भारत में उथल पुथल पर कुछ सुझाव
भारतीय राजनीति का भविष्य
जब हम भारतीय राजनीति की बात करते हैं तो हम इसे आम तौर पर देश की स्वतन्त्रता के पश्चात से देखने का आरम्भ करते हैं और शायद आज के संदर्भ में यही प्रासंगिक भी है । इस आधार पर यदि हम अगले दशक की भारतीय राजनीति के स्वरूप का आकलन करने का प्रयास करें तो हमें भारत की राजनीति के प्रमुख घटकों और राजनीति और समाज में उनके स्थान पर भी चर्चा करनी होगी।
देश की स्वतंत्रता के पश्चात वैसे राजनीतिक ताकत के अर्थ में काँग्रेस को छोड्कर कोई अन्य शक्ति नहीं थी लेकिन समाज और साहित्य के नजरिये से देखा जाये तो देश में स्वतन्त्रता को एक अधूरी स्वतन्त्रता माना गया था यही कारण था कि काँग्रेस के निकट माने जाने वाले कवि रामधारी सिंह दिनकर ने “परशुराम की प्रतीक्षा” नामक महाकाव्य की रचना कर देश में भविष्य में होने वाले और परिवर्तन के लिये तैयार होने को कहा और बाद में यह भी ज्ञात हुआ कि 1970 के दशक में चले जनांदोलन के पीछे भी उनकी उत्सुकता कम न थी। इससे यह सिद्ध होता है कि राजनीतिक रूप से ताकतवर होते हुए भी काँग्रेस के अतिरिक्त भी समाज में अन्य विचारधारा और राजनीति का स्थान शेष था। इसी कारण काँग्रेस से अलग जनसंघ जो कि राजनीति से अधिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे पूर्व आर्य समाज के रूप में सामाजिक रूप से लोकप्रिय रहा और स्वतन्त्रता से पूर्व काँग्रेस के अधिकतर सदस्य आर्य समाज पृष्टभूमि से आते थे इसी कारण काँग्रेस को जनता के मध्य राजनीतिक और सामाजिक रूप से मान्यता प्राप्त थी और अन्य विचारधारा के लिये स्थान नहीं था लेकिन 1925 के बाद स्थितियों में परिवर्त नआने लगा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा का पोषक और प्रतिनिधि बन गया । इसके बाद कुछ स्थान कम्युनिष्ट और समाजवादियों का भी रहा ।
इस प्रकार मूल रूप में भारतीय राजनीति में काँग्रेस , हिंदू राष्ट्रवादी, कम्युनिष्ट और समाजवादी विचारधारायें प्रमुख रहीं। यदि वैश्विक संदर्भ में देखें तो दक्षिण पंथी और वामपंथी राजनीतिक शब्दावली भारतीय संदर्भ में अधिक प्रासंगिक नहीं है वैसे यह आयातित शब्दावली पिछले अनेक दशकों से प्रयोग होती आ रही है।
देश की राजनीति में पिछले दो दशकों में जो परिवर्तन हुआ है वह अधिक मह्त्वपूर्ण और प्रासंगिक है । 1970 के दशक में परिवर्तन की जनाकाँक्षा को जब राष्ट्रवादी और समाजवादी सहेज न सके तो जनता ने पुनः एक बार गैर काँग्रेसवाद की धुरी पर आरम्भ होकर धार्मिक प्रतीक के सहारे चले जनांदोलन को परिवर्तन की आकाँक्षा के साथ सहयोग दिया और इस दौरान अनेक उतार चढावों के मध्य 21वीं शाताब्दी के दूसरे दशक में राजनीतिक सत्य यह है कि काँग्रेस को यथास्थितिवदी शक्ति माना जाता है और कम्युनिष्ट विचारधारा के क्षीण होने और समाजवादी आंदोलन के नेतृत्व की विश्वसनीयता खो देने से एक राजनीतिक शून्य सा दिखाई देता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि पिछले छह दशक से हिंदू राष्टृवाद की चेतना की वाहक माने जाने वाली शक्तियों के प्रति जनता की विश्वसनीयता कम हुई है। इसी बीच आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण ने देश में नये मध्य वर्ग का सृजन कर दिया है जो अपनी आकाँक्षा और एजेंडे के साथ सत्ता में भागीदारी को उत्सुक है। यह मध्य वर्ग दुविधा में है क्योंकि परम्परावादी और धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक होते हुए भी प्रचार और व्यावसायिक व आर्थिक विवशता के चलते अपनी बात पूरी तरह नहीं रख पा रहा है। ऐसी स्थिति में देश के लिये कौन सी राजनीति उपयुक्त है।
वर्तमान स्थिति में देश की कुल जनसंख्या को मोटे तौर पर चार भागों में बाँटना होगा। पिछले दो दशक में उत्पन्न हुई जनसंख्या अर्थात 16 से 22 वर्ष तक के लोग। 22 से 35 वर्ष की अवस्था के लोग। 35 से 50 वर्ष की अवस्था के लोग तथा 50 से ऊपर की अवस्था के लोग।
किशोर वय और युवावस्था के बारे में नीचे चर्चा की जायेगी। ये लोग पूरी तरह नये हैं जिनकी अभी तक कोई विचारधारा नहीं बन पाई है और इन्हें लोकशिक्षण के द्वारा तैयार करने की चुनौती है।
लेकिन शेष दो वर्ग के लोग जो कि 35 और उससे ऊपर की अवस्था में आते हैं वे भी परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं और अपनी पुरानी विचारधारा के क्षीण होने या उसकी विश्वसनीयता खो जाने से नयी विचारधारा की ओर देख रहे हैं। कुल मिलाकर भारतीय राजनीति आज पूरी तरह परिवर्तन के दोराहे पर खडी है। देश को एकदम नयी विचारधारा देने की आवश्यकता है जो कि सनातन परम्परा के अनुक्रम में सामयिक संदर्भ लिये हुए हो।
वैश्विक संदर्भ में भारतीय राजनीति
जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि भारतीय संदर्भ में दक्षिण पंथी और वामपंथी का विभाजन पूरी तरह अनुपयुक्त है। यह विभाजन फ्रांसीसी क्रांति के बाद आया था जब पहली बार संसद में जो पक्ष जिस ओर बैठा उसी के आधार पर यह विभाजन बना दिया गया और दो विश्वयुद्धों में विचारों को इन पर थोप दिया गया। इस विभाजन को यदि पश्चिमी संदर्भ में देखें तो दक्षिण पंथी का अर्थ है राजनीति में संस्थागत रूप से रिलीजन या मजहब की भूमिका, सेना को अधिक मह्त्व देना व सैन्य समाधानों की ओर उत्सुक रहना तथा मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था का पोषण करते हुए आर्थिक मामलों में राज्य की भूमिका को मह्त्वहीन कर बाजार को सभी कुछ निर्धारित करने की छूट देना। इसके विपरीत वामपंथी का अर्थ है मानवाधिकार और जनाधिकार से सम्बन्धित मुद्दों को उठाना और जनकल्याण कारी राज्य के अनुसार राज्य के ऊपर जनता की अधिक जिम्मेदारी डालना। लेकिन जिस संदर्भ में पश्चिम में और विशेषकर यूरोप में वामपंथ को लिया जाता है वह राष्टृ की पह्चान के प्रति आग्रह को भी बुराई मानता है और राज्य को प्रायः नपुंसक बनाकर रखना चाहता है।
यदि वैश्विक संदर्भ में राजनीति को देखा जाये तो एक नया रुझान देखने को मिल रहा है। जिस प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध से पूर्व फासिस्ट और कम्युनिष्ट एकसाथ आ गये थे और अतिवादी दक्षिण पंथी और वामपंथी के इस मिलन से द्वितीय विश्वयुद्ध अपरिहार्य हो गया था उसके विपरीत आज के दौर में नरम दक्षिण पंथी और नरम वामपंथी मानवोचित मुद्दों पर साथ आते दिख रहे हैं।
ब्रिटेन में हमें इसी प्रकार की गठबंधन सरकार देखने को मिल रही है । इसी प्रकार का रुझान अन्य पश्चिमी देशों में भी दिखाई दे रहा है जहाँ सत्तारूढ दक्षिणपंथी ताकतों के मुकाबले नरम वामपंथी ताकतें अपनी शक्ति बढा रही हैं। फ्रांस, जर्मनी में आने वाले चुनावों के बाद हमें यही चित्र देखने को मिल सकता है।
यह वैश्विक संदर्भ इस बात को पुष्ट करने के लिये पर्याप्त है कि वर्तमान स्तर पर राजनीति का जो स्वरूप है उसके अनुसार कट्टरपंथी , आत्यंतिक एजेंडा नहीं चल सकता और ऐसी कोई पहल एक सीमा से आगे नहीं जा सकती लेकिन समाज में इसका भी एक स्थान है। जैसे पश्चिम के अनेक देशों में आप्रवास विरोधी राजनीतिक दल तेजी से अपना पाँव पसार रहे हैं और मुख्य दक्षिण पंथी राजनीतिक दलों को अपना पूरा आधार बना पाने से रोक रहे हैं।
आज की राजनीति में विश्व स्तर पर हो रहे घटनाक्रम को यदि भारत के संदर्भ में देखें तो परिणाम यही निकलता है कि जिसे भारत में दक्षिण पंथी राजनीति कहते हैं वह हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति है क्योंकि राष्ट्रीय पहचान, सीमाओं की सुरक्षा, राजनीति में अध्यात्म का पोषण यह सभी कुछ दक्षिणपंथी राजनीति का अंग माना जा सकता है और जिसे वामपंथी मुद्दे कहा जाता है वह राजनीति का विकेंद्रीकरण, पूँजी का विकेंद्रीकरण , मुक्त अर्थ व्यवस्था के आधार पर समाज और मानव सभ्यता को बाजार की क्र्र्ररता के हवाले न छोड्कर लोभ पर विराम लगाकर जीवन शैली में परिवर्तन की बात उठाना आदि। इस प्रकार जब हम भारतीय राजनीति के भविष्य की बात करते हैं तो इसे नयी शब्दावली अध्यात्मपरक राजनीति का नाम देना होगा जो कि भारत की शास्वत पहचान की निरंतरता पर आधारित है और राजनीतिक संदर्भ मे दक्षिण और वामपंथी भावों को समेटे हुए है। भारत में कम्युनिज्म और समाजवाद की विचारधारा के क्षीण हो जाने से और काँग्रेस के यथास्थितिवादी होने से जनता में परिवर्तन की आकाँक्षा के साथ आत्मसात न हो पाने के कारण देश में एक व्यापक हिंदू राष्ट्र्वादी गठबन्धन की आवश्यकता है जिसमें कि कट्टर दक्षिणपंथी , नरम दक्षिण पंथी , मानवतावादी और पुराने समाजवादी भी हों जो कि अध्यात्म के नारे तले एकत्र हों।
आज की चुनौती
आज की सबसे बडी चुनौती किशोरवय और युवा वर्ग के मानस को समझना है। एक ओर जहाँ हम यू टी वी बिंदास और रियलिटी शो की ओर उसकी बढती रुचि पाते हैं , पिज्जा बर्गर , फिल्म और गर्लफ्रेंड के साथ समय बिताने में अधिक लिप्त पाते हैं तो वहीं देश से सम्बन्धित किसी विषय पर उसकी उत्कण्ठा भी देखने को मिलती है जब वह सार्थक फिल्मों और खेलों में देश की उपलब्धि पर हर्षित होता है। किशोरवय और युवावस्था के लोगों के बारे में अधिक अवस्था के लोग प्रायः यही कहते पाये जाते हैं कि यह पीढी बहुत बिग़ड गयी है और इसने अनेक सामाजिक मानदण्ड तोड दिये हैं। ऐसे में यह जानना अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि इस वर्ग के मानस को जानने का प्रयास किया जाये।
आखिर पिछली पीढी और आज की पीढी के मध्य क्या अंतर आया है। अनेक सामाजिक मानदण्ड बौने पड गये हैं। आखिर यह क्यों हो रहा है? वास्तव में मानव जाति ने अपनी विकासयात्रा में सदैव अधिकाधिक स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास किया है। हर युग में समाज व्यक्ति के आचरण को नियंत्रित करने के लिये नियम निर्मित करता है ताकि व्यक्ति की स्वतन्त्रता के साथ उसे समायोजित किया जा सके। इस युग में व्यक्ति अधिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने की आकाँक्षा से ओतप्रोत है और यही कारण है कि इस युग में जन्म लिया व्यक्ति या नारी अभी स्वतंत्रता का आनंद उठाना चाहते हैं ऐसे में यह चुनौती खडी हो गयी है कि स्वतंत्रता को कैसे परिभाषित किया जाये। आज स्वतंत्रता को अनुशासन से अधिक कर्तव्य बोध के साथ जोडने की आवश्यकता है। आज पिछली पीढी की भाँति अभिभावक अपनी संतान को जबरन किसी चीज के लिये विवश नहीं कर सकते और इसी प्रकार संयुक्त परिवार में रहकर अपने से बडे बुजुर्गों का सम्मान करने या उनकी बात के आगे नतमस्तक होने की परम्परा आज के किशोर और युवा नहीं जानते इस कारण यह आवश्यक है कि उन्हें लोकशिक्षण और इसके लिये प्रचलित माध्यमों के द्वारा उन्हें बताया जाये कि उनका व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व क्या है?
आज किशोर और युवा वर्ग के बारे में यह मानना उसके साथ अन्याय होगा कि वह संवेदनहीन है वास्तव में वह आज की जीवनशैली और सामाजिक परिवेश का शिकार है और इसी कारण अपने आन्तरिक स्वरूप में संवेदनशील होते हुए और पूरी तरह दूसरों पर समर्पित होते हुए भी इसके विपरीत आचरण करता दिखता है। वह एक काल्पनिक विश्व में विचरण करते हुए अपने एक दायरे में जी रहा है इसका प्रमुख कारण यह है कि उसे कहीं भी ऐसा नेतृत्व , अभिभावक या शिक्षक नहीं मिलता जो उसका मित्र बन सके। आज किशोर और युवा अवस्था के पीछे नहीं भागता उसे मित्र की भाँति उसकी स्वतन्त्रता को बाधित न करने वाला और उसके सपनों तक पहुँचाने वाला नेतृत्व चाहिये और आज इसका अभाव है और इसका सबसे बडा प्रमाण फिल्म और क्रिकेट से जुडे लोगों में अपने सपनों को साकार होते देखने की उसकी विवशता है।
आज का युवा और स्वदेशी
सामान्य रूप में यह देखने में आता है कि किशोर वय और युवा वर्ग के लोग अमेरिका के प्रति अत्यंत आकर्षित रहते हैं और ऐसे में एक बडा प्रश्न खडा होता है कि क्या स्वदेशी की बात करते हुए अमेरिका का विरोध करने से यह वर्ग किसी जनांदोलन से नहीं जुड सकता। यह तथ्य कुछ अंशों में सत्य है पर पूरी तरह नहीं। वास्तव में हमें समझना होगा कि यह वर्ग अमेरिका से क्यों आकर्षित है। इसके पीछे दो मुख्य कारण है। उसे लगता है कि अमेरिका प्रगति, विकास और समृद्धि का प्रतीक है और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का वाहक। आज यदि युवा वर्ग को यह विश्वास दिलाया जा सके कि भारतीय संस्कृति में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के लिये सदैव से सम्मान और स्थान रहा है और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और स्वार्थ में भेद है और हमारी संस्कृति कर्तव्य बोध पर आधारित व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की पोषक है। इसके साथ ही यह कोई मिथ या कल्पना नहीं है कि हमारा देश सोने की चिडिया था और स्वतन्त्रता के पश्चात हमारी राजनीतिक व्यवस्था में आई जडता और भ्रष्टता के चलते हम अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ विकास नहीं कर सके यदि एक बार इस व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हो जाये तो हम अमेरिका से कहीं आगे निकल सकते हैं।
व्यवस्था परिवर्तन के कुछ सुझाव
आज हम जब भविष्य की ओर देखते हैं तो हमें अपने अतीत से शिक्षा लेनी होगी। हमारे समक्ष आज दो प्रकार की कार्य पद्धति उपलब्ध है। एक पूर्णतया समर्पण और आत्मविलोपन की जहाँ स्वयं को गलाकर बिना किसी अपेक्षा के कार्य करने का आग्रह है और भावनात्मक रूप से पारिवारिक परिधि के अनुसार कार्य की परम्परा है जहाँ यदि सामने वाला सही मार्ग पर न हो तो भी उसके लिये स्वयं को दोषी सिद्ध कर आत्मग्लानि विकसित कर लेना जिसके आधार पर केवल सम्बन्ध को मह्त्व देना न कि परिणाम को।
इसके अतिरिक्त दूसरी कार्य पद्धति कारपोरेट पद्धति है जहाँ केवल परिणाम और मुनाफा का मह्त्व है भावना और सम्बन्ध का नहीं। आज की आवश्यकता दोनों के मध्य कहीं नयी कार्यपद्धति विकसित करने की है जहाँ भावना और सम्बन्ध के आधार पर परिणामकारक कार्यशैली पर जोर हो और न ही अधिक त्याग का पूर्वाग्रह हो और न ही अधिक प्रचार की आकाँक्षा।
आज के युवा के सामने सबसे बडी चुनौती उसकी बेरोजगारी है। पिछले छ्ह दशक में उसकी रचनात्मकता और व्यक्तित्व को इतना कुंठित कर दिया गया है कि परिपाटी से हट्कर कुछ सोचने की उसकी क्षमताजवाब दे चुकी है। इस कारण उसकी रोजगार की ललक को राष्ट्र निर्माण से जोड्कर प्रस्तुत करना होगा।
गो आधारित कृषि व्यवस्था को एक सम्पूर्ण हरित क्रांति के रूप में सामने लाना होगा जिसमें रोजगार की अपार सम्भावनायें दिखती हों तथा इसके लिये उत्पाद विक्रय , पैकेजिंग और बाजार निर्माण के पेशेवर तथ्यों को सामने लाना होगा।
हम जब समाज सेवा की बात करते हैं तो प्रायः इससे ऐसा ध्वनित होता है कि इसमें न तो कैरियर की सम्भावना है, न नाम की और न ही किसी प्रकार का आकर्षण है। समाज सेवा को कैरियर की एक आकर्षक सम्भावना के रूप में सामने लाना होगा।
शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा, सुरक्षा, संस्कार को नारे में शामिल करना होगा।
बाजारीकरण से युक्त संवेदनहीन निजीकरण के स्थान पर संवेदनशील सेवाभावी निजीकरण की नयी परम्परा का रूप समाज को दिखाना होगा जहाँ व्यक्ति कोई श्रमिक या पूँजीपति न होकर आत्मकल्याण से मानवमात्र की सेवा का साधन सिद्ध हो और खुद भी खाये और सभी को खिलाये।
समाजसेवा का अर्थ आम तौर पर दो तरह से लगाया जाता है या तो जो पूरी तरह विलीन होकर अपने समस्त सुखों का बलिदान कर तिल तिल कर मर कर आत्माहुति दे या फिर जो समाज सेवा के नाम पर फरेब करे लेकिन सेवा क्षेत्र के निजीकरण द्वारा आत्मसम्मान , राष्ट्रीय स्वाभिमान और आर्थिक सशक्तीकरण का नया प्रारूप सामने आये।
कृषि सुधार
भारत मूल रूप में कृषि और ऋषि प्रधान और परम्परा का देश है और भारत को आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से स्थिर और विकसित बनाने के लिये यह अत्यंत आवश्यक है कि इन दोनों ही परम्पराओं को राजनीति और राष्ट्रनीति का आधार बनाया जाये। पिछली एक शताब्दी से अधिक समय से एक सुनियोजित प्रयास के तहत भारत में कृषि संस्कृति को आर्थिक , सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से कमजोर करने का प्रयास हुआ है। क्योंकि कृषक अपआने जीवन में भारत की महान आध्यात्मिक परम्परा को आत्मसात कर उसे पीढियों को आगे बढाता रहा है। आज भारत में अनेक स्तर पर उथल पुथल का कारण यह भी है कि हमने अपनी अर्थव्यवस्था को सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्कताओं के अनुरूप नहीं ढाला है। कृषक को अपनी भूमि और आजीविका छोड्कर शहरों के मजदूर बनाने में हमारी नीतियाँ अधिक रुचि रखती हैं। आज यह आवश्यक है कि इस भूल को सुधारा जाये ।
आज भारत में कृषि की एक बडी समस्या है कि कृषि विज्ञान और आम किसान के मध्य बहुत दूरी है। भारत में निश्चित रूप से अनेक बडे कृषि विज्ञान केंद्र , प्रयोगशालायें और कृषि वैज्ञानिक हैं लेकिन इनसे कुछ ही दूरी पर स्थित कृषक इनका कोई लाभ नहीं उठा पाता और यह सब अकादमिक बहस का हिस्सा बनकर रह जाता है। आज इस बात की आवश्यकता है कि इन वैज्ञानिक तकनीकों और उनसे होने वाले लाभ से आम कृषक लाभान्वित हो। इसके लिये गैर सरकारी संगठन विशेष भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं। इन संग़ठनों के द्वारा देश के प्रत्येक मंडल या विकास खंड में कृषि सलाहकार मंडल की स्थापना करें जिसमें स्थानीय प्रतिष्ठित किसान और क्षेत्रीय प्रतिष्ठित लोगों का संयोजन हो और यह मंडल प्रत्येक माह स्थानीय स्तर पर कृषि वैज्ञानिकों और सरकारी सलाहकारों को बुलाकर एक किसान मेला आयोजित करे जो कि दिन भर का आयोजन हो जिसमें नयी तकनीक, विचार और अधिक वैज्ञानिक खेती के तरीकों से स्थानीय किसानों को अवगत कराया जाये।
इसके साथ ही कृषक की दूसरी समस्या उसे अपनी लागत का वास्तविक मूल्य न मिलना है। इसके लिये कृषक और बाजार के मध्य मध्यस्थों की भूमिका समाप्त करते हुए किसान की सीधी पहुँच बाजार तक हो इसका प्रयास किया जाये।
चुनाव सुधार
भारत जैसे विशाल और विविधतावादी देश के लिये संसदीय लोकतंत्र का भी ऐसा स्वरूप होना चाहिये जो अद्वितीय हो क्योंकि यह देश भी अद्वितीय है। भारत में दलगत और विचारधारागत राजनीति और प्रशासन को पृथक करना आवश्यक है इसलिये समय आ गया है कि संख्याबल के आधार पर एक सरकार के गठन के स्थान पर ऐसे कैबिनेट की परिपाटी हो जो सर्वानुमति पर आधारित हो। इसके लिये नया प्रावधान लाया जाये और संविधान में यथासम्भव सुधार किया जाए कि सभी दलों को मिले कुल मतों के प्रतिशत के आधार पर उन्हें सरकार में प्रतिनिधित्व मिले और सभी राजनीतिक दल कैबिनेट के लिये अपने सदस्यों का नाम प्रधानमंत्री को दें और सदा ही सभी दलों की मिली जुली कैबिनेट बने । देश को यदि विश्व की महाशक्ति बनाना है तो यह आवश्यक है की सरकार और राजनीतिक विचारधारा को अलग रखा जाए | एक दल का बहुमत और उसके आधार पर सरकार और संवैधानिक पदों का निर्धारण कटुता को दिनों दिन बढ़ाएगा ही इसलिए ऐसी व्यवस्था हो की विभागों का बंटवारा प्रधानमंत्री का ही विशेषाधिकार होगा ताकि सरकार और कैबिनेट के निर्णय दलगत राजनीति की भेंट न चढ सकें और देश का लोकतंत्र अधिक समन्वयक हो सके। इस प्रावधान से सभी विचारधारायें और राजनीतिक दल देश के विविधतावादी स्वरूप का प्रतिनिधित्व करेंगे और राष्ट्रीय निर्णयों में आम सहमति बन सकेगी और इसके साथ ही सभी दलों को सभी मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखनी होगी। इसके साथ ही इस बात को सुनिश्चित करने के लिये कि कभी कोई कैबिनेट सदस्य अपनी दलीय या विचारधारागत स्थिति के चलते कोई संवैधानिक संकट खडा न कर सके इस बात की व्य्वस्था हो कि यदि वह कैबिनेट के किसी निर्णय से असहमत हो तो उसे अपने पद से त्यागपत्र देकर इसी मुद्दे पर छह माह के भीतर चुनकर पुनः आना होगा और इस उपचुनाव को वह अपनी विचारधारा और दलीय स्थिति के साथ चुनाव लडेगा और उस एक प्रत्याशी को यदि अपने संसदीय क्षेत्र के कुल मत से 30 प्रतिशत मत प्राप्त होते हैं तो कैबिनेट छोडने से पूर्व जताई गयी उसकी असहमति स्वीकार की जायेगी और यदि मतों का प्रतिशत 30 प्रतिशत से कम हुआ तो उसे कैबिनेट का निर्णय मानना होगा।
इसके साथ ही विधायिका में गैर राजनीतिक सामाजिक और आध्यात्मिक संगठनों की राय को समावेशित करने के लिये देश में प्रख्यात धर्मगुरुओं, समाजसेवियों और आर्थिक क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त लोगों का सलाहकार मंडल बनाया जाये जिसकी राय भी मह्त्वपूर्ण विधायी कार्यों में ली जाये। भारत की सबसे बडी आवश्यकता अपनी विविधता को अपनी विशेषता बनाना है ताकि सामाजिक स्थिरता और सर्वानुमति के आधार पर देश आर्थिक और सांस्कृतिक प्रगति कर सके।
लोकसभा और विधानसभा के लिये चुने जाने वाले प्रत्याशियों को अधिक प्रतिनिधित्वपरक बनाने के लिये यह अनिवार्य किया जाये कि लोकसभा के लिये चुने जाने वाले प्रत्याशी को अपने संसदीय क्षेत्र में पडे मतों का 30 प्रतिशत प्राप्त करना अनिवार्य होगा इसी प्रकार विधानसभा के लिये यह प्रतिशत 25 प्रतिशत हो। जब तक किसी प्रत्याशी को इतने मत प्राप्त नहीं हो जाते चुनाव होते रहेंगे। इस नियम से कोई भी प्रत्याशी जाति या मजहब के आधार पर ध्रुवीकरण कर चुनाव नहीं जीत सकेगा और उसे अपने प्रदर्शन और विचार को ही अपने चुनाव का आधार बनाना होगा। चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह इलेक्ट्रानिक पद्धति से कर देने से अनेक चरण में चुनाव कराना भी अधिक खर्चीला और असुविधाजनक नहीं होग। कम गम्भीर और दूसरों के लिये वोट काटने वाले प्रत्याशियों को कम करते हुए यह सुनिश्चित किया जाये कि विजयी प्रत्याशी वास्तविक रूप से जनता का अधिक प्रतिनिधित्व प्राप्त करे इसलिये यह आवश्यक हो कि पर्चा भरते समय प्रत्याशी को यह शपथपत्र देना होगा कि उसके साथ संसदीय क्षेत्र के कुल मतदाताओं का कम से कम 5 प्रतिशत समर्थन प्राप्त है और इसे पुष्ट करने के लिये उसे स्थानीय निकायों के क्षेत्र में आने वाले उन निर्वाचन क्षेत्रों के कम से कम उतने निर्वाचित प्रतिनिधियों का हस्ताक्षरित पत्र चुनाव आयोग को देना होगा जो उस 5 प्रतिशत की शर्त को पूरा करते हों। इन नियमों से चुनाव में धन का प्रवाह भी कम होगा क्योंकि गम्भीरतापूर्वक मुद्दों के आधार पर प्रचार करने से और ठोस जनसमर्थन से ही चुनाव जीतना सम्भव हो सकेगा और मत खरीदने की परम्परा कम होगी।
सुरक्षा में रोजगार
देश की विशाल जनसंख्या को बोझ मानने के स्थान पर इसे राष्टृ के विकास में प्रयोग किया जा सकता है। देश के व्यावसयिक प्रतिष्ठानों, परिवहन व्यवस्था, शिक्षा संस्थान , स्वास्थ्य संस्थानों की वर्तमान आतंकवादी और आपराधिक स्थिति में सुरक्षा के लिये पुलिस और अर्धसैनिक बल की अपर्याप्तता को देखते हुए और निजी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पर्याप्त सुरक्षा देने में असफलता को देखते हुए एक केंद्रीय सुरक्षा एजेंसी के गठन का प्रस्ताव हो जिसके लिये संघ लोक सेवा आयोग की भाँत आयोग बने और चयन प्रक्रिया के द्वारा प्रति वर्ष प्रति 1000 व्यक्ति पर एक सुरक्षा अधिकारी के पैमाने से स्थान का विज्ञापन निकाला जाये और इनकी भर्ती हो जिसमे एन सी सी के बी और सी सर्टीफिकेट प्राप्त लोगों को वरीयता दी जाये।
सेवा क्षेत्र कैरियर बने
संघ लोक सेवा आयोग की भाँति एक जनहित सेवा आयोग का प्रस्ताव हो जिसमें शिक्षा, चिकित्सा और सस्कार प्रदान करने के लिये कैरियर का विकल्प हो इसके लिये परीक्षा हो जिसमें उत्तीर्ण लोग अपने लिये बताये स्थान पर नियुक्ति के लिये जायें तथा इसके लिये समाज से प्राप्त जनहित कोष और राष्ट्रीय सहायता कोष से इनके अच्छे वेतन की व्यवस्था हो। इस कोष को बनाने के लिये प्रतिदिन प्रत्येक नागरिक से एक रूपया इस कोष में जमा कराया जाये। इसके लिये जिन नागरिकों के पैन नम्बर हों उसकी सहायता से स्वतः इस खाते में एक रूपया जमा हो जायेगा।
अपनी प्रतिभा के अनुसार क्षेत्र चुनने की स्वतंत्रता और सरकार का सहयोग
किशोर वय और युवा वर्ग के लोगों को इंटरमीडियेट के बाद अपनी प्रतिभा के अनुसार अपने क्षेत्र को चुनने की स्वतंत्रता हो और यह सुनिश्चित करने के लिये कि किसी किशोर, किशोरी, युवक युवती को उसके अभिभावक उसकी रुचि के विपरीत क्षेत्र के चयन के लिये विवश न करें यह आवश्यक किया जाये कि इंटरमीडियेट के बाद एक देशव्यापी अनिवार्य परीक्षा हो और इस परीक्षा में परीक्षार्थी का अभिरुचि परीक्षण हो और इस आधार पर एक पैनल यह निर्णय दे कि कौन आगे क्या करना चाहता है। इस परीक्षा के बाद उसे एक कार्ड दिया जायेगा जो कि अपने रंग के अनुसार यह प्रदर्शित करेगा कि परीक्षा का परिणाम क्या रहा? इसी कार्ड के आधार पर उसे राष्ट्र निर्माण योजना में पन्जीकृत कर लिया जायेगा जहाँ से वह अपनी रुचि के अनुसार क्षेत्र चुनने और रोजगार प्राप्त करने तक राष्ट्रीय सहायता कोष से सहायता प्राप्त कर सकेगा। राष्ट्रीय सहायता कोष और जनहित सेवा आयोग की राशि एक ही ढंग से एकत्र की जायेगी। इससे युवाओं की रचनात्मकता सामने आयेगी और अधिक वैज्ञानिक, अनुसंधानकर्ता और विभिन्न खेलों में लोग सामने आ सकेंगे।
मुकदमे के शीघ्र निस्तारण के लिये न्यायिक अधिकारी
देश के गाँवों की सबसे बडी समस्याओं में से एक भू राजस्व और फौजदारी के लम्बित मुकदमे भी हैं। इस बात का प्रस्ताव किया जाये कि लम्बित मुकदमों के शीघ्र निस्तारण के लिये न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति ग्राम से जनपद स्तर तक हो जहाँ कुछ मुकदमों मे उसे अंतिम निर्णय का अधिकार हो और सभी मुकदमों को नियमित सुनवाई के द्वारा अधिक से अधिक एक वर्ष में निपटाने का अधिकार हो तथा कलेक्टर या तहसीलदार जैसे प्रशासनिक अधिकारियों को न्यायिक कार्यभार से मुक्त कर दिया जाये। इसकी नियुक्ति के लिये भी चयन आयोग हो और इन्हें परीक्षा के बाद चयनित किया जाये।
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