सरबजीत एक मोहरा तो नहीं
पाकिस्तान की जेल में पिछ्ले 18 वर्षों से बन्द भारतीय मूल के व्यक्ति सरबजीत को जब पहली बार पाकिस्तान सरकार की ओर से फांसी देने की बात की गयी तभी ऐसा प्रतीत होने लगा कि यह किसी गहरी साजिश का आरम्भ है। फिर जिस प्रकार से सरबजीत की फांसी टाली जाती रही और पाकिस्तान के एक पूर्व मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी ने मानवता के नाम पर इस विषय में रूचि दिखाई उससे यह विषय अधिक उलझता ही प्रतीत हुआ।
सरबजीत के परिवार को जिस प्रकार पाकिस्तान की सरकार ने पहले वीजा देने में आनाकानी की और फिर कुछ देर के लिये सरबजीत को मिलने की अनुमति दी वह भी इस विषय को चर्चा में लाने में काफी सफल रहा। पहली बार जब सरबजीत को फांसी की तिथि निर्धारित हो गयी तो कुछ हल्कों में खुसफुसाहट होने लगी कि इस मामले में पाकिस्तान सरकार मोलतोल के विचार में है और भारत सरकार की ओर से सफाई आई कि सरबजीत के बदले में किसी पाकिस्तानी कैदी को नहीं छोडा जायेगा। ऐसा ही बयान सरबजीत की पुत्री की ओर से भी आया और उसने स्पष्ट कहा कि वह कभी नहीं चाहेगी कि उसके पिता के बदले किसी आतंकवादी को छोडा जाये।
आज उन परिस्थितियों में कुछ अंतर आ गया है। पाकिस्तान सरकार ने सरबजीत की फांसी पर अगला निर्णय आने तक रोक लगा दी है। अब ऐसी आशा की जा रही है कि सरबजीत को संभवतः पाकिस्तान सरकार रिहा कर देगी। यह सम्भावना काफी हर्ष की बात है परंतु जिस प्रकार पाकिस्तान से वापस आने के बाद सरबजीत की बहन दलजीत कौर ने कहा है कि भारत सरकार को पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध मजबूत बनाने की दिशा में कदम उठाते हुए संसद पर आक्रमण के दोषी मोहम्मद अफजल को भी रिहा कर देना चाहिये। सरबजीत की बहन ने पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठन के किसी व्यक्ति को भी उद्धृत किया है कि “ जो दूसरों को झुकाना चाहते हैं उन्हें स्वयं भी झुकना पडता है”। संकेत स्पष्ट है कि भारत सरकार से अपेक्षा की जा रही है कि वह मोहम्मद अफजल को रिहा कर दे।
पाकिस्तान की ओर से जिस प्रकार बिना किसी भूमिका के सरबजीत को पहले फांसी घोषित करना और फिर पाकिस्तान के ही एक पूर्व मंत्री का इस मामले में हस्तक्षेप करना और उनके हस्तक्षेप से सरबजीत की फांसी को टालते जाना किसी मैच फिक्सिंग की तरह लग रहा था।
वास्तव में पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा जिन परिस्थितियों में सरबजीत को फांसी देने का निर्णय किया गया था उस समय पर ध्यान देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह समय वह था जब पाकिस्तान में मुशर्रफ़ विरोधी दल चुनाव जीत चुके थे और मुशर्रफ़ के सामने अपने अस्तित्व का संकट था। जनसम्पर्क और मीडिया में चर्चा में रहकर अपने विरोधियों को चित करने की कुशलता मुशर्रफ़ से अधिक किसी में नहीं है। हाशिये पर जा रहे मुशर्रफ ने एक दाँव फिर खेला और पाकिस्तान में अपने ऊपर अमेरिका परस्त होने और मुजाहिदीनों के प्रति कडा रूख अपनाने के आरोपों को हटाने के लिये मुशर्रफ़ ने सरबजीत को अपना मोहरा बनाया है।
यह बात और स्पष्ट रूप से समझने के लिये हमें पाकिस्तान में अमेरिका के समर्थन से चल रही आतंकवाद के विरुद्ध लडाई को भी निकट से देखना होगा। वास्तव में पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने अपने देश में पश्चिमोत्तर प्रांत और वजीरिस्तान में स्थानीय कबायलियों द्वारा सेना के विरुद्ध चल रही लडाई को जीतने के नाम पर फूट डालो और राज करो की नीति पर काम किया है और आतंकवादियों को नस्ल के आधार पर बांट दिया है। आज पाकिस्तान की सेना वजीरिस्तान और पश्चिमोत्तर प्रांत में पश्तून आतंकवादियों से दोस्ती कर रही है और उसके निशाने पर केवल अरब नस्ल के अल कायदा के लडाके हैं। यही कारण है कि 2007 में पाकिस्तान सरकार ने वजीरिस्तान में कबायलियों से समझौता कर लिया था कि सरकार न तो उन पर खुफिया आधार पर नजर रखेगी और न ही सेना उन पर कोई कार्रवाई करेगी लेकिन इसके बदले में ये लडाके सेना पर आक्रमण नहीं करेंगे। ऐसा समझौता करने के पीछे पाकिस्तान की सोच यह थी कि सेना के पश्तून सैनिक कभी भी पश्तून विद्रोहियों को नहीं मारेंगे और यदि पंजाबी सैनिकों को इस मोर्चे पर लगाया जाता है तो सेना में पंजाबी और पश्तूनी लाबी में तनाव और टकराव बढ सकता था। इसी कारण पाकिस्तान ने रणनीति अपनाई कि अरब नस्ल के आतंकवादियों को निशाना बनाया जाये जिससे अमेरिका भी प्रसन्न रहे और देश में रह रहे विद्रोहियों से सेना को युद्ध न करना पडे।
इसी नीति के सन्दर्भ में यदि मुशर्रफ की उस शतरंज की चाल को समझने का प्रयास किया जाये जिसमें सरबजीत को एक मोहरा बनाया गया है तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। आज यदि पाकिस्तान सरबजीत के बदले जैशे मोहम्मद के आतंकवादी मोहम्मद अफजल को छुडाने में सफल हो जाता है तो इसका श्रेय पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को जायेगा और देश के कट्टरपंथियों के बीच वे अपनी छवि सुधार सकेंगे। परवेज मुशर्रफ राजनीति के एक मंजे हुए खिलाडी हैं और उन्हें पता है कि दो ध्रुवों पर टिकी यह सरकार अधिक दिनों तक नहीं चल सकेगी और ऐसे में उनका दाँव मुल्ला मिलिट्री गठबन्धन पर ही निर्भर करेगा। इस दाँव के सफल होने के लिये जरूरी है कि वे सेना को खुश रखें और सेना की खुशी इसी में है कि पाकिस्तान में भारत विरोधी जिहादी गुट सशक्त और सक्रिय रहें। जिस प्रकार पाकिस्तान ने 2000 में कन्धार विमान के अपहरण में सक्रिय भूमिका निभाकर मसूद अजहर को छुड्वाया था जिसने बाद में जैशे मोहम्मद की स्थापना की और उसी संगठन ने 13 दिसम्बर 2001 को भारत की संसद पर आक्रमण किया और उसी आक्रमण में दोषी सिद्ध किये गये आतंकवादी को पाकिस्तान एक बार फिर पिछ्ले दरवाजे से रिहा कराना चाहता है।
सरबजीत की बहन द्वारा मोहम्मद अफजल की रिहाई के लिये भारत सरकार से की जा रही सिफारिश से स्पष्ट है कि पाकिस्तान में अधिकारियों ने दलजीत कौर को ऐसे किसी फार्मूले के बारे में कोई संकेत अवश्य दिया है। अब देखना यह है कि भारत सरकार इसे किस रूप में लेती है। वैसे भारत सरकार मोहम्मद अफजल की फांसी को ठण्डॆ बस्ते में डालकर अपना मंतव्य स्पष्ट कर चुकी है।
पाकिस्तान के इस नये दाँव से एक प्रश्न यह भी उठता है कि पाकिस्तान में नयी सरकार आने के बाद क्या भारत विरोधी आतंकवाद में कमी आयेगी। ऐसा बिलकुल भी नहीं लगता। जिस प्रकार इसी लेख में ऊपर कहा गया है कि पाकिस्तान अब आतंकवादियों को नस्ल और देशी विदेशी आधार पर देख रहा है। इस कारण नयी सरकार ने अपने देश के आतंकवादियों या पश्चिमोत्तर और वजीरिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों से बातचीत करने का निर्णय लिया है। इसका सीधा परिणाम आतंकवादी संगठनों को पुनः शक्तिशाली होने के रूप में सामने आयेगा। 2007 में कबायली क्षेत्रों में आतंकवादियों से पाकिस्तान सरकार के किये गये समझौते का परिणाम यह हुआ कि यहाँ अल कायदा के शीर्ष नेतृत्व को शरण दी गयी जिसने अपने संगठन को नये सिरे से संगठित कर लिया है और नयी पीढी का नेतृत्व भी तैयार कर लिया है जिसके सहारे आने वाले वर्षों में वह पूरी दुनिया में तबाही मचाने में सक्षम हैं।
पाकिस्तान भले ही आतंकवादियों को नस्ल या भौगोलिक सीमाओं में बाँधकर अपना पराया बताये परंतु उनका उद्देश्य सामान्य है और वह है कुरान और शरियत आधारित विश्व व्यवस्था की स्थापना। भारत के लिये ये संकेत किसी भी प्रकार शुभ नहीं है और जो लोग पाकिस्तान में नयी सरकार की स्थापना पर नये लोकतांत्रिक पाकिस्तान के निर्माण का स्वप्न देख रहे हैं उन्हें कल्पना लोक से वापस आकर वास्तविक लोक में जीना चाहिये जहाँ पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद अब भी भारत के लिये सबसे बडी चुनौती है।
माओवादियों की राह आसान नहीं
अपने पिछ्ले लेख वामपंथी इस्लामवादी गठजोड में मैने आशंका व्यक्त की थी कि जिस प्रकार भारत में कुछ प्रमुख समाचार पत्र नेपाल में माओवादियों की विजय को लेकर भारत में एक बौद्धिक वातावरण बनाकर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं उससे यह आभास होता है कि यह एक सुनियोजित प्रयास है। इस आशंका को बल तब और मिला जब अंग्रेजी के एक अग्रणी समाचार पत्र ने नेपाल में माओवादियों के नेता प्रचण्ड का एक लम्बा साक्षात्कार दो दिनों की श्रृखला में प्रकाशित हुआ। इसी समाचार पत्र ने अपने सम्पादकीय और लेखों द्वारा देश के बौद्धिक और राजनेता वर्ग को समझाने का प्रयास किया था कि नेपाल में माओवादियों की विजय से भारत में नक्सलवादियों और माओवादियों को भी लोकतंत्र के मार्ग पर लाना सरल होगा और इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए नेपाल में माओवादियों की नयी सरकार का हरसम्भव सहयोग भारत को करना चाहिये। जिस प्रकार इस समाचार पत्र के संवाददाता ने प्रचण्ड के साथ पूरे साक्षात्कार में समस्त स्थितियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है उससे तो यह साक्षात्कार कम प्रचण्ड के लिये अपनी ओर से किया गया जनसम्पर्क का प्रयास अधिक लगता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस समाचार पत्र को या इसके कुछ लोगों को माओवादियों की छवि भारत में ठीक करने की बहुत शीघ्रता है। वैसे इस समाचार पत्र के प्रचण्ड से अच्छे सम्बन्ध काफी पहले से दिखते हैं क्योंकि इसी समाचार पत्र के इसी संवाददाता ने नेपाल में माओवादियों के आन्दोलन के समय भी 2006 में प्रचण्ड का साक्षात्कार लिया था जिसकी काफी चर्चा हुई थी।
यह तथ्य इस कारण महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी आन्दोलनकारी या भूमिगत उग्रवादी का साक्षात्कार लेने का अर्थ उससे सहानुभूति रखना होता है परंतु भारत में एक ऐसी विचारधारा अवश्य है जो माओवाद और नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति रखती है और उसे कानून व्यवस्था के स्तर से हल करने के स्थान पर आन्दोलन के रूप में देखने का आग्रह करती है। प्रचण्ड का साक्षात्कार लेने वाले समाचारपत्र ने अपनी सम्पादकीय और लेखों द्वारा छ्त्तीसगढ में सल्वा जुदूम अभियान को जमकर कोसा और अपने तर्क की पुष्टि में रा के एक पूर्व अधिकारी को भी उतार दिया। इन घटनाक्रमों को आपस में जोड्ने से ऐसा लगता है कि निश्चय ही यह पत्रकारिता से अधिक विचारधारा के प्रति निष्ठा है। क्योंकि यह तथ्य नहीं भूला जा सकता कि भारत में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय अब भी चरमपंथी वामपंथियों का गढ है और प्रचण्ड ने भी अपनी शिक्षा यहीं पूरी की थी तो निश्चय ही उस समय के कामरेड आज भी समाज में तो होंगे ही।
माओवादियों का विषय उठाने के पीछे एक प्रमुख कारण यह भी है कि भारत के तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया में जहाँ नेपाल में माओवादियों की विजय का उल्लास मनाया जा रहा है या उसके पक्ष में देश में अनुकूल वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है तो वहीं माओवादियों के विरुद्ध नेपाल और भारत के हिन्दू संगठनों द्वारा नेपाल में राजा की शक्तियों को क्षीण न होने देने और माओवादियों के उत्पात को रोकने के संकल्प को स्थान ही नहीं दिया जा रहा है। समाचारों के प्रति यह चयनित रवैया हमारी इस धारणा को पुष्ट करता है कि भारत के मीडिया में भी अब भी वामपंथियों का वर्चस्व है जो नेपाल में माओवादियों की विजय में वामपंथ का उत्थान देख रहे हैं और ऐसा प्रदर्शित करना चाहते हैं कि मानों नेपाल में माओवादियों की विजय नेपाल की जनता का जनादेश है। नेपाल में माओवादियों की विजय को लेकर भारत में मीडिया ने पूरे तथ्य सामने नहीं आने दिये कि माओवादियों की विजय का एक बडा कारण यंग कम्युनिष्ट मूवमेंट नामक माओवदियों की व्यक्तिगत सेना के आतंक का भी रहा। इसके आतंक की स्वीकारोक्ति प्रचण्ड ने अपने साक्षात्कार में भी की है।
अभी पिछ्ले रविवार को उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जनपद में देवीपाटन नामक स्थान पर विश्व हिन्दू महासंघ नामक संगठन का तीन दिवसीय अधिवेशन समाप्त हुआ। इस सम्मेलन में विश्व हिन्दू महासंघ के नेपाल के प्रतिनिधि और भारत में विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं ने भाग लिया। विश्व हिन्दू महासंघ की स्थापना 1981 में नेपाल के दिवंगत राजा बीरेन्द्र ने की थी और यह संगठन तब से भारत और नेपाल के मध्य हिन्दुत्व के विषय पर परस्पर सहमति से कार्यरत है। इस अधिवेशन की समाप्ति पर प्रस्ताव पारित किया गया कि नेपाल में माओवादियों की विजय के उपरांत भी यह संगठन राजा को किनारे लगाकर माओवादियों के देश पर शासन के किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देगा। इस अधिवेशन में विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंहल ने कहा कि यदि माओवादियों को ऐसा करने की छूट दी गयी तो वे और शक्ति एकत्र कर लेंगे और फिर भारत में प्रवेश कर हिन्दू संस्कृति को सदा सर्वदा के लिये नष्ट कर देंगे। सिंहल ने कहा कि तराई क्षेत्र में सशस्त्र गुट बनाने वाले मधेशियों ने बडे पैमाने पर विश्व हिन्दू महासंघ और विश्व हिन्दू परिषद को समर्थन दिया है। यह अधिवेशन गोरखपुर के गोरक्षनाथ मन्दिर में आयिजित हुआ था जिसमें भारत और नेपाल के 200 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। नेपाल में राजशाही के पतन के बाद से विश्व हिन्दू महासंघ के अध्यक्ष भारत केशर सिम्हा ने भारत और काठमाण्डू के मध्य अनेक दौरे कर राजा के पक्ष में समर्थन जुटाने का प्रयास किया।
इस अधिवेशन में राजा ज्ञानेन्द्र के विश्वासपात्र रायल नेपाल आर्मी के सेवानिवृत्त अधिकारी 72 वर्षीय हेम बहादुर कार्की को विश्व हिन्दू महासंघ का नया अध्यक्ष बनाया गया। कार्की ने कहा कि अब भी रायल आर्मी के सदस्य बडी मात्रा में राजा के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि इन अधिनायकवादियों और हिन्दू विरोधी शक्तियों के विरुद्ध युद्ध कर सकें। इस अधिवेशन में राजा ज्ञानेन्द्र को भी आना था परंतु नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए वे नहीं आये परंतु इस अधिवेशन के लिये उन्होंने अपना सन्देश भेजा और कहा कि वे अधिवेशन के प्रस्तावों का पालन करेंगे। अधिवेशन में पूर्व अध्यक्ष सिम्हा ने नेपाल में माओवादियों की सहायता के लिये भारत सरकार की आलोचना की और कहा कि सात दलों का गठ्बन्धन भारत सरकार के सहयोग से ही सम्भव हो सका। इस अवसर पर विश्व हिन्दू महासंघ के भारत के अध्यक्ष योगी आदित्यनाथ ने कहा कि वे सदैव से माओवादियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की बात करते रहे हैं।
इस अधिवेशन के सम्बन्ध में भारत में मीडिया में कोई बात न तो प्रकाशित हुई और न ही इसका कोई उल्लेख हुआ जबकि अधिवेशन की उपस्थिति और इसके प्रस्तावों के अपने निहितार्थ हैं। अधिवेशन में हुई चर्चा स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि नेपाल में राजा के प्रति ऐसा वातावरण नहीं है जैसा माओवादी समस्त विश्व को प्रदर्शित कर रहे हैं। यदि माओवादी अब भी राजा को अपमानित करने या उन्हें देश से बाहर निकालने का यत्न करते हैं तो इसका उल्टा परिणाम होगा। यह बात माओवादियों को भी पता लग चुकी है और यही कारण है कि चुनाव से पहले बढ चढ कर बातें करने वाले माओवादी अब राजा के साथ किसी फार्मूले की तलाश में जुट गये हैं।
भारत में मीडिया में बैठे वामपंथी विचारों के चिंतक और लेखक नेपाल में माओवादियों की विजय को भले ही स्थायी मानकर चल रहे हों परंतु भारत सरकार को अपने देश की सुरक्षा की दृष्टि से नेपाल में माओवादी उग्रवाद की समाप्ति और नेपाल में राजा की शक्ति के विकल्प पर विचार करना चाहिये।
वैसे नेपाल में संवैधानिक सभा के पूरे परिणाम आने के बाद पूरी संविधान सभा में माओवादियों को बहुमत नहीं मिला है और उन्हें नेपाली कांग्रेस, यूएमएल और उपेन्द्र यादव की मधेशी जनाधिकार मोर्चा पर भी निर्भर होना पडेगा। उधर विश्व बाजार में तेल की बढ्ती कीमतों, मंहगाई के चलते भी माओवादी सरकार के सामने चुनौती है जिसके चलते उनका तेवर नरम पडा है पर उनकी बात पर भरोसा करना मुश्किल है विशेषकर तब जबकि अपने साक्षात्कार में प्रचण्ड ने भारत और ब्रिटेन जैसे लोकतंत्र को औपचारिक लोकतंत्र बताया है जो सभी वर्गों के लिये प्रतिनिधित्वकारी नहीं है और इस कारण माओवादी नेपाल में बहुदलीय व्यवस्था रखते हुए भी किसी अन्य विकल्प पर विचार करेंगे अर्थात पिछ्ले दरवाजे से अपना एजेण्डा लागू करने की सम्भावना दिखती है। दूसरा खतरनाक पक्ष है कि नेपाल की सेना में माओवादी लडाकों को समायोजित किया जायेगा और इसका आधार केवल प्रचण्ड का केवल यह आश्वासन होगा कि इन लडाकों को पेशेवर बना दिया जायेगा। यह कितना अस्पष्ट आधार है और इसका परिणाम कितना घातक है। जब नेपाल की सेना माओवादी विचार की होगी तो अपने पडोसी पर भारत कितना भरोसा कर सकता है कि वह कब चीन के हाथ का खिलोना न बन जाये। प्रचण्ड यह भी कह्ते हैं कि नेपाल की सेना का आकार भी कम किया जायेगा अर्थात नेपाल के सुरक्षा पूरी तरह माओवादियों के हाथ में होगी।
पहले लोकतंत्र के बने स्वरूप में परिवर्तन फिर सेना में माओवादी लडाकों के भर्ती फिर सेना का स्वरूप छोटा किया जाना अर्थात अधिनायकवादी शासन की पूरी तैयारी। इसके अतिरिक्त प्रचण्ड ने इस बात की गारण्टी भी नहीं दी है कि वे भारत के माओवादियों या नक्सलियों को उनका रास्ता अपनाने की सलाह देंगे उनके अनुसार भारत में नक्सलियों और माओवादियों के लक्ष्य अलग है इसलिये यदि वे उनसे प्रेरित होकर बुलेट छोड्कर बैलेट के रास्ते पर आते हैं तो अच्छा है। इससे साफ जाहिर है कि नेपाल में माओवादियों को समर्थन का असर भारत में नक्सलियों या माओवादियों पर नहीं पड्ने वाला है लेकिन इस बात के पैरवी करने वालों को यह बात समझ में क्यों नहीं आती। कुलमिलाकर नेपाल में स्थिति अब भी साफ नहीं है और माओवादियों को भी अनेक चुनौतियों का सामना करना बाकी है ऐसे में भारत के पास अब भी अवसर है कि वह नेपाल में अपने हित पहचान ले और जो भूल पिछ्ले तीन चार वर्षों में की है उसे सुधार कर नेपाल में माओवादियों की शक्ति कम करने का प्रयास करे। भारत के सहयोग के बिना माओवादियों का नेपाल में शासन करना सम्भव नहीं है इसी कारण प्रचण्ड भारत सरकार को सन्देश दे रहे है कि वह अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों का उपयोग कर नेपाल माओवादियों को आतंकवादी सूची से हटवा दे। लेकिन भारत सरकार को ऐसा कोई कदम उठाने से पहले इसके हानि लाभ पर विचार कर लेना चाहिये।
चुनाव के बाद पाकिस्तान
पाकिस्तान में चुनाव समाप्त हो चुके हैं और मिली जुली सरकार के गठन की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है। पाकिस्तान के चुनावों के उपरांत जो चित्र उभरा है उसके अनुसार पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज गुट को क्रमशः 87 और 66 सीटें प्राप्त हुई हैं इसी के साथ पश्तून बहुल इलाके की पार्टी अवामी नेशनल पार्टी को 10 सीटें प्राप्त हुई हैं जिसके पास 2002 में एक भी सीट नहीं थी। इसी प्रकार 2002 के चुनाव में नवाज की पार्टी के पास केवल 18 सीटें थी जो कि अब 66 पहुँच गयी है। इस प्रकार इस चुनाव में यदि किसी पार्टी को सर्वाधिक लाभ हुआ है तो वह नवाज शरीफ की पार्टी को। पाकिस्तान के चुनाव में आये इस विशेष रुझान की ओर हमें ध्यान देने की आवश्यकता है। नवाज शरीफ की पार्टी जहाँ नवाज के ग्रहनगर पँजाब में बहुत अच्छा प्रदर्शन करने में सफल रही तो वहीं पकिस्तान पीपुल्स पार्टी को बेनजीर भुट्टो के सिन्ध में उतनी सफलता नहीं मिली और उन्हें सहानुभुति का भी विशेष लाभ नहीं मिला। आखिर इस रुझान का कारण क्या हो सकता है। एक तो असिफ अली जरदारी की छवि के चलते पीपीपी को नुकसान हुआ है और उन्हें पँजाब में मुँह की खानी पडी.और दूसरा एक बडा कारण जिसकी ओर लोकमंच के पिछ्ले आलेख में संकेत किया गया था जब नवाज शरीफ पकिस्तान लौटे थे कि बेनजीर भुट्टो का मुशर्रफ से हाथ मिलाना और आतंकवाद तथा धर्मिक कट्टरता के सम्बन्ध में अमेरिका की भाषा बोलना नवाज शरीफ के लिये अधिक सम्भावनाओं का द्वार खोलेगा।
पाकिस्तान के चुनावों पर यदि बारीक निगाह डाली जाये तो पकिस्तान की जनता का मतदान की मतदान की एक विशेष परिपाटी रही है। उनके लिये आम जीवन के मुद्दों पर पर परवेज मुशर्रफ की सरकार के झूठे दावे और बिजली, पानी और रोजगार की बढती समस्या एक प्रमुख मुद्दा था तो दूसरी ओर देश में बढती आतंकवादी घटनाओं के लिये मुशर्रफ की नीतियों को दोषी ठहराया जाना था। पकिस्तान की जनता आतंकवाद से त्रस्त तो है परंतु इस विषय में अपने अनुसार नीतियों का संचालन चाह्ती है न कि अमेरिका के निर्देषों पर। पकिस्तान के मतदाताओं की इसी अभिरुचि का लाभ नवाज शरीफ की पार्टी को विशेष रूप से मिला। पाकिस्तान में अजीब जनादेश या यूँ कहें कि खण्डित जनादेश का प्रमुख कारण पीपीपी का पूरा विश्वास अर्जित न कर पाना और पकिस्तान पीपुल्स पार्टी नवाज गुट क़ा अधिक सशक्त विकल्प बनकर उभरना रहा। इसी प्रकार पश्तून इलाके में विशेष प्रभाव रखने वाली अवामी नेशनल पार्टी भी 2002 में कट्टरपथियों के हाथों पूरी तरह पराजित होने के बाद 10 गुना लाभ अर्जित कर 10 सीटें प्राप्त करने में सफल रही । यह रूझान भी इस तथ्य को प्रतिबिम्बित करता है कि पश्तून इलाके में अभी उदारवादी और वामपंथी रूझान वाली इस पार्टी का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ है। इस बार इस पार्टी ने विशेष रूप से कबायली इलाके के लिये नया नाम पश्तूनिस्तान या ऐसे ही मिलता जुलता नाम और इस पूरे प्रांत के लिये स्वायत्त्ता की मांग को अपना चुनावी एजेंडा बनाया था। यह अपील पूरी तरह काम कर गयी और इस पार्टी को लोगों ने काफी जनादेश दिया।
अब जबकि जनादेश आ चुका है और नयी सरकार के गठन की तैयारी हो रही है तो यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि साथ आने वाले घटक दलों के एजेन्डे क्या रहे हैं और वे आपस में किस आधार पर गठबन्धन सरकार को चला सकते हैं। पकिस्तान पीपुल्स पार्टी की दिवंगत नेत्री बेनजीर भुट्टो ने अमेरिका के इशारे पर राष्ट्र्पति परवेज मुशर्रफ के साथ एक समझौता कर लिया था और उसके अनुसार उन्हें प्रधानमंत्री और मुशर्रफ को राष्ट्र्पति बने रहना था। चुनाव के दौरान बेनजीर की हत्या से अमेरिका की इस नीति को कुछ धक्का लगा क्योंकि अब पकिस्तान की राजनीति में नवाज शरीफ का प्रभाव बढ. गया जो अमेरिका कभी नहीं चाह्ता था। क्योंकि अमेरिका का मानना है कि नवाज शरीफ धार्मिक पार्टियों के साथ अत्यंत सहज हैं और इस्लामी सिद्धांतों में विश्वास रखते हुए सेकुलर राजनीति के लिये उपयुक्त नहीं हैं या दूसरे शब्दों में उन्हे राजनीति के इस्लामीकरण से विशेष परहेज नहीं है। सरकार गठन के उपरांत जो विषय सबकी उत्सुकता का होगा वह यह कि आखिर नये प्रधानमंत्री फहीम मक्दूम सभी सहयोगी दलों के निहित स्वार्थों के मध्य संतुलन कैसे बैठाते हैं।
एक ओर प्रमुख घटक दल पीपीपी को जहाँ अमेरिका से कोई एतराज नहीं है तो वहीं नवाज शरीफ की पार्टी आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध को अपनी शर्तों पर लड.ना चाह्ती है और आतंकवादी गुटों के सफाये में तो अमेरिका का सहयोग चाह्ती है परंतु पकिस्तान के इजराइल के साथ सम्बन्धों को लेकर भी नवाज शरीफ की पार्टी का रूख साफ है कि इस यहूदी देश के साथ पकिस्तान के सम्बन्ध नहीं होने चहिये। इसके अतिरिक्त नवाज की पार्टी की एक और मांग प्रधानमंत्री फहीम को धर्मसंकट में डाल सकती है और वो यह कि राष्ट्रपति मुशर्रफ द्वारा पिछ्ले वर्ष लागू किये गये आपातकाल के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को हटाने के उनके निर्णय को बदल कर उन्हें फिर से अपने पद पर स्थापित करने की मांग भी नवाज की पार्टी की है। आगे चलकर इस मांग पर भी फहीम को निर्णय लेना होगा जो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति संस्था के मध्य टकराव का कारण बन सकता है। पीपीपी तो कम से कम यह टकराव नहीं ही चाहेगी।
सरकार के लिये एक और विषय जो धर्मसंकट का हो सकता है वह एक और सहयोगी अवामी नेशनल पार्टी की मांग को स्वीकार करना कि पश्तून इलाके का नया नामकरण हो और उसे स्वायत्त्ता प्रदान की जाये। इस मांग का विरोध न केवल पँजाबी बहुल लोग करेंगे वरन इससे सेना के पँजाबी प्रभुत्व को भी दीर्घगामी स्तर पर नुकसान हो सकता है इस कारण ऐसे किसी भी प्रस्ताव का सेना भी विरोध कर सकती है जिससे भविष्य में बलोचिस्तान और सिन्ध की स्वायत्त्ता की मांग भी उठ सकती है।
सरकार के गठन से पूर्व इन विरोधाभासों के बाद एक और बात जो अत्यंत महत्वपूर्ण होगी वह यह कि राष्ट्रपति मुशर्रफ इस परिवर्तन को किस प्रकार लेते हैं और नयी सरकार के प्रति क्या रवैया अपनाते हैं। यदि वे सरकार के साथ सहयोग कर चलते हैं तो भी नवाज शरीफ की पार्टी उन्हें किनारे लगाने का प्रयास करेगी क्योंकि नवाज शरीफ का राजनीतिक भविष्य राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के पाकिस्तान की राजनीति में प्रभाव कम होने पर ही निर्भर है जिस मात्रा में मुशर्रफ कमजोर होंगे उसी मात्रा में नवाज शरीफ का राजनीतिक भविष्य उज्ज्वल होगा। पाकिस्तान की नयी सरकार के लिये सबसे बडा काम नवाज शरीफ की राजनीतिक योजना को समझना और उसके साथ संतुलन स्थापित करना होगा। पाकिस्तान की नयी सरकार को तीन राजनीतिक व्यक्तित्वों के साथ सांमजस्य बिठाना है। नवाज शरीफ, असिफ अली जरदारी और फहीम मकदूम। तीनों ही व्यक्तित्व सरकार बनने के उपरांत अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास करेंगें। ऐसे में पीपीपी में जरदारी और फहीम दो शक्ति केन्द्र बनकर उभरने की सम्भावना है जो पार्टी के दीर्घकालिक हितों के लिये ठीक नहीं होगा।
कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पकिस्तान की जनता ने अपने नेताओं को एक अवसर प्रदान किया है जहाँ से वे पकिस्तान को लोकतंत्र की ओर ले जा सकते हैं और आशा का सूरज दिखा सकते हैं। अब यह देखने की बात होगी कि ये नेता इस अवसर का लाभ उठा पाते हैं या फिर पकिस्तान के लोकतंत्र का वही पुराना हश्र होता है। क्योंकि जिस प्रकार के बयान पुरानी सरकार के मंत्रियों के आ रहे हैं उससे लगता है कि वे इस गठबन्धन के अंतर्विरोधों से इस सरकार के शीघ्र गिरने के स्वप्न अभी से देखने लगे हैं।
भारत-पाक शान्ति वार्ता
हवाना में सम्पन्न हुये निर्गुट सम्मेलन में भारत के प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने एक बार फिर बातचीत का दौर आरम्भ किया है जो जुलाई माह में मुम्बई मे हुये बम धमाकों के बाद स्थगित हो गई थी. इस बातचीत को भारत और पाकिस्तान दोनों ही सरकारें अपने जनसम्पर्क अभियान के माध्यम से एक उपलब्धि रूप में चित्रित कर रही हैं.
एक ओर जहाँ बलूचिस्तान में नवाब बुग्ती की पाकिस्तानी सेना द्वारा हुई हत्या और वजीरिस्तान में तालिबानी आतंकवादियों से समझौते के बाद संयुक्त विपक्ष का सामना कर रहे पाकिस्तानी राष्ट्रपति अपनी स्थिति मजबूत करने के लिये कश्मीर का कार्ड खेल रहे हैं तो वहीं भारत के प्रधानमन्त्री पाकिस्तान से बातचीत का क्रम आरम्भ कर देश के समक्ष आतंकवाद का विकल्प प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं. ऐसे में यह वार्ता दोनों शासनाध्यक्षों की मजबूरी को अधिक बयान करती है.
पाकिस्तान के राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद भारत के प्रधानमन्त्री ने जिस प्रकार पाकिस्तान को भी आतंकवाद से पीड़ित बताकर आतंकवाद से लड़ने में दोनों देशों की साझा कोशिशों के लिये कार्य पद्धति विकसित करने की बात की तो उनकी बात में स्वतन्त्र सम्प्रभु राष्ट्र के प्रतिनिधि से अधिक कुछ अदृश्य महाशक्तियों के स्वर ध्वनित हुये. प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के बयान के बाद पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायुक्त शंकर मेनन ने मुम्बई ब्लास्ट में पाकिस्तान को क्लीन चिट देते हुये कहा कि भारत ने इन विस्फोटों के लिये पाकिस्तान को कभी दोषी नहीं ठहराया. यह बयान उन दावों के विपरीत है जिनमें महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री सहित देश के अनेक जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों ने न केवल पाकिस्तान पर अँगुली उठाई थी वरन इस सम्बन्ध में ठोस सबूत होने की बात की थी. अब नवीनतम बयान से साफ है कि भारत की नीति में आये इस परिवर्तन के पीछे कुल और खिलाड़ी भी हैं. मजबूरी की इस वार्ता को आरम्भ करने से एक बड़ा प्रश्न फिर खड़ा हुआ है कि भारत ने बातचीत में आज तक क्या प्राप्त किया है और पिछले असफल प्रयोगों के बाद भी बातचीत केवल बातचीत के लिये क्यों की जाती है. इस सम्बन्ध में एक अनुमान यह होता है कि भारत-पाकिस्तान विषय में वार्ता की मेज पर जाने से पहले भारत का कोई गृहकार्य नहीं होता. अभी तक भारत-पाकिस्तान विवाद की मूल भावना को समझने और उसके समाधान का कोई गम्भीर प्रयास कभी हुआ ही नहीं. पिछले कुछ वर्षों में आगरा शिखर वार्ता से हवाना में हुई भेंट तक वार्ता एक राजनीतिक पड़ाव से अधिक कुछ सिद्ध नहीं हो पाता.
इसका एक बड़ा कारण समस्या को रिजाल्व करने के स्थान पर उसे डिजाल्व करने में बढ़ती रूचि है. भारत के साथ पाकिस्तान के विवाद की तुलना यदि इजरायल-फिलीस्तीन विवाद से करें तो इस सम्बन्ध में स्थिति कुछ हद तक स्पष्ट हो सकती है. हालांकि इजरायल-फिलीस्तीन के विवाद का स्वरूप कुछ भिन्न भले हो परन्तु इजरायल की भी सबसे बड़ी समस्या पड़ोसी अरब देशों द्वारा इजरायल के अस्तित्व को अस्वीकार करते हुये उसे अपने ऊपर थोपा गया मानने की है, यद्यपि भारत के साथ ऐसी समस्या तो नहीं है परन्तु पाकिस्तान के अस्तित्व का आधार भारत विरोध है जहाँ का शासन और धार्मिक तन्त्र कुछ काल्पनिक मिथकों के जरिये पाकिस्तान का इतिहास निर्मित कर उसे इस्लामी पहचान देकर भारत को एक हिन्दू खलनायक के रूप में अपने देशवासियों के समक्ष खड़ा करता है.
1948 में इजरायल की निर्मिति के पश्चात 1967 में छह दिन के युद्ध में ही अरब देशों को पराजित करने के बाद अमेरिका में इजरायल को अपना रणनीतिक साथी माना जाने लगा और बिडम्बना है कि अमेरिका का मित्र बनने के बाद इजरायल को 1992 के बाद से स्वयं को अनेक क्षेत्रों से स्वेच्छया हटना पड़ा है, पहले लेबनान में गोलन पहाड़ियों से वापसी, फिर गाजा क्षेत्र से वापसी और अब येहुद ओलमर्ट द्वारा जेरूसलम के विभाजन का प्रस्ताव. फिलीस्तीन के साथ शान्ति प्रयासों के क्रम में अमेरिका के प्रस्तावों पर कभी ओस्लो फार्मूला और कभी कैम्प डेविड शिखर वार्ता में इजरायल ने फिलीस्तीन को एक पर एक छूट दी जिसका परिणाम फिलीस्तीन में इन्तिफादा और इजरायल की सीमाओं तक लेबनान के आतंकवादी संगठन हिजबुल्लाह की पहँच के रूप में सामने आया. इजरायल के विश्लेषक मानते हैं कि फिलीस्तीन को छूट देने की प्रवृत्ति के चलते अरब देशों के अनेक कट्टरपंथी संगठनों को भरोसा हो चला है कि अब इजरायल में वह धार नहीं रही और उससे मुकाबला आसान है और इसी का परिणाम है कि इजरायल को नष्ट करने की बातें अधिक खुलकर होने लगी हैं.
भारत-पाकिस्तान समस्या के मूल में भी कश्मीर मुद्दा नहीं है मुद्दा है पाकिस्तान का अलोकतान्त्रीकरण . पाकिस्तान के शासन तन्त्र और सामाजिक तन्त्र पर मुल्ला मिलिट्री गठबन्धन का नियन्त्रण. इसी गठबन्धन के कारण पाकिस्तान में लोकतान्त्रिक संस्थाओं का विकास नहीं हो सका है. भारत को पाकिस्तान में लोकतान्त्रिक सिद्धान्तों जैसे नागरिकों के मूल अधिकार, स्त्री अधिकार, व्यक्तिगत अधिकार, स्थानीय निकायों को अधिक प्रतिनिधित्व , अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा, अभिव्यक्ति की स्वन्त्रता और सूचना के अधिकार को सशक्त करने के लिये विशेष प्रयास करने चाहिये ताकि जनता लोकतन्त्र की ओर प्रवृत्त हो सके. इसके लिये भारत को अहस्तक्षेप की अपनी पुरानी नीति का परित्याग कर अपने हितों की रक्षा के लिये दूसरे देशों की नीतियों को प्रभावित करने कीनई नीति का विकास करना चाहिये.
यदि अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिये मध्य पूर्व की नीतियों और सरकारों को अपने अनुकूल चलाने की नीति को राष्ट्रीय हित में उचित ठहराता है और चीन अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिये तिब्बत को हजम कर सकता है तो भारत को अपने पड़ोसी देशों की नीतियों प्रभावित करने का अधिकार क्यों कर नहीं मिलना चाहिये.
भारत को पाकिस्तान के सम्बन्ध में अल्पकालिक नीतियों का परित्याग कर दीर्घगामी नीति का अनुपालन करते हुये पाकिस्तान के लोकतान्त्रीकरण का प्रयास करना चाहिये और इसके लिये पाकिस्तान की लोकतन्त्र समर्थक शक्तियों को नैतिक, सामरिक और आर्थिक हर प्रकार की सहायता देने का प्रयास करना चाहिये, अन्यथा महाशक्तियों के दबाव में पाकिस्तान को छूट देते हुये हम पाकिस्तान के इस्लामी साम्राज्यवादी एजेण्डे से घिर जायेंगे.

