बुद्ध की अनुभूति

कुछ वर्ष पहले पुरी जगन्नाथ जी के दर्शन को गया था, वहां से कोणार्क सूर्य मन्दिर होते हुए धौलगिरि की पहाड़ियों पर स्थित महात्मा बुद्ध के स्थान पर दर्शन के लिए गया| बुद्ध की लेटी हुई प्रतिमा के चेहरे पर अलौकिक शान्ति को देखकर उनसे एक ही प्रश्न किया? आख़िर आपके विचार और अनुभूति की प्रेरणा से एक विश्वव्यापी संप्रदाय बन गया, कितने ही राजवंश उसके प्रभाव में आए , आपके साथ इतना वैभव और राजसिक अभियान भी आया फिर आप इतनी परम् शान्ति के साथ लेटे हैं ? उनकी प्रतिमा ने उत्तर में मानो मुझसे कहा, ” जिस दिन निर्भय और निर्लिप्त होने की गहरी अनुभूति व्यक्तित्व का हिस्सा बन जायेगी उस दिन कोई इच्छा नहीं होगी पर तुम्हारे आसपास वह सबकुछ होगा जो तुम्हें नहीं चाहिए और जिससे दूसरे लाभान्वित हो सकते हैं और जब तक भय और लिप्सा होगी तब तक केवल इच्छा होगी और उसे प्राप्त न कर पाने की कुंठा|”

कुछ वर्ष पहले पुरी जगन्नाथ जी के दर्शन को गया था, वहां से कोणार्क सूर्य मन्दिर होते हुए धौलगिरि की पहाड़ियों पर स्थित महात्मा बुद्ध के स्थान पर दर्शन के लिए गया| बुद्ध की लेटी हुई प्रतिमा के चेहरे पर अलौकिक शान्ति को देखकर उनसे एक ही प्रश्न किया? आख़िर आपके विचार और अनुभूति की प्रेरणा से एक विश्वव्यापी संप्रदाय बन गया, कितने ही राजवंश उसके प्रभाव में आए , आपके साथ इतना वैभव और राजसिक अभियान भी आया फिर आप इतनी परम् शान्ति के साथ लेटे हैं ? उनकी प्रतिमा ने उत्तर में मानो मुझसे कहा, ” जिस दिन निर्भय और निर्लिप्त होने की गहरी अनुभूति व्यक्तित्व का हिस्सा बन जायेगी उस दिन कोई इच्छा नहीं होगी पर तुम्हारे आसपास वह सबकुछ होगा जो तुम्हें नहीं चाहिए और जिससे दूसरे लाभान्वित हो सकते हैं और जब तक भय और लिप्सा होगी तब तक केवल इच्छा होगी और उसे प्राप्त न कर पाने की कुंठा|”

कुछ वर्ष पहले पुरी जगन्नाथ जी के दर्शन को गया था, वहां से कोणार्क सूर्य मन्दिर होते हुए धौलगिरि की पहाड़ियों पर स्थित महात्मा बुद्ध के स्थान पर दर्शन के लिए गया| बुद्ध की लेटी हुई प्रतिमा के चेहरे पर अलौकिक शान्ति को देखकर उनसे एक ही प्रश्न किया? आख़िर आपके विचार और अनुभूति की प्रेरणा से एक विश्वव्यापी संप्रदाय बन गया, कितने ही राजवंश उसके प्रभाव में आए , आपके साथ इतना वैभव और राजसिक अभियान भी आया फिर आप इतनी परम् शान्ति के साथ लेटे हैं ? उनकी प्रतिमा ने उत्तर में मानो मुझसे कहा, ” जिस दिन निर्भय और निर्लिप्त होने की गहरी अनुभूति व्यक्तित्व का हिस्सा बन जायेगी उस दिन कोई इच्छा नहीं होगी पर तुम्हारे आसपास वह सबकुछ होगा जो तुम्हें नहीं चाहिए और जिससे दूसरे लाभान्वित हो सकते हैं और जब तक भय और लिप्सा होगी तब तक केवल इच्छा होगी और उसे प्राप्त न कर पाने की कुंठा|”