हिन्दू आतंकवाद के मिथक का पर्दाफाश

बी शांतनु
हिन्दी अनुवाद- अमिताभ त्रिपाठी
http://satyameva-jayate.org/2010/07/19/myth-of-hindutva-terror/

आज कल एक नया भूत सामने लाया गया है और वह है हिन्दुत्व आतंकवाद ( उर्फ हिन्दू आतंकवाद)। सम्भव है यह शब्द आपने पहले भी सुना हो , सम्भव है कि आपको इस पर क्रोध आया हो लेकिन आप क्रोधित होकर अपने कार्य में लग गये होंगे। सम्भव है कि आपने यह सोचने का प्रयास भी नहीं किया होगा कि यह हिन्दुत्व आतंकवाद है क्या? अभी कुछ दिन पूर्व मैं कुछ लोगों के मध्य था और जब उन्होंने यह शब्द सुना तो वे क्रुद्ध हो गये शायद इससे भी अधिक क्रुद्ध हों लेकिन वे अपने कार्य में लग जायेंगे।
अभी पिछले सप्ताह एक जागरूक पाठक ने आउटलुक की हिन्दू आतंकवाद सम्बन्धी आवरण कथा की ओर मेरा ध्यान दिलाया। इस कहानी को लेकर अपनी जल्दबाजी की संक्षिप्त प्रतिक्रिया में मैने लिखा, “ इस लेख को भयंकर ढंग से हिन्दू आतंक का शीर्षक दिया गया है परंतु यह नहीं बताया गया है कि यह हिन्दू सिद्धांतों और हिन्दू परम्पराओ से किस प्रकार प्रेरित है। इसी प्रकार कुछ स्थानों पर हिन्दुत्व का भी सन्दर्भ लिया गया है परंतु इसके प्रयास नहीं हुए हैं कि हिन्दुत्व से उनका आशय क्या है और लेखक के अनुसार इसका अर्थ क्या है? “ लेकिन इसके उपरांत मैंने इस कहानी को फिर से पढा और मुझे पता लगा कि इसे बिकाऊ बनाने के लिये सनसनीखेज बनाया गया है। लेकिन इस लेख में इसके तथ्यों पर चर्चा की जायेगी।

यदि हम आउटलुक की कहानी पर लौटें हालाँकि न तो इस विषय पर यह पहली कथा है और न ही अंतिम होगी लेकिन इस कथा की समाप्ति इस कथन के साथ हुई कि जब सीबीआई सारे बिखरे हुए सूत्रों को एकसाथ जोडेगी तभी हिन्दुत्व आतंकवाद का समग्र चित्र सामने आ सकेगा। 2000 शब्दों के इस लेख को स्मृति कोप्पिकर, देबर्षि दासगुप्त और स्निग्धा हसन ने सहयोग दिया है “ हिन्दू आतंकवाद एक वास्तविकता है फिर भी भारत इस वास्तविकता को नाम नहीं देना चाहता”।

यह कथा मई में प्रवीन स्वामी के आउटलुक के ही लेख “ The Rise of Hindutva Terror” | पहले लेख की समीक्षा करना अधिक उचित होगा। प्रवीन स्वामी की यह रिपोर्ट आन्ध्र प्रदेश में हैदराबाद मे मक्का मस्जिद पर आक्रमण के सिलसिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक देवेन्द्र गुप्ता को उनके राजनीतिक सहयोगियों विष्णु प्रसाद और चन्द्रशेखर पाटीदार के साथ इस आक्रमण के लिये योजना बनाने के सन्देह में पकड्ने पर आधारित थी। Read more

हिन्दू आतंकवाद का मिथक

देश में इन दिनों आतंकवाद पर चर्चा जारी तो है पर इसका स्वरूप और परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। आज आतंकवाद को हिन्दुत्व और हिन्दू के साथ जोडकर प्रस्तुत किया जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से इस तरह के समाचार समाचार पत्रों और टीवी मीडिया में आये हैं कि देश में अनेक मस्जिदों और मुस्लिम क्षेत्रों में हुए आक्रमणों में कुछ हिन्दू तत्वों का हाथ रहा है। इन समाचारों को आधार बनाकर और कुछ छुटपुट पुरानी घटनाओं जैसे बम बनाने के प्रयास आदि को मिलाकर कुछ प्रमुख पत्रिकाओं ने हिन्दुत्व आतंकवाद, हिन्दू आतंकवाद , भगवा आतंकवाद जैसे मिथक और अवधारणायें चलाने का अभियान चलाया है।
विशेष रूप से आउटलुक पत्रिका के ऐसे कुछ लेखों में बतायी गयी घटनाओं की तकनीकी व्याख्या और समीक्षा भी आगे के आलेख में की जायेगी परंतु यहाँ हिन्दू आतंकवाद की परिभाषा और उससे जुडे मिथक के राजनीतिक और विचारधारागत पहलू पर चर्चा की जायेगी।

हिन्दू आतंकवाद की इस परिभाषा और इस मिथक को समग्र रूप से हम तब तक नहीं समझ सकते जब तक इसके पीछे के विचारधारागत आग्रह को नहीं समझ सकते। जिन लोगों को ऐसे आक्रमणों के लिये आरोपी बनाया गया है उनके मामले में न्यायिक प्रक्रिया चल रही है इसलिये उस पर चर्चा करना उचित नहीं होगा। चर्चा का विषय यह है कि क्या इन घटनाओं के आधार पर हिन्दू आतंकवाद , हिन्दुत्व आतंकवाद या भगवा आतंकवाद की बात करना उचित है? Read more

भाजपा की समस्या है क्या?

बीते तीन चार माह में इस बात पर काफी चर्चा हुई है कि अब भाजपा का क्या होगा? लोकसभा चुनावों का परिणाम आते ही जिस प्रकार सर्वत्र यह विषय चर्चा के केन्द्रबिन्दु में है यह दो बातों की ओर संकेत करता है। एक देश में एकदलीय शासन की सम्भावना से लोग आशंकित हैं तो वही देश में पिछले डेढ दशक में विचारधारा के आधार पर आये परिवर्तन का यह संकेत है। तीन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम आने से यह चर्चा फिर प्रासंगिक हो उठी है।

देश की स्वतंत्रता के उपरांत कांग्रेस पार्टी ने जिस विचारधारा को अपनाया वह पूरी तरह कम्युनिज्म, सेक्युलरिज्म पर केन्द्रित रही। शीतयुद्ध के काल में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ने विदेश नीति में एक छ्द्म निर्गुट नीति के आधार पर एक काल्पनिक व्यवस्था नव स्वतंत्र अरब देशों और अफ्रीका के देशों के साथ खडा करने का प्रयास किया। लेकिन यह भी यथार्थ के ठोस धरातल पर आधारित नहीं थी और नेहरू जी की इन्हीं रूमानी नीतियों के कारण भारत में कम्युनिज्म और सेक्युलरिज्म को देश के निर्माण का आधार बनाया गया। जबकि इसके विपरीत देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू इतिहास के जानकार होते हुए भी भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन की मूल चेतना को समझने में असफल रहे। भारत का स्वतंत्रता संघर्ष हिन्दू नवजागरण की अभिव्यक्ति थी जिसका आधार बंकिम चन्द्र चटर्जी के आनन्दमठ, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती के ठोस धरातल पर आधारित था। इस पूरे आन्दोलन की चेतना के मूल में एक ही आकाँक्षा निहित थी कि भारत को महमूद गजनवी से पूर्व के भारत की पहचान से जोडा जाये। कांग्रेस ने देश की स्वतंत्रता के उपरांत इसके विपरीत नीतियाँ अपनाईं और तुर्की के कमाल अतातुर्क की तर्ज पर पण्डित नेहरू को लगा कि धर्म भारत के विकास को अवरुद्ध कर देगा इस कारण देश का नया स्वरूप सेक्युलरिज्म के आधार पर हो। यह शब्द संविधान में भले ही बाद में जोडा गया हो लेकिन स्वतंत्रता के समय से ही स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि को ठीक सन्दर्भ में नहीं समझा गया। गान्धी जी ने अपना पूरा आन्दोलन भक्ति आन्दोलन की तर्ज पर चलाया और राम को देश की आध्यात्मिक एकता का सूत्र बनाकर उसे तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ जोड दिया लेकिन हिन्दू मुस्लिम समस्या को लेकर वे भी उलझ गये।

1970 के दशक से देश में लगातार कांग्रेस विरोधी राजनीति के विकल्प के आते रहने से राजनीतिक स्तर पर तो कांग्रेस विरोध का ध्रुव बन रहा था लेकिन वैचारिक स्तर पर विकल्प 1980 के दशक में खडा होना उस समय आरम्भ हुआ जब कांग्रेस ने नरम हिन्दुत्व का आधार छोडकर मुस्लिम तुष्टीकरण का रास्ता ग्रहण कर लिया। इसी प्रतिक्रिया में राममन्दिर आन्दोलन ने आकार ग्रहण करना आरम्भ किया। फिर भी राममन्दिर आन्दोलन में केवल एक ही पक्ष नहीं था।

वास्तव में आज भाजपा की विवशता का कारण यही है कि राममन्दिर आन्दोलन से जुडी अपनी पहचान को भुलाने के लिये वह आतुर है। भाजपा का विस्तार राममन्दिर आन्दोलन के साथ हुआ और इस विस्तार के अनेक आयाम हैं। शहरी क्षेत्रों में इस आन्दोलन से अधिकतर हिन्दू अल्पसंख्यकवाद के चलते असुरक्षा की भावना से जुडे थे तो ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के हिन्दू इस आन्दोलन के साथ आध्यात्मिक परम्परा के आधार पर जुडे थे। यही वह बिन्दु है जो आज भाजपा के संभ्रम का कारण है और इसी कारण हिन्दुत्व की अनेक व्याख्यायें हो रही हैं।

भारत की लाखों वर्ष पुरानी पहचान का आधार उसकी सांस्कृतिक एकता नहीं वरन आध्यात्मिक एकता है। संस्कृति तो रहन- सहन, खान पान, आचार व्यवहार के आधार पर बनती है जिसके सम्बन्ध में भारत में अत्यंत विविधता है फिर भी इस विविधता में एकता का कारण आध्यात्मिक संचेतना का केन्द्रबिन्दु एक होना है। देश में कोई भी भाषा बोलने वाला, कोई भी वस्त्र पहनने वाला, किसी भी प्रकार का आचार व्यवहार करने वाला एक सिद्धांत को अवश्य मानता है कि सभी मार्ग एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं और वह है आत्मतत्व। गूढ दार्शनिक सिद्धांतों को गाँव के लोग इतनी सरलता से अपनी कहावतों में कह जाते हैं जिस पर ग्रंथों की रचना की जा सकती है। भारत में हमारे पूर्वजों ने इस् गूढ दार्शनिक सिद्धांत को युगानुकूल और व्यावहारिक जीवन में प्रायोगिक बनाने के लिये अनेक वे नियम बनाये जिनका मूल उद्देश्य ही यह है कि व्यक्ति का जीवन इस प्रकार सुगठित हो कि वह इस सत्य को कभी न भूले कि यह जीवन अंतिम सत्य नहीं है। आयुर्वेद, अष्टाँग योग, चारों धाम, गाय, गंगा, गायत्री सभी इसी एक सत्य के साथ साक्षात्कार कराते हैं। परंतु देश में स्वतंत्रता के बाद स्वयं को सेक्युलरिज्म के दायरे में लाने के लिये हिन्दूवादी शक्तियों ने सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय हिन्दुत्व के सम्बन्ध में आने के बाद रटना आरम्भ कर दिया कि हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म दो अलग- अलग चीजें है और हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति जबकि सामान्य समाज में हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को पर्याय माना जाता है। इसी कारण हिन्दुत्व धीरे धीरे एक राजनीतिक अवधारणा बनती गयी और सामान्य हिन्दू समाज को इसमें मूल हिन्दू चेतना के गुण नहीं दिखे और जिसके जो मन में आया वह हिन्दुत्व की व्याख्या करता गया और अब हिन्दुत्ववादियों ने ही हिन्दुत्व को मखौल बना दिया है और मीडिया में आये दिन हिन्दुत्व का मजाक उडाया जाता है।

वास्तव में इसके पीछे कुछ कारण हैं। एक तो भारत को हिन्दू राष्ट्र मानते हुए भी उसकी आध्यात्मिक गूढता और उसके औपनिषदिक दर्शन के आधार पर राजनीति और समाज को संगठित करने का प्रयास नहीं हुआ और इससे भी दुखद यह कि पिछले कुछ सौ वर्षों में हिन्दू समाज ने आत्मग्लानि और पराजित मानसिकता का जो भाव अपने भीतर व्याप्त कर लिया है हिन्दुत्व आन्दोलन भी उसी ग्रंथि का शिकार हो गया है और वर्तमान समस्याओं का समाधान सेमेटिक धर्म और जीवन दर्शन के आधार पर देखा जाने लगा है। जैसे भारत की आध्यात्मिक साधना व्यक्ति को भौतिक जीवन से पलायन की शिक्षा देती है, इससे व्यक्ति कायर हो जाता है, इस विचारधारा पर चलकर राष्ट्रवाद के लिये कार्य सम्भव नहीं है। इसी के साथ एक पुस्तक , एक पैगम्बर, धार्मिक अनुयायियों की एकरूपता और एक जैसी जीवन पद्धति को ही आदर्श मानकर हिन्दू धर्म की व्याख्या इसी सन्दर्भ में होने लगी और सेमेटिक परम्परा को आदर्श मानने से कहीं न कहीं सेमेटिक धर्मों की भाँति धर्म का अर्थ न्याय की स्थापना के बजाय दूसरे धर्म के प्रति घृणा को हिन्दू धर्म की एकता का आधार बनाने की भावना विकसित होने लगी।

जनसंघ की स्थापना से लेकर राममन्दिर आन्दोलन तक हिन्दू धर्म के मूल तत्वों की स्थापना के लिये प्रयास करने के स्थान पर उसे संविधान के दायरे में लाने, कम्युनिष्ट सिद्धांत के समानांतर दर्शन विकसित करने की होड और फिर सेक्युलरिज्म का विरोध करने के स्थान पर अपने हिदुत्व को सेक्युलरिज्म के दायरे में लाने के चलते वैचारिक स्तर पर काफी गड्ड मड्ड हुई। हिन्दू समाज को संगठित करने का दावा करने वाली शक्तियों ने तो कभी हिन्दू को एक ईकाई माना ही नहीं। यदि ऐसा होता तो भाजपा जाति, अवर्ण, सवर्ण , पिछडा, दलित, आदिवासी, जनजाति ,उत्तर दक्षिण की राजनीति न करती वरन भारत की आध्यात्मिक एकता को अपनी राजनीति का आधार बनाती। आज वैचारिक स्पष्टता न होने का ही परिणाम है कि जो विचारधारा की रट लगाते हैं वे जानते ही नहीं कि इस विचारधारा को सामाजिक और राजनीतिक रूप से कैसे क्रियांवित किया जाये। आज तो विचारधारा और हिन्दुत्व की बात केवल अपना भाव बढाने या फिर किसी की नजर में अच्छा बने रहने के लिये की जाती है।

वास्तव में भाजपा ने हिन्दुत्व का नारा तो लगाया लेकिन हिन्दू एकता का प्रयास नहीं किया। वही गलती की जो पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने की थी कि अनेक सुन्दर शब्द गढे और स्वप्न देखे लेकिन आधार का पता ही नहीं था और परिणाम आज सामने है। इसी प्रकार हिन्दुत्व की बात तो खूब हुई पर हिन्दुत्व है क्या और उसे कैसे साकार करना है न तो इसका पता है और न ही कोई कार्यक्रम। इसी कारण जिसके जो मन में आये बोलता है और वही हिन्दुत्व हो जाता है। यह वैचारिक दीवालियापन पूरी तरह स्पष्ट है कि पाकिस्तान के विभाजन के लिये नेहरू और पटेल को दोषी ठहराया जा रहा है और मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्युलर बताया जा रहा है क्योंकि जो लोग भी जिन्ना की प्रशंसा कर रहे हैं उनके लिये भाजपा और कांग्रेस में एक ही अंतर है कि कांग्रेस का नेतृत्त्व गाँधी परिवार के हाथ में है और वहाँ उनके लिये कोई स्थान कभी नहीं था इसी कारण ये लोग जनसंघ के साथ आये। क्योंकि इन्हें पाकिस्तान बनाने वालों की मानसिकता से कोई समस्या नहीं है।

लेकिन आज समाज भाजपा को हिन्दू पक्ष के रूप में देखना चाहता है और इसके लिये सबसे पहले विचारधारा की स्पष्टता लानी होगी। आज विचारधारा के सम्बन्ध में भाजपा या हिन्दुत्ववादियों की स्थिति उस बालक की तरह है जो परीक्षा में प्रश्नों का उत्तर देता है तो न तो वह उसे समझ पाता है और न ही परीक्षा पुस्तिका जाँचने वाला।

कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद जिस प्रकार भाजपा के भविष्य़ को लेकर चर्चा हो रही है उससे स्पष्ट है कि अब कम्युनिज्म के पतन के बाद सेक्युलरिज्म का खोखला स्वरूप सामने आ गया है वैसे भी यूरोप ने कभी भी अपनी ईसाई पहचान को लेकर क्षमा भाव नहीं रखा और मुस्लिम देशों में तो लोग जानते ही नहीं कि सेक्युलरिज्म किस चिडिया का नाम है लेकिन भारत में हिन्दू पहचान को भुलाने के लिये सेक्युलरिज्म का ढॉंग चलता रहा। कम्युनिज्म के पतन के बाद धर्म की पहचान का आग्रह सतह पर आ गया है। इसी के साथ विश्व में एक नया परिवर्तन भी आ रहा है और वह है वैश्व्वीकरण का। आने वाले एक दशक के परिवर्तन की आहट मिलनी आरम्भ हो गयी है। पहले इण्टरनेट ने राष्ट्र , राज्य और सरकार की सीमायें तोड दीं और अब आई पी एल जैसे टूर्नामेंट सिद्ध कर रहे हैं कि बहुराष्ट्रवाद और वैश्वीकरण का सिद्धांत ही भविष्य़ है।

इस युग का सिद्धांत है स्वतंत्रता। स्वतंत्रता के सिद्दांत को स्थापित करने के लिये एकरूपता, खान पान, रहन सहन, आचार व्यवहार और कुछ हद तक चरित्र के सिद्धांत भी देश काल परिस्थितियों के सापेक्ष रखने होंगे। इस युग में व्यक्ति स्वतंत्र होना चाहता है सूचना का अबाध स्रोत इसी तथ्य को इंगित करता है कि व्यक्ति अपनी स्वतंत्र चेतना विकसित करना चाहता है और स्वतंत्रता पर किसी प्रकार का हस्तक्षेप उसे सहन नहीं है। वह किसी एक विचार या व्यक्ति के साथ बँधा रहना नहीं चाहता। लेकिन इसका समाधान स्वतंत्रता का हनन नहीं वरन हिन्दू धर्म के सिद्धांत का प्रचार ही है। वास्तव में स्वतंत्रता के इस काल में ही हिन्दुत्व की प्रासंगिकता अधिक है।

आज हिन्दू धर्म के वास्तविक स्वरूप को सामने लाने की आवश्यकता है न कि किसी सेमेटिक धर्म के प्रकाश में उसकी व्याख्या करने की। धर्म की पहचान के प्रति बढ्ते आग्रह के चलते अवसर आ गया है कि हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति कहना बन्द किया जाये और वैश्वीकरण के इस काल में इसे सार्वभौमिक धर्म बनने की ओर विकसित किया जाये जो कि व्यक्ति को स्वतन्त्र होते रहने की प्रेरणा देते हुए अंततः प्रकृति से भी मुक्त हो जाने का क्रियात्मक विधान भी बताता है।

सैद्धांतिक रूप से हिन्दुत्व की आध्यात्मिक गम्भीरता के साथ ही हिन्दू अपनी पहचान को लेकर भी आतुर है। ज्यों ज्यों भारत में मध्य वर्ग सशक्त हो रहा है और वैश्वीकरण के चलते शहर और गाँव का भेद कम हो रहा है। गाँव के निवासी भी अपने जीवन को भौतिक आधार पर विकसित करना चाहते हैं इस कारण परम्परा के स्थान पर हिन्दू धर्म के मूल को संरक्षित रखते हुए विकास और स्वतंत्रता के साथ उसका समायोजन करना होगा परंतु यह धारणा पूरी तरह भ्रांति पर आधारित है कि हिन्दू स्वाभिमान, हिन्दू रक्षा और हिन्दू धर्म का विषय आधुनिकता के साथ मेल नहीं खाता। इसके विपरीत वास्तविकता तो यह है कि वर्तमान हिन्दू पीढी अधिक स्पष्ट और आक्रामक है जो हिन्दू को विश्व में एक शक्ति के रूप के रूप में देखने की आकाँक्षी है। भौतिक उन्नति की आकाँक्षा के बाद भी अवचेतन मन की यही आकाँक्षायें सुप्त हुई हैं समाप्त नहीं और इसमें एक प्रमुख आकाँक्षा भारत को महमूद गजनवी के पूर्व के भारत की चेतना से जोडना है।

भाजपा को यदि प्रासंगिक बने रहना है तो उसे हिन्दू राजनीतिक दल बनना होगा और नयी परिस्थितियों में अपना विकास करना होगा जिसमें आधुनिकता, विकास और जीवन स्तर के उत्थान की अभिलाषा के साथ हिन्दुओं के अवचेतन मन को साकार करने के लिये पूरी ईमानदारी के साथ विश्वास पूर्वक नयी राजनीतिक परिभाषा गढनी होगी। लेकिन इसके लिये आवश्यक है कि भाजपा अपने कार्यक्रम , नीतियों और हिन्दुत्व पर विश्वास करना सीखे। भाजपा को समझना होगा कि कांग्रेस यथास्थितिवादी राजनीतिक दल है और भाजपा अवचेतन मन और सपनों की पार्टी है। जब जब भाजपा यथास्थिति को अपनाने का प्रयास करेगी इसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा। भाजपा को सपनों को साकार करना और अवचेतन मन की आकाँक्षा को पूर्ण करने का राजनीतिक समीकरण ढूँढना होगा अन्यथा इसका ह्रास ही होता जायेगा। दुखद पक्ष तो यह है कि भाजपा हर पराजय के बाद कुछ नया बहाना ढूँढ कर स्वयं को और अपने समर्थकों को दिलासा देती है और सत्य से भागना चाहती है।

भाजपा को सेक्युलरिज्म के दायरे से बाहर आकर आधुनिकता के साथ हिन्दुत्व को समायोजित करना होगा जो कि हिन्दू आग्रह पर आधारित हो न कि तुष्टीकरण पर।

कहीं हम आडम्बरी तो नहीं होते जा रहे हैं?

पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ महाविद्यालयों के पत्रकारिता से जुडे छात्रों के मध्य विदेश नीति और भारत की सामरिक चुनौतियों से सम्बन्धित विषय पर मुझे इन छात्रों को सम्बोधित करना था। कार्यक्रम के उपरांत राजस्थान की एक पत्रकारिता छात्रा ने अनौपचारिक वार्तालाप में अनेक प्रश्न किये लेकिन एक प्रश्न के उत्तर से ही मुझे यह लेख लिखने की प्रेरणा हुई। उस छात्रा ने कहा कि वह अपने जीवन में पहली बार घर से बाहर अकेले निकली है और उसे बताया गया है कि पत्रकारिता एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ लडकियों को काफी कठिनाई होती है और उन्हें अनेक समझौतों के लिये तैयार रहना चाहिये। उसने मुझसे सलाह माँगी कि उसे क्या करना चाहिये? मैंने बदले में उससे प्रश्न किया कि जब उसने पहली बार घर से बाहर कदम निकाले होंगे तो निश्चय ही उसके मन में अधिक आशंकायें रही होंगी जो धीरे धीरे कम ही हुई होंगी। सम्भव है कि पहले लगा हो कि किसी लडकी का घर से बाहर निकलना और फिर पत्रकारिता के लिये प्रयास करना ही नैतिकता के अनेक प्रश्नों से सरोकार रखता हो लेकिन अब उसके सामने यही प्रश्न है कि वह पत्रकारिता में लड्की होते हुए अपने मूल्यों और आदर्शों के साथ् सांमजस्य बिठाकर कैसे चले? इसका जो समाधान मेरे पास था मैंने उस छात्रा को बताया और वह यह कि आदर्श का व्यावहारिकता के साथ सांमजस्य होना चाहिये और व्यावहारिकता का आदर्श के साथ। दोनों का ही अतिवाद व्यक्ति को अलग थलग कर देता है। जैसे आदर्श का व्यावहारिकता के साथ सांमजस्य नहीं होने से व्यक्ति दोहरा चरित्र का जीवन व्यतीत करने लगता है उसी प्रकार व्यावहारिकता में आदर्श का पुट नहीं होने से भी सफलता स्थाई नहीं होती।

व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का अपना आदर्श और मूल्य होते हैं और यह व्यक्तिगत स्तर पर कठोर और सामूहिक स्तर पर लचीला होता जाता है इसलिये प्रत्येक व्यक्ति अपनी परम्परा और संस्कार के आधार पर अपना आदर्श निर्धारित करता है। समाज में कार्य करते हुए इस आदर्श का व्यावहारिकता के साथ समायोजन करने से तात्पर्य यह है कि यदि किसी की परम्परा और संस्कार के आधार पर माँसाहार करना, शराब पीना या फिर धूम्रपान करना आदर्श जीवन के विपरीत है तो यदि उस व्यक्ति को ऐसे लोगों के साथ रहने से कुछ सीखने को मिलता है या प्रगति होती है तो निश्चय ही सांमजस्य किया जाना चाहिये। इसी के साथ व्यावहारिकता को भी आदर्श के साथ सांमजस्य करना चाहिये और कुछ सार्वभौमिक मूल्य और आदर्श हैं जिनका पालन होना चाहिये। निश्चित रूप से आज भी समाज में लडकियों का कार्यक्षेत्र में जीवन अनेक कष्टदायक अनुभव दे जाता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि लडकियों को घर की चारदीवारी से बाहर नहीं निकलना चाहिये और सभी क्षेत्रों में अपना कौशल नहीं दिखाना चाहिये। ज्यों ज्यों लडकियों ने सार्वजनिक जीवन में अपनी सक्रियता बढाई है उसी अनुपात में पुरूषों के मन में उनकी प्रति कुण्ठा कम होने लगी है। यह कुण्ठा धीरे धीरे और कम होगी जैसे जैसे स्त्रियों का आत्मविश्वास बढता जायेगा।

इस विषय पर सोचते हुए मुझे देश की आज की अनेक समस्याओं का एक सूत्र भी पकड में आ गया। आदर्श और नैतिकता की सापेक्ष व्याख्या नहीं होने से हमारा समाज एक दोहरे चरित्र और आडम्बर का शिकार हो गया है।

हमने सार्वजनिक जीवन में आदर्श और नैतिकता के इतने कठोर मानदण्ड निर्धारित कर रखे हैं कि यह जानते हुए भी कि कोई भी व्यक्ति उनका पालन नहीं करता और हर व्यक्ति का दोहरा चरित्र है हम यह आभास लेकर प्रसन्न रहते हैं कि सर्वत्र आदर्श और नैतिकता का पालन हो रहा है।

वास्तव में आदर्श और नैतिकता के कुछ मूलभूत नियम हैं जो सार्वभौमिक हैं और जिनका पालन करने की अपेक्षा सभी धर्मों, विचारधारा और व्यक्तिगत जीवन से सार्वजनिक जीवन तक के लोगों से की जाती है। परंतु इन मूलभूत तत्वों के अतिरिक्त रहन सहन, पहनावा, खान पान, आचार व्यवहार यह पूरी तरह देश काल परिस्थितियों के सापेक्ष होता है लेकिन कुछ वर्षों में आदर्श और नैतिकता की बहस इन्हीं पर आकर टिक गयी है।

वैश्वीकरण के इस युग में जबकि स्थानीयता और वैश्विक दृष्टिकोण के मध्य एक ट्कराव की सी स्थिति दिखती है तो निश्चय ही हमें यह समझना होगा कि वे कौन से तत्व हैं जिनका प्रचलन समाज के लिये घातक हो सकता है और कौन से तत्व ऐसे हैं जिन्हें आत्मसात करना चाहिये।

हरियाणा के विधानसभा चुनावों में यह जानकर मुझे अत्यंत कष्ट हुआ कि भाजपा ने पश्चिमी संगीत सहित अनेक पश्चिमी चलन को प्रतिबन्धित करने का प्रस्ताव अपने घोषणापत्र में किया है। यह सोच एक जबर्दस्त भ्रम का परिणाम है। कुछ वर्ष पूर्व मुझे हरियाणा जाने का अवसर मिला और वहाँ एक गाँव मुंडोग़ढी है जहाँ 100 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या है। इस क्षेत्र में पूरी तरह शरियत का कानून चलता है और टीवी प्रतिबन्धित है, लड्कियों का स्कूल जाना प्रतिबन्धित है इसी के साथ अन्य प्रतिबन्ध भी हैं। हरियाणा अत्यंत परम्परावादी क्षेत्र है जहाँ अब भी पंचायत का राज्य चलता है। लेकिन अब वह अवसर आ गया है कि हिन्दू समाज अपनी अनेक सामाजिक जडताओं से बाहर आये क्योंकि 700 वर्षों की पराधीनता के काल में अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बचाये रखने के लिये कुछ कठोर सामाजिक नियम बनाये गये थे ताकि आक्रमणकारियों के साथ मिल कर हम अपनी पह्चान न खो दें परंतु अब अवसर आ गया है कि ऐसी जडताओं को तोडा जाये और हिन्दू धर्म की सबसे बडी सेवा यही है कि अन्धविश्वास, सामाजिक जड्ता और परम्परा के मध्य अंतर करना सीखा जाये।

यदि गंगा न रहे, गायत्री न रहे,गाय न रहे, चार धाम न रहे, योग और आयुर्वेद न रहे , गीता का सन्देश न रहे तो मानना पडेगा कि हिन्दू परम्परा नष्ट हो रही है और जो भी विचारधारा इनका अस्तित्व स्वीकार नहीं करती और स्वयं को श्रेष्ठ मनवाने का उपक्रम करती है ऐसी किसी भी विचारधारा से हिन्दू धर्म को खतरा है। । जिन हिन्दुओं के पूर्वजों ने हजारों वर्षों की साधना और तपस्या से आध्यात्मिकता का सिद्धांत दिया और आध्यात्मिक स्तर पर स्वतंत्रता का ज्ञान दिया उसे सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर कैसे पालन किया जाता था यह सब कुछ हम अपनी हजारों वर्षॉं की पराधीनता के चलते भूल चुके हैं और सेमेटिक धर्मों की भाँति रहन-सहन, खान-पान, आचार व्यवहार, पहनावे के आधार पर अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान नष्ट होने का खतरा भाँपने लगे हैं।

जिस प्रकार देश में वैश्वीकरण के विरुद्ध एक व्यापक बह्स चलायी जा रही है उसमें तथ्य कम और आधुनिकता और परिवर्तन को आत्मसात कर पाने की अक्षमता के चलते असुरक्षा की भावना अधिक दिखाई पड रही है। भारत में वैश्वीकरण के आधार पर परिवर्तन की आहट 1985 के आस पास से ही दिखने लगी थी और तब से क्रमबद्द तरीके से मैंने प्रत्येक परिवर्तन के विरुद्ध तर्क सुने कि यह भारत को सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से खोखला करने का अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र है। पहले कम्प्यूटर आया तो कहा गया कि अब भारत में बेरोजगारों की फौज खडी हो जायेगी क्योंकि क्लर्क का काम मशीनें करेंगी। आज कल्पना करिये कि यदि कम्प्यूटर न हो तो रेल आरक्षण, बैंक से पैसा निकालना या जमा करना कितना कठिन होता। मुझे याद है कि मैं बचपन में जब बैंक जाता था तो मुझे तीन से चार घण्टे लगते थे।

इसी प्रकार- वैश्वीकरण और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आने पर जब महिलायें अनेक प्रकार की नौकरी करने लगीं तो कहा गया कि यह भारत के परिवार तंत्र को तोडने का अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र है। आज तो महानगरों में यदि पति पत्नी दोनों न कमायें तो घर चलाना मुश्किल होता है और लोग सहजता से चाहते हैं कि पत्नी भी नौकरी करे अब तो कस्बों और गाँवों में भी यह चलन आम है। लेकिन इन दोनों के बाद भी भारतीय संस्कृति नष्ट तो नहीं हुई। इसी प्रकार टीवी क्रांति, फैशन शो से लेकर इंटरनेट तक यही बहस आम है कि भारतीय संस्कृति अब गयी कि तब गयी।

वास्तव में बहुत वर्षॉं की पराधीनता के कारण हमारी असुरक्षा की भावना अत्यंत अधिक है और हमारा आत्मविश्वास अत्यल्प है। न चाहते हुए भी हिन्दू समाज मुस्लिम समाज की भाँति आचरण कर रहा है जो आधुनिकता का विरोध करते हुए हर घटनाक्रम के पीछे अमेरिका और इजरायल का हाथ देखता है। मुस्लिम समाज की इस मानसिकता का कारण भौतिक विकास में उनका पिछडना है। केवल धर्म को ही केन्द्र में रखने और शरियत और क़ुरान के आधार पर ही चलते रहने के आग्रह से वे पश्चिम के विकास की गति को पकड नहीं सके और आज इस हीन भावना से निकलने के लिये अनेक प्रयास कर रहे हैं जो उनमें कुण्ठा और हिंसा भर रहा है।

हिन्दू समाज को इस हीन भावना से स्वयं को बचाने की आवश्यकता है। जींस, टीशर्ट पहनने से, उन्मुक्त जीवन जीने से , स्वतंत्रता के प्रति आग्रह रखने से कोई संस्कृति कभी नष्ट नहीं होती। समाज में नैतिक शिक्षा देने, चारित्रिक निर्माण करने, लोगों को आदर्श का पाठ पढाने के लिये प्रयास समाज में होते रहते हैं और मूल भूत मूल्यों और आदर्शों को छोडकर अन्य बाहरी तत्व परिवर्तित होते रहते हैं और जो इन परिवर्तनों को जितना शीघ्र अपना कर उन्हें अपने अनुकूल और स्वयं को उनके अनुकूल बना लेता है वही अपनी पहचान के साथ प्रगति कर पाता है।

आज हम अपनी ऊर्जा उन मूलभूत तत्वों की रक्षा के लिये नहीं लगा रहे हैं जो न केवल भारत के लिये वरन मानवता के लिये आवश्यक है और वह है आध्यात्मिकता के सिद्धांत को किस प्रकार समाज और राजनीति के आचरण में ढाला जाये। वैश्वीकरण का यह प्रवाह किसी एक देश का षडयंत्र है या नहीं यह मह्त्वपूर्ण नहीं है मह्त्वपूर्ण है कि क्या इसे रोकने की क्षमता हमारे पास है तो फिर इसका प्रतिरोध करने में समय नष्ट करने के स्थान पर इसे अपने अनुरूप ढालने का आन्दोलन क्यों नहीं चलाया जाता?

आखिर आज से सौ वर्ष पूर्व यदि कोई समुद्र पार कर जाता था तो उसका धर्म भ्रष्ट हो जाता था। वह व्यवस्था भी काल सापेक्ष थी लेकिन यदि स्वामी विवेकानन्द ने समुद्र पार नहीं किया होता तो भारत में पुनर्जागरण भी नहीं होता। इसी प्रकार आज से सौ वर्ष पूर्व एक जाति दूसरी जाति का छुआ नहीं खाती थी और यह भी धर्म और संस्कृति से जुडा विषय था लेकिन अब इस नियम में काफी ढिलाई आ गयी है तो भी तो न तो हिन्दू धर्म नष्ट हुआ और न ही हमारी संस्कृति।

वास्तव में भारत की विविधता को देखते हुए हर आंचलिकता और क्षेत्रीयता का अपना महत्व है लेकिन परिस्थितियों के आधार पर इनमें भी तो परिवर्तन आता रहता है।

लेकिन आज वैश्वीकरण के स्तर पर हो रहे इन परिवर्तनों के चलते आदर्श और नैतिकता का व्यावहारिकता के साथ सांमजस्य आवश्यक है। क्योंकि ऐसा नहीं होने से ही आज व्यक्तिगत स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक हम ढोंग का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जैसे व्यक्तिगत जीवन में यदि कार में खरोंच लग जाती है तो लोग खरोंच लगाने वाले को पीट पीट कर मार डालते हैं लेकिन यदि उनसे उनका आदर्श पूछा जाये तो वह महात्मा गाँधी को ही बतायेंगे क्योंकि उन्हें भी पता है कि आदर्श को जीवन में ढाला नहीं जाता इसलिये उसे इतना ऊँचा रखो कि उसका व्यावहारिक जीवन से कोई लेना देना ही न हो।

इसी मानसिकता का दर्शन हमें सर्वत्र होता है। इसी कारण व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक जीवन में भारी विरोधाभास होता है। आज सब कुछ बाजारवाद से ही संचालित है इसलिये मुनाफा कमाने वाले जानते हैं किस चीज का प्रचार करने से तथाकथित आदर्श और नैतिकता का आभास ध्वस्त होगा और उसे बचाने के लिये कौन लोग सामने आयेंगे। यही कारण है कि बीते कुछ वर्षों में देश के वास्तविक मुद्दों पर चर्चा होने के स्थान पर अनेक ऐसे मुद्दों पर चर्चा होती है जिससे दोनों पक्षों को मुनाफा होता है। आखिर धारा 377 को देश में तूल किसने दिया यदि इस विषय पर इतनी बहस न होती तो कोई नहीं जान पाता कि यह क्या बला है? इसी प्रकार सच का सामना धारावाहिक को लोकप्रियता भी तो इसी मानसिकता ने दी। ऐसा नहीं है कि ऐसे लोग जान बूझकर विरोध करते हैं या बाजारवाद को लाभ पहुँचाते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि अपनी ऊर्जा कहाँ लगाई जाये कि वास्तविक फल प्राप्त हो। एक बार इन बाहरी कारणों से धर्म और संस्कृति के नष्ट होने की असुरक्षा की मानसिकता छोड दी जाये तो ही वास्तव में वास्तविक खतरों से लडा जा सकता है।

स्वतंत्रता व्यक्ति की मूलभूत आकाँक्षा होती है और वह उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है और अवसर मिलते ही अपने आस पास के प्रत्येक बन्धन तोड देना चाहता है। यह युग स्वतन्त्रता का युग है जो भी मान्यता, मिथक जिज्ञासा उत्पन्न करेगी और स्वतंत्रता को बाधित करेगी व्यक्ति उस ओर जाने का प्रयास करेगा। इसलिये आज समाज को इस बात पर विचार करना चाहिये कि स्वतंत्रता और उच्श्रृखलता के बीच सीमा रेखा क्या हो? स्वतंत्रता के मानक बनाये जायें जो सभी को स्वीकार्य हों। लेकिन इन सबसे भी पहले अपने समय की और अपने पूर्वजों की परम्परा को टूटते हुए देखकर हमें यह कदापि नहीं मानना चाहिये कि अब जो परिवर्तन होगा वह विनाशकारी होगा। क्योंकि हर पुरानी पीढी अपनी नयी पीढी से यही कहती है कि हमारे समय में आदर्श और नैतिकता चरम पर थी और अब तो सब नष्ट हो गया। बालीवुड में ऐसी फिल्में पिछले दो तीन दशक से बन रही हैं। अब अवसर है कि हम विचार करें कि हमें अपनी शक्ति और ऊर्जा कहाँ लगानी है? कौन हमारा शत्रु है और किससे हमें खतरा है? यह विचार करते समय हमें यही ध्यान में रखना चाहिये कि हमारी अगली पीढी किस प्रकार के वातावरण में अपने धर्म, संस्कृति का पालन करते हुए प्रगति और विकास कर सकेगी

हिन्दू जीवन पद्दति नहीं धर्म है

इन दिनों धर्म पर बहस काफी तीव्र हो गयी है और भारत में पिछले 6 दशक में कम्युनिज्म और सेक्युलरिज्म के घालमेल ने बौद्धिक वर्ग में धर्म के विषय को लेकर एक विशेष प्रकार की ग्रंथि का निर्माण कर दिया है जिसके चलते वह धर्म को बहस के दायरे से बाहर रखना चाहता है। ऐसा विशेष रूप से हिन्दुओं में पाया जाता है। राजनीति पर तो काफी खुलकर चर्चा होगी लेकिन जब धर्म की बारी आयेगी तो उस पर कोई भी चर्चा करने से परहेज करते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दू धर्म के शिक्षण और प्रशिक्षण की सार्वजनिक प्रक्रिया पूरी तरह ठप सी हो गयी है। अब नयी पीढी के हिन्दू अपनी धार्मिक पहचान के प्रति आग्रह तो रखते हैं लेकिन अपने धर्म के मूलभूत स्वरूप को लेकर भ्रमित रहते हैं।

इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह है कि पिछले दो दशक में हिन्दूवादी संगठनों सहित अनेक मंचों से इस तथ्य को रूढ कर दिया गया है कि हिन्दू धर्म नहीं वरन जीवन दर्शन है। आज कोई भी बौद्धिक हिन्दू आपके मुँह से हिन्दू धर्म की बात निकलने से पहले ही उसे लपक कर कहता है कि हिन्दू धर्म नहीं वरन जीवन दर्शन है। यह भ्रम आखिर क्यों आया?

आज से कोई सौ वर्ष से पूर्व भी जब स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका और यूरोप में हिन्दू धर्म के बारे में अपने व्याख्यान दिये थे तो उन्होंने स्पष्ट रूप से हिन्दू धर्म को विश्व के सभी धर्मों के साथ तुलनात्मक दृष्टि से एक ऐसा धर्म सिद्ध किया था जिसमें आगे चलकर एक सार्वभौमिक धर्म बनने के गुण विद्यमान हैं। फिर स्वतंत्रता के बाद स्थिति बदल क्यों गयी? इसका कारण यही है कि हिन्दू धर्म को राजनीति और संविधान के दायरे में लाने के लिये उसकी नयी परिभाषा गढी जाने लगी और फिर सर्वोच्च न्यायालय का हिन्दुत्व के पक्ष में निर्णय आने के उपरांत इसे संवैधानिक पुष्टि मिल जाने के बाद तोता रटंत आरम्भ हो गया कि हिन्दुत्व जीवन पद्दति है।

वास्तव में वैश्विक स्तर पर अनेक ऐसे परिवर्तन होते हैं जिनकी दस्तक काफी पहले से मिलने लगती है। यही कुछ आज के सन्दर्भ में भी सत्य है। आज जिस प्रकार समस्त विश्व में धार्मिक पहचान का आग्रह तेजी से बढ रहा है उसका आरम्भ 1990 के दशक से ही हो गया था। कम्युनिज्म ने अपनी नास्तिक विचारधारा के चलते सेक्युलरिज्म को एक क़ृत्रिम आभास के रूप में जीवित रखा था। लेकिन सोवियत संघ के पतन के बाद से देश और लोग संस्कृति और राष्ट्र राज्य की अवधारणा से अधिक अपनी धार्मिक पहचान को आगे कर चल रहे हैं।

पश्चिम के देशों ने और इस्लामी देशों ने कभी भी सेक्युलरिज्म के नाम पर अपनी धार्मिक पहचान से समझौता नहीं किया था। किसी भी ईसाई देश में आज तक गैर ईसाई राष्ट्राध्यक्ष नहीं बना और ऐसा ही इस्लामी देशों के साथ भी है फिर भी भारत में सेक्युलरिज्म के नाम पर उसकी हिन्दू पहचान से उसे वंचित रखा गया और इसी प्रतिक्रिया में 1990 में हिन्दू आन्दोलन खडा हुआ।

हिन्दू आन्दोलन को संवैधानिक दायरे में और सेक्युलरिज्म के दायरे में रखने के लिये हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को पृथक बताया गया और इस घालमेल के परिणामस्वरूप सामान्य हिन्दू जनमानस ने हिन्दू धर्म को एक जीवन पद्धति के रूप में परिभाषित करना आरम्भ कर दिया।

जब धर्म को राजनीति के माध्यम से स्थापित करने का प्रयास किया जाता है तो इसी प्रकार की भ्रम की स्थिति का निर्माण होता है।
आज इस बात की आवश्यकता है कि हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के सम्बन्ध में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की जाये।

हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति बताने का प्रयास इस कारण भी हुआ कि हिन्दू धर्म अन्य सेमेटिक धर्मों की भाँति एक पुस्तक, पैगम्बर पर आधारित नहीं है लेकिन जीवन पद्धति के दायरे में कुछ नियम आते हैं जिन्हें धर्म की पुस्तक या पैगम्बर द्वारा निर्धारित किया जाता है और उसका पालन सुनिश्चित करने के लिये एक संस्थागत ढाँचा तैयार किया जाता है। जैसा कि इस्लाम धर्म में हमें देखने को मिलता है। शरियत और सुन्नत की अवधारणा इसी को प्रकट करते हैं। प्रत्येक इस्लाम धर्मावलम्बी के लिये इस्लाम, शरियत और सुन्ना ( अर्थात पैगम्बर के जीवन का अनुपालन) के आधार पर दिनचर्या और जीवन सुनिश्चित करने के लिये मौलवी, फतवे आदि की व्यवस्था है। इसी प्रकार इस्लाम एक आध्यात्मिक और दार्शनिक अवधारणा से अधिक शरियत के आधार पर जीवन जीने को प्रमुखता देता है। वैसे इस्लाम में भी रोजा, नमाज, जकात और हज आध्यात्मिक उन्नति के लिये ही है लेकिन योग पद्धति के अनुपात में उसका परिणाम अधिक देर से आता है। इसी प्रकार अल्लाह को ब्रह्म के रूप में स्थापित न करके पैगम्बर पर अधिक ध्यान दिया गया है।

वास्तव में सबसे प्राचीन सेमेटिक धर्म यहूदी धर्म में भी यहूदी कानूनों और जीवन पद्धति पर ही अधिक जोर दिया गया था जिसका काफी कुछ अंश इस्लाम में देखने को मिलता है। जैसे सुन्नत, एक ही दिशा में प्रार्थना ( इस्लाम में भी मक्का से पूर्व जेरुसलम की ओर मुँह करके ही प्रार्थना की जाती थी)। यहूदियों के सहस्रों वर्षों तक अपने मूल स्थान से दूर रहने के कारण उनके लिये मूल यहूदी जीवन पद्धति और कानूनों का पालन करना सम्भव नहीं हो सका और जिस देश में वे रहते थे उसी परिवेश के आधार पर उन्होंने स्वय़ं को ढाल लिया इसी कारण यहूदी आज अधिक विकसित और प्रगतिशील हैं। सम्भव है कि वे अपने ही देश में रहते तो उनका स्वरूप कुछ दूसरा होता।

हिन्दू धर्म के जीवन पद्धति के रूप मे परिभाषित करने से हिन्दू के लिये एक समान कानूनी संहिता, रहन सहन, पहनावा, खान-पान और आचार व्यवहार की आवश्यकता होती है। वास्तव में पिछले सहस्रों वर्षों से विश्व में धर्म पर चर्चा होते समय सेमेटिक धर्मों के प्रकाश में अन्य धर्मों के गुणों को परखा जाता है। इस आधार पर एकरूपता को धर्म की पहली शर्त माना जाता है। इसी बहस का परिणाम है कि कुछ धारणायें पूरी तरह उलट गयी हैं। जो धर्म जीवन पद्धति है उसे सर्वश्रेष्ठ धर्म के रूप में आँका जाता है और जिस धर्म में सार्वभौमिक धर्म होने की क्षमता है उसे जीवन पद्धति कहा जाता है।
आज के वैश्वीकरण और वैज्ञानिक युग में इस बात पर टकराव करने का कोई कारण नहीं है कि किसके पैगम्बर या अवतार श्रेष्ठ हैं और किसके कमतर हैं। इस युग में बहस इस बात पर होनी चाहिये कि धर्म के लक्षण क्या हैं और धार्मिक आधार पर टकराव समाप्त करने के लिये किसी सार्वभौमिक धर्म की कल्पना की जा सकती है क्या? लेकिन यदि कोई इसके उत्तर में कहे कि हमारा धर्म ही सार्वभौमिक है क्योंकि हमारे पैगम्बर को ही अंतिम मानो तब तो टकराव ज्यों का त्यों बना रहेगा। इसी प्रकार कोई कहे कि सबके चर्च की शरण में आये बिना सार्वभौमिक धर्म की अवधारणा सफल नहीं हो सकती तो भी टकराव समाप्त नहीं होगा। सार्वभौमिक धर्म वही हो सकता है जो व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करे और उस पर नियम, कायदे, उपासना पद्धति या फिर किसी पैगम्बर का बोझ न डाले।

निश्चित रूप से अभी वह समय नहीं आया है लेकिन वह समय भी अधिक दूर नहीं है। हिन्दू धर्म को लेकर जो दुविधा सदैव से बुद्धिजीवियो में रही है वह दो स्तरों पर है। प्रथम, यदि हिन्दू धर्म की दार्शनिक अवधारणा और उसके औपनिषदिक चिंतन के आधार पर उसकी व्याख्या करें तो उसके लिये एक भौगोलिक ईकाई के आधार पर हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को पुष्ट कर पाना कठिन हो जाता है। क्योंकि हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप आत्मा की अमरता, कर्मफल का सिद्धांत और सृष्टि के बहुत्व में एकत्व की ब्रह्म की अवधारणा है जो योग की अनेक शाखाओं के माध्यम से आत्मतत्व की प्राप्ति का क्रियात्मक पक्ष प्रस्तुत करता है। इस पूरी धारणा में किसी राष्ट्र, जाति, नस्ल या धर्म की सीमायें नहीं हैं और यह आधात्यामिक विज्ञान किसी के लिये भी खुला है लेकिन इस पूरी अवधारणा में भी राष्ट्रवाद के लिये स्थान है क्योंकि भारत में हिन्दुओं के पूर्वजों ने अध्यात्म विज्ञान की खोज की है जो सबसे बडा विज्ञान है कि सृष्टि में जो कुछ भी बहुलता दिखाई देती है उसके बाद भी एक ही तत्व उसकी एकता का आधार है जो सभी से जुडा है। इसी कारण व्यष्टि और समष्टि में समंवय का सिद्धांत हिन्दू धर्म का आधार है जिसका वर्तमान प्रकटीकरण हिन्दुत्व में होता है। अध्यात्म विज्ञान का पेटेंट हिन्दुओं का है इसलिये इसकी रक्षा करने का दायित्व भी उन्हीं का है।

स्वामी विवेकानन्द ने पहली बार किसी भी धर्म की आलोचना या किसी भी पैगम्बर की बहस में पडे बिना धर्म की एक सार्वभौमिक व्याख्या करने का प्रयास किया था। उन्होंने धर्म को पुस्तक और पैगम्बर की बहस के दायरे से बाहर लाकर कुछ मूलभूत सिद्धांतों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया था। वर्तमान वैज्ञानिक युग में और वैश्वीकरण के इस युग में जब सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर सार्वभौमिकता का सिद्धांत स्थापित हो रहा है तो धार्मिक स्तर पर भी सार्वभौमिकता का सिद्धांत स्थापित होना ही चाहिये।

आज जिस तीव्रता से पश्चिम में और अफ्रीकी देशों में हिन्दू धर्म को स्वीकार किया जा रहा है उसका मूलकारण उसकी सार्वभौमिकता और व्यापकता है। हिन्दू धर्म किसी एक अवतार या पुस्तक पर आधारित नहीं है। इसके कुछ मूलभूत सिद्धांत हैं जिसमें आत्मा की अमरता और ब्रह्म की व्यापकता है। इस सिद्धांत को सर्वस्वीकार्य बनाने के लिये और उसका सातत्य बनाये रखने के लिये जितनी दार्शनिक और बौद्धिक कसरत भारत में हमारे पूर्वजों ने की है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं हुई है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक दार्शनिक, पौराणिक और कर्मकाण्ड के स्तर पर एक ही सिद्धांत को प्रतिपादित करने का प्रयास हुआ। पुराणों की कथायें, कर्मकाण्ड ये भी उसी परम सत्ता के प्रति व्यक्ति को उन्मुख करते हैं। भारत में यदि कोई किसी देवता की आराधना करता है, पत्थर की उपासना करता है या फिर साँप की भी पूजा करता है तो वास्तव में उसमें विद्यमान उस ब्रह्म की आराधना करता है। विज्ञान भी तो सभी तत्वों को संचालित करने वाली शक्ति के अंवेषण में ही लगा है। विज्ञान के सभी आविष्कार एक ही दिशा की ओर संकेत करते हैं कि इस सृष्टि में बहुत्व में एकत्व है। लेकिन इस एकत्व को अनुभव करने का विज्ञान हिन्दू धर्म ने वर्षों पूर्व ही खोज निकाला था।

हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति सिद्ध करने का कारण केवल यही रहा है कि हिन्दू धर्म ने अपने मूलभूत सिद्धांतों को धर्म की परिभाषा का आधार बनाने का प्रयास ही नहीं किया। आयुर्वेद, अष्टाँग योग, गंगा, गायत्री, गोमाता, चारों धाम ये भारत की संस्कृति के नहीं हिन्दू धर्म की एकता के आधार हैं। आयुर्वेद, अष्टाँग योग व्यक्ति की वह आरम्भिक तैयारी है जब वह स्वयं को आत्मतत्व और ब्रह्म से साक्षात्कार के लिये तैयार करता है। इसी प्रकार चारों धाम, गंगा और गोमाता एक सामान्य हिन्दू को अपने बुद्धि विवेक के आधार पर हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों और ब्रह्म से जुडाव का आभास देते हैं। चारों धाम की यात्रा हिन्दू देश की सांस्कृतिक एकता का दर्शन करने के लिये नहीं करता वरन अपना परलोक सुधारने के लिये करता है। इसी प्रकार गंगा का दर्शन करने लोग इस भाव से नहीं जाते कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से भावविभोर हो जायें वरन इस भाव से जाते हैं कि गंगा स्वयं शिव की जटा से निकली हैं और इसमें स्नान करने से उनके पापों का मोचन होगा। भारत में सांस्कृतिक विविधता में भी एकता का भाव उसकी बहुत्व में एकत्व की आध्यात्मिक अवधारणा के कारण है और यही कारण है कि राम मन्दिर आन्दोलन में राम उसी ब्रह्म की एकता के प्रतीकरूप थे। राममन्दिर आन्दोलन में लोगों ने भाग विशुद्ध आध्यात्मिक भाव से लिया था।

अब अवसर आ गया है कि हिन्दुत्व को लेकर चल रही बहस पर कुछ ठहर कर विचार किया जाये और बिना सोचे समझे इसे जीवन पद्धति कहते रहने के स्थान पर तुलनात्मक धर्म का विमर्श आरम्भ किया जाये और धर्म के मूलभूत तत्वों के सन्दर्भ में सभी धर्मों की व्याख्या की जाये और जीवन पद्धति और धर्म का अंतर स्पष्ट किया जाये। इतने वर्षों में धर्म के आध्यात्मिक स्वरूप की अवहेलना करते रहने से धर्म का बाह्य स्वरूप ही धर्म का प्रतीक बनता जा रहा है और सारा झगडा बाह्य स्वरूप पर हो रहा है। धर्म के आधार पर खान-पान, रहन-सहन, आचार-व्यवहार को स्थापित करने के प्रयास के कारण विवाद पनपते हैं। भारत में हिन्दुओं में सांस्कृतिक आधार पर विविधता होते हुए भी आपस में एकता का आधार आध्यात्मिक संचेतना का मूलबिन्दु का एक होना है और सभी सांस्कृतिक विविधतायें इसी मूलबिन्दु पर केन्द्रित हैं। जबकि इसके विपरीत अन्य धर्मों का केन्द्रबिन्दु आध्यात्मिक न होने से मूल समस्या है और विषय यह उठाया जाता है कि इतनी सांस्कृतिक विविधताओं के लोग भारत में एक साथ रहते हैं तो फिर कुछ धर्मों के साथ क्या समस्या है? समस्या यही है कि एक तो उनका धार्मिक केन्र्् हिन्दू धार्मिक केन्द्र के साथ मेल नहीं खाता और वे अपनी धार्मिक श्रेष्ठता को भारत पर थोपने का प्रयास करते हैं।

वर्तमान वैश्वीकरण और वैज्ञानिक युग में वही विचारधारा या धर्म लोगों को संतुष्ट कर सकता है जो बहुत्व में एकत्व की बात करे और मानव मात्र को समभाव से देखे। हिन्दू धर्म ने जिस आध्यात्मिक विज्ञान की सर्जना की है वह देश काल परिस्थिति से परे सतत विकासमान धारा है जो शरीर, मन, बुद्धि से परे आत्मा के प्रदेश में ले जाती है और प्रकृति से भी स्वतंत्र कर पूर्ण मुक्ति प्रदान करती है।

इसी सिद्धांत के आधार पर विश्व को आगे बढना उसकी नीयति है। वैसे भी विश्व इतिहास पर यदि दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि जिहाद और क्रुसेड के काल के बाद से व्यक्ति दिनोंदिन स्वतंत्रता की ओर ही बढ रहा है। प्रबोधन युग में यूरोप ने चर्च की जडता को तोडा, फिर व्यक्ति की महत्ता को स्थापित किया गया, फ्राँसीसी क्रांति से पहले रूसो जैसे विद्वानों ने व्यक्ति की इच्छा का सिद्धांत स्थापित कर कहीं न कहीं व्यक्ति के भीतर विद्यमान स्वतंत्र सत्ता को ट्टोलने का प्रयास किया और फिर राजनीतिक संस्थाओं के द्वारा भी व्यक्ति को सार्वभौम सत्ता के रूप में स्थापित किया गया और आधुनिक युग में लोकतंत्र की सैद्धांतिक अवधारणा यही है कि व्यक्ति की इच्छा का सम्मान होना चाहिये। यह बात अलग है कि व्यावहारिक रूप से इसका प्रयोग अपने सिद्धांत के अनुरूप खरा उतरा या नहीं।

औपनिवेशिक काल का नस्ली श्रेष्ठता का विचार भी स्थायी नहीं रहा और फिर भौतिक द्वन्द्व का कम्युनिष्ट सिद्धांत भी अल्पकालिक सिद्ध हुआ। अब वैश्वीकरण का सिद्धांत स्थापित हो रहा है। अनेक पूर्वाग्रहों के चलते इस संक्रमण काल को अनेक रूपॉं में परिभाषित किया जा रहा है लेकिन वैश्वीकरण की यह संस्कृति शनैःशनैः सार्वभौमिकता के सिद्धांत को प्रबल कर रही है। अब राष्टृ राज्य और सरकारों की संस्कृति ढीली पड रही है और बहुराष्ट्रीय संस्कृति पनप रही है जहाँ व्यक्ति नस्ल, जाति, देश और सिद्धांतों की सीमाओं से परे व्यक्तिगत सम्बन्धों को मह्त्व दे रहा है। आज विश्व में अनेक स्थानों पर ऐसे निजी और व्यक्तिगत प्रयास सामने आ रहे हैं जिन्होने किसी भी राज्यगत संस्था से अधिक प्रभाव अर्जित किया है। शनैः शनैः विश्व एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ आने वाले वर्षों में अनेक प्रचलित अवधारणायें ध्वस्त होंगी और व्यक्ति अधिक स्वतंत्रता की ओर उन्मुख होगा और ऐसी स्थिति में शायद धर्म भी उसे सीमित नहीं कर सकेगा यदि उसकी सार्वभौमिक पहुँच नहीं है।

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