अतीत और वर्तमान

वर्तमान की काल साधना क्यों अतीत से नाता जोड़े
जितनी ही हो जिद भविश्य की उतना ही मन पीछॆ जाए
हमने सुना यही पुरखों से जीवन का तो लक्ष्य मुक्ति है
पर यह मुक्ति बिना बंधन के प्रात काल की निशा लगे है
ऋषियों मुनियों की धरती पर युगों युगों की काल वेदना
कितने ही झंझावातों को सहकर भी तो चिर नूतन है
लेकिन आज कई प्रश्नों का यह भी उत्तर माँग रही है
इस धरती का यक्ष प्रश्न है अपने ही उन पुत्रों से
जो युगों युगों से इस धरती के यौवन को चमकाते आए
फिर क्यों आज इसी धरती के प्रश्नों से मुँह चुरा रहे हैं
इस धरती का सत्यं एक है
चिर नूतन यौवन यह धरती मुक्ति मार्ग की सखी रही है
इस धरती की नियति यही है फिर अतीत हो या भविश्य हो
जो धरती की काल वेदना ,मुक्ति पर्व और चिर यौवन की अंतर्धारा से विलग हो रहे उन्हें विलग होने दो
पर मुक्ति पर्व का शास्वत उत्सव कभी नहीं रुकने वाला है

वर्तमान की काल साधना क्यों अतीत से नाता जोड़े
जितनी ही हो जिद भविश्य की उतना ही मन पीछॆ जाए
हमने सुना यही पुरखों से जीवन का तो लक्ष्य मुक्ति है
पर यह मुक्ति बिना बंधन के प्रात काल की निशा लगे है
ऋषियों मुनियों की धरती पर युगों युगों की काल वेदना
कितने ही झंझावातों को सहकर भी तो चिर नूतन है
लेकिन आज कई प्रश्नों का यह भी उत्तर माँग रही है
इस धरती का यक्ष प्रश्न है अपने ही उन पुत्रों से
जो युगों युगों से इस धरती के यौवन को चमकाते आए
फिर क्यों आज इसी धरती के प्रश्नों से मुँह चुरा रहे हैं
इस धरती का सत्यं एक है
चिर नूतन यौवन यह धरती मुक्ति मार्ग की सखी रही है
इस धरती की नियति यही है फिर अतीत हो या भविश्य हो
जो धरती की काल वेदना ,मुक्ति पर्व और चिर यौवन की अंतर्धारा से विलग हो रहे उन्हें विलग होने दो
पर मुक्ति पर्व का शास्वत उत्सव कभी नहीं रुकने वाला है

वर्तमान की काल साधना क्यों अतीत से नाता जोड़े
जितनी ही हो जिद भविश्य की उतना ही मन पीछॆ जाए
हमने सुना यही पुरखों से जीवन का तो लक्ष्य मुक्ति है
पर यह मुक्ति बिना बंधन के प्रात काल की निशा लगे है
ऋषियों मुनियों की धरती पर युगों युगों की काल वेदना
कितने ही झंझावातों को सहकर भी तो चिर नूतन है
लेकिन आज कई प्रश्नों का यह भी उत्तर माँग रही है
इस धरती का यक्ष प्रश्न है अपने ही उन पुत्रों से
जो युगों युगों से इस धरती के यौवन को चमकाते आए
फिर क्यों आज इसी धरती के प्रश्नों से मुँह चुरा रहे हैं
इस धरती का सत्यं एक है
चिर नूतन यौवन यह धरती मुक्ति मार्ग की सखी रही है
इस धरती की नियति यही है फिर अतीत हो या भविश्य हो
जो धरती की काल वेदना ,मुक्ति पर्व और चिर यौवन की अंतर्धारा से विलग हो रहे उन्हें विलग होने दो
पर मुक्ति पर्व का शास्वत उत्सव कभी नहीं रुकने वाला है