धर्म की परिभाषा क्या है?

April 11, 2012 · Filed Under आत्मकथात्मक · Comment 

बाल्यकाल से लेकर आजतक यदि किसी विचार ने सर्वाधिक आकर्षित किया है तो यही कि धर्म की परिभाषा क्या है? जब हम शिशु होते हैं तो हमारे लिये धर्म वही होता है जो हमारे अभिभावक हमें बताते हैं। भगवान मुँह टेढा कर देंगे, ऐसा मत करो भगवान देख रहे हैं अर्थात अनुशासन और नैतिकता के आधार के रूप में धर्म की व्याख्या को एक बाल मन जान पाता है। किशोरवय से युवावस्था तक उसके लिये धर्म एक विभेद और टकराव के स्वरूप में सामने आता है जब पहली बार उसे पर्वों, पहनावे, खान पान और रहन सहन में धार्मिक पहचान के आधार पर भेद दिखता है। होली , दीवाली से लेकर ईद , बकरीद और क्रिसमस में उल्लास का विभेद धर्म के आधार पर हमारी पहचान को स्थापित करता है। व्यक्ति जब आत्मनिर्भर होता है तो सभी अर्थों में उसके लिये धर्म एक ऐसी वस्तु बन जाता है कि जब यह विरोधी भावों में समन्वय स्थापित करने की कला के रूप में सामने आता है अर्थात आधुनिक सेक्युलरिज्म कि चलो इस आधार पर समझौता कर लें कि धर्म पर चर्चा से परहेज करेंगे और व्यक्ति के सामाजिक सरोकार का आधार अर्थ सहित अन्य सब कुछ होगा लेकिन धर्म पर जोर नहीं दिया जायेगा। आधुनिक समाज और विश्व इसी सिद्धांत के आधार पर चल रहा है यह कितना सही है कितना गलत यह तो अलग बहस का मुद्दा है लेकिन काम तो चल ही रहा है। Read more

सेक्स क्या है?

April 11, 2012 · Filed Under आत्मकथात्मक · Comment 

सबसे अधिक चर्चा जिन चीजों की होती है उसे यदि देखा जाये तो आम तौर पर दो रहस्य व्यक्ति के जीवन को सर्वाधिक आकर्षित करते रहे हैं। आध्यात्मिकता और सेक्स। इन दोनों को कभी परस्पर विरोधाभाषी माना जाता है तो कभी पूरक लेकिन वास्तविकता क्या है इस बारे में कोई भी दावे से कुछ भी नहीं कह सकता। Read more

When politics leads and society follows?

For last two three days I have been watching the continuous coverage on the induction of few members in BJP who were sacked from the cabinet of BSP government headed by Ms Mayawati. It has become a bigger issue rather than any other in last few days. It would be unfair to be on neutral side on this whole affair which has almost drawn the attention of every one. Simultaneously one other development took place when the anti graft crusader for last one year Anna Hazare and his team seems to be in total disarray as long as their next strategy is concerned. Both of these developments put before us few questions which we need to answer. Read more

वैश्वीकरण और पत्रकारिता

August 30, 2008 · Filed Under आत्मकथात्मक · Comment 

राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के राष्ट्रीय संयोजक श्री के.एन.गोविन्दाचार्य की पहल पर नई दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब में वैश्वीकरण का पत्रकारिता पर प्रभाव व हमारी परम्परा नामक परिसंवाद आयोजित किया गया जो वास्तव में परिसंवाद से अधिक संगोष्ठी होकर रह गया। दिन भर के इस कार्यक्रम में अनेक नामी गिरामी पत्रकारों ने भाग लिया। इनमें प्रसिद्ध पत्रकार और जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी, ई टी वी दिल्ली के प्रमुख एन.के.सिंह, प्रथम प्रवक्ता पत्रिका के संपादक और पूर्व में जनसत्ता से जुडे रहे रामबहादुर राय और जी न्यूज के सलाहकार संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रमुख नाम थे। कार्यक्रम के प्रथम सत्र में प्रभाष जोशी ने उद्घाटन सत्र में पूरे विषय की भाव भूमि रखी और तय हो गया कि वर्तमान परिस्थितियों में पत्रकारिता के मूल्यों से लेकर वैश्वीकरण के बढते प्रभावों के बीच बदलते जीवन मूल्यों और बदलते सामाजिक ताने बाने पर विचार होगा और कमोवेश हुआ भी यही। परंतु इस पूरे लेख में तीन वक्ताओं के इर्द गिर्द पूरे विषय को समेटने का प्रयास होगा और यह प्रयास भी होगा कि उनके विचारों की समीक्षा और समालोचना भी हो सके।

प्रभाष जी ने अपने पूरे सम्बोधन में दो प्रमुख विषयों को स्पर्श किया एक तो यह कि भारत में पत्रकारिता बाजारमूलक हो गयी है और इसका उद्देश्य मुनाफा कमाना हो गया है और अब यह लोकहित से सरोकार रखने के स्थान पर ब्राण्ड निर्माण के कार्य में लिप्त हो गयी है। दूसरा विषय जो वयोवृद्ध पत्रकार ने उठाया वह था सम्पादकों के स्तर में आ रही गिरावट इस सम्बन्ध में उन्होंने स्वाधीनता आन्दोलन का उदाहरण दिया कि किस प्रकार अंग्रेजों के आगे झुकने के स्थान पर स्वदेश में आठ सम्पादकों ने काला पानी की सजा झेलना अधिक पसन्द किया।

कार्यक्रम में दूसरे प्रमुख वक्ता जिन्होंने कुछ समग्रता में विषयों को स्पर्श किया वह थे राम बहादुर राय जिन्होंने पत्रकार से अधिक एक आन्दोलनकारी की भाँति अपने विचार रखे और वर्तमान समस्याओं के मूल में भारतीय संविधान को देखा।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के राष्ट्रीय संयोजक के.एन. गोविन्दाचार्य ने जब अपने विचार रखे तो यह स्पष्ट हो गया कि यह कार्यक्रम उनके देश व्यापी आन्दोलन को एक हिस्सा है जिसके मूल में विचार यह है कि वे अपने विचार को अधिक प्रासंगिक और क्रियाशील कैसे बना सकते हैं? के.एन. गोविन्दाचार्य ने कोई नई बात नहीं रखी और वैश्वीकरण के दुष्प्रभावों वाले कैसेट को फिर से रिप्ले कर दिया फिर भी उन्हें पहली बार सुनने वालों के लिये यह नया था और सार्थक भी था। श्री गोविन्दाचार्य ने कुछ बातें कहीं कि वर्तमान व्यवस्था कुछ देशी और विदेशी शक्तियों के हित साधती है इसलिये इसे बदलना आवश्यक है यह बदलाव सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तीनों स्तर पर होना चाहिये। गोविन्दाचार्य की अधिक मह्त्वपूर्ण बात यह रही कि आने वाली पीढी के सुखद भविष्य को सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ अवश्य करे और क्रियाहीन होकर हारकर न बैठे।

इस आलेख में केवल तीन वक्ताओं की बात इसलिये की गयी है कि इस संगोष्ठी के पीछे का जो चिंतन है वह इन तीन वक्ताओं के विचारों में ही ढूँढा जा सकता है क्योंकि ये तीनों ही एक विचारधारा के लोग हैं, तीनों ही 1977 के जयप्रकाश नारायण आन्दोलन से प्रभावित लोग हैं साथ ही उसके सूत्रधार भी रहे हैं, तीनों के व्यक्तित्व में 1975 के आपातकाल और उसके प्रतिरोध के संस्मरण हैं और कुछ हद तक ये तीनों लोग अब भी उस दौर से बाहर नहीं आ पाये हैं और उसी तर्ज पर एक और समग्र क्रांति की प्रतीक्षा और प्रयास में हैं।

प्रभाष जोशी ने अपने पत्रकारिता जीवन की सबसे बडी उपलब्धि बताई कि अब भी वे अपने ही हाथ से लिखते हैं, उनकी लेखनी में कोई कलम नहीं लगती और एक बार में ही वे लिख जाते हैं और ऐसा सीधा लिखते हैं कि लोग उसे फोटो स्टेट तक कह जाते हैं। यह उपलब्धि कुछ बातों की ओर संकेत करती है इसमें कहीं न कहीं पत्रकारिता में विकसित हो रही नयी तकनीकों का पर व्यंग्य और इन नयी तकनीकों के आत्मसात न होने की जिद है। प्रभाष जी अपनी बातें साहित्यिक अन्दाज में लाक्षणिक अन्दाज में भी कहते हैं और उनका यह विचार उनकी इसी धारा का प्रतिनिधि है। प्रभाष जी के इस वक्तव्य से वैश्वीकरण से पत्रकारिता में आ रहे दो बदलावों की ओर संकेत जाता है एक तो बाजारोन्मुख पत्रकारिता और दूसरा तकनीक प्रधान पत्रकारिता। बाजारोन्मुख पत्रकारिता वैश्वीकरण के पूरे व्याकरण की ओर संकेत करती है जिसमें व्यापक बहस की गुंजायश है कि क्या वैश्वीकरण के चलते मूल्यों में बदलाव आ रहा है। दूसरा बदलाव तकनीक का है। यही दोनों बदलाव पिछले कुछ वर्षों में पूरे समाज में भी देखने को मिल रहे हैं कि मूल्यों में और तकनीक के स्तर पर बदलाव आया है।

अब इसमें प्रश्न यह है कि इन परिस्थितियों में क्या हो सकता है? सहज है कि तकनीक को अपनाया जाये और मूल्यों के बदलाव के कारणों पर विचार हो। अपने पूरे व्याख्यान में प्रभाष जी ने समस्यायें गिनाईं पर अपने स्तर से कोई समाधान नहीं सुझाया।

इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि तीनों ही लोग यानी प्रभाष जी , राम बहादुर राय जी और और गोविन्दाचार्य जी इस पूरी समस्या को एक आर्थिक ईकाई के रूप में ले रहे हैं और समाधान के मूल में व्यवस्थागत परिवर्तन को मानकर चल रहे हैं परंतु इस समस्या के मूल में और समाधान में आस्थागत पक्ष को छोड दिया गया है जो कि वैश्वीकरण से मुक्ति का मंत्र है। वर्तमान सन्दर्भ में आस्था को जिस प्रकार साम्प्रदायिकता से जोडकर उस पर बहस से बचने का प्रयास हो रहा है उससे ही सारी समस्या है।

परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है जो विचार समाज के बदलते स्वरूप के साथ अपने को आत्मसात नहीं करता वही कट्टरपंथी या फण्डामेंटलिस्ट कहा जाता है इसी कारण यदि आज प्रछन्न भोगवादी संस्कृति वैश्वीकरण के मूल में समाज में अपनी पकड बना रही है तो इसके पीछे हमारे द्वारा ही प्रदान की गयी शून्यता है जो हमने तथाकथित सेकुलरिज्म के नाम पर आस्था और धर्म को छोडकर समाज को प्रदान की है। आज कोई भी पत्रकार अपने जीवन में हिन्दू संस्कृति के मूल्यों, परम्पराओं और मान्यताओं के आधार पर आचरण नहीं कर सकता क्योंकि ऐसा करने पर उसे तथाकथित कुलीन बिरादरी का प्रमाणपत्र नहीं मिलेगा और उसके लिये सेकुलर होने का अर्थ धर्मविरोधी होना ही है। यही बात हर बौद्धिक व्यक्ति के सम्बन्ध में भी लागू होती है। अपनी आस्थाओं को छोडकर हमने समाज में एक शून्यता का वातावरण दिया जिसकी पूर्ति आज वैश्वीकरण के विचार और आचरण से हो रही है।

रामबहादुर राय जी ने देश की सभी समस्याओं का कारण भारत के संविधान को बताया परंतु यह भी स्थाई समाधान नहीं है आखिर कौन सा संविधान देश में आयेगा और वह संविधान किस मात्रा में वर्तमान संविधान से भिन्न होगा। क्या आज यह साहस किसी में है कि वह स्वामी विवेकानन्द की भाँति अमेरिका की छाती पर चढकर उसके धर्म की सारहीनता सिद्ध कर सके और उसे बता सके कि वैश्वीकरण का विचार स्वतंत्रता और समानता के भाव का विरोधी है। आज वैश्वीकरण के विरोध के नाम पर नये विचारों और नयी तकनीक से आतंक और पलायन का भाव रखने वाले लोग बडी मात्रा में इस आवाज में शामिल हो रहे हैं जिससे यह पूरा अभियान एक विभ्रम की स्थिति का निर्माण कर रहा है। वैश्वीकरण एक आधुनिक धर्म है जो सेकुलरिज्म के नाम पर नास्तिक और आस्थाहीन होने की प्रवृत्ति का परिणाम है। परंतु आज वैश्वीकरण के नाम पर चल रही बहस को पूरी तरह आर्थिक आधार पर चलाया जा रहा है और इसके समाधान भी आर्थिक और राजनीतिक आधार पर खोजे जा रहे हैं ऐसे में इस पूरे आन्दोलन के एक विचारधारा विरोधी दूसरी विचारधारा हो जाने के अवसर अधिक हैं।

श्री गोविन्दाचार्य जी ने अपने पूरे वक्तव्य में वैश्वीकरण के समाधान के रूप में लोभ, मोह और क्रोध से परे रहने की बात की परंतु यह तो तभी सम्भव है जब जीवन में आस्था और साधना हो और इसके लिये आवश्यक है कि नयी पीढी का जीवन धर्म प्रेरित हो और बहस इस बात पर हो कि समाज के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म का शासन हो और इस क्रम में सेकुलरिज्म की पश्चिमी अवधारणा और धर्म की भारत की परम्परा पर बहस हो। गोविन्द जी की बात से स्पष्ट था कि वे समाज में बढ्ती सामाजिक संवेदनहीनता हो अनुभव कर रहे हैं पर इसका भाव तो तभी आयेगा जब जीवन में धर्म होगा। आज विश्व के सभी प्रयोग असफल हो चुके हैं और वैश्वीकरण विचार के रूप में एक अंतिम पश्चिमी प्रयास है पर हमें याद रखना चाहिये कि इसमें तकनीक भी एक पक्ष है है और मार्केटिंग भी एक तकनीक है और वैश्वीकरण के इस पक्ष को स्वीकार करना चाहिये और इसके विचार से उपजी प्रछन्न भोगवादी संस्कृति को अपने धर्म के शस्त्र से काटना चाहिये।

इस्लामी आतंकवाद से जूझता एक बौद्धिक योद्धा

वर्तमान विश्व में जब हम समस्याओं की बात करते हैं तो सर्वाधिक ध्यान जिस समस्या कि ओर जाता है वह समस्या है आतंकवाद की। वैसे तो इस विश्व में अनेक प्रकार के आतंकवाद हैं परंतु जिस आतंकवाद ने सभी देशों और सभ्यताओं को संकत में डाल रखा हैं वह आतंकवाद है इस्लामी आतंकवाद और इस आतंकवाद ने सभी देशों को अपनी नीतियों में इस प्रकार संशोधन के लिये विवश कर दिया कि इस्लामी आतंकवाद सभी देशों के लिये पहली प्राथमिकता बन गया है।  पिछ्ले दिनों दिल्ली में भारत के एक प्रमुख हिन्दी दैनिक समचार पत्र समूह की ओर से एशिया में उपस्थित अनेक समस्याओं को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह गोष्ठी अंतरराष्ट्रीय इस सन्दर्भ में थी कि इसमें भाग लेने वाले अनेक वक्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर के थे। इस संगोष्ठी में अनेक विषयों के अतिरिक्त धार्मिक आतंकवाद और उससे निपटने के उपायों पर भी चर्चा होनी थी। इस विषय पर लोगों का मार्गदर्शन करने के लिये विशेष रूप से अमेरिका स्थित मिडिल ईस्ट फोरम के निदेशक डा. डैनियल पाइप्स को बुलाया गया था। डा. पाइप्स न केवल अमेरिका में वरन समस्त विश्व में मध्य पूर्व की राजनीति और इस्लामी राजनीति के जानकार माने जाते हैं।  डा. पाइप्स की यह कोई पहली भारत यात्रा नही थी इससे पूर्व वे चार बार भारत आ चुके हैं। इस बार उनकी यात्रा का मह्त्व इस सन्दर्भ में अधिक था कि इससे पूर्व जब भी वे भारत आये विश्व में इस्लामी राजनीति और इस्लामी आतंकवाद उस चरमोत्कर्ष पर नहीं था जहाँ आज वह है।

पाइप्स इस्लामी राजनीति और इस्लामवाद पर पिछ्ले 28 वर्षों से लिख रहे हैं और 1970 के दशक में ईरान में हुई इस्लामी क्रांति के बाद से ही इस्लाम में बढ. रहे कट्टरपंथ की ओर समस्त विश्व और विशेषकर पश्चिम का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। 1980 के दशक से ही पाइप्स अपने लेखों का केन्द्र कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों को बनाते रहे हैं उन्होंने न केवल इस्लामी अतिवाद की बढती प्रव्रत्ति की ओर संकेत किया वरन् प्रत्येक घटना का बारीकी से अध्ययन कर उसमें छुपी जेहादी प्रव्रत्ति को ढूँढ निकाला। हालांकि उनके लेखों को इस्लामीफोबिक कह कर हवा में उडा दिया गया परंतु जब 11 सितम्बर 2001 को वर्ल्ड ट्रएड सेंटर पर आतंकवादी आक्रमण हुआ तो अमेरिका के अनेक अग्रणी समाचार पत्रों ने अपने विश्लेषण में कहा कि यदि डा. डैनियल पाइप्स की बातों को ध्यान से सुना गया होता तो इस आक्रमण को टाला जा सकता था। 11 सितम्बर की घटना के उपरांत डा. पाइप्स को समस्त विश्व में इस्लामी राजनीति के विशेषज्ञ के रूप में लिया जाने लगा और उनकी ओर विश्व एक आशाभरी निगाहों से देखने लगा कि उनके पास इस समस्या का कोई इलाज होगा। इसी क्रम में जब वे इस बार भारत आये तो उनसे मिलने की उत्सुकता भी थी। 

 हिन्दी समाचार पत्र समूह द्वारा आयोजित कार्यक्रम 16 जनवरी को था और डैनियल पाइप्स 15 जनवरी को भारत आ गये थे। लोकमंच को इसकी सूचना थी और इसी कारण लोकमंच के सम्पादक अमिताभ त्रिपाठी और कर्यकारी सम्पादक शशि कुमार सिंह दो अन्य सदस्यों रघुनाथ शरण पाठक और मनीष के साथ डा. पाइप्स से मिलने दिल्ली स्थित ताज पैलेस होटल पहुँचे जहाँ डा. पाइप्स ठहरे थे। करीब 45 मिनट की इस भेंट में अनेक विषयों पर चर्चा हुई। सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय यह रहा कि उन्होंने जब इस्लाम की राजनीति की चर्चा समस्त विश्व के सन्दर्भ में की तो उनके मूल में वही विषय सामने आये जो भारत में हैं अर्थात समस्या की ओर से आंख मूँदकर मुस्लिम तुष्टीकरण में लिप्त हो जाना। यह जानकर अत्यंत आश्चर्य हुआ कि समस्त विश्व में इस्लामी राजनीति एक ही परिपाटी पर चल रही है और इस्लामी आतंकवाद से निपटने के सम्बन्ध में भी एक ही जैसा प्रयास है।  डा. पाइप्स ने जब पश्चिम के नजरिये के सम्बन्ध में बात की तो ऐसा लगा मानों वे हमारे देश की बात कर रहे हों। उन्होंने बताया कि पश्चिम में भी इस्लामी अतिवाद का कारण वामपंथियों कि नजर में इस्लाम के साथ हुआ अन्याय है और इसके समाधान के रूप में मुसलमानों को अधिक से अधिक विशेषाधिकार दिये जाने की आवश्यकता है। पश्चिम के देशों में भी मुसलमान शरियत के आधार पर संचालित होते हैं और अधिक से अधिक बच्चे पैदाकर भूजनांकिकी का संतुलन बिगाड.रहे हैं।

डा. पाइप्स केवल समस्याओं का ही उल्लेख नहीं करते वरन समाधान भी सुझाते हैं। डा. पाइप्स का मानना है कि समस्या समस्त इस्लाम धर्म नहीं है वरन इस्लाम धर्म का राजनीतिक उपयोग है। उनके  अनुसार जब तक इस्लाम 1200 वर्षों तक विजय पथ पर अग्रसर होता रहा तब तक उसके अनुयायी प्रसन्न रहे परंतु जब यूरोप ने तरक्की कर ली और इस्लाम पीछे रह गया और उसे पता लगा कि वह पीछे रह गया है तो उसमें कट्टरता का समावेश हो गया और जब भी इस्लाम पिछ्ड.ता है तो उसमें जेहादी तत्वों का प्राधान्य हो जाता है। डा. पाइप्स के अनुसार विश्व में कुल मिलाकर तीन खतरनाक विचारधारायें हैं वामपंथी, फासिस्ट और इस्लामवादी। इन तीनों ही विचारधाराओं के मुकाबले के लिये सभ्य विश्व को पहल करनी होगी।  डा. पाइप्स के विचारों में सर्वाधिक संतोष प्रदान करने वाला जो तथ्य है वह यह है कि जब वे सभ्य विश्व की बात करते हैं तो उनमें बीसवीं शताब्दी की पश्चिम की सभ्य विश्व की अवधारणा नहीं है जिसमें सभ्य का अर्थ केवल ईसाई देशों से था। डा. पाइप्स जब सभ्य विश्व की बात करते हैं तो उनकी नजर में भारत की भी एक भूमिका है।

डा. पाइप्स इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि नरमपंथी इस्लाम के विकास की सम्भावनायें हैं और उसी नेतृत्व के विकास पर जोर दिया जाना चाहिये। उनके अनुसार इस्लामी आतंकवाद ने सर्वाधिक नुकसान मुसलमानों को ही पहुँचाया है. इस कारण एक बार नरमपंथी इस्लाम के विकास की प्रक्रिया आरम्भ हुई तो इसमें मुसलमानों का भी सहयोग मिलेगा।डा. पाइप्स पिछ्ले कुछ वर्षों से अपने लेखों का अनुवाद विश्व की विभिन्न भाषाओं में करा रहे हैं और इसी क्रम में उनके कार्य का हिन्दी अनुवाद भी हो रहा है और यह कार्य लोकमंच के द्वारा किया जा रहा है। डा. डैनियल पाइप्स लोकमंच के सलाह्कार भी हैं। उन्होंने लोकमंच के प्रतिनिधियों से भेंट में लोकमंच का हर प्रकार से हरसम्भव सहयोग का आश्वाशन दिया है। डा. पाइप्स ने लोकमन्च के प्रतिनिधियों के साथ भेंट में भारत के सम्बन्ध में विभिन्न जानकारियों में विशेष रुचि दिखायी और माना कि विश्व के इस भाग के सम्बन्ध में उनका ज्ञान अल्प है, परंतु यह अवश्य कहा कि अब वे जल्दी जल्दी भारत की यात्रा करेंगे और अपना सन्देश आम जनता तक ले जाने का प्रयास करेंगे।

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