कश्मीर समस्या के विविध आयाम

इन दिनों कश्मीर समस्या एक बार फिर पूरे विकराल् स्वरूप के साथ हमारे समक्ष उपस्थित है। आज कश्मीर समस्या का जो स्वरूप हमें दिखाई दे रहा है उसके अनेक ऐतिहासिक कारण हैं जिनकी चर्चा समय समय पर होती रहती है परंतु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज भी कश्मीर हमारे समक्ष इतिहास के अनसुलझे प्रश्न की तरह मुँह फैलाये खडा है।

कश्मीर समस्या निश्चित रूप से देश की स्वतंत्रता के बाद देश के नेतृत्व की उस मानसिकता का परिचायक ही है कि देश का नेतृत्त्व क़िस प्रकार उन शक्तियों के हाथ में चला गया जो न तो भारत को एक सांस्कृतिक और न ही आध्यात्मिक ईकाई मानते थे। वे तो भारत को एक भूखण्ड तक ही मानते थे जिसका सौदा विदेशी दबाव में या अपनी सुविधा के अनुसार किया जा सकता है। आज कश्मीर के सम्बन्ध में यह बात पूरी तरह समझने की है कि कश्मीर भारत की मूल पहचान और संस्कृति का अभिन्न अंग सह्स्त्रों वर्षों से रहा है। कश्मीर के सम्बन्ध में एक बडी भूल यही होती है कि हम इसे भारत का अभिन्न अंग मानते हुए भी इसे एक राजनीतिक ईकाई भर मान कर संतुष्ट हो जाते हैं जिसका इतिहास 194 से आरम्भ होता है। कश्मीर के प्रति भारत का भावनात्मक लगाव जब तक उसकी ऐतिहासिकता के साथ चर्चा मे नहीं लाया जाता तब तक इसका पक्ष अधूरा रहेगा। इसी पक्ष के अभाव के चलते इस समस्या को पूरी तरह राजनीतिक सन्दर्भ में देखा जाता है और भारत का एक वर्ग कहीं न कहीं जाने अनजाने इस सम्बन्ध में हीन भावना से ग्रस्त होता जा रहा है कि कश्मीर में स्वायत्तता या फिर स्वतंत्रता की माँग पर विचार किया जा सकता है। इस प्रकार कश्मीर समस्या का एक आयाम तो उसे उसके सांस्कृतिक सातत्य में न देखने की भूल है। Read more

देश की सेक्युलर राजनीति के पुनर्मूल्याँकन का समय ?

पिछले वर्ष देश में हुए आम चुनावों के बाद से सामान्य तौर पर एक नारा देश की सेक्युलर शक्तियाँ लगा रही हैं कि अब भारत बदल गया है और लोग विकास चाहते हैं और पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति से तंग आ चुके हैं। यह बाद कहते समय जो बात इन तत्वों के ध्यान में रहती है वह यह कि अब विश्व में वैश्वीकरण का युग है और विश्व में एक क्षेत्र को दूसरे से पूरी तरह अलग थलग नहीं रखा जा सकता। ऐसे में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है कि जो कुछ रुझान समस्त विश्व मे हमें देखने को मिल रहा है उस पृष्ठभूमि में ही यदि भारत की राजनीति को समझने का प्रयास किया जाये तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सम्मुख हमारे उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर हमें देना ही होगा। इन प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि सेक्युलर परिभाषा और राजनीति का स्वरूप क्या होना चाहिये? इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार यूपीए सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में और फिर अपने दूसरे कार्यकाल में अभी तक पूरी तरह पश्चिम की शक्तियों के प्रभाव में अपनी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति को क्रियांवित करने का प्रयास किया है ठीक उसके विपरीत आतंकवाद और इस्लाम व मुस्लिम जनता के साथ सम्बन्धों को परिभाषित करने में इस माड्ल को अपनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। Read more

मालेगाँव विस्फोट से मुंतज़र अल जैदी तक

आज प्रातः काल जब एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र उठाकर देखा तो उसमें ठीक एक वर्ष पूर्व मालेगाँव में हुए विस्फोट में मारी गयी एक मुस्लिम बालिका के बारे में बताया गया था कि किस प्रकार उसके सपने अधूरे रह गये। सहानुभूति के इस ढंग पर मैं यह नहीं कहूँगा कि यह समाचार पत्र पक्षपातपूर्ण है क्योंकि इसी समाचार पत्र ने मुम्बई में हुए अनेक विस्फोटों की भी ऐसी ही कहानियाँ प्रकाशित की थीं जिनमें मारे गये लोग हिन्दू थे। मालेगाँव विस्फोट के एक वर्ष पूरे होने पर साध्वी प्रज्ञा सहित 11 लोगों पर मुकदमा चल रहा है और नासिक के एक न्यायालय द्वारा इन आरोपियों पर मकोका हटाये जाने के निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय ने स्टे दे दिया है। फिलहाल महाराष्ट्र एटीएस काफी कुछ साक्ष्य प्राप्त करने का दावा कर रही है देखना है इस मामले में पूरी वास्तविकता कब तक सामने आती है।

बीते एक वर्ष में वैश्विक स्तर पर अनेक परिवर्तन देखने को मिले। एक वर्ष पूर्व इस्लामी आतंकवाद शब्द को लेकर समस्त विश्व के मुसलमान दबाव में आये तो उन्होंने दोतरफा रणनीति अपनाई। एक ओर तो अनेक इस्लामी संगठनों ने फतवे जारी किये और इस्लाम को शांति का धर्म घोषित किया तो दूसरी ओर इस्लामी आतंकवाद शब्द पर आपत्ति करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर समस्त विश्व में अभियान चलाया कि इस शब्द के प्रयोग को रोका जाये क्योंकि यह आतंकवाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश की नीतियों की प्रतिक्रिया है। स्वाभाविक रूप से इसके कुछ परिणाम भी दिखने लगे और भारत में मालेगाँव विस्फोट में कुछ मुस्लिम लोगों के मारे जाने में हिन्दुओं का हाथ होने से भारत में पिछले दो दशक से चल रहा इस्लामी आतंकवाद का बदला पूरा हो गया और यह सिद्ध हो गया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और सभी धर्मों के कुछ कट्टरपंथी अपने धर्म का गलत प्रयोग और व्याख्या कर रहे हैं। कम से कम सामान्य बौद्धिक वर्ग तो इसी निष्कर्ष पर पहुँच गया लगता है।

अमेरिका में इस वर्ष के आरम्भ में इस देश की जनता ने जार्ज बुश की नीतियों को अस्वीकार कर बराक हुसैन ओबामा को नया राष्ट्रपति चुन लिया। जिस देश ने 2003 में इराक में सद्दाम हुसैन को सत्ताच्युत करने के लिये सैनिक अभियान चलाया उसी देश के लोगों ने पाँच वर्ष बाद हुसैन मध्यनामधारी एक व्यक्ति को अपना सर्वोच्च कमांडर चुन लिया तो यह कुछ संकेत ही है। वैसे इस्लामवादी आजकल हर घटनाक्रम का समाधान कुरान से ढूँढ कर दिखा देते हैं। निश्चय ही इसका समाधान उनके पास है कि अब विश्व में काफी कुछ बदलने वाला है।

लेकिन जो बदलाव पिछले एक वर्ष में हुआ है उसकी ओर हमें अवश्य ध्यान देने की आवश्यकता है। पिछले वर्ष के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश जब इराक की अपनी अंतिम यात्रा पर थे तभी एक प्रेसकांफ्रेंस में स्थानीय टीवी चैनल के पत्रकार मुंतजर अल जैदी ने उनके ऊपर जूता फेंक दिया और उसके बाद उनकी गिरफ्तारी हुई लेकिन अब उन्हें छोड दिया गया है। मुंतजर अल जैदी ने जेल से छोडे जाने के बाद एक पत्र में अपने विचार व्यक्त किये जिसका सार संक्षेप यही है कि उनके देश पर एक विदेशी शासन को वे सहन नहीं कर सके, अपने देश के लोगों का खून बहता देख उन्हें सहन नहीं हुआ और उनका व्यवसाय पीछे रह गया और उनकी देशभक्ति उन पर हावी हो गयी।
भारत में भी कुछ पत्रकारों ने इसे अनूदित किया और उसे यहाँ वहाँ प्रकाशित किया। कुछ मुस्लिम पत्रकारों की इस विषय में रुचि अवश्य आश्चर्यचकित करती है कि एक इराकी व्यक्ति की देशभक्ति से इतना प्रभावित होने के पीछे क्या आशय है?

मुंतजर अल जैदी को जिस प्रकार समस्त विश्व में सहानुभूति मिली और देखते देखते जार्ज बुश को खलनायक बना दिया गया वह एक विशेष मानसिकता की ओर संकेत करता है जिसका शिकार समस्त विश्व पिछले अनेक दशकों से होता चला आ रहा है और वह मानसिकता है प्रताडित होने का प्रदर्शन करने की। आज समस्त विश्व में यह भाव देखा जाता है कि अपराधी, उग्रवादी, आतंकवादी स्वयं को तर्कों के सहारे न्यायसंगत सिद्ध करने का प्रयास करते हैं और समस्त मीडिया, मानवाधिकार संगठन, बौद्धिक वर्ग उनके प्रति सहानुभूति का भाव रखता है।

वास्तव में द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत युद्ध नीति में आया यह बडा परिवर्तन है। इससे पूर्व दो महायुद्धों में विजित पक्ष अपनी शक्ति, पराक्रम, क्र्रूरता का प्रदर्शन कर शत्रु पक्ष के ह्रदय में भय उत्पन्न करता था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पारम्परिक युद्ध का स्वरूप बदल गया और विशेष रूप से शीतयुद्ध के काल में शक्ति संतुलन का सिद्धांत विकसित हुआ जिसके चलते युद्ध का स्थान लोगों का मन होने लगा। मीडिया, पुस्तक, बौद्धिक वर्ग और छवि निर्माण के लिये प्रचार तंत्र के सहारे युद्ध जीता जाने लगा। शीत युद्ध के दौरान समस्त विश्व में रूस की खुफिया एजेंसी और अमेरिकी खुफिया एजेंसी के बीच इसी प्रकार का छवि निर्माण का दौर चला। शीत युद्ध काल में कम्युनिज्म के प्रभाव के चलते विश्व के अनेक क्षेत्रों में कम्युनिष्ट विचारधारा से प्रभावित लोगों ने प्रताडित होने के भाव को पूरे बौद्धिक जगत में एक सिद्धांत के रूप में स्थापित किया ताकि राज्य व्यवस्था को प्रताडित करने वाला बता कर क्रांति और उपद्रव को न्यायसंगत सिद्ध किया जा सके। इसी का परिणाम है कि कम्युनिष्ट आन्दोलन के लिये सहयोगी तत्वों को अत्यंत निरीह, शोषित और प्रताडित सिद्ध किया जाता रहा है और कम्युनिष्ट आन्दोलन के लिये हथियार उठाने वालों को न केवल महिमामंडित किया जाता है वरन उनके गिरफ्तार होने या मारे जाने पर प्रताडित होने का भाव वाला सिद्धांत आगे रखकर समस्त मीडिय़ा, बौद्धिक जगत, मानवाधिकार संगठन एकजुट होकर उनके प्रति सहानुभूति का वातावरण बनाने का प्रयास करने लगते हैं।

पूरे विश्व में वामपंथ और दक्षिणपंथ का विभाजन कर दिया गया है और मानवाधिकार, नारी अधिकार, पर्यावरण विषय, पशु प्रेम, अल्पसंख्यक अधिकार,सर्वहारा अधिकार, व्यवस्था परिवर्तन् सहित सभी विषय वामपंथ की झोली में डाल दिये गये हैं । इससे उदारवादी वामपन्थी जिनका कम्युनिष्टों से कोई वास्ता नहीं है जैसे यूरोप के वामपंथी वे भी इस वैश्विक बहस में अनजाने ही हिस्सा बन जाते हैं।

वर्तमान युग में छवि निर्माण और प्रताडित होने के भाव से सहानुभूति प्राप्त कर एक ऐसे अन्यायपूर्ण वातावरण का निर्माण हो गया है कि कुछ पक्षों को पूरी तरह निर्दोष और कुछ को नरभक्षी मान लिया गया है। आज कोई भी निर्णय न्याय के आधार पर करने के स्थान पर प्रचार तंत्र के प्रभाव में आकर भावुकता के वशीभूत होकर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर किया जाता है।

समस्त विश्व में इस्लाम को निशाना बनाया जा रहा है। अमेरिका, पश्चिम और इजरायल उसे नष्ट करना चाहते हैं। भारत का मुसलमान अत्यंत गरीब और पिछडा है। आतंकवाद का किसी मजहब से कोई लेना देना नहीं वह तो गरीबी और बेबसी के शिकार लोग अपनी कुंठा में कर रहे हैं। अमेरिका और इजरायल जो कुछ फिलीस्तीनियों के साथ कर रहे हैं उसके बाद उनके विरुद्ध आतंकवाद न्यायसंगत है। ये कुछ इसी प्रकार के तर्क हैं जो बौद्धिक वर्ग और मीडिया के ह्र्दय में उतर चुके हैं।

वर्तमान युग में प्रचार तन्त्र का उपयोग किस प्रकार स्वयं को प्रताडित सिद्ध करने के लिये किया जाता है इसके कितने ही उदाहरण हमारे पास है। विश्व भर के इस्लामवादियों ने कहा कि इजरायल और अमेरिका की खुफिया एजेंसियों ने स्वयं ही 11 सितम्बर की घटना कर ली ताकि इस्लाम के विरुद्ध युद्ध किया जा सके और तेल के स्रोतों पर नियंत्रण किया जा सके। इसी प्रकार भारत में गोधरा में कारसेवकों को साबरमती रेलगाडी में जलाये जाने के बाद हुए दंगों के बाद स्वयं को प्रताडित सिद्द करने के लिये इस्लामवादियों और मुस्लिम पक्ष की ओर से तर्क आया कि रेल में आग तो अन्दर से लगी थी। फिर भारत में 2004 से लेकर लगातार हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमणों के बाद इनकी ओर से तर्क आया कि यह कार्य भी हिन्दू संगठनों का है। ऐसे ही न जाने कितने प्रचार विश्व भर में मुसलमानों के मध्य किये जाते हैं ताकि स्वयं को प्रताडित दिखाकर न केवल सहानुभूति प्राप्त की जाये वरन आतंकवाद को न्यायसंगत सिद्ध कर शेष समाज और सरकार पर दबाव डाला जाये कि हमारी प्रताडना और आर्थिक व सामाजिक अवनति का कारण आप लोग हैं इसलिये हमारे साथ विशेष व्यवहार हो और विशेषाधिकार दिया जाये। यदि यही तर्क है तब तो भारत में पिछडों और दलितों को मुस्लिम समाज से अपना अधिकार माँगना चाहिये कि 700 वर्षों तक उनके शासन में रहने के बाद भी उनका जीवन स्तर क्यों नहीं सुधरा?

मुंतजर अल जैदी के जूते के प्रति समस्त विश्व के बौद्धिक और मीडिया वर्ग ने जो सहानुभूति दिखाई उसने कभी सोचा कि इसका दूसरा पक्ष भी है। कोई भी सिद्धांत , देश या धर्म पूरी तरह निरपेक्ष सहानुभूति का पात्र कैसे हो सकता है और कोई भी सिद्धांत, देश , धर्म सतत निन्दा का पात्र कैसे हो सकता है। ये स्थितियाँ तो देश काल परिस्थितियों के सापेक्ष होती हैं। लेकिन समाज के बौद्धिक वर्ग और मीडिया के साथ यही हो रहा है। यदि मालेगाँव में विस्फोट करने वाले तर्क दें कि पिछले चार वर्षों से जिस प्रकार निर्दोष हिन्दुओं को निशाना बनाया गया और खुलेआम मीडिया में ईमेल के जरिये हिन्दू धर्म के विरुद्ध जेहाद की बात की गयी उससे हमारा मन बेचैन हो गया और हम सुध बुध खो बैठे और हमें लगा कि यदि अब सरकार कुछ नहीं कर सकती तो हिन्दुओं की रक्षा का दायित्व हमें अपने हाथों में लेना होगा। जरा कल्पना करिये कि बौद्धिक वर्ग और मीडिया की प्रतिक्रिया क्या होगी? लेकिन यदि इसी भाव से इराक का पत्रकार अमेरिका के सर्वोच्च सेनापति के ऊपर जूता फेंकता है तो उसे महिमामंडित किया जाता है। क्योंकि यह जूता अमेरिका पर फेंका गया है। मुंतजर अल जैदी के हाथ में उस समय केवल जूता था सो उसने फेंक दिया और जिसके हाथ में हथियार है वह जेहाद कर रहा है। अधिक तो छोडिये जरा कल्पना करिये कि भारत में कोई हिन्दू पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री पर जूता फेंक दे तो कितने पत्रकार उसे शाबासी देंगे।

प्रचार के इस युग में जिस प्रकार प्रताडित किये जाने का भाव निर्माण कर आतंकवाद का प्रच्छन्न युद्ध जीता जा रहा है उससे सावधान रहने की आवश्यकता है। मीडिया , सरकारें, मानवाधिकार संगठन सहित बौद्धिक समाज इसी ग्रंथि का शिकार है और सहज रूप में कभी माओवादी नेताओं, कभी संसद पर आक्रमण के लिये दोषी तो कभी मुम्बई में सैकडों निर्दोषों को जान लेने वाले के लिये मानवीय आधार पर सोचने लगते हैं। यही इस युद्द की सबसे बडी विजय है। इस तथ्य को हमें समझना होगा।

आज युद्ध के परम्परागत स्वरूप को भूलकर नये सन्दर्भ में इसे समझने की आवश्यकता है। आज इस्लामी आतंकवाद और माओवाद को पराजित करने में इसीलिये कठिनाई हो रही है क्योंकि फासिस्टों, कम्युनिष्टों और नाजियों की भाँति इसका संचालन एक देश नहीं कर रहा है किस उस पर आक्रमण कर आप इसे नष्ट कर सकते हैं। आज इस्लामवाद और जेहाद किसी ओसामा बिन लादेन या जवाहिरी तक सीमित नहीं है यह ब्लागों, समाचार पत्रों, कालेज कैम्पसों, चैट रूम, एसएमएस से लेकर सभी आधुनिक सूचना तकनीकों तक पहुँच चुका है। जो भी किसी न किसी प्रकार मुस्लिम उत्पीडन के सिद्धांत को पुष्ट करता है या इस्लामिक सर्वोच्चता के सिद्धांत को प्रचारित करने का प्रयास करता है वह जाने अनजाने इस्लामवादी आन्दोलन को सशक्त कर रहा है। यही तथ्य माओवाद के सम्बन्ध में भी सत्य है। जिस प्रकार कोबाद गाँधी और लालगढ में माओवादियों की गिरफ्तारी पर मीडिया ने इनके प्रति सहानुभूति का रवैया अपनाया है वह चिंता का विषय है। लेकिन इसका समाधान सरकारी सेंसरशिप भी नहीं है इसका समाधान यही है कि उन तटस्थ लोगों को इन आत्ंकवादी आन्दोलनों की इस बौद्धिक खुराक की वास्तविकता से परिचित कराया जाये ताकि सहानुभूति के प्रवाह में बहने से पहले यह जाँच लें कि न्यायपूर्ण क्या है?

आज वैश्वीकरण, अमेरिका, इजरायल और हिन्दुत्व का विरोध करना तो आम फैशन है क्योंकि आप बौद्धिक विरादरी में तभी स्थान पा सकते हैं जब आपमें ये योग्यतायें हों। लेकिन जो लोग अपने कम्प्यूटर पर बैठकर इन तत्वों की आलोचना करते हैं उसी का लाभ उठाकर ऐसा कर पा रहे हैं। वैश्वीकरण ने राष्ट्र, राज्य, सरकार और सेंसरशिप जैसी परिकल्पनाओं को कालबाह्य कर दिया है और व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता प्रदान की है। जिस वैश्वीकरण के विरोध में कम्युनिष्ट और समाजवादी लामबन्द होते हैं क्या वे स्वतंत्रता के इसी सिद्धांत का पालन करने देंगे?

अमेरिका और इजरायल ने मध्य पूर्व में इस्लामवादी आन्दोलन को संगठित होने से रोक रखा है जिससे भारत में लोग सुकून से बैठकर अर्थसाधना कर पा रहे हैं। क्योंकि तेल अवीव से नई दिल्ली तक केवल दो लोकतांत्रिक देश हैं भारत और इजरायल और यही तथ्य यह प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त है कि इस क्षेत्र में इजरायल न हो तो भारत की सुरक्षा पर क्या प्रभाव होगा?

भारत में इस बात को काफी प्रचारित किया गया है कि इस्लामी आतंकवाद के वैश्विक स्वरूप से भारत को कोई खतरा नहीं है क्योंकि यह अरब देशों में पश्चिम की इजरायल परस्त नीतियों और उनके देशों में पश्चिम सैनिकों की तैनाती की प्रतिक्रिया है। लेकिन वास्तविकता तो यह है कि मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया की इस्लामवादी शक्तियों के साथ भारत के मुस्लिम संगठनों की सहानुभूति का पुराना इतिहास है। अंग्रेजों के समय 1909 से खिलाफत की पुनर्स्थापना के लिये भारत में अल्लामा इकबाल ने जबर्दस्त आन्दोलन चलाया और अंग्रेजों के विरुद्ध तुर्क सेना के लिये हर प्रकार की सहायता की। शाह वलीउल्लाह ने तो अंग्रेजों के विरुद्ध ईरान के शाह और अफगानिस्तान के शासकों को भारत पर आक्रमण के लिये मनाने का प्रयास किया। जिन दिनों मिस्र में सैयद कुत्ब मुस्लिम ब्रदरहुड के द्वारा जिहादी इस्लामी आतंकवादी आन्दोलन की पृष्ठभूमि रख रहे थे उसी कालखण्ड में भारतीय उपमहाद्वीप में मौदूदी जमायते इस्लामी की नींव रख रहे थे।
यह बात सत्य है कि 700 वर्षों तक भारत में शासन करने के दौरान इस्लाम ने अपने स्वरूप में कुछ परिवर्तन किया था और सूफी इस्लाम ने उसमें आध्यात्मिकता का कुछ पुट भर दिया था और अनेक मुगल शासकों ने अपनी अनेक विवशताओं के चलते शरियत के साथ कुछ समझौते किये थे परंतु अंग्रेजों के हाथ में शासन जाने के बाद भारत में जो भी जिहादी आन्दोलन चला वह वैश्विक इस्लामी आन्दोलन से गहराई से जुडा था और इसका उद्देश्य खिलाफत संस्था की पुनर्स्थापना, भारत को पुनः इस्लामी राज्य बनाना और कुरान और शरियत के आधार पर शासन व्यवस्था स्थापित करना था। इसलिये भारत के सम्बन्ध में यह तर्क सत्य से पूरी तरह परे है कि मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया की इस्लामी राजनीति या आन्दोलन का भारत के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। आज की परिस्थितियों में सूचना के अबाध प्रवाह के चलते यह और भी सरल हो गया है कि मध्य पूर्व की राजनीति के साथ स्वयं को जोडे रखा जाये।

इजरायल की निन्दा का दौर फिर आरम्भ

पिछले वर्ष इजरायल द्वारा हमास के विरुद्ध गाजा में की गयी कार्रवाई को लेकर समस्त विश्व ने इजरायल की निन्दा की थी। इजरायल की इस कार्रवाई पर संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार परिषद ने जो इस विश्व संस्था की नवोदित संस्था है उसने दक्षिण अफ्रीका के रिचर्ड गोल्ड्स्टोन के नेतृत्व में एक जाँच समिति निर्मित की थी जिसकी जाँच रिपोर्ट बीते दिनों 15 सितम्बर को प्रकाशित हुई। इस जाँच रिपोर्ट को लेकर दो प्रकार की प्रतिक्रियायें आनी स्वाभाविक थीं। एक ओर इजरायल ने जहाँ इस रिपोर्ट को एकतरफा और पूर्वाग्रहपूर्ण बताया है वहीं इजरायल विरोधी इसे इजरायल की निन्दा का एक और हथियार मानकर चल रहे हैं। वैसे अपनी स्थापना के बाद से पिछले 6 दशक में इजरायल की इतनी निन्दा हुई है कि अब इस देश को भी इस निन्दा की परवाह नहीं करनी चाहिये।

गोल्डस्टोन रिपोर्ट को लेकर इजरायल ने जो आपत्तियाँ उठाई हैं उनपर ध्यान दिये बिना इस रिपोर्ट को पूरी तरह स्वीकार कर लेना और इजरायल को युद्ध अपराधी मान लेना न तो नैतिक दृष्टि से उचित है और न ही अकादमिक दृष्टि से ही उचित है। गोल्डस्टोन रिपोर्ट पर विश्व भर में हुई प्रतिक्रिया पूरी तरह एकतरफा और भावुक है जिसमें इजरायल को पहले से ही दोषी सिद्ध किया जा चुका है। इजरायल ने जब गाजा पर कार्रवाई की थी तभी यह मान लिया गया था कि फिलीस्तीनी और हमास निर्दोष है और इजरायल फिलीस्तीन में नरसंहार कर रहा है। इसलिये पूरी तरह स्पष्ट है कि यदि गोल्ड्स्टोन रिपोर्ट में इजरायल पर आरोप न लगाये जाते तो शायद आज जो लोग गोल्डस्टोन की प्रशंसा करते नहीं थकते वही उसे अमेरिका और इजरायल का एजेण्ट सिद्द करने में पीछे नहीं रहते। इस रिपोर्ट को नकारते हुए इजरायल ने जो तर्क दिये हैं उन पर ध्यान तो दिया ही जा सकता है। जिस मानवाधिकार परिषद ने इस जाँच समिति को बनाया था वह पहले ही गाज़ा में इजरायल की कार्रवाई को युद्ध अपराध बताकर निन्दित कर चुकी थी ऐसे में इस परिषद की निष्पक्षता को सन्देह के दायरे से बाहर कैसे माना जा सकता है जब इसने जाँच आयोग बनाने से पूर्व ही इजरायल के सम्बन्ध में अपनी राय व्यक्त कर दी थी।

इसी प्रकार कुछ अन्य बातें भी हैं जिसके चलते इस जाँच रिपोर्ट को जाँच से अधिक एक राजनीतिक वक्तव्य माना जा सकता है। जाँच रिपोर्ट में हमास की ओर से पिछले कुछ वर्षों में फिलीस्तीन से दागे गये 1200 राकेटों का उल्लेख तक नहीं किया गया है और इसी के साथ जिस गाजा में हमास का इतना प्रभाव है वहाँ के लोगों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे जाँच समिति के समक्ष गवाही में किसी भी प्रकार से हमास के विरुद्ध कोई बात कहते जबकि पूरे अभियान में बात सामने आयी थी कि हमास ने सामान्य नागरिकों को आगे कर रखा था ताकि उनके मरने पर इसे नरसंहार बताया जा सके।

जिस प्रकार रिपोर्ट में हमास की उकसाने वाली कार्रवाई और 1200 राकेट अपने क्षेत्र में दागे जाने के बाद भी संयम बनाये रखने की इजरायल के पक्ष को पूरी तरह नजरअन्दाज किया गया है उससे तो यही खतरा उत्पन्न हो गया है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिये राज्यप्रायोजित आतंकवाद से निपटने के लिये आत्मरक्षा की कार्रवाई करना अत्यंत कठिन हो जायेगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार परिषद ने एक बार फिर उस मानसिकता का परिचय दिया है जो पूरी तरह विरोधाभासी है। वर्तमान समय में जब कुछ देश धर्म को एक राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग कर इस नीति को अपनी विदेश नीति का अंग बना रहे हैं तो ऐसे में किसी भी प्रतिरोध पर प्रश्नचिन्ह खडा करने से पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ या मानवाधिकार संगठन यह तो बतायें कि इस इस्लामवादी मानसिकता और इसके पीछे छुपे उद्देश्यों का मुकाबला कैसे किया जाये?

एक ओर समस्त विश्व में वामपंथी और इस्लामवादी बौद्धिक वर्ग गोल्डस्टोन रिपोर्ट पर इतना बावेला मचा रहा है वहीं ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के खुलेआम इजरायल को नष्ट करने की धमकी पर चुप है। अभी कुछ दिन पूर्व ही ईरान के राष्ट्रपति ने यूरोप में हुए यहूदी नरसंहार को एक काल्पनिक और तथ्य से परे बात कहा और इस आधार पर इजरायल के अस्तित्व को चुनौती दी। वास्तव में महमूद अहमदीनेजाद की बात को लेकर वे लोग उत्साहित हो सकते हैं जो वर्षों से इस्लाम के गठबन्धन से अमेरिका और पूँजीवाद को नष्ट करना चाहते हैं लेकिन विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि धार्मिक उन्माद के आधार पर स्थापित की गयी कोई व्यवस्था कितनी विनाशकारी होती है ।

समस्त विश्व में सोवियत रूस के पतन के बाद और वैश्वीकरण के विस्तार के बाद कम्युनिज्म के लिये वैचारिक धरातल पर कुछ बचा ही नहीं और अब कम्युनिज्म का एक ही आधार है अमेरिका विरोध। समस्त विश्व में वामपंथियों ने इस्लामवादी आन्दोलन के साथ मिलकर राजनीतिक इस्लाम को मजबूत करना आरम्भ किया है और भारत में यही कम्युनिष्ट बुद्धिजीवी धीरे धीरे माओवादियों और नक्सलियों के साथ इस्लामवाद और राजनीतिक इस्लाम को सशक्त कर रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में वैश्वीकरण के विस्तार के साथ विचारधाराओं के एजेण्डे भी वैश्विक हो रहे हैं। इसी सन्दर्भ में अब वैश्विक स्तर पर इजरायल और फिलीस्तीन विवाद में इजरायल का विरोध करना वामपन्थी होने का पहला लक्षण है इसलिये इजरायल की निन्दा करते हुए इस्लामवादियों को संतुष्ट रखते हैं। कम्युनिष्टों को लगता है कि अब समय आ गया है कि इस्लाम के आधार पर ब्याजमुक्त अर्थव्यवस्था की अवधारणा का समर्थन किया जाये ताकि पूँजीवाद को ध्वस्त किया जा सके।

वैश्विक स्तर पर वामपंथियों का इजरायल विरोध काफी पुराना है लेकिन भारत में इसके बारे में अधिक चर्चा तब से होने लगी जबसे 1991 में भारत ने इजरायल के साथ राजनयिक सम्बन्ध आरम्भ किये। भारत में कम्युनिज्म और इस्लाम का गठबन्धन काफी पुराना है और कम्युनिष्टों को सदा से यही लगा कि भारत में यदि कम्युनिज्म को स्थापित करना है तो भारत का मूल हिन्दू स्वरूप नष्ट करना होगा और इसलिये उन्होंने सेक्युलरिज्म की आड में भारत के इतिहास को पराजय की मानसिकता से भर दिया और इस्लाम को एक विजेता के धर्म के रूप में स्थापित किया। इसी गठबन्धन के चलते इजरायल के साथ रणनीतिक समानता होते हुए भी भारत को उसे राजनयिक दर्जा देने में 4 दशक से भी अधिक समय लग गया। अब इजरायल को राजनयिक दर्जा मिलने के बाद कम्युनिष्ट इस विषय को राजनीतिक और बौद्धिक दोनों मंचों पर एकसाथ उठाते हैं। पिछले दिनों सम्पन्न लोकसभा चुनाव में केरल में अनेक मुस्लिम संगठ्नों ने खुलकर कम्युनिष्टों का साथ दिया और वर्तमान केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर को हराने के लिये कम्युनिष्ट और मुस्लिम संगठन गोलबन्द हुए थे क्योंकि उन पर आरोप था कि वे इजरायल समर्थक हैं।

विश्व स्तर पर और भारत में इजरायल की निन्दा के फैशन को कम्युनिष्ट और इस्लामवादी प्रभाव के रूप में आँकना चाहिये। गोल्ड्स्टोन रिपोर्ट को लेकर यूरोप में जो प्रतिक्रिया आयी उससे स्पष्ट है कि यूरोप में कम्युनिष्ट प्रभाव क्षीण हो रहा है। भारत में अब भी बडी मात्रा में कम्युनिष्ट विचार के लेखक और पत्रकार हैं जो विचारधारा के स्तर पर इजरायल की निन्दा करते हैं लेकिन उसका आधार केवल इस्लामवादी आन्दोलन को सशक्त करना और उनके साथ एकता प्रदर्शित करना होता है। वैसे भारत में पश्चिम की तर्ज पर अनेक उदारवादी-वामपंथी भी हैं जो अपनी सार्वजनिक छवि को ध्यान में रखते हुए इजरायल विरोधी दिखना पसन्द करते हैं और व्यक्तिगत रूप से इजरायल की प्रशंसा करते हैं और उसकी प्रगति का पूरा लाभ उठाते हैं। यह वर्ग इजरायल की निन्दा किसी वैचारिक प्रतिबद्धता से अधिक राजनीतिक रूप से सही होने की ललक के कारण करता है परंतु जो कम्युनिष्ट इजरायल की निन्दा करते हैं वे बौद्धिक वास्तव में इस्लामवाद के साथ हैं और राजनीतिक इस्लाम का वर्चस्व बढता हुआ देखना चाहते हैं। यह वही वर्ग है जो भारत में हिन्दुत्व को भी गाली देते नहीं थकता, परंतु नक्सलवाद को व्यवस्था परिवर्तन का एक आन्दोलन मानता है।

भारत के सन्दर्भ में इजरायल के साथ सम्बन्धों का क्या महत्व है इस बात पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिये न कि इस बात पर कि इजरायल के बारे में समस्त विश्व का मुस्लिम समाज क्या सोचता है? भारत को अपनी सामरिक, रणनीतिक और विदेश नीति सम्बन्धी प्राथमिकतायें निर्धारित करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उसका हित किसमें है न कि अरब के मुसलमानों का हित किसमें है। आखिर इतने वर्षों में भारत के किसी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ने इजरायल की यात्रा नहीं की, संयुक्त राष्ट्र संघ में सदैव इजरायल विरोधी प्रस्ताव का समर्थन किया लेकिन भारत में 15 प्रतिशत से भी अधिक मुस्लिम जनस्ंख्या होने के बाद भी उसे आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कांफ्रेंस की सदस्यता नहीं मिली तो इसी कारण कि यह संगठन भारत के सभी प्रयासों के बाद भी इसे मुसलमानों का प्रतिनिधि नहीं मानता। इसी प्रकार इजरायल- अरब संघर्ष में अरब देशों का साथ देने के बाद भी ओआईसी ने सदैव कश्मीर मसले पर पाकिस्तान का पक्ष लिया क्यों क्योंकि यह संगठन मुद्दों को धर्म के आधार देखता है और भारत को गैर इस्लामिक देश मानकर उसे अपने से बाहर रखता है। इसके विपरीत भारत ने इजरायल के विषय को अपनी राष्ट्र्रीय नीति के बजाय एक धार्मिक विषय बना दिया और इस पूरे मामले को वोट बैंक के साथ जुड्ने दिया।

भारत के लिये समय आ गया है कि वह अपनी नीतियाँ अपने राष्ट्रीय हितों के सन्दर्भ में बनाये न कि किसी के तुष्टीकरण के लिये। आज इजरायल के साथ निकटतम और सामरिक सम्बन्ध या रक्षा समझौता ही इस्लामी आतंकवाद और पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद का प्रतिरोध है।

वैसे भी विचाधारा के स्तर पर जिस प्रकार कम्युनिष्ट और इस्लामवादी एकसाथ आ रहे हैं उसे देखते हुए इस बात की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आने वाले वर्षों में चीन, पाकिस्तान, ईरान और उत्तरी कोरिया एक खतरे के रूप में दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया में सामने आ जायें। क्योंकि आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध में चीन ने इस प्रकार खुलकर कभी भाग नहीं लिया कि उसे इस्लामी जगत के अविश्वास या घृणा का पात्र बनना पडे।

भारत में जो लोग आँखमूदकर इजरायल की निन्दा को सत्य मान लेते हैं उन्हें भारत सहित विश्व स्तर पर बन रहे कम्युनिष्ट इस्लामवादी गठजोड पर भी नजर रखनी चाहिये।

क्या है चीन की मंशा ?

इन दिनों चीन सीमा विवाद अचानक सुर्खियों में आ गया है। देश के एक प्रसिद्ध सामरिक विशेषज्ञ भरत वर्मा ने तो चीन की वर्तमान और भावी परिस्थितियों के आधार पर यह भविष्य़वाणी भी कर दी है कि चीन अपनी आंतरिक स्थितियों के दबाव में देश को कम्युनिष्ट तंत्र के अंतर्गत एकजुट रखने के लिये 2012 तक भारत पर आक्रमण कर सकता है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह काफी कुछ सम्भव सा दिखता है। चीन में कहने को तो काफी तीव्र आर्थिक विकास हुआ है लेकिन इस विकास के साथ ही आर्थिक असमानता भी काफी तेजी से बढी है। इसके अतिरिक्त चीन ने अब अपना मूल बौद्ध ताओ स्वरूप सामने रखने के स्थान पर स्वयं को एक कम्युनिष्ट नस्लवादी शासन के रूप में परिवर्तित कर लिया है जो हान नस्ल को छोड्कर अन्य सभी नस्लों को दबाने और उन्हें द्वितीय श्रेणी का स्तर प्रदान करता है। तिब्बत, उइगर या फिर मंगोलियाई बौद्ध हों सभी के ऊपर चीन के हान कम्युनिष्टों ने अपनी नस्ली श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास किया है।

जो कुछ भी आज चीन का स्वरूप भारत के साथ दिखाई पड रहा है उसे वास्तव में सीमा विवाद माना जा रहा है लेकिन ऐसा चीन के सम्बन्ध में अधिक जानकारी नहीं होने के कारण है। भारत पर चीन के 1962 के आक्रमण के पश्चात एक समाजवादी सांसद शशिभूषण ने पहली बार चीन की यात्रा की थी और उसके बाद चीन की महत्वाकाँक्षाओं और सैन्य तैयारियों के आधार पर 1976 में उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी China, The Myth of Superpower । इस पुस्तक में लेखक ने कुछ मूलभूत बातों की ओर संकेत किया था। चीन ने माओत्से तुंग की अगुवाई में रूस के कम्युनिज्म से भी अधिक हिंसक और फासीवादी माओवादी कम्युनिज्म चलाया जो साम्राज्यवादी, युद्धपरक और दूसरे देशों में माओवाद को फैलाकर वहाँ नये प्रकार का माओवादी कम्युनिज्म स्थापित करना था।

माओ ने कम्युनिज्म के मूल शत्रु अमेरिका से सम्बन्ध स्थापित किये और एशिया में रूस के प्रभाव को समाप्त करने के लिये और स्वयं को साम्यवाद और कम्युनिज्म का प्रणेता सिद्ध करने के लिये रूस विरोधी रणनीति अपनाई और अमेरिका द्वारा वियतनाम पर आक्रमण करने पर वियतनाम का साथ नहीं दिया जबकि यह युद्ध पूरी तरह अमेरिका बनाम कम्युनिज्म का था। माओ के चीन ने अमेरिका के साथ सामरिक हथियारों की खरीद फरोख्त भी की। इस प्रकार चीन ने कम्युनिज्म के वैश्विक आन्दोलन से स्वयं को अलग ही रखा और एक अलग प्रकार का माओवाद खडा किया जो मूल रूप में साम्राज्यवादी और चीन के एशिया में प्रभाव विस्तार की नीति पर आधारित है।

चीन में हान नस्ल के लोगों की संख्या सीमित है परंतु देश के प्रमुख पदों पर उन्हीं का नियंत्रण है और सभी हान कम्युनिष्ट हैं। कम्युनिष्ट शासन के अधीन नस्लवाद का ऐसा स्वरूप खडा किया गया है कि अन्य नस्लों की महिलाओं को हान पुरुष से ही विवाह करना या फिर उनका अपहरण कर उनकी नस्ल बदलने का राज्य प्रायोजित अभियान पूरे चीन में अनेक दशकों से चल रहा है और इसके परिणामस्वरूप तिब्बत और मगोलिया को चीन हडप कर चुका है और सीक्यांग में भी यही नीति लागू कर मुस्लिम विद्रोह को शांत रखा गया है।

चीन में प्राचीन काल से हान राजवन्श के समय से ही चीन में प्रमुख रूप से हान स्वयं को श्रेष्ठ नस्ल के रूप में देखते हैं जिनकी दृष्टि में उन्हें विश्व पर शासन करने का अधिकार मिला है। माओ के काल में माओवाद के साथ हान नस्ल का यह मिलन एक नयी साम्राज्यवादी मानसिकता के रूप में विकसित हुआ है। चीन ने स्वयं को एक बन्द समाज के रूप में रखा जिसकी योजना, राष्ट्र के उद्देश्य और सैन्य मह्त्वाकाँक्षाओं के बारे में बाहर के लोगों को कभी पता नहीं चल सका यही कारण है कि चीन के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के विचार हैं।

भारत में चीन को लेकर दो प्रकार के विचार हैं – एक तो कम्युनिज्म और समाजवाद के प्रभाव से प्रभावित लोग अमेरिका को प्रथम शत्रु मानते हैं इसलिये अमेरिका जैसी बुराई से निपटने के लिये भारत और चीन की आपसी एकता की वकालत करते हैं और दूसरा विचार वह है जो सदैव चीन को शंका की दृष्टि से देखता है।

वास्तव में चीन से सतर्क रहने की आवश्यकता है। जो विचारधारा भारत और चीन को आर्थिक महाशक्ति मानकर संयुक्त रूप से अमेरिका को चुनौती देने की बात करते हैं वे भूल जाते हैं कि दो बराबर की शक्तियाँ आपस में तभी टकराव और युद्ध से बची रह सकती हैं जब उनके सामरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तीनों में से कोई भी हित न टकराता हो। चीन आर्थिक दृष्टि से जितना निकट अमेरिका के है उतना भारत के नहीं है। चीन डायनासोर की तरह बढती अपनी आर्थिक व्यवस्था और उत्पादन के लिये भारत को बाजार की भाँति देखता है जबकि भारत में भी उपभोक्ता से अधिक ऐसी अर्थव्यवस्था है जो भी निर्माण ही करती है इस दृष्टि से अमेरिका चीन के लिये अधिक उपयुक्त बाजार है जहाँ उपभोक्ता अधिक हैं। इसलिये चीन और भारत के आर्थिक हित एक नहीं हैं क्योंकि चीन को बाजार की आवश्यकता है और भारत में भी मझोले, छोटे, कुटीर और ग्रामीण उद्योगों के लिये बाजार की आवश्यकता है ऐसे में भारत का बाजार यदि चीनी माल से पट गया तो भारत के उत्पादकों का क्या होगा?

इसी प्रकार चीन और भारत के सामरिक हित पूरी तरह टकराते हैं। क्योंकि हिन्द महासागर से लेकर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप सहित दक्षिण पूर्व एशिया में चीन अपने पाँव पसारना चाहता है और इस क्षेत्र में चीन का सामरिक प्रभाव भारत के लिये खतरनाक है क्योंकि चीन सामुद्रिक सीमा और भारत से सटी सीमा का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिये निश्चित रूप से करेगा जैसा कि वह पाकिस्तान के माध्यम से करता आया है।

इसी प्रकार भारत और चीन की एकता की बात करने वाले लोग भारत और चीन के सांस्कृतिक सम्बन्धों की दुहाई देते हैं लेकिन यहाँ भी विरोधाभास है क्योंकि चीन भारत की भाँति अपने सांस्कृतिक सातत्य से जुडा नहीं है और अब वहाँ संस्कृति और धर्म के स्थान पर माओवादी कम्युनिज्म को एक सम्प्रदाय के रूप में स्थापित कर दिया गया है। यह सत्य है कि अब भी अधिकाँश चीनी अपनी मूल सांस्कृतिक परम्परा से विमुख नहीं हुए हैं लेकिन माओवादी कम्युनिष्ट शासन के अंतर्गत उनकी आवाज दबी हुई है।

इसी प्रकार चीन किसी भी प्रकार अमेरिका से सामरिक टकराव नहीं चाहता। कभी कभी एक विचार यह भी आता है कि चीन के सीक्यांग प्रांत में इस्लामी अलगाववाद के चलते चीन वृहद आतंक के विरुद्ध युद्ध में साथ आ जायेगा। यह बात भी दिवा स्वप्न है एक तो सीक्यांग प्रांत में चीन के कम्युनिष्ट शासन ने न केवल दमन किया है वरन वहाँ भी हान नस्ली श्रेष्ठता का दाँव खेल कर काफी संख्या में हान वर्चस्व को स्थापित कर दिया है जो किसी भी स्थिति में शक्ति संतुलन का कार्य करेंगे। वैसे भी पाकिस्तान के साथ चीन के अटूट सम्बन्धों के चलते सीक्यांग प्रांत की समस्या के वैश्विक इस्लामी आन्दोलन से जुड्ने की सम्भावना कम ही है। पिछले वर्षों में हमने देखा कि किस प्रकार चीन ने ग्वादर बन्दरगाह पर कार्य कर रहे अपने इंजीनियरों को इस्लामी आतंकवादियों के चंगुल से छुडा लिया और इस कार्य में पाकिस्तान सरकार ने मध्यस्थता की। इसलिये इस बात की सम्भावना अत्यंत क्षीण है कि सीक्यांग की समस्या इतनी बढ जायेगी कि चीन अपने साम्राज्यवादी उद्देश्यों को बदल देगा।

चीन के सम्बन्ध में कोई भी चर्चा और बहस भारत में अभी तक इसलिये अधिक नहीं हुई कि भारत में मीडिया सहित बौद्धिक क्षेत्रों में या तो कम्युनिष्ट या फिर शीत युद्ध कालीन मानसिकता के लोगों का प्रभुत्व है जो अपने अपने कारणों से अमेरिका को ही केन्द्र में रखकर चिंतन करते हैं। इसी कारण पिछले एक दशक में जब समस्त विश्व लादेन और बुश के रूप में ध्रवीकृत हो गया तो चीन ने अपनी तैयारी इस पूरे युद्ध से अलग रहकर बनाये रखी।

सैमुअल हट्टिंगटन ने सभ्यता के संघर्ष की जो परिकल्पना दी थी उसमें लोगों ने इस्लाम बनाम पश्चिम के संघर्ष पर अधिक ध्यान दिया जबकि चीन भी इसी ग्र्ंथि का शिकार है। चीन को अपनी विशाल सेना पर अधिक विश्वास है।

चीन के शासक इस योजना पर वर्षों से विचार कर रहे हैं कि किस प्रकार समस्त एशिया में उनका नियंत्रण हो। चीन में समय समय पर ऐसी पाठ्य पुस्तकों का उल्लेख सामने आता है जिसमें दक्षिण पूर्व एशिया के अनेक देश चीन के मानचित्र में नजर आते हैं। माओ ने जिस वृहद चीन की कल्पना की थी उसमें भारत के भी कुछ हिस्से थे। वास्तव में माओ विश्व इतिहास के उस दौर की पौध हैं जब विश्व ने फासीवाद, साम्राज्यवाद, नाजीवाद का दौर देखा था और माओ ने इन सभी का रूपांतरण चीन के प्राचीन हान राजवंश की साम्राज्यवादी पिपासा के साथ कर दिया और चीन का राष्ट्रीय उद्देश्य निश्चित कर दिया।

आने वाले समय में चीन के साथ भारत का टकराव अवश्यंभावी है और चीन भारत में नक्सलवाद, पूर्वोत्तर में उग्रवाद और पाकिस्तान को सहायता कर भारत में अपने लिये पाँचवा स्तम्भ तैयार कर रहा है।

जो लोग वर्तमान युग में केवल शांति और आर्थिक आधार पर देशों के सम्बन्धों को परिभाषित कर रहे हैं उन्हें समझ लेना चाहिये कि किसी भी युद्ध का कारण किसी देश की साम्राज्यवादी , नस्ली या फिर धार्मिक मह्त्वाकाँक्षा होती है। चीन न केवल भारत के लिये वरन समस्त एशिया के लिये खतरा बनने वाला है।

चीन ने पिछले दस वर्षों में आर्थिक विकास किया और केवल आर्थिक विकास का आभास दिया लेकिन इस दौरान उसने अपनी सामरिक और रणनीतिक स्थिति को अत्यंत सशक्त कर लिया और इसी एक दशक में भारत ने अपनी कमजोरी समस्त विश्व के समक्ष उजागर कर दी। 1999 में विमान अपहरण के बदले आतंकवादियों को छोडना, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री का चीन की यात्रा पर तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग मान लेना, पाकिस्तान बस लेकर जाना और बदले में कारगिल युद्ध लडना, पडोस के तानाशाह परवेज मुशर्रफ को आगरा बुलाना और बदले में 13 दिसम्बर 2001 को भारत की संसद पर आक्रमण झेलना और बदले में कुछ न कर पाना, जम्मू में सेना की छावनी में कालूचक में सेना के परिजनों की हत्या और बदले में सेना को एक वर्ष सीमा पर रखने के बाद भी पाकिस्तान के रवैये में सुधार न करवा पाना, देश में इस्लामी आतंकवाद के चलते हजारों लोगों की मृत्यु के बाद भी 26 नवम्बर 2008 को देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई पर भीषण आक्रमण के बाद भी असहाय सा दिखने के बाद चीन क्या समस्त विश्व को पता चल चुका है कि भारत सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से कितना असहाय है। आज चीन , पाकिस्तान और अमेरिका सभी जानते हैं कि भारत किसी भी कीमत पर शांति चाहता है और इसलिये यदि उसे आक्रामक स्थिति में उलझा दिया जायेगा तो वह समुचित प्रतिकार नहीं कर सकेगा।

आज चीन सीमा पर जो भी टकरावपूर्ण नीति अपना रहा है उसके लिये वर्तमान सरकार ही दोषी नहीं है क्योंकि वर्तमान प्रधानमंत्री वही नीति अपना रहे हैं जो उनसे पूर्व के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनाई थी। पाकिस्तान के साथ किसी भी कीमत पर शांति, कश्मीर में एकतरफा युद्ध विराम और बातचीत से हल निकालना और कश्मीर समस्या के समाधान के लिये बातचीत का दायरा इन्सानियत रखना। चीन से अरुणाचल और सिक्किम के मामले में कोई भी गारण्टी न मिलने पर भी तिब्बत को चीन का अभिन्न मान लेना वास्तव में एक बार फिर भारत की विदेश नीति को जवाहरलाल नेहरू के रास्ते पर ले जाने जैसा था जिस रास्ते को 1991 में पी वी नरसिम्हाराव ने छोड दिया था। आज भारत जो कुछ भी दबाव अनुभव कर रहा है उसके पीछे पिछले एक दशक की भूलें हैं। पिछ्ले एक दशक में राजनीतिक दलों ने देश को विश्व पटल पर हँसी का पात्र बना दिया है जिसके नेता आर्थिक आँकडों में हेरफेर कर जनता को गुमराह कर झूठा भुलावा दे रहे हैं कि सर्वत्र शांति है बस अर्थ साधना में लगे रहो।

एक बार फिर देश की सुरक्षा और मनोबल के विषय को दलीय आधार पर बहस के दायरे में लाया जा रहा है। देश का दुर्भाग्य है कि देश के समक्ष उपस्थित इन खतरों से ध्यान हटाने के प्रयास किये जा रहे हैं। यदि किसी के विमान के इकोनोमी क्लास में यात्रा करने या फिर शताब्दी ट्रेन में यात्रा करने से देश की जटिल समस्याओं का समाधान हो जाता तो फिर नेताओं के कार्यकाल के बाद उनके कार्यों की समीक्षा इतिहास क्योंकर करता?

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