12310458_1049042885115773_884992672162635629_nAmitabh Tripathi

अपने  बारे  में  लिखना  अत्यंत  कठिन  होता है क्योंकि स्वयं के बारे में लिखने का  अर्थ  है कि अभी हम उस  स्तरको प्राप्त करने के  लिए संघर्षरत हैं  और उसकी  भूमिका बना रहे हैं कि जब दूसरे हमारे बारे में कुछ लिखें |इसलिए मात्र इतना  बताते हुए कि अपनी पहचान छुपाने का आरोप न लगे अपने बारे में कुछ बातें बता रहा हूँ उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र के जिला बहराइच में जन्म लेकर  उत्तर प्रदेश के  अम्बेडकरनगर जिले में अपनी  आरंभिक शिक्षा प्राप्त की और जिला फैजाबाद के अवध विश्वविद्यालय से सम्बद्ध साकेत महाविद्यालय से ग्रेजुएशन और  विधि स्नातक ( ला ग्रेजुएशन ) किया|अपने विद्यार्थी जीवन में ही पत्रकारिता से जुड़कर उत्तर प्रदेश के दैनिक समाचार पत्र “ स्वतंत्र भारत” के अम्बदेकरनगर जिले के संवाददाता और विज्ञापन प्रतिनधि के रूप में कार्य करते हुए जमीनी स्तर से पत्रकारिता और प्रशासन व राजनीति को समझने का  अवसर मिला |ला ग्रेजुएशन के बाद उत्तर प्रदेश के अधिकतर  लोगों की तरह लोक सेवा आयोग से जुडी परीक्षाओं के लिए दिल्ली आ गया १९९९ में और फिर अनेक पडावों से गुजरते हुए लगा कि व्यवस्था का अंग बनने के स्थान पर व्यवस्था के बाहर से ही उसका जायजा लेने वाले लोगों का साथ दिया जाये और फिर राजनीति , सामाजिक सेवा, पत्रकारिता , लेखन जैसे विषय आपस में मिल गए |
दिल्ली में आने के बाद सबसे उल्लेखनीय कार्य है संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ अति विद्वान् और चिंतकों का साथ | दुनिया में आतंकवाद और मध्य पूर्व की राजनीति पर अध्ययन करने वाले थिंक टैंक मिडिल ईस्ट फोरम के अध्यक्ष डा डेनियल पाइप्स के कार्यों का हिन्दी अनुवाद और अमेरिका के ही एक अन्य विद्वान् , पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता डा रिचर्ड बेंकिंन के साथ बांग्लादेश और पाकिस्तान में निवास कर रहे अल्पसंख्यकों के अधिकारों की मांग अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने के लिए अकेडमिक और कार्यकर्ता स्तर की सक्रियता के साथ देश और दुनिया के विभिन्न विषयों पर लिखते रहने की ललक ने पूरी तरह जिज्ञासु बना दिया है और अब तो यह लगता है कि शायद अब सही अर्थों में लिखने पढ़ने का सलीका आया है और एक सामान्य नियम समझ में आया है कि जुडाव किसी से भी हो , विचारधारा कोई भी हो पर हर प्रकार की रचनात्मकता और हर दिशा से आने वाले विचारों का स्वागत करने की उदारता होनी चाहिए   , क्योंकि हम जिस जगत  में रहते हैं वह परिवर्तनशील है और इसी कारण   सोच और नजरिया व  विचारधारा को लेकर भी लचीला रहना पड़ता है क्योंकि आप भले ही न बदलें , परिस्थितियाँ, चुनौतियां और इन्हें देखने और इनका सामना करने का ढंग तो बदल ही जाता है|