About
जब भी अपने बारे में लिखना होता है तो काफी संकोच होता है। इसलिये नहीं कि कुछ कहने या लिखने को नहीं है वरन यह सोचकर कि क्या इतना योगदान समाज को दे दिया है कि अपना परिचय दूँ। फिर भी यह धृष्टता करूँगा क्योंकि चाहता हूँ कि जब मेरे विचार पढें तो मेरे बारे में भी कुछ जानें।
पत्रकारिता कभी भी मेरा प्रोफेशन या व्यवसाय नहीं रहा वरन यह पैशन या जुनून था। पत्रकारिता से मेरा पहला परिचय विद्यार्थी जीवन में हुआ जब 1993 में विधि स्नातक करते हुए एक अग्रणी समाचार पत्र स्वतंत्र भारत के लिये ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य करने लगा। वह बडी रोचक कथा है जो कभी फुर्सत से सुनाऊँगा। लेकिन अध्ययन के प्रभावित होने से वह कार्य एक वर्ष के बाद छोड दिया।
वास्तव में मैं उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र से आता हूँ और भगवान राम के जन्मस्थल अयोध्या से बडा निकट का सम्बन्ध है। 1995 में स्नातक और विधि स्नातक अवध विश्वविद्यालय से समाप्त कर कुछ दिन सामाजिक कार्य कर भारत को समझने का प्रयास किया और फिर 1999 में सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिये दिल्ली आ गया। लेकिन एक बार इस परीक्षा में बैठने के बाद पत्रकारिता का कीडा काटने लगा और राष्ट्रधर्म के पूर्व सम्पादक वीरेश्वर द्विवेदी के साथ पत्रकारिता के गुर सीखने लगा जो उस समय विश्व हिन्दू परिषद का मीडिया का कार्य भी देखते थे। विद्या भारती के विद्यालयों से आरम्भिक शिक्षा प्राप्त होने के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके संगठनों को निकट से जानने की इच्छा सदैव थी और इसी क्रम में वीरेश्वरजी का साथ मिला। लेकिन उन्होंने मुझे संगठन का कार्य करने के लिये प्रेरित न करके मेरे अन्दर के पत्रकार को निखारा और पत्रकारिता के बारे में काफी कुछ उनसे सीखा।
अनेक वर्षों तक विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लिखने के साथ ही राष्ट्रीय सहारा, दैनिक भाष्कर जैसे अनेक समाचार पत्रों में नियमित रूप से लिखने लगा। इसी बीच 2001 में अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण और फिर भारत में संसद पर हुए आक्रमण के बाद आतंकवाद के मूल कारणों का अध्ययन करने के लिये नियमित विषयों पर लेखन छोड्कर आतंकवाद के विभिन्न पहलुओं पर शोध आरम्भ कर दिया। उस क्रम में अनेक निष्कर्षों पर पहुँचा और अनेक नये सम्पर्क भी बने। आतंकवाद की इस समस्या के अनेक रूप हैं और उनमें से एक जिहादी आतंकवाद है और इसका सम्बन्ध मध्य पूर्व की राजनीति, क्रुसेड और जिहाद का इतिहास और भारत में इस्लामी साम्राज्य की समाप्ति के बाद अंग्रेजों के समय आरम्भ हुए इस्लामी आन्दोलनों की पृष्ठभूमि में है। परंतु इन विषयों को जानते हुए भी सत्य से भागने की परम्परा हमारे बुद्धिजीवी वर्ग में है।
जिन दिनों मैं आतंकवाद के विषय में जानने के क्रम में अध्ययन कर रहा था और मुख्यधारा की पत्रकारिता के पलायनवादी रूख को अनुभव कर कुछ विकल्प के बारे में सोच रहा था उन्हीं दिनों मेरा परिचय हिन्दी में ब्लागिंग के जनकों में से एक शशि सिंह के साथ सम्पर्क हुआ और उन्होंने ब्लागिंग की विधा से परिचित कराया। अब इस विधा ने समाज पर अपनी गहरी छाप छोडी है और यह मीडिया का सशक्त माध्यम बन चुका है। हिन्दी में ब्लागिंग को आरम्भ करने और लोकप्रिय करने में जिन लोगों ने अपना बहुमूल्य योगदान दिया है मैं उनका हार्दिक धन्यवाद करता हूँ। मैंने उन लोगों के बारे में शशिजी से सुना है। शशिजी अब भी नारद के आरम्भिक प्रयासों के रोचक स्मरण सुनाते हैं। विशेष रूप से जीतेंद्र चौधरी, अनूप शुक्ल, देवाशीष चक्रवर्ती, संजय बेगाणी के प्रयासों का प्रशंसक हूँ। अंत में शशिजी के हिन्दी प्रेम और हिन्दी के लिये उनके प्रयासों के लिये उनका प्रशंसक हुए बिना नहीं रह सका। अपने व्यस्ततम समय से जिस प्रकार वे समय निकाल कर कुछ न कुछ प्रयोग करते रह्ते हैं वह अत्यंत प्रशंसनीय है।

