ब्राहमणविरोध का पाखण्ड

कोई एक शताब्दी पूर्व तमिलनाडु में जो द्रविडियन आंदोलन ब्राहमनवाद का विरोध कराने के नाम पर आरंभ हुआ था और जिसमें कम्यूनिज्म के सिद्धांत के आधार पर पौराणिक युग से देव और असुर के विभाजन को भी श्रम शक्ति के विभाजन के आधार पर नियत कर वैचारिक पुष्टि दी गयी | उसे एक बार फिर मद्रास के आई आई टी के विवाद के द्वारा हवा देने का प्रयास हो रहा है| हालाँकि यह आंदोलन पेरियार ने ही आरंभ किया था और बाद में तथाकथित अम्बेद्करवादियों ने भी उन्हीं तर्कों के आधार पर हिन्दू धर्म को ब्राह्मणवादीबताया और आज तक यह अभियान चल रहा है पर इस पूरे अभियान में दो तर्क मुझे कभी समझ नहीं आया जिसमें विरोधाभास है| यदि द्रविडियन या अम्बेदकरवादी राम का विरोध इसलिये करते हैं कि उन्हें ब्राह्मणों से नफरत है और उन्हें भी ब्राह्मणवाद का हिस्सा मानते हैं और उनके लिए जन्मना जाति से वैर है तो फिर राम तो जन्म से क्षत्रिय थे फिर उन्हें भारत की संस्कृति का प्रतीक् मानने पर क्यों आपत्ति है ? यदि उन्हें अध्यात्म और ऋषि परम्परा अनुत्पादक लगती है और इसे समाज के अन्य वर्गों के शोषण का जरिया मानते हैं तो फिर रावण के नाना सुमाली ने अपनी पुत्री कैकसी को ऋषि पुल्स्त्यस के पुत्र विश्रवा से गर्भवती होकर पुत्र उत्पन्न कराने क्यों भेजा? इस प्रकार तो रावण न केवल ब्राह्मण कुल का था बल्कि उसने वे सारी आधयात्मिक शक्ति और साधना की जो द्रविडियन या अम्बेदकरवादियों के अनुसार ब्राह्मणवाद का चोचला हैं| रावण संहिता और शिव तांडव स्त्रोत की रचना कराने वाले महान विद्वान ब्राह्मण रावण को सीता का अपहरण करने के अपराध से पूर्व प्रशंशित करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है| लेकिन क्या द्रविडियन या अम्बेद्करवादी अपने इस पाखंड पर अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे कि उन्हें ब्राह्मण से नफरत है या भारत की आध्यात्मिक ऋषि परंपरा से|