पहल
इधर काफी दिनों से ब्लाग की दुनिया से गायब रहा और लम्बे समय से कोई लेख भी नहीं लिख सका. इसके कई कारण रहे परन्तु उनमें से एक यह भी था कि तकनीकी कमियों के कारण नारद के कुछ दिन तक काम न करने के कारण लेख पर टिप्पणियाँ प्राप्त नहीं होती थीं इस कारण अधिक उत्साह भी नहीं रहता था. इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मैं टिप्पणियों के लोभ में लिखता हूँ परन्तु उससे द्विपक्षीय वार्तलाप होता है और हमें पता चलता रहता है कि हमारे विचार किस स्तर के हैं और उनमें सुधार की कितनी सम्भावनायें हैं.
ब्लाग की दुनिया से मेरा सर्वप्रथम परिचय मेरे मित्र भाई शशि कुमार सिंह ने कराया और उसके उपरान्त मुझे इसमें आनन्द आने लगा. आरम्भिक दौर में स्वान्त: सुखाय ही यह करता रहा, परन्तु कुछ ही महीनों में भाई शशि के साथ बातचीत में विचार आया कि यूनीकोड की इस सुविधा को क्यों न एक वरदान के रूप में प्रयोग किया जाये. वास्तव में तो इण्टरनेट पश्चिमी आविष्कार है और यह वैश्वीकरण में अन्तर्निहित बाजारमूलक शक्तियों का प्रचार का सबसे बड़ा हथियार है फिर भी हमें भूलना नहीं चाहिये कि अपने शासन को भारत में शाश्वत बनाने के लिये लार्ड मैकाले द्वारा थोपी गई अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने ही राजा राममोहन राय, अरविन्द घोष, स्वामी विवेकानन्द और सुभाषचन्द्र बोष जैसे यशस्वी देश भक्तों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया जिन्होंने सामयिक साम्राज्यवादी शक्तियों को उनकी ही भाषा में ही न केवल उत्तर दिया वरन् हिन्दू पुनर्जागरण की पताका फहराकर हिन्दुत्व की पुनर्स्थापना की.
आज एक बार फिर सेमेटिक धर्मों से प्रेरित शक्तियाँ जेहाद और वैश्वीकरण के स्वरूप में विश्व की विविधता नष्ट कर उसका एकसमानीकरण करना चाहती हैं, इस प्रकृति विरोधी एकसमानीकरण प्रवृत्ति का उत्तर क्या हो सकता है तो भारत की विविधतावादी संस्कृति. विविधतावादी इसलिये नहीं कि यहाँ भारतवंशी धर्मों की स्वीकार्यता है वरन् विविधतावादी इसलिये कि इस संस्कृति में चर-अचर जगत को परमात्मा की अभिव्यक्ति मानकर कण-कण में एक ही आत्मा के दर्शन किये जाते हैं, इसी कारण जो हमारी उपासना पद्धति से मोक्ष प्राप्त नहीं करना चाहता उसके भी व्यक्तित्व का सम्मान होता है, उसे भी जीने का पूरा अधिकार होता है क्योंकि उसके भीतर भी वही प्रकाश है जो हमारे अन्दर है.
दुर्भाग्यवश एक ओर बन्दूक के जोर से तो दूसरी ओर बाजारमूलक शक्तियों के जोर से विश्व को एकसमान बनाने का प्रयास हो रहा है. जेहाद जहाँ लोगों को भयभीत कर उनकी आस्था को डाँवाडोल कर रहा है तो बाजारी शक्तियाँ हमारी भाषा, संस्कार और मूल्यों को नष्ट करने पर आमादा हैं. मुनाफे को परम लक्ष्य मानकर, शारीरिक सुख को सबसे बड़ा सुख मानकर तथा सफलता को अच्छाई पर प्राथमिकता देकर एक नई संस्क़ति का सृजन किया जा रहा है जहाँ आत्मीयता, प्रेम, संस्कार और मूल्य पैसे या मुनाफे के तराजू में तोले जा रहे हैं. मैंने आप लोगों के समक्ष कोई नई बात नहीं बताई है, मैं नया केवल इतना बताने जा रहा हूँ कि हमने इस वैश्वीकरण की आँधी को रोकने का मार्ग निकाल लिया है और उस दिशा में पहल भी आरम्भ कर दी है. वैश्वीकरण और जिहाद की यह आँधी रोकने का एकमेव मार्ग है अपना आधार पुष्ट किया जाये. अधिक से अधिक लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिये लोकशिक्षण से जन-जागरण की तकनीक अपनाई जाये.
जैसा कि मैंने आरम्भ में कुछ महापुरूषों का नाम लिया था उसी प्रकार हम इण्टरनेट की तकनीक के सहारे अपनी भाषा और संस्कृति को भ्रष्ट होने से बचा सकते हैं. बाजारमूलक शक्तियाँ एक विचित्र प्रकार की भाषा का समावेश पत्रकारिता में कर रही हैं. वे उत्तेजना और कण्डोम संस्कृति को प्रोत्साहन देकर अपनी पत्र, पत्रिकाओं , इलेक्ट्रानिक माध्यमों और फिल्मों के लिये बाजार बनाना चाहती हैं. इस विचार को रोकने का सशक्त माध्यम भाषाई समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा स्वप्रेरित भाव से साहित्य सृजन या रचनात्मक कार्य में लगे लोगों को प्रोत्साहित करते हुये उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर एक संगठित स्वरूप देना है.
हमने इस दिशा में एक सार्थक पहल 11व 12 नवम्बर 2006 को नई दिल्ली स्थित संकटमोचन आश्रम रामकृष्णपुरम् से-6 में की जब भाषाई समाचार पत्रों के देश भर के 85 सम्पादक एक मंच पर एकत्र आये और दो दिन तक देश के ज्वलन्त विषयों पर परस्पर विचार-विनमय हुआ तथा राष्ट्रीय सन्दर्भ में भाषाई समाचार पत्रों का आकलन किया गया. इस कार्यक्रम में लिट्टी चोखा वाले भाई शशि कुमार सिंह का बड़ा सहयोग रहा, इसके साथ ही जागरण डाट काम के समाचार सम्पादक अर्जुन देशप्रेमी ने अपने सम्बोधन में जिस प्रकार नई तकनीक को व्यावहारिक भाषा में समझाकर उसके उपयोग को अत्यन्त सरल सिद्ध कर दिया उससे प्रतिभागियों का उत्साह सातवें आसमान पर था.
यह पहल अब रूकने वाली नहीं है इस कल्पना को साकार स्वरूप देने के लिये हर उस व्यक्ति से सहयोग अपेक्षित है जो अपनी अगली पीढ़ी को संस्कार, भाषा, मूल्य और धर्म की वही विरासत देना चाहता है जिसमें हम पले-बढ़े हैं. बाजारमूलक शक्तियाँ भारत के प्रचार माध्यम पर अपनी पूँजी का शिकंजा कस कर उसे मुनाफे का बाजार बनाना चाहती हैं जहाँ सेक्स, उत्तेजना, कामुकता, यौनसुख को चर्चा का विषय माना जायेगा. क्रिकेट, फिल्म देश की अभिव्यक्ति मानी जायेगी. किसानों की आत्महत्या, मजदूर की पसीने की कमाई, संयुक्त परिवार का संस्कार न तो देखने को मिलेगा और न सुनने को .
इससे पहले कि वैश्वीकरण की आँधी हमारी साहित्यिक और रचनात्मक सोच को भ्रष्ट कर हमें बाजारमूलक बना दे हमें समय रहते चेत कर अपनी बिखरी हुई शक्ति को सहेजना होगा. भाषाई समाचार पत्रों, आंचलिक रचनाधर्मियों, साहित्यकारों को एकत्र लाना होगा ताकि अपनी संस्कृति को परिवार से बाजार बनने से रोका जा सके.
अपने भानू जी
कभी-कभी कुछ लोग हमारे मध्य रहते हैं तो हम उनसे इतने अधिक आत्मसात् हो जाते हैं कि उनके बिछुड़ने मात्र की कल्पना से हम सिहर उठते हैं और यदि ऐसा बिछोह हो भी जाता है तो मन को मनाते हैं कि वे हमारे मध्य पुन: किसी न किसी स्वरूप में वापस आयेंगे. ऐसा ही हिन्दी के ख्यातिलब्ध पत्रकार स्व. भानुप्रताप शुक्ल के पाठकों, प्रशंसकों और आत्मीयजनों के साथ हुआ. पिछले 17 अगस्त को लम्बी बीमारी के बाद अन्तिम श्वांस लेने वाले श्री भानु जी अपने पीछे कितनी समृद्ध विरासत छोड़ गये हैं इसका आभास कल उनकी श्रद्धाजलि सभा को देखकर हुआ. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लगभग हजार लोगों की क्षमता वाले साईं आडीटोरियम का खचाखच भरा सभाकक्ष इस बात की पुष्टि कर रहा था कि अपने पाठकों, प्रशंसकों और आत्मीय जनों के मध्य भानू जी के नाम से लोकप्रिय स्व. भानुप्रताप शुक्ल ने अपनी वैचारिक साधना और तपस्वी जीवन से लोगों के ह्रदय में कितनी गहरी पैठ बना रखी थी. जीवन के आरम्भिक वर्षों में माँ और पिता के स्नेह से वंचित रहे भानू जी ने अपने जीवन की इस रिक्तता को अपने जीवन का एक मिशन भी बनाया और जैसा कि वात्सल्य ग्राम की संचालिका साध्वी ऋतम्भरा जी ने कहा कि वे इस प्रकल्प के मानस शिल्पी थे और ऋतम्भरा जी में उन्होंने अपनी माँ के दर्शन किये और उन्हें दीदी माँ नाम दिया. भानू जी के व्यक्तित्व के इस पक्ष से स्पष्ट होता है कि उन्होंने कितनी संवेदनशीलता से अपने जीवन को पढ़ा था और जीवन को समष्टि में और समष्टि को अपने जीवन में एकाकार किया था. जीवन के आरम्भिक दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ सम्पर्क में आये भानू जी को श्रीगुरूजी और पं.दीन दयाल उपाध्याय को निकट से देखने और उनका सान्निध्य प्राप्त करने का अवसर मिला था. उन दोनों ही महापुरूषों के व्यक्तित्व का प्रभाव उनके जीवन पर था. इसी कारण हिन्दुत्व की विचारधारा के प्रति अटूट निष्ठा और आग्रह होने के बाद भी वैचारिक मत भिन्नता वाले व्यक्तियों के साथ भी उनके व्यक्तिगत सम्बन्ध थे और इसका प्रमाण उनकी श्रद्धांजलि सभा में भी देखने को मिला जब श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के शिल्पियों के साथ इस आन्दोलन के खलनायक मुलायम सिंह यादव भी मंचासीन रहे. भानू जी की यह विशेषता हिन्दुत्व की उसी भावना के अनुरूप थी जिसमें समस्त जड़ चेतन में एक ही परमात्मा की अनुभूति की जाती है जो विविध स्वरूपों में स्वयं को प्रकट करता है. हिन्दू संस्कृति की बिशेषता के अनुरूप उनका ह्रदय विशाल था परन्तु विचारधारा और संस्कृति के प्रति उनका आग्रह इतना आस्थावान था कि उसमें समझौता करने के बारे में वे सोच भी नहीं सकते थे. अपनी लेखनी के माध्यम से उन्होंने जिन युवाओं को हिन्दुत्व विचारधारा के प्रति प्रवृत्त किया उनमें मैं भी एक था. हालांकि साहित्यकार और घोर हिन्दूवादी पिता की सन्तान होने के कारण लेखन और विचारधारा मुझे विरासत में मिली परन्तु अपनी विचारधारा का सशक्त प्रकटीकरण और छवि की चिन्ता किये बिना सत्य को स्थापित करने का साहस मुझे भानू जी से ही मिला. श्रीराम मन्दिर आन्दोलन के पूर्व जब देश का बौद्धिक वर्ग स्वयं को सेकुलर खेमे में रखने के लिये अपनी संस्कृति, परम्परा, गौरव और इतिहास को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ता था, तब भानू जी ने हिन्दुत्व को बौद्धिक आन्दोलन बनाया और उसे वृहद आयाम प्रदान किया. आज भी हमारे देश का बौद्धिक वर्ग छवि निर्माण के रोग से ग्रस्त है. इस रोग के कारण सत्य का अनुभव करते हुये भी उसे न बोलने की बौद्धिक बेईमानी हमारे अन्दर घर कर गई है. हम हिन्दुत्व की बात तो करना चाहते हैं परन्तु जाने-अनजाने मुस्लिम विर
धी होने की छवि से भयाक्रान्त हो जाते हैं. इसी भय का निवारण कर लेखन धर्म को सर्वोपरि रखा भानू जी ने. उनका तर्क था बौद्धिक विपन्नता और कायरता राष्ट्र को नष्ट कर देती है. इसका शिकार हम हजारों वर्षों से होते आये हैं फिर भी हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई के भुलावे में जी रहे है. श्रद्धाजलि सभा में बैठकर मुझे अपने चिट्ठों पर आई कुछ टिप्पणियाँ स्मरण हो रही थीं जिनमें मुझे सलाह दी गई थी कि हिन्दू चेतना का प्रसार तो करूँ पर मुस्लिम विरोधी न बन जाऊँ. यह बात कुछ हजम होने लायक नहीं है. हमारे देश में ऐसे बहुत से उदारवादी हैं जो मुसलमानों को खुश करने के लिये संस्कृति, परम्परा, इतिहास, अतीत सब कुछ छोड़कर केवल भाई चारे की बात करना चाहते हैं पर भाई चारा कैसे सम्भव है जब हम एक को भाई मानते हैं और अगला हमें चारा समझता हो. आखिर संस्कृति की बात होगी तो इतिहास का उल्लेख होगा, इतिहास का उल्लेख होगा तो हिन्दुओं पर हुये मुस्लिम अत्याचारी शासकों की बात आयेगी. बात शिवाजी और महाराणा प्रताप की आयेगी. इतिहास के आधार पर कल के मुसलमानों और आज के मुसलमानों और आज के मुसलमानों की तुलना होगी. तुलना तो ऐतिहासिक अनुभव और परिप्रेक्ष्य में होगी. जिन प्रश्नों और विषयों पर इतिहास में हिन्दू मुस्लिम संघर्ष हुये यदि वे आज भी उसी स्वरूप में हैं तो इसका अर्थ है कि सांस्कृतिक संघर्ष अपनी पुरानी स्थिति पर टिका है. ऐसे में यदि हिन्दुओं से आग्रह होता है कि वे पुरानी बात छोड़कर विकास की बात करें, भाईचारे की बात करें तो साफ अर्थ है कि हिन्दू अपना सब कुछ त्याग दें और भाई चारा कायम करें. आज विदेशी आक्रान्ता बाबर के ढाँचे से मुसलमानों को अगाध श्रद्धा है उनके लिये इसका ढहना उनके धर्म पर आघात है. एक विदेशी आक्रान्ता किसी राष्ट्र की जनता का श्रद्धापात्र कैसे बन सकता है. आज यदि ओसामा बिन लादेन अमेरिका पर हमला कर स्टेच्यू आफ लिबर्टी को ध्वस्त कर वहाँ अपने नाम की मस्जिद बना ले तो अमेरिकी जनता उसे स्वीकार करेगी नहीं सदियों तक उसके लिये संघर्ष करेगी और अवसर मिलने पर ओसामा मस्जिद गिरा देगी, अब यदि अमेरिका का मुसलमान चिल्लाये कि हमारे मजहब का प्रतीक गिरा दिया गया तो साथी अमेरिकी इन मुसलमानों के बारे में क्या सोचेंगे. यही बात भारत के मुसलमानों पर लागू होती है. 1937 में वन्देमातरम् का विरोध हुआ और 10 साल बाद पाकिस्तान बन गया कितने मुसलमान आगे आये जिन्ना की जिद रोकने. गाँधी जी ने क्या नहीं किया मुसलमानों को साथ रखने के लिये हिन्दुओं से हँसते-हँसते मर जाने तक कहा लेकिन क्या गाँधी मुस्लिम हठधर्मिता को रोक पाये. इसलिये देश के समक्ष उत्पन्न खतरों का उल्लेख जो नफा-नुकसान या छवि बचाकर करते हैं वे सत्य बोलने का या तो साहस नहीं रखते या फिर खतरों की गम्भीरता और उसके वास्तविक कारणों से अनभिज्ञ रहते हैं. इस देश का भला हिन्दुओं के जाग्रत होने से ही होगा और इस जागरण के क्रम में यदि मुस्लिम विरोध होता है तो उसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये , क्योंकि यह समस्या हमारी नहीं है. हिन्दुओं ने सदैव मुसलमानों से मित्रता ही चाही है उन्होंने ही मानवता को काफिर और मोमिन में बाँटा है.
ह्रषीकेश दा
किसी भी व्यक्ति के सामाजिक योगदान की समीक्षा इस आधार पर होती है कि उसके जीवनकाल से अधिक उसकी मृत्यु के बाद उसे समाज किस रूप में याद रखता है. इस कसौटी पर यदि प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ह्रषीकेश दा को परखें तो हम पाते हैं कि उनकी मृत्यु के साथ ही हिन्दी सिनेमा के एक ऐसे युग का अन्त हो गया है जिसमें फिल्में समाज के साथ जुड़कर आम दर्शक को उसके पात्रों के साथ आत्मसात् होने का अवसर प्रदान करती थीं. ह्रषीकेश दा की फिल्में गम्भीर मनोवैज्ञानिक चित्रण से लेकर गुदगुदाने वाले सजीव चित्रण तक विस्तृत थीं. जिन भी दर्शकों ने अनुपमा फिल्म देखी होगी उन्हें अनुपमा और उसके पिता के मानसिक द्वन्द्व की यादें सदैव मस्तिष्क में ताजा रहेगी. इसी प्रकार अभिमान फिल्म के नायक के माध्यम से उन्होंने जिस प्रकार पुरूष प्रधान मानसिकता वाले कुण्ठित पति का जो स्वरूप लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया था वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है . इसी प्रकार आनन्द के बाबू मोशाय को भुला पाना किसी के लिये सम्भव हो पायेगा क्या. इसके साथ ही चुपके-चुपके फिल्म में ह्रषीकेश दा ने जिस सुन्दरता से हास्य व्यंग्य को प्रस्तुत किया वह उनकी बहुआयामी प्रतिभा और निर्देशन की कुशलता को प्रस्तुत करता है जब उन्होंने अपने समय के एक्शन हीरो को विनोदपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया. बावर्ची के राजेश खन्ना के माध्यम से दिया गया उनका सन्देश आज कहीं अधिक प्रासंगिक है जब व्यक्ति व्यावसायिक स्पर्धा में इस कदर लिप्त हो चुका है कि उसे खुलकर हंसना भी नहीं भाता. लम्बे अन्तराल के उपरान्त जब ह्रषीकेश दा ने झूठ बोले कौवा काटे फिल्म बनाई तो उन्होंने दिखा दिया कि समय के साथ मनोरंजन के सिद्धान्तों में अन्तर नहीं आता और उनकी इस कला से उन निर्देशकों को शिक्षा लेनी चाहिये जो आज मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता, नग्नता और द्विअर्थी संवादों का सहारा लेते हैं. ह्रषीकेश दा के निधन के बाद अब ऐसी फिल्में दुर्लभ हो जायेंगी जहाँ दर्शक फिल्म को स्वयं के साथ जोड़कर ओर स्वयं को फिल्म के साथ जोड़कर देख सकेगा. ह्रषीकेश की आनन्द का नायक सामान्य व्यक्ति लगता था जो समुद्र के किनारे हाथ में गुब्बारों के साथ जब गाता था कहीं दूर पर जब दिन ढल जाये तो फिल्म देखने वाला सामान्य व्यक्ति नायक को अपनी पहुँच में पाता था, परन्तु आज जब कल हो न हो का नायक न्यूयार्क की सड़कों पर या डिस्को थेक में इट्स टाइम टू डिस्को गाता है तो यहीं फिल्मों के साथ जनता से जुड़ने की और जनता पर फिल्म थोपने की मानसिकता का अन्तर स्पष्ट हो जाता है. ह्रषीकेश दा का यही योगदान समाज को है कि फिल्म निर्माण व्यवसाय नहीं सामाजिक दायित्व है परन्तु आज के निर्देशकों में इसी भावना का अभाव है. वे कहानी से लेकर जीवन शैली और पात्र से लेकर संवाद तक सब कुछ दर्शकों के मस्तिष्क में जबरन ठूँसना चाहते हैं.

