इस्लामी कट्टरता का नया दौर

पाकिस्तान में पिछले दिनों जब प्रमुख प्रांत पंजाब के राज्यपाल सलमान तासीर की हत्या उनके ही अंगरक्षक द्वारा कर दी गयी तो अनेक प्रश्न एक साथ उठ खडे हुए। इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढना अत्यंत आवश्यक है। पाकिस्तान में जिस प्रकार यह हत्या अन्जाम दी गयी है वही अपने आप में सनसनीखेज है और जिस प्रकार इस हत्या के बाद पाकिस्तान के प्रमुख इस्लामी मजहबी संगठन और राजनीतिक दल इस घटना को न केवल सही ठहरा रहे हैं वरन इसे इस्लाम और पैगम्बर की चौदह सौ वर्ष पुरानी परम्परा के अनुक्रम में प्रशंसित कर रहे हैं उससे निश्चय ही यह आवश्यक हो गया है कि इस पूरी घटना को समग्रता में देखा जाये। समग्रता से आशय यह है कि क्या यह घटना पाकिस्तान की अराजक स्थिति का परिचायक है या फिर किसी नये रुझान का आरम्भ है। निश्चय ही इसे केवल कानून व्यवस्था के गिरावट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये विशेष रूप से तब जब कि तालिबान ने इस हत्या की जिम्मेदारी भी ले ली है। हालाँकि इस दावे की सत्यता अभी प्रमाणित नहीं हुई है लेकिन फिर भी इससे कुछ गम्भीर प्रश्न अवश्य खडे हुए हैं। Read more

भाजपा क्यो हैं भ्रम में?

यह लेख जब मैं लिख रहा हूँ तो कोई भी मुझसे यह प्रश्न अत्यंत सहजता से कर सकता है कि क्या मैं भाजपा के राजनीतिक स्वास्थ्य की कामना करते हुए स्वयं को निष्पक्ष मान सकता हूँ तो निश्चय ही कोई तटस्थ हुये बिना भी निष्पक्ष हो सकता है। बौद्धिक वर्ग में तटस्थता जैसी कोई वस्तु नहीं होती क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी विचार का पोषण अवश्य करता है और बौद्धिक व्यक्ति का दायित्व यह होता है कि वह निष्पक्ष होकर अपने पक्ष रखे। इसी धर्म का पालन करते हुए वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा की राजनीतिक दशा और दिशा की समीक्षा करने का प्रयास इस लेख में कर रहा हूँ। Read more

कश्मीर समस्या के विविध आयाम

इन दिनों कश्मीर समस्या एक बार फिर पूरे विकराल् स्वरूप के साथ हमारे समक्ष उपस्थित है। आज कश्मीर समस्या का जो स्वरूप हमें दिखाई दे रहा है उसके अनेक ऐतिहासिक कारण हैं जिनकी चर्चा समय समय पर होती रहती है परंतु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज भी कश्मीर हमारे समक्ष इतिहास के अनसुलझे प्रश्न की तरह मुँह फैलाये खडा है।

कश्मीर समस्या निश्चित रूप से देश की स्वतंत्रता के बाद देश के नेतृत्व की उस मानसिकता का परिचायक ही है कि देश का नेतृत्त्व क़िस प्रकार उन शक्तियों के हाथ में चला गया जो न तो भारत को एक सांस्कृतिक और न ही आध्यात्मिक ईकाई मानते थे। वे तो भारत को एक भूखण्ड तक ही मानते थे जिसका सौदा विदेशी दबाव में या अपनी सुविधा के अनुसार किया जा सकता है। आज कश्मीर के सम्बन्ध में यह बात पूरी तरह समझने की है कि कश्मीर भारत की मूल पहचान और संस्कृति का अभिन्न अंग सह्स्त्रों वर्षों से रहा है। कश्मीर के सम्बन्ध में एक बडी भूल यही होती है कि हम इसे भारत का अभिन्न अंग मानते हुए भी इसे एक राजनीतिक ईकाई भर मान कर संतुष्ट हो जाते हैं जिसका इतिहास 194 से आरम्भ होता है। कश्मीर के प्रति भारत का भावनात्मक लगाव जब तक उसकी ऐतिहासिकता के साथ चर्चा मे नहीं लाया जाता तब तक इसका पक्ष अधूरा रहेगा। इसी पक्ष के अभाव के चलते इस समस्या को पूरी तरह राजनीतिक सन्दर्भ में देखा जाता है और भारत का एक वर्ग कहीं न कहीं जाने अनजाने इस सम्बन्ध में हीन भावना से ग्रस्त होता जा रहा है कि कश्मीर में स्वायत्तता या फिर स्वतंत्रता की माँग पर विचार किया जा सकता है। इस प्रकार कश्मीर समस्या का एक आयाम तो उसे उसके सांस्कृतिक सातत्य में न देखने की भूल है। Read more

हिन्दू आतंकवाद के मिथक का पर्दाफाश

बी शांतनु
हिन्दी अनुवाद- अमिताभ त्रिपाठी
http://satyameva-jayate.org/2010/07/19/myth-of-hindutva-terror/

आज कल एक नया भूत सामने लाया गया है और वह है हिन्दुत्व आतंकवाद ( उर्फ हिन्दू आतंकवाद)। सम्भव है यह शब्द आपने पहले भी सुना हो , सम्भव है कि आपको इस पर क्रोध आया हो लेकिन आप क्रोधित होकर अपने कार्य में लग गये होंगे। सम्भव है कि आपने यह सोचने का प्रयास भी नहीं किया होगा कि यह हिन्दुत्व आतंकवाद है क्या? अभी कुछ दिन पूर्व मैं कुछ लोगों के मध्य था और जब उन्होंने यह शब्द सुना तो वे क्रुद्ध हो गये शायद इससे भी अधिक क्रुद्ध हों लेकिन वे अपने कार्य में लग जायेंगे।
अभी पिछले सप्ताह एक जागरूक पाठक ने आउटलुक की हिन्दू आतंकवाद सम्बन्धी आवरण कथा की ओर मेरा ध्यान दिलाया। इस कहानी को लेकर अपनी जल्दबाजी की संक्षिप्त प्रतिक्रिया में मैने लिखा, “ इस लेख को भयंकर ढंग से हिन्दू आतंक का शीर्षक दिया गया है परंतु यह नहीं बताया गया है कि यह हिन्दू सिद्धांतों और हिन्दू परम्पराओ से किस प्रकार प्रेरित है। इसी प्रकार कुछ स्थानों पर हिन्दुत्व का भी सन्दर्भ लिया गया है परंतु इसके प्रयास नहीं हुए हैं कि हिन्दुत्व से उनका आशय क्या है और लेखक के अनुसार इसका अर्थ क्या है? “ लेकिन इसके उपरांत मैंने इस कहानी को फिर से पढा और मुझे पता लगा कि इसे बिकाऊ बनाने के लिये सनसनीखेज बनाया गया है। लेकिन इस लेख में इसके तथ्यों पर चर्चा की जायेगी।

यदि हम आउटलुक की कहानी पर लौटें हालाँकि न तो इस विषय पर यह पहली कथा है और न ही अंतिम होगी लेकिन इस कथा की समाप्ति इस कथन के साथ हुई कि जब सीबीआई सारे बिखरे हुए सूत्रों को एकसाथ जोडेगी तभी हिन्दुत्व आतंकवाद का समग्र चित्र सामने आ सकेगा। 2000 शब्दों के इस लेख को स्मृति कोप्पिकर, देबर्षि दासगुप्त और स्निग्धा हसन ने सहयोग दिया है “ हिन्दू आतंकवाद एक वास्तविकता है फिर भी भारत इस वास्तविकता को नाम नहीं देना चाहता”।

यह कथा मई में प्रवीन स्वामी के आउटलुक के ही लेख “ The Rise of Hindutva Terror” | पहले लेख की समीक्षा करना अधिक उचित होगा। प्रवीन स्वामी की यह रिपोर्ट आन्ध्र प्रदेश में हैदराबाद मे मक्का मस्जिद पर आक्रमण के सिलसिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक देवेन्द्र गुप्ता को उनके राजनीतिक सहयोगियों विष्णु प्रसाद और चन्द्रशेखर पाटीदार के साथ इस आक्रमण के लिये योजना बनाने के सन्देह में पकड्ने पर आधारित थी। Read more

भाजपा की समस्या है क्या?

बीते तीन चार माह में इस बात पर काफी चर्चा हुई है कि अब भाजपा का क्या होगा? लोकसभा चुनावों का परिणाम आते ही जिस प्रकार सर्वत्र यह विषय चर्चा के केन्द्रबिन्दु में है यह दो बातों की ओर संकेत करता है। एक देश में एकदलीय शासन की सम्भावना से लोग आशंकित हैं तो वही देश में पिछले डेढ दशक में विचारधारा के आधार पर आये परिवर्तन का यह संकेत है। तीन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम आने से यह चर्चा फिर प्रासंगिक हो उठी है।

देश की स्वतंत्रता के उपरांत कांग्रेस पार्टी ने जिस विचारधारा को अपनाया वह पूरी तरह कम्युनिज्म, सेक्युलरिज्म पर केन्द्रित रही। शीतयुद्ध के काल में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ने विदेश नीति में एक छ्द्म निर्गुट नीति के आधार पर एक काल्पनिक व्यवस्था नव स्वतंत्र अरब देशों और अफ्रीका के देशों के साथ खडा करने का प्रयास किया। लेकिन यह भी यथार्थ के ठोस धरातल पर आधारित नहीं थी और नेहरू जी की इन्हीं रूमानी नीतियों के कारण भारत में कम्युनिज्म और सेक्युलरिज्म को देश के निर्माण का आधार बनाया गया। जबकि इसके विपरीत देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू इतिहास के जानकार होते हुए भी भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन की मूल चेतना को समझने में असफल रहे। भारत का स्वतंत्रता संघर्ष हिन्दू नवजागरण की अभिव्यक्ति थी जिसका आधार बंकिम चन्द्र चटर्जी के आनन्दमठ, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती के ठोस धरातल पर आधारित था। इस पूरे आन्दोलन की चेतना के मूल में एक ही आकाँक्षा निहित थी कि भारत को महमूद गजनवी से पूर्व के भारत की पहचान से जोडा जाये। कांग्रेस ने देश की स्वतंत्रता के उपरांत इसके विपरीत नीतियाँ अपनाईं और तुर्की के कमाल अतातुर्क की तर्ज पर पण्डित नेहरू को लगा कि धर्म भारत के विकास को अवरुद्ध कर देगा इस कारण देश का नया स्वरूप सेक्युलरिज्म के आधार पर हो। यह शब्द संविधान में भले ही बाद में जोडा गया हो लेकिन स्वतंत्रता के समय से ही स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि को ठीक सन्दर्भ में नहीं समझा गया। गान्धी जी ने अपना पूरा आन्दोलन भक्ति आन्दोलन की तर्ज पर चलाया और राम को देश की आध्यात्मिक एकता का सूत्र बनाकर उसे तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ जोड दिया लेकिन हिन्दू मुस्लिम समस्या को लेकर वे भी उलझ गये।

1970 के दशक से देश में लगातार कांग्रेस विरोधी राजनीति के विकल्प के आते रहने से राजनीतिक स्तर पर तो कांग्रेस विरोध का ध्रुव बन रहा था लेकिन वैचारिक स्तर पर विकल्प 1980 के दशक में खडा होना उस समय आरम्भ हुआ जब कांग्रेस ने नरम हिन्दुत्व का आधार छोडकर मुस्लिम तुष्टीकरण का रास्ता ग्रहण कर लिया। इसी प्रतिक्रिया में राममन्दिर आन्दोलन ने आकार ग्रहण करना आरम्भ किया। फिर भी राममन्दिर आन्दोलन में केवल एक ही पक्ष नहीं था।

वास्तव में आज भाजपा की विवशता का कारण यही है कि राममन्दिर आन्दोलन से जुडी अपनी पहचान को भुलाने के लिये वह आतुर है। भाजपा का विस्तार राममन्दिर आन्दोलन के साथ हुआ और इस विस्तार के अनेक आयाम हैं। शहरी क्षेत्रों में इस आन्दोलन से अधिकतर हिन्दू अल्पसंख्यकवाद के चलते असुरक्षा की भावना से जुडे थे तो ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के हिन्दू इस आन्दोलन के साथ आध्यात्मिक परम्परा के आधार पर जुडे थे। यही वह बिन्दु है जो आज भाजपा के संभ्रम का कारण है और इसी कारण हिन्दुत्व की अनेक व्याख्यायें हो रही हैं।

भारत की लाखों वर्ष पुरानी पहचान का आधार उसकी सांस्कृतिक एकता नहीं वरन आध्यात्मिक एकता है। संस्कृति तो रहन- सहन, खान पान, आचार व्यवहार के आधार पर बनती है जिसके सम्बन्ध में भारत में अत्यंत विविधता है फिर भी इस विविधता में एकता का कारण आध्यात्मिक संचेतना का केन्द्रबिन्दु एक होना है। देश में कोई भी भाषा बोलने वाला, कोई भी वस्त्र पहनने वाला, किसी भी प्रकार का आचार व्यवहार करने वाला एक सिद्धांत को अवश्य मानता है कि सभी मार्ग एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं और वह है आत्मतत्व। गूढ दार्शनिक सिद्धांतों को गाँव के लोग इतनी सरलता से अपनी कहावतों में कह जाते हैं जिस पर ग्रंथों की रचना की जा सकती है। भारत में हमारे पूर्वजों ने इस् गूढ दार्शनिक सिद्धांत को युगानुकूल और व्यावहारिक जीवन में प्रायोगिक बनाने के लिये अनेक वे नियम बनाये जिनका मूल उद्देश्य ही यह है कि व्यक्ति का जीवन इस प्रकार सुगठित हो कि वह इस सत्य को कभी न भूले कि यह जीवन अंतिम सत्य नहीं है। आयुर्वेद, अष्टाँग योग, चारों धाम, गाय, गंगा, गायत्री सभी इसी एक सत्य के साथ साक्षात्कार कराते हैं। परंतु देश में स्वतंत्रता के बाद स्वयं को सेक्युलरिज्म के दायरे में लाने के लिये हिन्दूवादी शक्तियों ने सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय हिन्दुत्व के सम्बन्ध में आने के बाद रटना आरम्भ कर दिया कि हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म दो अलग- अलग चीजें है और हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति जबकि सामान्य समाज में हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को पर्याय माना जाता है। इसी कारण हिन्दुत्व धीरे धीरे एक राजनीतिक अवधारणा बनती गयी और सामान्य हिन्दू समाज को इसमें मूल हिन्दू चेतना के गुण नहीं दिखे और जिसके जो मन में आया वह हिन्दुत्व की व्याख्या करता गया और अब हिन्दुत्ववादियों ने ही हिन्दुत्व को मखौल बना दिया है और मीडिया में आये दिन हिन्दुत्व का मजाक उडाया जाता है।

वास्तव में इसके पीछे कुछ कारण हैं। एक तो भारत को हिन्दू राष्ट्र मानते हुए भी उसकी आध्यात्मिक गूढता और उसके औपनिषदिक दर्शन के आधार पर राजनीति और समाज को संगठित करने का प्रयास नहीं हुआ और इससे भी दुखद यह कि पिछले कुछ सौ वर्षों में हिन्दू समाज ने आत्मग्लानि और पराजित मानसिकता का जो भाव अपने भीतर व्याप्त कर लिया है हिन्दुत्व आन्दोलन भी उसी ग्रंथि का शिकार हो गया है और वर्तमान समस्याओं का समाधान सेमेटिक धर्म और जीवन दर्शन के आधार पर देखा जाने लगा है। जैसे भारत की आध्यात्मिक साधना व्यक्ति को भौतिक जीवन से पलायन की शिक्षा देती है, इससे व्यक्ति कायर हो जाता है, इस विचारधारा पर चलकर राष्ट्रवाद के लिये कार्य सम्भव नहीं है। इसी के साथ एक पुस्तक , एक पैगम्बर, धार्मिक अनुयायियों की एकरूपता और एक जैसी जीवन पद्धति को ही आदर्श मानकर हिन्दू धर्म की व्याख्या इसी सन्दर्भ में होने लगी और सेमेटिक परम्परा को आदर्श मानने से कहीं न कहीं सेमेटिक धर्मों की भाँति धर्म का अर्थ न्याय की स्थापना के बजाय दूसरे धर्म के प्रति घृणा को हिन्दू धर्म की एकता का आधार बनाने की भावना विकसित होने लगी।

जनसंघ की स्थापना से लेकर राममन्दिर आन्दोलन तक हिन्दू धर्म के मूल तत्वों की स्थापना के लिये प्रयास करने के स्थान पर उसे संविधान के दायरे में लाने, कम्युनिष्ट सिद्धांत के समानांतर दर्शन विकसित करने की होड और फिर सेक्युलरिज्म का विरोध करने के स्थान पर अपने हिदुत्व को सेक्युलरिज्म के दायरे में लाने के चलते वैचारिक स्तर पर काफी गड्ड मड्ड हुई। हिन्दू समाज को संगठित करने का दावा करने वाली शक्तियों ने तो कभी हिन्दू को एक ईकाई माना ही नहीं। यदि ऐसा होता तो भाजपा जाति, अवर्ण, सवर्ण , पिछडा, दलित, आदिवासी, जनजाति ,उत्तर दक्षिण की राजनीति न करती वरन भारत की आध्यात्मिक एकता को अपनी राजनीति का आधार बनाती। आज वैचारिक स्पष्टता न होने का ही परिणाम है कि जो विचारधारा की रट लगाते हैं वे जानते ही नहीं कि इस विचारधारा को सामाजिक और राजनीतिक रूप से कैसे क्रियांवित किया जाये। आज तो विचारधारा और हिन्दुत्व की बात केवल अपना भाव बढाने या फिर किसी की नजर में अच्छा बने रहने के लिये की जाती है।

वास्तव में भाजपा ने हिन्दुत्व का नारा तो लगाया लेकिन हिन्दू एकता का प्रयास नहीं किया। वही गलती की जो पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने की थी कि अनेक सुन्दर शब्द गढे और स्वप्न देखे लेकिन आधार का पता ही नहीं था और परिणाम आज सामने है। इसी प्रकार हिन्दुत्व की बात तो खूब हुई पर हिन्दुत्व है क्या और उसे कैसे साकार करना है न तो इसका पता है और न ही कोई कार्यक्रम। इसी कारण जिसके जो मन में आये बोलता है और वही हिन्दुत्व हो जाता है। यह वैचारिक दीवालियापन पूरी तरह स्पष्ट है कि पाकिस्तान के विभाजन के लिये नेहरू और पटेल को दोषी ठहराया जा रहा है और मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्युलर बताया जा रहा है क्योंकि जो लोग भी जिन्ना की प्रशंसा कर रहे हैं उनके लिये भाजपा और कांग्रेस में एक ही अंतर है कि कांग्रेस का नेतृत्त्व गाँधी परिवार के हाथ में है और वहाँ उनके लिये कोई स्थान कभी नहीं था इसी कारण ये लोग जनसंघ के साथ आये। क्योंकि इन्हें पाकिस्तान बनाने वालों की मानसिकता से कोई समस्या नहीं है।

लेकिन आज समाज भाजपा को हिन्दू पक्ष के रूप में देखना चाहता है और इसके लिये सबसे पहले विचारधारा की स्पष्टता लानी होगी। आज विचारधारा के सम्बन्ध में भाजपा या हिन्दुत्ववादियों की स्थिति उस बालक की तरह है जो परीक्षा में प्रश्नों का उत्तर देता है तो न तो वह उसे समझ पाता है और न ही परीक्षा पुस्तिका जाँचने वाला।

कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद जिस प्रकार भाजपा के भविष्य़ को लेकर चर्चा हो रही है उससे स्पष्ट है कि अब कम्युनिज्म के पतन के बाद सेक्युलरिज्म का खोखला स्वरूप सामने आ गया है वैसे भी यूरोप ने कभी भी अपनी ईसाई पहचान को लेकर क्षमा भाव नहीं रखा और मुस्लिम देशों में तो लोग जानते ही नहीं कि सेक्युलरिज्म किस चिडिया का नाम है लेकिन भारत में हिन्दू पहचान को भुलाने के लिये सेक्युलरिज्म का ढॉंग चलता रहा। कम्युनिज्म के पतन के बाद धर्म की पहचान का आग्रह सतह पर आ गया है। इसी के साथ विश्व में एक नया परिवर्तन भी आ रहा है और वह है वैश्व्वीकरण का। आने वाले एक दशक के परिवर्तन की आहट मिलनी आरम्भ हो गयी है। पहले इण्टरनेट ने राष्ट्र , राज्य और सरकार की सीमायें तोड दीं और अब आई पी एल जैसे टूर्नामेंट सिद्ध कर रहे हैं कि बहुराष्ट्रवाद और वैश्वीकरण का सिद्धांत ही भविष्य़ है।

इस युग का सिद्धांत है स्वतंत्रता। स्वतंत्रता के सिद्दांत को स्थापित करने के लिये एकरूपता, खान पान, रहन सहन, आचार व्यवहार और कुछ हद तक चरित्र के सिद्धांत भी देश काल परिस्थितियों के सापेक्ष रखने होंगे। इस युग में व्यक्ति स्वतंत्र होना चाहता है सूचना का अबाध स्रोत इसी तथ्य को इंगित करता है कि व्यक्ति अपनी स्वतंत्र चेतना विकसित करना चाहता है और स्वतंत्रता पर किसी प्रकार का हस्तक्षेप उसे सहन नहीं है। वह किसी एक विचार या व्यक्ति के साथ बँधा रहना नहीं चाहता। लेकिन इसका समाधान स्वतंत्रता का हनन नहीं वरन हिन्दू धर्म के सिद्धांत का प्रचार ही है। वास्तव में स्वतंत्रता के इस काल में ही हिन्दुत्व की प्रासंगिकता अधिक है।

आज हिन्दू धर्म के वास्तविक स्वरूप को सामने लाने की आवश्यकता है न कि किसी सेमेटिक धर्म के प्रकाश में उसकी व्याख्या करने की। धर्म की पहचान के प्रति बढ्ते आग्रह के चलते अवसर आ गया है कि हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति कहना बन्द किया जाये और वैश्वीकरण के इस काल में इसे सार्वभौमिक धर्म बनने की ओर विकसित किया जाये जो कि व्यक्ति को स्वतन्त्र होते रहने की प्रेरणा देते हुए अंततः प्रकृति से भी मुक्त हो जाने का क्रियात्मक विधान भी बताता है।

सैद्धांतिक रूप से हिन्दुत्व की आध्यात्मिक गम्भीरता के साथ ही हिन्दू अपनी पहचान को लेकर भी आतुर है। ज्यों ज्यों भारत में मध्य वर्ग सशक्त हो रहा है और वैश्वीकरण के चलते शहर और गाँव का भेद कम हो रहा है। गाँव के निवासी भी अपने जीवन को भौतिक आधार पर विकसित करना चाहते हैं इस कारण परम्परा के स्थान पर हिन्दू धर्म के मूल को संरक्षित रखते हुए विकास और स्वतंत्रता के साथ उसका समायोजन करना होगा परंतु यह धारणा पूरी तरह भ्रांति पर आधारित है कि हिन्दू स्वाभिमान, हिन्दू रक्षा और हिन्दू धर्म का विषय आधुनिकता के साथ मेल नहीं खाता। इसके विपरीत वास्तविकता तो यह है कि वर्तमान हिन्दू पीढी अधिक स्पष्ट और आक्रामक है जो हिन्दू को विश्व में एक शक्ति के रूप के रूप में देखने की आकाँक्षी है। भौतिक उन्नति की आकाँक्षा के बाद भी अवचेतन मन की यही आकाँक्षायें सुप्त हुई हैं समाप्त नहीं और इसमें एक प्रमुख आकाँक्षा भारत को महमूद गजनवी के पूर्व के भारत की चेतना से जोडना है।

भाजपा को यदि प्रासंगिक बने रहना है तो उसे हिन्दू राजनीतिक दल बनना होगा और नयी परिस्थितियों में अपना विकास करना होगा जिसमें आधुनिकता, विकास और जीवन स्तर के उत्थान की अभिलाषा के साथ हिन्दुओं के अवचेतन मन को साकार करने के लिये पूरी ईमानदारी के साथ विश्वास पूर्वक नयी राजनीतिक परिभाषा गढनी होगी। लेकिन इसके लिये आवश्यक है कि भाजपा अपने कार्यक्रम , नीतियों और हिन्दुत्व पर विश्वास करना सीखे। भाजपा को समझना होगा कि कांग्रेस यथास्थितिवादी राजनीतिक दल है और भाजपा अवचेतन मन और सपनों की पार्टी है। जब जब भाजपा यथास्थिति को अपनाने का प्रयास करेगी इसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा। भाजपा को सपनों को साकार करना और अवचेतन मन की आकाँक्षा को पूर्ण करने का राजनीतिक समीकरण ढूँढना होगा अन्यथा इसका ह्रास ही होता जायेगा। दुखद पक्ष तो यह है कि भाजपा हर पराजय के बाद कुछ नया बहाना ढूँढ कर स्वयं को और अपने समर्थकों को दिलासा देती है और सत्य से भागना चाहती है।

भाजपा को सेक्युलरिज्म के दायरे से बाहर आकर आधुनिकता के साथ हिन्दुत्व को समायोजित करना होगा जो कि हिन्दू आग्रह पर आधारित हो न कि तुष्टीकरण पर।

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