भारत की वर्तमान चुनौती

भारत के समाज के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सभी अपना विस्तार करना चाहते हैं| जो लोग देश से भारत रहते हैं परन्तु अब भी भारत से जुड़े हैं वे भारत को विश्व पटल पर देखना चाहते हैं, जो चीजों को सभ्यता के में संदर्भ व्याख्यायित करते हैं वे भारत के प्राचीन गौरव को वापस लाना चाहते हैं, जो महानगरों में रहते हैं वे कुलीन वर्ग में शामिल होना चाहते हैं और अभिजात्य वर्ग की यथास्थिति को बदलना चाहते हैं , जो छोटे शहरों में निवास करते हैं वे बड़े शहरों का जीवनस्तर चाहते हैं और गांवों में रहने वाले लोग भी अन्य लोगों की भांति समृद्ध होना चाहते हैं और अपनी पिछली पीढ़ी से अधिक अच्छा जीवन स्तर चाहते हैं|
परिवर्तन की यह चाहत सभी सन्दर्भों में विस्तार चाहती है और विस्तार की यह आकांक्षा जमीनी स्तर पर धीरे धीरे सुलग रही है और लोग सदियों पुरानी सामाजिक, धार्मिक और मानवीय व्यवहार के स्वरूप में परिवर्तन चाहते हैं|परन्तु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विस्तार और अपने लिए बड़े स्थान की अपेक्षा एक दूसरे से लड़ने से नहीं पूरी होगी | सबसे पहले एक होकर हमें अपने विचार में विस्तार और खुलापन लाना होगा , मस्तिष्क को नए विचारों के लिए तैयार करना होगा , इतिहास में जो जैसा है उसे आज भी उसी तरह देखने के स्थान पर और इतिहास का प्रतिशोध वर्तमान में लेने की प्रवृत्ति से पीछा छुड़ाना होगा, इतिहास से प्रेरणा लेकर वर्तमान के सहारे भविश्य की ओर देखना सीखना होगा | इस विचार के साथ विश्व को नए सिरे से देखने पर छह अरब से भी अधिक जनसंख्या वाला यह विश्व हमारे लिए अपरिमित सम्भावानाओं से भरा हुआ दिखेगा | इस विश्व में भारत अपनी जनसंख्या के बल पर दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक, सांस्कृतिक ताकत बन सकता है जो दुनिया में अपने लिए अपना स्थान और विस्तार कर सकता है पर पहली शर्ट है कि हम एक देश के रुप में जीना तो सीखें और ओलंपिक में सर्वाधिक पदक, अन्य खेलों में पदक सहित बड़े सपनों के साथ नए विचार और नए लक्ष्य निर्धारित करें| इस दुनिया में तेजी से कम हो रहे मानव संसाधन की कमी को पूरा करने के लिए विश्व में एक बहुलतावादी और सह अस्तितव की संस्कृति को मज़बूत कराते दिखें और बेरोजगारी की समस्या के समाधान का नया रास्ता तलाश करें|
दुनिया हमसे अपेक्षा रखती है कि हम एक आधुनिक देश के रुप में अपनी भूमिका का निर्वाह करें पर हम खाने की आदत , धार्मिक विविधता पर झगड़ने , और मध्य युग और प्राचीन युग में लौटकर अधिक पवित्र, शुद्ध और धार्मिक होने की जिद के साथ आधुनिकता का यह लक्ष्य नहीं प्राप्त कर सकते | हमारे सामने दो विकल्प हैं, सामने आगे दुनिया के साथ चलते हुए आसमान की ऊँचाई पर अपनी नजर रखना या फिर पीछे मुड़कर मध्य कल और प्राचीन काल में लौटना और अलग थलग और परेशान होना|