What Fails team Anna?
Is it the right way to define the strength in democracy in the form of numbers and crowd only? This was the one potent question which arises in my mind when this leg of the movement of team Anna was almost declared as flop show because of the poor showing of people in MMRDA ground in Mumbai and at Ramlia Maidan in Delhi. In my opinion it is dangerous argument in any democracy as it is loaded with possibility of setting aside thoughts, suggestions on the cast of numbers and crowds but this theory does not apply to team Anna as they were relying heavily on crowds and in an debate in Kolkata with Times Now Arvind kejariwal categorically stated that any group who can mobilize 50,000 plus crowd can force government to bend on backward to negotiate with that group. Read more
दिग्विजय सिंह के हिंदू आतंकवाद का सच
पिछले कुछ माह से कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह अपने कुछ तथाकथित बयानों को लेकर चर्चा में हैं। हालाँकि उनके बयान या उनकी राय कोई नयी नहीं है लेकिन जिस प्रकार पिछले माह सम्पन्न हुए कांग्रेस के महाधिवेशन में दिग्विजय सिंह को अपनी बात कहने का अवसर दिया गया और इसके लिये कांग्रेस के मंच का उपयोग हुआ उसके बाद इस बात के लिये कोई शंका नहीं रहा गयी कि जो कुछ कांग्रेस महासचिव कह रहे हैं वह उनकी व्यक्तिगत राय भर नहीं है और इसके लिये उन्हें कांग्रेस के आला कमान का वरदह्स्त प्राप्त है। Read more
इस्लामी कट्टरता का नया दौर
पाकिस्तान में पिछले दिनों जब प्रमुख प्रांत पंजाब के राज्यपाल सलमान तासीर की हत्या उनके ही अंगरक्षक द्वारा कर दी गयी तो अनेक प्रश्न एक साथ उठ खडे हुए। इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढना अत्यंत आवश्यक है। पाकिस्तान में जिस प्रकार यह हत्या अन्जाम दी गयी है वही अपने आप में सनसनीखेज है और जिस प्रकार इस हत्या के बाद पाकिस्तान के प्रमुख इस्लामी मजहबी संगठन और राजनीतिक दल इस घटना को न केवल सही ठहरा रहे हैं वरन इसे इस्लाम और पैगम्बर की चौदह सौ वर्ष पुरानी परम्परा के अनुक्रम में प्रशंसित कर रहे हैं उससे निश्चय ही यह आवश्यक हो गया है कि इस पूरी घटना को समग्रता में देखा जाये। समग्रता से आशय यह है कि क्या यह घटना पाकिस्तान की अराजक स्थिति का परिचायक है या फिर किसी नये रुझान का आरम्भ है। निश्चय ही इसे केवल कानून व्यवस्था के गिरावट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये विशेष रूप से तब जब कि तालिबान ने इस हत्या की जिम्मेदारी भी ले ली है। हालाँकि इस दावे की सत्यता अभी प्रमाणित नहीं हुई है लेकिन फिर भी इससे कुछ गम्भीर प्रश्न अवश्य खडे हुए हैं। Read more
बिहार जनादेश के निहितार्थ
बिहार में बहुप्रतीक्षित विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो गये और अब उस पर विश्लेषणों का दौर चल रहा है। इन चुनावों में जिस प्रकार असाधारण जनादेश आया है उसके बाद इन बारीकियों का विश्लेषण करने का कोई अर्थ नहीं है कि किस जाति या बिरादरी ने किसे कितना मत दिया या फिर किस मजह्ब ने किसे मत दिया और किसे नहीं। जिस अनुपात में जनादेश आया है उसने इन विश्लेषणों को मह्त्वहीन कर दिया है अब केवल चर्चा इस बात पर हो सकती है कि बिहार के जनादेश के निहितार्थ क्या हैं और राष्ट्रीय राजनीति के लिये इसमें क्या सन्देश छुपा है। Read more
कश्मीर समस्या के विविध आयाम
इन दिनों कश्मीर समस्या एक बार फिर पूरे विकराल् स्वरूप के साथ हमारे समक्ष उपस्थित है। आज कश्मीर समस्या का जो स्वरूप हमें दिखाई दे रहा है उसके अनेक ऐतिहासिक कारण हैं जिनकी चर्चा समय समय पर होती रहती है परंतु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज भी कश्मीर हमारे समक्ष इतिहास के अनसुलझे प्रश्न की तरह मुँह फैलाये खडा है।
कश्मीर समस्या निश्चित रूप से देश की स्वतंत्रता के बाद देश के नेतृत्व की उस मानसिकता का परिचायक ही है कि देश का नेतृत्त्व क़िस प्रकार उन शक्तियों के हाथ में चला गया जो न तो भारत को एक सांस्कृतिक और न ही आध्यात्मिक ईकाई मानते थे। वे तो भारत को एक भूखण्ड तक ही मानते थे जिसका सौदा विदेशी दबाव में या अपनी सुविधा के अनुसार किया जा सकता है। आज कश्मीर के सम्बन्ध में यह बात पूरी तरह समझने की है कि कश्मीर भारत की मूल पहचान और संस्कृति का अभिन्न अंग सह्स्त्रों वर्षों से रहा है। कश्मीर के सम्बन्ध में एक बडी भूल यही होती है कि हम इसे भारत का अभिन्न अंग मानते हुए भी इसे एक राजनीतिक ईकाई भर मान कर संतुष्ट हो जाते हैं जिसका इतिहास 194 से आरम्भ होता है। कश्मीर के प्रति भारत का भावनात्मक लगाव जब तक उसकी ऐतिहासिकता के साथ चर्चा मे नहीं लाया जाता तब तक इसका पक्ष अधूरा रहेगा। इसी पक्ष के अभाव के चलते इस समस्या को पूरी तरह राजनीतिक सन्दर्भ में देखा जाता है और भारत का एक वर्ग कहीं न कहीं जाने अनजाने इस सम्बन्ध में हीन भावना से ग्रस्त होता जा रहा है कि कश्मीर में स्वायत्तता या फिर स्वतंत्रता की माँग पर विचार किया जा सकता है। इस प्रकार कश्मीर समस्या का एक आयाम तो उसे उसके सांस्कृतिक सातत्य में न देखने की भूल है। Read more

