घटनाओं या कार्यों को करना माना जा रहा है सम्भव है कि वे कार्य इन्होंने न किये हों भले ही इसके अग्रणी लोगों से इसकी जिम्मेदारी ले ली हो।
इस बात में कोई आश्चर्य नहीं , “ बडी मात्रा में साक्ष्यों को एकत्र करने के बाद भी महाराष्ट्र की जाँच सही दिशा में न गयी हो”। हालाँकि राजस्थान में हुई गिरफ्तारियाँ महत्वपूर्ण हैं परंतु उनका कोई प्रभाव नहीं होगा। जैसा कि स्वामी स्वयं कहते है, “ इन गिरफ्तारियों ने दीवार से कुछ ईंटों को अवश्य निकाला है लेकिन बस इतना ही।
स्वामी पूरी कथा में कोई भी ठोस प्रमाण नहीं उपलब्ध करा पाये हैं और केवल विवरण देते जा रहे हैं। इसीलिये आपको अभिनव भारत के सदस्यों को समर्पित पैराग्राफ के पैराग्राफ मिल जायेंगे और कहीं बीच बीच में उनके कुछ बयानों और बातचीत को प्रमाण के रूप में उपलब्ध कराया जाता है।
“ विवादित वनवासी कल्याण आश्रम जो कि दक्षिण गुजरात में हिन्दू धर्मांतरण कार्यक्रम के द्वारा आदिवासियों को निशाना बना रहा है”
कोई सन्दर्भ नहीं, कोई प्रमाण नहीं , केवल कहीं कहीं कुछ वाक्य हैं जो कि घुसा दिये गये हैं। यदि आप सरसरी निगाह से लेख पढें तो आप इन गाढे किये गये अंशों से वंचित हो सकते हैं। प्रवीन ने जब इस नाटक का मंच सजा लिया है तो वे एक बहस की ओर बढते हैं , “ भारत हिन्दुत्व आतंकवाद के नेटवर्क की कहानी से क्या शिक्षा ले रहा है?”
अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि “ हिन्दुत्व आतंकवादी नेटवर्क” है क्या? क्या यह अभिनव भारत के कुछ असंतुष्ट सदस्यों का है फिर बजरंग दल से निकाले गये कुछ लोगों? या फिर यह अधिक खतरनाक है जो कि हिन्दू सामाजिक संगठ्नों और राजनीतिक संगठनों द्वारा संचालित अधिक गहरा है जैसे कि आरएसएस, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम और इसी प्रकार के असंख्य संगठन और समितियाँ। इस बारे मे कोई स्पष्ट स्थिति नहीं है।
इसके बाद प्रवीन अत्यंत चालाकी से अपना ध्यान पिछले 60 वर्षों की राजनीति पर केन्द्रित करते हैं और “ हिन्दुत्व आतंकवाद” की जडें बालगंगाधर तिलक में खोजते हैं।
साम्राज्यवादी रूस में आतंकवाद के नाटकीय प्रभाव से प्रभावित हिन्दू राष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक ने भारत की स्वाधीनता के को प्राप्त करने के लिये हिंसा को एक साधन के रूप में प्रयोग करने का निर्णय किया। 1905 मे क्र्रांति के चलते जब जार एलेक्जेंडर को मूल नागरिक अधिकार देने को विवश होना पडा तो तिलक ने अपने अनुयायियों से कहा, “ प्रार्थना करने के दिन गये —– आयरलैंड, जापान और रूस की ओर देखो और उनके तरीकों का प्रयोग करो”
लेकिन यह बयान महात्मा गान्धी के एक बयान से किस प्रकार भिन्न है?
ऐसी स्थिति लाने के लिये हमें स्वयं की रक्षा करनी होगी, यह क्षमता है शस्त्र धारण करने की और उसका उपयोग करने की— यदि हम उसे सीखना चाहते है तो हमारा यह दायित्व है कि हम सेना में शामिल हों”
स्रोत
यह कितना सरल है कि गान्धी के उपर्युक्त बयान से पूर्व तिलक के आरम्भिक बयान को लगा दिया जाये। प्रार्थना के दिन गये — ऐसा समय लाने के लिये हमें अपनी रक्षा करनी आनी चाहिये और शस्त्र धारण करने और उसका उपयोग करना आना चाहिये।
फिर से लेख पर लौटते हैं। अनेक ऐसे रहस्यों का सक्षिप्त उल्लेख करने के उपरांत जिन्हें अभी हल किया जान शेष है स्वामी कहते हैं, “ पिछले सप्ताह हुई गिरफ्तारियों के बाद भी खतरा वास्तविक है और इसे समाप्त किया जाना चाहिये”।
क्या खतरा है? खतरा किससे है? अभिनव भारत से? आरएसएस से? बजरंग दल से? या फिर उन हिन्दुओं से जो अपनी क्षमता में बिना किसी की अनुमति से ( भले ही वे किसी मंच या संगठन से हों) ( सनातन परम्परा की कौन सी शाखा निर्दोष लोगों को मारने की अनुमति देती है)
प्रवीन इस विषय पर मौन रहना ही बेहतर समझते हैं। इसके बजाय वे और मंचो और लोगों के नाम गिनाते हैं। पिछले वर्ष जून में हिन्दू जनजागृति समिति के सदस्य ठाणे में में एक थियेटर में बम विस्फोट के मामले में पकडे गये। गोवा आधारित सनातन संस्था जो कि हिन्दू जनजागृति से सम्बद्ध है उसके सदस्य पनानी में बम के सिलसिले मे पकडे गये।
इससे पूर्व बजरंग दल से सम्बन्धित राजीव मिश्र और भूपिन्दर सिंह उत्तर प्रदेश में कानपुर में बम बनाते समय एक दुर्घटना में मारे गये।
लेकिन क्या ये लोग किसी व्यापक योजना के अंग के रूप में कार्य कर रहे थे? क्या इन लोगों को संगठन की ओर से ऐसा करने की अनुमति थी और आशीर्वाद प्राप्त था या फिर यह स्वतंत्र आतंकी गतिविधि थी? इस प्रश्नो का कोई उत्तर नहीं दिया गया। ऐसा शायस इसलिये है कि ऐसे समाचार नहीं बनते या फिर इस बारे मे हमे अभी तक पता नहीं है।
वर्णन और प्रश्नों का उत्तर नहीं देने से अधिक चिंताजनक बात कुछ अपनी बातें थोपने और मनवाने का प्रयास है। स्वामी ने इस वर्ष के आरम्भ मे जर्मन बेकरी विस्फोट के सन्दर्भ में लिखा—-
पिछले सप्ताह पुणे में जर्मन बेकरी बम विस्फोट ने अभिनव भारत की विद्रूप कथा को सामने प्रस्तुत किया है। जिस हिन्दुत्व आतंकवादी मंच को पुरोहित ने स्थापित किया मुम्बई नरसंहार के बाद एक बार पुनः जो चर्चा मे जो कि नाशिक में परीक्षण आरम्भ होने के कुछ ही दिनों बाद हुआ था।
व्यक्तिगत रूप से हिन्दू सहानुभूति रखने वालों से अति दक्षिणवादी तक मानते हैं कि ये विस्फोट पुरोहित और उसके हिन्दुत्व आतंकवादी प्रकल्प की नैतिक प्रामाणिकता को पुष्ट करते हैं।
स्वामी नहीं बताते कि कैसे? और कौन से हिन्दू? और फिर अपनी बात थोपते हैं-
कुछ जाँचकर्ता मानते हैं कि संगठ्नों या फिर अन्य हिन्दुत्व प्रकोष्ठ ने इस घट्ना को अंजाम दिया।
आप लोगों में से कुछ लोगों को याद होगा कि इन सज्जन ने तत्काल पुणे विस्फोट के सम्बन्ध में अपनी राय बदल ली और इंडियन मुजाहिदीन की ओर अंगुली उठा दी। लेकिन तब तक काफी क्षति पहुँचा चुके थे क्योकि लोगों की स्मृति छोटी होती है और पहला प्रभाव ही मुख्य होता है।
अब आउटलुक की सबसे हाल की आवरण क़था पर आते है। जैसा कि मैंने आरम्भ में कहा कि इस कहानी का शीर्षक है- “ हिन्दू आतंकवाद एक वास्तविकता है फिर भी भारत इसका नाम नहीं लेता”। आश्चर्यजनक ढंग से कुछ आरम्भिक पंक्तियों में ही “ हिन्दू आतंकवाद” के सन्दर्भ को “ उग्रवादी हिन्दू राष्ट्रवादी ग़ुट “ में बदल दिया गया।
—- अंत में पीछा करते हुए गुप्त के माध्यम से हिन्दू राष्ट्रवादी गुट तक संकेत गया। राजस्थान के आतंकवाद निरोधी दस्ते के प्र्मुख कपिल गर्ग के अनुसार, “ हमने उस धर्म ( हिन्दू) के कुछ लोगों को पकडा है और हमें विश्वास है कि हम सही रास्ते पर हैं।
हैदराबाद में भी सीबीआई को लगता है कि वे सही रास्ते पर हैं, अंत में मक्का मस्जिद बम विस्फोट के सिलसिले में हिन्दू गुट के चार लोगों की गिरफ्तारी हुई है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से किसी भी, “ उग्रवादी हिन्दू राष्ट्रवादी” गुट के किसी भी सदस्य को किसी भी आक्रमण का आरोपी नहीं पाया गया है( जहाँ तक मुझे जानकारी है)। तो फिर एक बार फिर यह प्रश्न आता है कि क्या ये आक्रमण स्वतंत्र रूप से किये गये थे या फिर इस बारे में शीर्ष नेतृत्व से राय या अनुमति ली गयी औए उन्हें विश्वास में लिया गया। यदि इन लोगों ने स्वतंत्र रूप से ऐसा किया तो क्या यह उचित है कि इसे हिन्दुत्व आतंकवाद या भगवा आतंकवाद बताया जाये?
वे कौन से कारण हैं कि इन्हें हिन्दुत्व आतंकवाद या भगवा आतंकवाद कहना अनुचित है।
कारण 1- आज तक ऐसा एक भी प्रमाण और साक्ष्य नहीं उपलब्ध है जो यह प्रमाणित कर सके कि हिन्दुत्व से जुडे किसी संगठन के द्वारा आतंकवाद की घटनाओं के लिये व्यापक षड्यंत्र रचा गया है।
कारण 2- यदि हम मीडिया द्वारा रची गयी अवधारणा में शामिल हों तो आज तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि जिन लोगों ने आतंकवाद की इन घटनाओं को अंजाम दिया है उन्होंने हिन्दू धर्म से कोई नैतिक प्रेरणा ग्रहण की।
यह अत्यंत आवश्यक है कि कुछ मह्त्वपूर्ण अंतर किये जायें-
ऐसे अनेक आतंकवाद हैं जो कि इस्लाम के मूलभूत स्तम्भ की कसमें खाते है और यहाँ तक कि क़ुरान और हदीस का उद्दरण देते हैं और आतंकवादी कार्य के लिये इनसे नैतिक प्रेरणा ग्रहण करते हैं।
ये आतंकवादी केवल एक समुदाय के लोगों को निशाना नहीं बनाते और मरने वालों को निशाना बनाते समय सेकुलर रहते हैं।
आज तक हमारे सामने कोई ऐसा प्रमाण नहीं है कि किसी ने ऐसी घटनाओं की जिम्मेदारी लेते हुए किसी हिन्दू सिद्धान्त या फिर प्राचीन या आधुनिक स्रोत के किसी सिद्धांत या धर्म से किसी नैतिक प्रेरणा की बात की हो।
उपर्युक्त बिन्दुओं में कुछ और बिन्दु मैं जोडना चाहता हूँ। “ हिन्दुत्व आतंकवाद “ का साहित्य और उसकी नियमावली कहाँ है? या फिर यह मात्र घटना करने वालों के मस्तिष्क भर में है। इसके अतिरिक्त ऐसी घटनाओं मे शामिल लोगों के सम्बन्ध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सार्वजनिक वक्तव्य क्या है?
जब कि यह स्पष्ट हो रहा था कि सुनील जोशी ( अजमेर और हैदराबाद विस्फोट में शामिल) उग्रवादी मार्ग अपना रहा था तो आरएसएस ने सार्वजनिक रूप से उससे अपने को दूर कर लिया।
क्या इसे प्रकाशित किया गया?
इसके अतिरिक्त दूसरा पक्ष प्रस्तुत किय गया। Rediff में कृष्णकुमार ने लिखा-
( भाजपा के विधायक दीपक जोशी ) ने हिन्दू आतंकवाद के रुझान को मानने में झिझक दिखाई।
“यह कोई संगठ्ति प्रयास नहीं है” “और न ही इसे आरएसएस जैसे किसी संगठन की अनुमति है”
परंतु इस आलेख में तो कुछ दूसरा ही सन्देश निह्ति था जिसे कि थोपा जाना था।
मालवा क्षेत्र पूरी तरह आदिवासी है। इन्दोर में अधिक आदिवासी जनसंख्या नहीं है। लेकिन धार 75 प्रतिशत आदिवासी है , झाबुआ लगभग 100 प्रतिशत आदिवासी है। बलवानी, खारगाँव और खंडुवा 50 प्रतिशत आदिवासी है।
हिन्दू दूसरा सबसे बडा समुदाय है।
देखने की बात है कि पिछली बार जब मैंने मालवा का दौरा किया तो इस क्षेत्र में आदिवासियों ने स्वयं को न तो ईसाई के रूप में न मुस्लिम के रूप में अपनी पहचान बताई तो फिर शरारत से परिपूर्ण वाक्य क्यों? इसी बीच नये आरोप चस्पा करने के लिये गढे जा रहे थे। माननीय गृहमंत्री श्री चिदम्बरम के शब्दों में-
हम इसे हिन्दू आतंकवाद नहीं कहते – ये गुट अतिवादी उग्रवादी हिन्दू दर्शन का समर्थन करते प्रतीत होते हैं।
निश्चित रूप से न तो श्री चिदम्बरम और न ही रिपोर्टर यह बताने का कष्ट उठाते हैं कि वास्तव में यह “ उग्रवादी या कट्टरपंथी हिन्दू दर्शन ” है क्या? जब तक मैंने इसे नहीं देखा था मैंने तो सदैव यही जाना था कि हिन्दू दर्शन की मूल विचारधारा वेदांत की महान परम्परा मे सन्निहित है हो सकता है कि श्री चिदम्बरम का विचार कुछ दूसरा हो।
इस विषय पर आई कुछ नयी रिपोर्ट तो इतनी हल्की हैं कि उनमें तथ्यों की गहराई नहीं है और वे एक प्रेस विज्ञप्ति सी दिखती हैं। ये सभी गिरफ्तारियाँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि जाँचकर्ता धीरे धीरे उपेक्षित “ हिन्दू आतंकवादी” गुट से ध्यान हटाकर “ हिन्दुत्व आतंकवाद” के वास्तविक खतरे को लेकर जाग रहे हैं। यद्यपि ऐसे साक्ष्य हैं जो इसकी उपस्थिति 2002 से सिद्ध करते हैं, जाँच एजेंसियों ने इसकी तरफ से अपनी आंखें बद्न कर रखी थीं। समय रहते यदि यदि जाँचकर्ताओं ने कार्रवाई की होती तो अनेक जानें बचाई जा सकती थीं और अनेक विस्फोट रोके जा सकते थे।
सबसे रोचक तो यह है कि एक भी रिपोर्ट या लेख़क अपनी हिन्दुत्व की समझ को स्पष्ट करने का कोई प्रयास नहीं करता। इसलिये हमारे लिये यह जान पाना अत्यंत कठिन है कि ये घटनायें हिन्दुत्व आतंकवाद का प्रकटीकरण हैं या फिर हिन्दुओं द्वारा आतंकवादी आक्रमण हैं।
महत्वपूर्ण है कि “ आउटलुक “ ने अपनी एक और रिपोर्ट में अभिनव भारत पर कुछ आरोप मढे हैं-
मालेगाँव मामले में 4,528 पृष्ठ की चार्जशीट में अभिनव भारत को संगठित अपराध का सिंडीकेट बताया गया है।
मैं फिर से दुहरा दूँ कि “ संगठित अपराध सिडीकेट” न कि कोई राजनीतिक गुट या आरएसएस से जुडा संगठन वैसे Rediff की एक रिपोर्ट इसका भी खण्डन करती प्रतीत होती है-
मुम्बई के एक विशेष न्यायालय ने शुक्रवार को 2008 को मालेगाँव विस्फोट के सिलसिले में साध्वी प्रज्ञा , लेफ्टीनेंट कर्नल पुरोहित और नौ अन्य लोगों पर मकोका के आरोप हटा लिये और कहा कि इनमें से कोई भी संगठित अपराध सिंडीकेट का हिस्सा नहीं है।
केवल आरोपों से भी अधिक चिंताजनक यह तथ्य है कि आज तक एक भी आरोपी को दोषसिद्ध नहीं किया गया है मैं केवल हिन्दू उग्रवादियों की बात नहीं कर रहा वरन इस्लामवादी आतंकवादी गतिविधियों के सन्दिग्धों की भी बात कर रहा हूँ।
क्या हमारी आपराधिक जाँच एजेंसियाँ इतनी प्रभावहीन हैं कि अब तक पिछले सात वर्षों में एक भी आतंकवादी को सजा नहीं हुई है (
अंतिम सजा संसद पर आक्रमण के दोषी अफजल गुरू को दी गयी)
क्या एक जाँच को पूरा होने मे दस वर्षों का समय लगता है? या फिर ये देर राजनीतिक दबाव और चुनाव के समीकरण को देखकर किया जाता है? क्या हिन्दुत्व आतंकवाद का दाँव भी वोट बैंक को ही ध्यान में रखक्र किया गया है। या फिर हम जितना सोचते समझते हैं उससे अधिक गहरा विषय है?
लेकिन इन सभी गिरफ्तारियों के मध्य एक प्रश्न किसी ने उठाने का साहस नहीं किया कि आखिर हिन्दू जो कि भारत में बहुसंख्यक हैं और जिनका मूलभूत सिद्धांत सहिष्णुता और दया पर आधारित है उन्हें किस विवशता में आतंकवाद का मार्ग चुनना पडा?
यह एक ऐसा प्रश्न है जिसे मुख्यधारा का मीडिया कभी नहीं उठायेगा या फिर बहाना करेगा कि इसकी आवश्यकता नहीं है। लेकिन यदि हिन्दुओं को इन आक्रमणों में दोषी सिद्ध करना है और भविष्य में इसे रोकना है तो तो इस पर चर्चा करनी होगी। आखिर हिन्दू बहुसंख्यक इस देश मे अपनी शिकायतें मनवाने के लिये हिन्दू इस रास्ते पर क्यों निकला? आखिर हिन्दू भारत में स्वय़ं को घिरा हुआ सा क्यों अनुभव कर रहा है?
यह प्रश्न मेरे मित्र संजय ने अप्रत्यक्ष रूप से मेरे ब्लाग पर पूछा था, “ इस ब्लाग की भावना और विशेष रूप से सत्यमेव जयते के कारण यह उचित होगा कि उन कारणों की जाँच की जाये कि जो अभिनव भारत जैसे संगठनों के दावे हैं”। सितम्बर 2008 में इसके उत्तर में मैंने लिखा और वह भी मतांतरण के सन्दर्भ में-
भारत मे “ हिन्दू” स्वयं को घिरा हुआ अनुभव कर रहा है, उसे लगता है कि धीरे धीरे वह घिरता जा रहा है – उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है और उसकी चिंताओं के किसी को सहानुभूति नहीं है–
उसने सदैव यह माना है कि यह उसकी मातृभूमि है उसका “ मूल” क्षेत्र उसकी आस्था की जन्मभूमि और अब वही अपनी भारत भूमि में स्वयं को असुरक्षित पा रहा है महाराष्ट्र में ( यदि वह उत्तर प्रदेश उर बिहार का है) इसी प्रकार असम , कश्मीर और उडीसा में—
उसे लगता है कि न केवल उसका जीवन और उसकी व्यक्तिगत सुरक्षा पर आक्रमण हो रहा है वरन शनैः शनैः परंतु व्यवस्थित तरीके से उसके सिद्धांतो और धर्म पर आक्रमण हो रहा है। उसे लगता है कि यदि उसने ऐसी बातें की तो उसे हिन्दुत्ववादी माना जायेगा और वह अपनी आस्था सार्वजनिक रूप से करने से वह हँसी का पात्र बन जायेगा और उसकी सभी शिकायतें सेक्युलरिज्म के दायरे से बाहर कर दी जायेंगी और उसे सेक्युलर कहलाने के लिये इन शिकायतों को छोडना होगा।
कुछ अवसरों पर उसकी यह भावना आक्रोश में परिणत होती हैं, जो तत्काल, बिना योजना के और असाधारण होती है और हमें यह आश्चर्य होता है कि यह कैसे क्यों घटित हुआ?
यही कुछ कन्धमाल, जम्मू मे देखने को मिला अभूतपूर्व प्रतिक्रिया उन लोगों की जो सोचते हैं कि उनके लिये सारे मार्ग अवरुद्ध हैं।
क्या यह तर्क हो सकता है नहीं पर्ंतु ऐसी भावना है। ऐसा प्रतीत भी होता है।
एक माह पश्चात कुछ प्रतिष्ठित ब्लाग में यही विचार ध्वनित हुए-
भारत मे हिन्दू भयभीत है । इसके लिये अनेक बाते हैं जैसे कि जिस गति से मालेगाँव विस्फोट के मामले को सामने लाया गया जबकि समस्त देश में हुए अन्य विस्फोटों के मामले मे उदासीनता दिखाई गयी। जिस प्रकार हिन्दुओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है उससे हिन्दू आक्रोश उबल रहा है और विशेष रूप से जिस प्रकार सेक्युलरवादी ऐसे विस्फोटों के लिये न्यायसंगत तर्क ढूँढते हैं 2005 मे मुम्बई में हुए रेल विस्फोटों को लेकर एक लेख में विदेशी जर्नल में कहा गया कि इसका निशाना ऊँची कक्षाओं मे यात्रा करने वाले गुजराती थे।
एक माह पश्चात ( नवम्बर 2008 में) राधा राजन ने हिन्दू आतंकवाद पर अपने लेख में कहा कि जो कुछ स्पष्ट रूप से दिख रहा है उसे समझो।
—- हिन्दू राष्ट्रवाद के भय ने इस देश को नष्ट करने के कगार पर ला दिया है जो कि जिहाद और मतांतरणवादी चर्च द्वारा संचालित है और जिसे देश की सेक्युलर हिन्दू विरोधी राजनीति से प्रेरणा मिलती है। साध्वी प्रज्ञा, समीर कुलकर्णी , मेजर उपाध्याय और ले. पुरोहित दृढसंकल्प हिन्दू राष्ट्रवाद के उभार की ओर संकेत करते हैं।
हिन्दू आतंकवाद? कोई इसे जो ही कहना चाहे वह कह सकता है पर सामने जो दिख रहा है वह दिखना चाहिये कि युद्ध जारी रहेगा।
अभी हाल में भारतीय राजनीति के सर्वेक्षक ने भी ऐसी ही बातें कहीं- ( गोपनीयता के चलते नाम नहीं दिया जा रहा है)
क्या हिन्दुओं को हिन्दुओं के विरुद्ध हो रहे आतंकवाद और अपने अधिकारों के क्षरण की प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिये। सच्चर रिपोर्ट जो कि पूरे मंत्रालय और उसकी रणनीति का खुलासा करता है? क्या हम हिन्दुओं की रक्षा अहिंसा से करने जा रहे हैं? क्या अलग मजहब के लिये अलग कानून होगा?
केरल में युवा मुसलमानों को जिहादी बनने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है ( अभी हाल में एक प्रोफेसर का हाथ काट दिया गया)। कांग्रेस सांसद और सीपीएम की पूरी जानकारी मे इन गुटों ने नये नाम से अपने को खडा किया है। चिंताजनक स्थिति है। शायद कुछ लोग चुपचाप देख रहे होंगे परंतु हमारे जैसे लोग कुछ करने को विवश हैं—– यदि आत्मरक्षा आतंकवाद है तो फिर आप आक्रामक आक्रमण और बिना उकसावे के आतंकवाद को क्या कहेंगे? आतंकवाद आतंकवाद को जन्म देता है। क्या एक गाल पर तमाचे के बाद हम दूसरा तमाचा आगे कर दें? क्या हम ओजहीन मूढ बन जायें जो केवल पीडा झेलना जानता है? देशभक्ति कभी भी चुप और मूक समर्पण नहीं कर सकती।
केवल लोग नहीं मारे जा रहे हैं, अपमानित हो रहे हैं, गालियाँ खा रहे हैं या फिर अपने अधिकारों से वंचित हो रहे हैं या फिर शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के अधिकार से वंचित किये जा रहे हैं वरन परम्परा, धार्मिक शिखर भी यहाँ तक कि राज्यक्षेत्र की सीमायें भी बदली जा रही हैं और उनके साथ समझौता हो रहा है? आखिर इन सब पर क्या प्रतिक्रिया हो? हमें आत्मबलिदान की अनुमति मिलनी चाहिये? जब कोई किनारे लगा दिया जाता है तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी होती है।
इसके बारे में सोचो, गहराई से सोचो — क्योंकि यदि यह आक्रोश की भावना , वंचित होने की भावना, घेरे जाने की भावना वास्तविक है और चतुर्दिक फैल गयी तो भविष्य़ अत्यंत क्षीण है।
नेतृत्व जिसने हमे अनेक मोर्चों पर धोखा दिया है वह इस कुंठा और हताशा की भावना से उपजे सुनामी को रोक पाने में समर्थ न होगा और चीजें तेजी से और हिंसक रूप से हाथ से बाहर हो जायेंगी। और यदि हम चुप रहे तो हम इस विनाश के मूक साक्षी होंगे—जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, “ यह वह अवसर है कि जब निष्क्रियता कोई विकल्प नहीं है और निष्पक्षता आत्मघाती होगी” यह अवसर है कि जब बोला जाये और कोई पक्ष लिया जाये।
जहाँ तक अभिनव भारत की बात है तो मैं बी रमन के लेख “ मुस्लिम विरोधी प्रतिक्रियावादी आतंकवाद” के अंश से अपना लेखा समाप्त करूँगा।
क्या इन गिरफ्तारियों से बजरंग दल या उन संगठनों पर प्रतिबन्ध लगाने का मामला सशक्त होगा जिससे ये जुडे हैं? या फिर इन्हें इन्हें उन संगठनों की प्रकृति माना जा सकता है यहाँ तक कि वे हिन्दू या फिर आतंकवादी संगठ्न हों? किसी ही संगठन को आतंकवादी संगठन बताने के लिये और इसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने के लिये न कि केवल इसके सदस्यों के विरुद्ध कार्रवाई के किये दो प्रकार के साक्ष्यों की आवश्यकता होती है। प्रथम, इसके संविधान या घोषणापत्र में स्पष्ट रूप से इस बात की वकालत की जानी चाहिये कि आतंकवाद के स्तर की हिंसा के सहारे यह अपना उद्देश्य प्राप्त करना चाहता है। दूसरा, इस संगठन को आतंकवाद की श्रेणी की हिंसा में लगातार शामिल होना चाहिये और वह भी पूर्वनियोजित आशयपूर्ण हिंसा। देखना है कि क्या जाँच के दौरान ऐसे साक्ष्य सामने आते हैं या नहीं और इसके लिये प्रतीक्षा करनी होगी।
इन्हें भी पढ़ें:
- When politics leads and society follows?
- भारत में उथल पुथल पर कुछ सुझाव
- Who wins Uttar Pradesh?
- What Fails team Anna?
- दिग्विजय सिंह के हिंदू आतंकवाद का सच
और ये कुछ मिलता-जुलता:
Comments
3 Responses to “हिन्दू आतंकवाद के मिथक का पर्दाफाश”
Leave a Reply


भाई प्रस्तुतीकरण और अनुवाद का स्तर पठनीयता के के दायरे के बाहर है. मूल आलेख तो समझ में आता है पर यह अनुवाद समझने में कठिन है. फिर भी बी. शांतनु के आलेख का लिंक देने के लिए धन्यवाद.
आशा है आप आलोचना को स्वस्थ ढंग से लेते हैं. अगर प्रस्तुतीकरण का स्तर बेहतर कर दें तो आपकी सच से रु-ब-रु करने वाली पोस्टें ज्यादा लोगों तक पहुंचेंगी.
[Reply]
SATYA-AHINSA-PARMODHARMA….. Dear Karmo se Vidhata-Bhagya ka FAISLA badal sakta he. to , ”AA-INSAN APNE AAP KO PEHCHAN AUR INSANIYAT KE LIYE KAR ACHCHHE KUCHH KAAM WARNA NAHI HOGA TERA SWARG ME NNAM-O-NISHAN”….. Request 2 all Insan
[Reply]
SATYA-AHINSA-PARMODHARMA….. Dear Karmo se Vidhata-Bhagya ka ”FAISLA” badal sakta he. to , ”AA-INSAN APNE AAP KO PEHCHAN AUR INSANIYAT KE LIYE KAR ACHCHHE KUCHH KAAM WARNA NAHI HOGA TERA SWARG ME NNAM-O-NISHAN”….. Request 2 all Insan
[Reply]