देश की सेक्युलर राजनीति के पुनर्मूल्याँकन का समय ?

पिछले वर्ष देश में हुए आम चुनावों के बाद से सामान्य तौर पर एक नारा देश की सेक्युलर शक्तियाँ लगा रही हैं कि अब भारत बदल गया है और लोग विकास चाहते हैं और पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति से तंग आ चुके हैं। यह बाद कहते समय जो बात इन तत्वों के ध्यान में रहती है वह यह कि अब विश्व में वैश्वीकरण का युग है और विश्व में एक क्षेत्र को दूसरे से पूरी तरह अलग थलग नहीं रखा जा सकता। ऐसे में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है कि जो कुछ रुझान समस्त विश्व मे हमें देखने को मिल रहा है उस पृष्ठभूमि में ही यदि भारत की राजनीति को समझने का प्रयास किया जाये तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सम्मुख हमारे उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर हमें देना ही होगा। इन प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि सेक्युलर परिभाषा और राजनीति का स्वरूप क्या होना चाहिये? इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार यूपीए सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में और फिर अपने दूसरे कार्यकाल में अभी तक पूरी तरह पश्चिम की शक्तियों के प्रभाव में अपनी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति को क्रियांवित करने का प्रयास किया है ठीक उसके विपरीत आतंकवाद और इस्लाम व मुस्लिम जनता के साथ सम्बन्धों को परिभाषित करने में इस माड्ल को अपनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है।

एक ओर जहाँ पश्चिम के अनेक देशों ने पश्चिम की संस्कृति के मूल्यों जैसे अभियव्यक्ति की स्वतंत्रता ( जिसमें आलोचना और कटाक्ष भी शामिल है), व्यक्तिगत स्वतंत्रता, स्त्री स्वतंत्रता, संविधान और कानून के दायरे में अपने यहाँ निवास करने वाले मुस्लिम आप्रवासियों के साथ सहअस्तित्व का समाधान निकालने की पहल आरम्भ की और इसके परिणामस्वरूप हमें फ्रांस, बेल्जियम , स्विटजरलैण्ड , नीदरलैण्ड में कुछ गतिविधियाँ देखने को मिलीं हैं वहीं ठीक इसके विपरीत भारत एक ऐसी स्थिति में पहुँचता जा रहा है जहाँ इस सत्य से इंकार किया जा रहा है कि इस्लामवाद एक आन्दोलन के रूप में मुस्लिम जनमानस को आन्दोलित और प्रभावित कर रहा है और आतंकवाद तथा मुस्लिम कट्टरता अब नये स्वरूप में ऐतिहासिक अनसुलझे प्रश्न के रूप में फिर हमारे समक्ष उपस्थित है।

आज इस प्रश्न के समाधान का वही फार्मूला निकाला जा रहा है जो कि देश की स्वतंत्रता से पूर्व 1920 से 1940 के दशक में निकाला गया था कि इसके समाधान का प्रयास करने के लिये ठोस प्रयास न किया जाये।

इस पीढी के युवा जिन्होंने कि इतिहास को उसी सन्दर्भ और दृष्टिकोण से देखा है जैसा उन्हें दिखाने का प्रयास किया गया है वे यदि यह मानकर चलते हैं कि समस्याओं को आज के सन्दर्भ में देखना चाहिये तो वे भी इस बात से अवश्य विचलित होंगे कि 11 सितम्बर 2001 के बाद इस्लामी आतंकवाद ( यह नाम इसलिये नहीं दिया जा रहा है कि इस्लाम मजहब के कुछ लोग आतंकवाद की घटनाओं में लिप्त हैं वरन इसलिये कि इन आतंकवादियों का दावा है कि वे कुरान के निर्देशों पर जिहाद कर रहे हैं) की समस्या से जिस प्रकार पश्चिम ने अपना बचाव किया उस अनुपात में हम उसका मुकाबला क्यों नहीं कर पा रहे हैं? इसके अनेक ऐतिहासिक कारण भी हैं परंतु जो प्रमुख प्रश्न आज हमारे समक्ष उपस्थित है वह यह कि क्या आज सेक्युलरिज्म के नाम पर कहीं हम पलायन, आत्मसमर्पण, या फिर गलत दिशा में तो नहीं जा रहे हैं जहाँ एक अवधारणा को लेकर हम चल रहे हैं और छ्ह दशक पुरानी रणनीति के आधार पर नयी चुनौतियों का सामना करना चाहते हैं।

समस्त विश्व में भारत एक ऐसा देश है जो कि इस्लामी आतंकवाद और जिहाद से सीधे सीधे प्रभावित है। इस विषय पर जिस प्रकार का राष्ट्रीय चरित्र विश्व के अन्य देशों ने दिखाया है क्या वैसा चरित्र हम दिखा सके हैं? यदि नहीं तो क्यों?

आज वैश्विक सन्दर्भ में यदि इस्लामी आतंकवाद और मुस्लिम अतिवाद की बात की जाये तो शेष विश्व से हमें काफी कुछ सीखना चाहिये। द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत जब पश्चिमी यूरोप के अनेक देशों को स्वयं को फिर से खडा करने के लिये आप्रवासियों की आवश्यकता हुई तो उन्होंने जिस आप्रवासियों को अपने यहाँ स्थान दिया उनकी आज की पीढी जब आज भी स्वयं को इन देशों के साथ आत्मसात नहीं कर सकी है और एक अलग थलग और विलग संस्कृति के रूप में एक राष्ट्रीय जीवन और एकता में अंतरनिहित संकट उत्पन्न कर दिया है तो ये देश इस दूरगामी परिणाम वाली समस्या को लेकर सचेष्ट हो गये हैं और पिछले एक दशक में इस पूरी समस्या को लेकर कुछ निष्कर्ष निकाले हैं। एक, इस्लामी आतंकवाद एक वास्तविकता है और इसके अनेक आयाम हैं। इसमें दो तत्व मुख्य हैं कि इसे एक व्यापक आन्दोलन बनने से रोका जाये और आतंकवाद को देश के सामान्य मुस्लिम वर्ग के मध्य पनपने का अवसर न दिया जाये तथा अपने देश में स्थित उन तत्वों पर पैनी नजर रखी जाये जो इस्लाम की विचारधारा को आतंकवाद के स्तर तक के ले जाने में सहयोग करते हैं। इस सन्दर्भ में पश्चिम के इन देशो ने इस बात मे हिचक नहीं दिखाई कि इस्लामी मजहबी नेतृत्त्व को इस बात का दायित्व दिया जाये कि देश में इस्लामी आतंकवाद की विचारधारा या उसके क्रियांवयन के लिये यह नेतृत्व उत्तरदायी होगा। इसके साथ ही इन देशों को यह भी समाधान दिखा कि इस्लामी आतंकवाद पर दबाव बनाकर उसे कमजोर या शक्तिहीन कर देने से ही ऐसे आन्दोलन या भविष्य़ में ऐसी पुनरावृत्ति की सम्भावनायें समाप्त नहीं होतीं इसलिये अल कायदा या ऐसे दूसरे संगठनों के आक्रमणों से पश्चिम को सुरक्षित कर लेने के बाद भी पश्चिम के देश इस्लाम मजहब मानने वालों की कुछ प्रवृत्तियों को लेकर सचेत हैं।

अधिक संतान उत्पन्न करने की प्रवृत्ति , अलग थलग रहने की प्रवृत्ति, लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी तरह आस्था न रखते हुए उसके उदारवादी संस्थानो का अपने लिये लाभ उठाकर भी शरियत और कुरान को एक वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में स्वीकार करना और समय समय पर ऐसे संगठनों या आन्दोलनों का समर्थन करते हुए उसे आतंकवाद की हद तक ले जाने का विकल्प खुला रखना। पश्चिम ने इस्लामी आतंकवाद को इस सन्दर्भ में देखकर इसके समाधान का दृढनिश्चय कर लिया है।

ठीक इसके विपरीत यदि हम भारत की स्थिति देखें तो हमें चित्र पूरी तरह भिन्न दिखाई देता है। भारत में सेक्युलरिज्म को जिस तरह व्याख्यायित किया जाता है वह सदैव ही विरोधाभाषी रहा है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने तुर्की में ओटोमन साम्राज्य को समाप्त कर पश्चिम की तर्ज पर एक सेक्युलर व्यवस्था स्थापित करने वाले मुस्तफा कमाल अतातुर्क को अपना आदर्श बनाया परंतु उन्हे भारत में सेक्युलरिज्म के नाम पर मुस्लिम साम्प्रदायिकता के बीज देश में छोड देने में कोई हिचकिचाहट भी नहीं हुई। पश्चिम में किसी भी देश में सेक्युलरिल्म का अर्थ उस देश की मूल संस्कृति का विरोध या उसके प्रति हीन भावना रखना या ग्लानि भाव रखना नहीं है। फ्रांस विश्व का सबसे बडा कैथोलिक देश है और उसकी व्यवस्था सेक्युलर होते हुए भी वहाँ इस बात को लेकर कोई भ्रांति नहीं है कि लोकतंत्र, बहुलता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बाद भी देश का स्वरूप कैथोलिक ईसाई का ही है और विश्व मे कहीं भी कैथोलिक ईसाई के सम्बन्ध में फ्रांस का राष्ट्रपति अपना विचार रखता है यहाँ तक कि कन्धमाल में हुई घटनाओं के बाद भी फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सारकोजी ने भारत के प्रधानमंत्री के समक्ष कैथोलिक ईसाई प्रतिनिधि के तौर पर यह प्रश्न उठाया था।

इसी प्रकार अमेरिका का राष्ट्रपति अपने पद की शपथ बाइबिल हाथ में लेकर लेता है। पश्चिम के समस्त देश अपनी ईसाई पह्चान और संस्कृति के साथ समझौता करने को तैयार नहीं हैं। उनके लिये सेक्युलरिज्म का अर्थ इतना ही है कि देश का शासन चर्च के द्वारा नहीं उदारवादी लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर चले। इसी का परिणाम है कि इन देशों में इस्लाम और मुस्लिम समाज को उसकी मजहबी स्वतंत्रता देते हुए भी उसे मूल पश्चिमी संस्कृति के दायरे में लाने का प्रयास हो रहा है और इस अभियान को एक राष्ट्रीय विषय माना जा रहा है।

इसके विपरीत हमारे देश में सेक्युलरिज्म के नाम पर एक धोखा और हिन्दू विरोध का खुला खेल पिछले आठ दशक से चल रहा है। भारत में सेक्युलरिज्म, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकार के नाम पर समस्याओं से भागना, इस्लाम और मुस्लिम विषय को पर चर्चा को साम्प्रदायिक बताकर उसे और बढाते रहने की प्रवृत्ति घर कर गयी है। आज देश में ऐसी स्थिति बना दी गयी है कि इस्लाम और मुस्लिम विषय को तथ्यों और तर्कों से परे भावुकता का विषय बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है कि यह एक ऐसा वर्ग है जो उत्पीडित है, सताया है, समस्त विश्व , मीडिया, तंत्र सब इसके विरुद्ध है इसलिये इसे सहानुभूति की आवश्यकता है और इसलिये जो भी इस वर्ग के बारे में प्रश्न उठाता है वह इस पर अत्याचार कर रहा है। यह पूरी तरह प्राकृतिक नियम के सिद्धांतों के विपरीत है। आज मीडिया, अकादमिक वर्ग, राजनीतिक वर्ग और बौद्धिक वर्ग इसी भावुकता के सिद्धान्त का परिपालन कर रहा है और यह मानकर चल रहा है इससे सम्बन्धित कोई भी प्रश्न नहीं उठाया जाना चाहिये वरन इसकी सभी तार्किक- अतार्किक माँगें मानी जायें। भारत में आज मुस्लिम वर्ग को लेकर जो वातावरण बनाया जा रहा है वह कहीं भी उसके पक्ष में नहीं है।

जो लोग इतिहास से सबक नहीं लेते वे इतिहास दुहराते हैं। देश में स्वतंत्रता से पूर्व ही राष्ट्रीयता परिभाषित हो जानी चाहिये थी और इसे परिभाषित करने के लिये हिन्दू- मुस्लिम समस्या और उसके ऐतिहासिक प्रश्नों का समाधान आवश्यक है। हम इस वास्तविकता से पिछले आठ दशक से भाग रहे हैं और अब सेक्युलरिज्म के नाम पर ऐसी स्थिति निर्माण की जा रही है कि कृत्रिम रूप से समाज पर यह इच्छा थोपने का प्रयास हो रहा है कि यह कोई समस्या ही नहीं है। इस एकाँगी दृष्टिकोण की सर्वाधिक क्षति भारत में मुस्लिम समुदाय को होने वाली है। देश में जो राजनीतिक दल, अकादमिक, बौद्दिक वर्ग और मीडिया के लोग इस्लाम और मुस्लिम विषय को भावुकता के साथ चर्चा के दायरे से बाहर कर देना चाहते हैं उनकी यह सोच दो तथ्य प्रतिपादित करती है- या तो ये लोग सामान्य रूप से देश की नब्ज को भाँप नहीं पा रहे हैं या फिर इन्हें ऐसा लगता है कि ये अपनी इच्छा शेष समाज पर थोप ले जायेंगे। ये दोनों ही बातें खतरनाक हैं। यदि देश की इच्छा के विपरीत इस्लाम और मुस्लिम समाज की भूमिका और उसके प्रति अपेक्षा पर बहस नहीं होने दी जा रही है तो इसकी प्रतिक्रिया के लिये लोकतांत्रिक मार्ग अवरुद्ध हो जायेगा और यदि समाज की भावना के विपरीत कुछ थोपने का प्रयास उस पर किया गया तो वर्तमान राजनीति, मीडिया, बौद्धिक वर्ग और अकादमिक वर्ग अपनी विश्वसनीयता खो देगा।
इस सन्दर्भ में सभी को गहन रूप से विचार करने की आवश्यकता है। आज समस्त विश्व में इस्लाम को लेकर मुस्लिम समाज के समक्ष प्रश्न किये जा रहे हैं और इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिये इस समाज के लोगों को सामने आना चाहिये और ऐसे प्रश्नों को उठाना या उनके उत्तर जानना आखिर क्या बुरा है?

समस्त विश्व में अधिकाँश अलगाववादी उग्रवादी और फिर आतंकवादी गतिविधियों में मुस्लिम संगठन लिप्त हैं जो कि धीरे धीरे एक वृहत्तर इस्लामी जिहादी मनोभाव से ओतप्रोत होकर वैश्विक आन्दोलन चला रहे हैं जिसकी मूल प्रेरणा समय- समय पर की गयी जिहाद और कुरान की व्याख्या में निहित है। इस पर समस्त विश्व के लोग चिंता व्यक्त कर रहे हैं यहाँ तक कि स्वयं अनेक मुस्लिम देश में ऐसी प्रवृत्ति से आशंकित हैं तो फिर भारत में यदि इस प्रवृत्ति , इसके वैचारिक स्वरूप, इसके समाधान पर चर्चा की जाती है तो उस पर खुली बहस करने के स्थान पर इसे पूरी तरह भावुकता का विषय क्यों बना दिया जाता है? इसी प्रकार वर्तमान विश्व में उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब सभी नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे देश के संविधान और उसके कानून में आस्था रखें तो सेक्युलरिज्म के नाम पर यह कैसे सहन किया जा सकता है कि इस विषय पर देश की स्वतंत्रता के छह दशक बाद भी प्रश्न न उठे कि मुस्लिम समुदाय आखिर देश के कानून में आस्था रखता है या अपने शरियत में? देश की व्यवस्था जब यह आदर्श स्थिति घोषित करती है कि सभी नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे परिवार नियोजन करें तो कोई मजहब और शरियत के नाम पर कैसे दावा कर सकता है कि वह इन नियमों का तो पालन नहीं करेगा पर्ंतु उसे देश के संसाधनों पर पहला दावा चाहिये।

आज देश में सेक्युलरिज्म के नाम पर मुस्लिम समुदाय और इस्लाम से सम्बन्धित अनेक प्रश्नों को भावुकता और साम्प्रदायिकता के पैकेज में सजाकर बहस के दायरे से बाहर कर दिया गया है परंतु ये प्रश्न जितने प्रासंगिक आज से आठ दशक पूर्व थे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। यदि उस समय समस्या का स्वरूप कुछ दूसरा था तो आज कुछ दूसरा है परंतु समस्या है और इससे भागना इसका समाधान नहीं है।

देश में सेक्युलरिज्म की राजनीति और उस गठबन्धन से जुडे अन्य तत्वों को समझना चाहिये कि कुछ जुमले, अवधारणायें, फब्द्तियाँ अनंत काल तक प्रासंगिक नहीं रहतीं और धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिकता, फासीवाद, हिटलर , तानाशाही उनमें से ही है। इन शब्दों को अनावश्यक रूप से इतनी बार प्रयोग किया गया है कि अब ये शब्द अपना अर्थ खो चुके हैं। अब इन सेक्युलर शक्तियों को कुछ नये शब्द गढने चाहिये जो आज के सन्दर्भ मे प्रासंगिक हों।

अभी इन सेक्युलर शक्तियों को सफलता मिलती इसलिये दिख रही है कि भारत में इस विषय पर कोई बहस आरम्भ नहीं हुई है और इस पूरे विषय को गुरिल्ला पद्धति से सेक्युलर लोग लेकर चल रहे हैं जैसे कि बिना तार्किक और तथ्यपरक बह्स में गये मीडिया और राजनीतिक के सेक्युलर गठजोड से एक अवधारणा के आधार पर एक पक्ष को पीडित और दूसरे पक्ष को उत्पीड्क सिद्ध कर भाग जा रहे हैं न तो कोई बह्स और न ही ऐसी अवधारणा निर्माण करने वालों का कोई उत्तरदायित्व बनता है। उदाहरण के लिये- अफजल की फाँसी को क्रियांवित करने के लिये यदि कोई प्रश्न उठाता है तो मीडिया और सेक्युलर राजनेता कहते हैं कि यह साम्प्रदायिक और गन्दी राजनीति है। जब 1984 के सिख दंगों की बात होती है तो कहा जाता है पुराने मुर्दे क्यों उख़ाड रहे हो इसके विपरीत हिन्दू आतंकवाद के लिये प्रमाण दिखाने की आवश्यकता ही नहीं है । इसी प्रकार गोधरा के बाद गुजरात में हुए दंगों की बार बार चर्चा की जाती है तो यह कहा जाता है कि जिस राज्य के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में ऐसा हुआ उसके सेक्युलर शब्दकोष के अपशब्द भी यदि कम पड जायें तो चिंता नहीं लेकिन इस पर बहस समाप्त नहीं होनी चाहिये।

सेक्युलरिज्म के नाम पर जिस प्रकार कपट और फरेब का खेल चल रहा है वह आहत करने वाला नहीं शर्मनाक हैं और वह भी उन शक्तियों के सहयोग से जो स्वयं को लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ कहते हैं। जिस प्रकार मीडिया ने अमित शाह के मामले में स्वयं ही प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने वाला, न्यायालय में मामला चलाने वाला और फिर निर्णय सुनाने वाला सिद्ध किया उससे तो यही सिद्ध होता है कि या तो भारत में इलेक्ट्रानिक मीडिया अभी अपरिपक्व है या उत्तरदायित्वविहीन है या फिर निष्पक्षता का दावा तो करता है पर है नहीं।

यदि इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका देखें तो आश्चर्य होता है कि मानों सेक्युलरिज्म के नाम पर अब जैसे भारत की जाँच एजेंसियो , पुलिस बल, आतंकवाद को सेक्युलरिज्म के दायरे में लाने का प्रयास करते हुए मुस्लिम वर्ग को सन्देश दिया जा रहा है कि आपके साथ न्याय हो रहा है उसी प्रकार इलेक्ट्रानिक मीडिया भी सन्देश दे रहा है कि हम इस्लामी आतंकवाद की अपनी रिपोर्टिंग का प्रायश्चित करने को तैयार हैं। क्या यह संकेत शुभ है? क्या यह निष्पक्षता है? क्या यह सेक्युलरिज्म है? क्या यह लोकतंत्र का सम्मान है? निष्पक्षता का अर्थ संतुलन बनाने के प्रयास में असंतुलित होना नहीं है। जो वास्तविकता है उसे दिखाना ही होगा। सेक्युलरिज्म के नाम पर यदि देश में इस प्रकार संतुलन के नाम पर अस्ंतुलन बनाने का प्रयास हुआ और अन्याय का सहारा लिया गया तो परिणाम क्या होगा? किसी ने विचार किया?

आखिर पिछले आठ दशक से हिन्दुत्व के प्रबल विरोध और सेक्युलरिज्म के प्रबल प्रचार के बाद भी जब कि साम्प्रदायिक दंगों पर लाखों पुस्तकें लिखी जाती हैं और 2002 के गुजरात दंगों के बाद न केवल पुस्तकें लिखी जाती हैं, लेख लिखे जाते हैं, गैर सरकारी संगठन समस्त विश्व में जिस व्यक्ति को सबसे बडा खलनायक सिद्ध करते हैं उसे गुजरात की जनता सिर आंखो पर क्यों बैठाती है? आखिर क्यों वामपंथ, कम्युनिज्म, गान्धीवाद और कांग्रेस के इतने वर्षों के शासन के बाद भी श्री राममन्दिर निर्माण के लिये आन्दोलन क्यों सफल होते हैं? जिस राजनीतिक दल पर बाबरी ढाँचा गिराकर देश में आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाया जाता है उसी राजनीतिक दल को इस घटना के बाद देश की जनता केन्द्र की सत्ता तक कैसे पहुँचा देती है? जिस प्रज्ञा ठाकुर को हिन्दू आतंकवादी बताया जाता है उसके समर्थन में सामान्य हिन्दू जनमानस क्यों सहानुभूति रखता है और उसकी आर्थिक सहायता के लिये अभियान तक चलाता है? जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पिछली अनेक पीढियों से गालियाँ दी जा रही हैं उसका समर्थन न केवक देश में वरन विदेश में हिन्दुओं में क्यों बढ्ता ही जा रहा है? अच्छा हो सेक्युलरिज्म के ठेकेदार और उनके मित्र कभी इन प्रश्नों पर भी विचार करें?

देश में सेक्युलरिज्म के नाम पर जिस प्रकार का वातावरण बनाया जा रहा है वह एक बार फिर हिन्दुत्व आन्दोलन का मार्ग प्रशस्त करेगा। जिस प्रकार सेक्युलर लाबी देश की भावना से बेपरवाह अपना एजेंडा चलाये जा रही है वह देश में किसी बडे तूफान को आम्ंत्रित करने जैसा है।

आज देश में वैचारिक स्तर पर वामपंथ, कम्युनिज्म , समाजवाद पूरी तरह निष्प्राण हो चुका है और जिस प्रकार कांग्रेस सेक्युलरिज्म के नाम पर हिन्दू विरोध के रास्ते पर चलकर स्वयं को इंडियन मुस्लिम कांग्रेस बनाने पर आमदा है उससे तो यही प्रतीत हो रहा है कि अब देश में हिन्दू राजनीति का नया दौर आरम्भ हो सकता है।

उचित यही होगा कि सेक्युलरिज्म के ठेकेदार देश में ऐसी विस्फ़ोटक स्थिति का निर्माण न करें कि यह हिन्दुत्ववादी आन्दोलन प्रतिक्रियावादी होकर उभरे। यदि किसी को देश की ऐसी स्थिति के बारे में सन्देह हो तो वह एक बार पूर्वाग्रह से मुक्त होकर देश का दौरा कर ले और देश की मानसिकता का अध्ययन कर ले तो उसे सहज ही पता लग सकेगा कि टीवी चैनल पर सेक्युलरिज्म की दुहाई देते हुए जितनी बार संतुलन साधने का प्रयास होता है उतनी बार अवचेतन मस्तिष्क़ में दबी भावनायें बाहर आकर इतिहास के प्रश्नों का समाधान माँगने को उद्यत हो जाती हैं। यदि सेक्युलरिज्म की राजनीति ने भारत में अपना पुनर्मूल्याँकन नहीं किया तो यह आने वाले दिनों में सेक्युलरिज्म भारत में सर्वाधिक निन्दित और अपमानित शब्द हो जायेगा। आज का भारत अब सेक्युलरिज्म के नाम पर अफजल गुरू और सोहराबुद्दीन को अपना आदर्श बनाकर नहीं चल सकता और न ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके संगठ्नों को इंडियन मुजाहिदीन और आई एस आई से बडा खतरा मान सकता है। आज यदि किसी को थोडा सा भी भ्रम हो कि भारत के लोग इस बात से संतुष्ट हो जायेंगे कि अफजल से पहले फाँसी के हकदार हिन्दू संगठ्नों के नेता हैं और देश में सभी समस्याओं के मूल में वही हैं तो क्षमा करें अब यह उन्हें भी नहीं पचता जो वैचारिक रूप से हिन्दुत्व के विरोधी हैं।

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