Spiritual politics?
When we talk about politics often we misread the minds of people and start it from more secular ways and presume that electoral consolidation can be happen only by social welfare and economy but it is not always the truth. In India the method of spiritual politics has never been adopted. When we talk about spirituality is politics it is neither communal nor centric to any particular group. As in social and economic definitions we use the term unorganized labor we tend to define things in pure economic ways but in spiritual definition it can be seen that human resource is being guided with psychological and emotional domain rather than pure physical ways. Read more
भारत में उथल पुथल पर कुछ सुझाव
भारतीय राजनीति का भविष्य
जब हम भारतीय राजनीति की बात करते हैं तो हम इसे आम तौर पर देश की स्वतन्त्रता के पश्चात से देखने का आरम्भ करते हैं और शायद आज के संदर्भ में यही प्रासंगिक भी है । इस आधार पर यदि हम अगले दशक की भारतीय राजनीति के स्वरूप का आकलन करने का प्रयास करें तो हमें भारत की राजनीति के प्रमुख घटकों और राजनीति और समाज में उनके स्थान पर भी चर्चा करनी होगी। Read more
What Fails team Anna?
Is it the right way to define the strength in democracy in the form of numbers and crowd only? This was the one potent question which arises in my mind when this leg of the movement of team Anna was almost declared as flop show because of the poor showing of people in MMRDA ground in Mumbai and at Ramlia Maidan in Delhi. In my opinion it is dangerous argument in any democracy as it is loaded with possibility of setting aside thoughts, suggestions on the cast of numbers and crowds but this theory does not apply to team Anna as they were relying heavily on crowds and in an debate in Kolkata with Times Now Arvind kejariwal categorically stated that any group who can mobilize 50,000 plus crowd can force government to bend on backward to negotiate with that group. Read more
भाजपा क्यो हैं भ्रम में?
यह लेख जब मैं लिख रहा हूँ तो कोई भी मुझसे यह प्रश्न अत्यंत सहजता से कर सकता है कि क्या मैं भाजपा के राजनीतिक स्वास्थ्य की कामना करते हुए स्वयं को निष्पक्ष मान सकता हूँ तो निश्चय ही कोई तटस्थ हुये बिना भी निष्पक्ष हो सकता है। बौद्धिक वर्ग में तटस्थता जैसी कोई वस्तु नहीं होती क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी विचार का पोषण अवश्य करता है और बौद्धिक व्यक्ति का दायित्व यह होता है कि वह निष्पक्ष होकर अपने पक्ष रखे। इसी धर्म का पालन करते हुए वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा की राजनीतिक दशा और दिशा की समीक्षा करने का प्रयास इस लेख में कर रहा हूँ। Read more
देश की सेक्युलर राजनीति के पुनर्मूल्याँकन का समय ?
पिछले वर्ष देश में हुए आम चुनावों के बाद से सामान्य तौर पर एक नारा देश की सेक्युलर शक्तियाँ लगा रही हैं कि अब भारत बदल गया है और लोग विकास चाहते हैं और पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति से तंग आ चुके हैं। यह बाद कहते समय जो बात इन तत्वों के ध्यान में रहती है वह यह कि अब विश्व में वैश्वीकरण का युग है और विश्व में एक क्षेत्र को दूसरे से पूरी तरह अलग थलग नहीं रखा जा सकता। ऐसे में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है कि जो कुछ रुझान समस्त विश्व मे हमें देखने को मिल रहा है उस पृष्ठभूमि में ही यदि भारत की राजनीति को समझने का प्रयास किया जाये तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सम्मुख हमारे उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर हमें देना ही होगा। इन प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि सेक्युलर परिभाषा और राजनीति का स्वरूप क्या होना चाहिये? इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार यूपीए सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में और फिर अपने दूसरे कार्यकाल में अभी तक पूरी तरह पश्चिम की शक्तियों के प्रभाव में अपनी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति को क्रियांवित करने का प्रयास किया है ठीक उसके विपरीत आतंकवाद और इस्लाम व मुस्लिम जनता के साथ सम्बन्धों को परिभाषित करने में इस माड्ल को अपनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। Read more

