हिन्दू आतंकवाद के मिथक का पर्दाफाश
बी शांतनु
हिन्दी अनुवाद- अमिताभ त्रिपाठी
http://satyameva-jayate.org/2010/07/19/myth-of-hindutva-terror/
आज कल एक नया भूत सामने लाया गया है और वह है हिन्दुत्व आतंकवाद ( उर्फ हिन्दू आतंकवाद)। सम्भव है यह शब्द आपने पहले भी सुना हो , सम्भव है कि आपको इस पर क्रोध आया हो लेकिन आप क्रोधित होकर अपने कार्य में लग गये होंगे। सम्भव है कि आपने यह सोचने का प्रयास भी नहीं किया होगा कि यह हिन्दुत्व आतंकवाद है क्या? अभी कुछ दिन पूर्व मैं कुछ लोगों के मध्य था और जब उन्होंने यह शब्द सुना तो वे क्रुद्ध हो गये शायद इससे भी अधिक क्रुद्ध हों लेकिन वे अपने कार्य में लग जायेंगे।
अभी पिछले सप्ताह एक जागरूक पाठक ने आउटलुक की हिन्दू आतंकवाद सम्बन्धी आवरण कथा की ओर मेरा ध्यान दिलाया। इस कहानी को लेकर अपनी जल्दबाजी की संक्षिप्त प्रतिक्रिया में मैने लिखा, “ इस लेख को भयंकर ढंग से हिन्दू आतंक का शीर्षक दिया गया है परंतु यह नहीं बताया गया है कि यह हिन्दू सिद्धांतों और हिन्दू परम्पराओ से किस प्रकार प्रेरित है। इसी प्रकार कुछ स्थानों पर हिन्दुत्व का भी सन्दर्भ लिया गया है परंतु इसके प्रयास नहीं हुए हैं कि हिन्दुत्व से उनका आशय क्या है और लेखक के अनुसार इसका अर्थ क्या है? “ लेकिन इसके उपरांत मैंने इस कहानी को फिर से पढा और मुझे पता लगा कि इसे बिकाऊ बनाने के लिये सनसनीखेज बनाया गया है। लेकिन इस लेख में इसके तथ्यों पर चर्चा की जायेगी।
यदि हम आउटलुक की कहानी पर लौटें हालाँकि न तो इस विषय पर यह पहली कथा है और न ही अंतिम होगी लेकिन इस कथा की समाप्ति इस कथन के साथ हुई कि जब सीबीआई सारे बिखरे हुए सूत्रों को एकसाथ जोडेगी तभी हिन्दुत्व आतंकवाद का समग्र चित्र सामने आ सकेगा। 2000 शब्दों के इस लेख को स्मृति कोप्पिकर, देबर्षि दासगुप्त और स्निग्धा हसन ने सहयोग दिया है “ हिन्दू आतंकवाद एक वास्तविकता है फिर भी भारत इस वास्तविकता को नाम नहीं देना चाहता”।
यह कथा मई में प्रवीन स्वामी के आउटलुक के ही लेख “ The Rise of Hindutva Terror” | पहले लेख की समीक्षा करना अधिक उचित होगा। प्रवीन स्वामी की यह रिपोर्ट आन्ध्र प्रदेश में हैदराबाद मे मक्का मस्जिद पर आक्रमण के सिलसिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक देवेन्द्र गुप्ता को उनके राजनीतिक सहयोगियों विष्णु प्रसाद और चन्द्रशेखर पाटीदार के साथ इस आक्रमण के लिये योजना बनाने के सन्देह में पकड्ने पर आधारित थी। Read more
हिन्दू आतंकवाद का मिथक
देश में इन दिनों आतंकवाद पर चर्चा जारी तो है पर इसका स्वरूप और परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। आज आतंकवाद को हिन्दुत्व और हिन्दू के साथ जोडकर प्रस्तुत किया जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से इस तरह के समाचार समाचार पत्रों और टीवी मीडिया में आये हैं कि देश में अनेक मस्जिदों और मुस्लिम क्षेत्रों में हुए आक्रमणों में कुछ हिन्दू तत्वों का हाथ रहा है। इन समाचारों को आधार बनाकर और कुछ छुटपुट पुरानी घटनाओं जैसे बम बनाने के प्रयास आदि को मिलाकर कुछ प्रमुख पत्रिकाओं ने हिन्दुत्व आतंकवाद, हिन्दू आतंकवाद , भगवा आतंकवाद जैसे मिथक और अवधारणायें चलाने का अभियान चलाया है।
विशेष रूप से आउटलुक पत्रिका के ऐसे कुछ लेखों में बतायी गयी घटनाओं की तकनीकी व्याख्या और समीक्षा भी आगे के आलेख में की जायेगी परंतु यहाँ हिन्दू आतंकवाद की परिभाषा और उससे जुडे मिथक के राजनीतिक और विचारधारागत पहलू पर चर्चा की जायेगी।
हिन्दू आतंकवाद की इस परिभाषा और इस मिथक को समग्र रूप से हम तब तक नहीं समझ सकते जब तक इसके पीछे के विचारधारागत आग्रह को नहीं समझ सकते। जिन लोगों को ऐसे आक्रमणों के लिये आरोपी बनाया गया है उनके मामले में न्यायिक प्रक्रिया चल रही है इसलिये उस पर चर्चा करना उचित नहीं होगा। चर्चा का विषय यह है कि क्या इन घटनाओं के आधार पर हिन्दू आतंकवाद , हिन्दुत्व आतंकवाद या भगवा आतंकवाद की बात करना उचित है? Read more
दिल्ली में मदरसे कहीं बन न जायें सिरदर्द
सच्चर कमेटी की सिफारिशों को क्रियांवित करने के लिये केन्द्र सरकार समान अवसर आयोग का गठन करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है जो पूरी तरह अल्पसंख्यक मंत्रालय के अधीन होगा और इस आयोग के द्वारा सभी क्षेत्रों में राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायायिक सहित पुलिस बलॉं तक में मुस्लिम आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया जायेगा। सरकार की दृष्टि में मुस्लिम समाज का कम प्रतिनिधित्व देश के सेक्युलर ढाँचे के साथ मेल नहीं खाता इसलिये अब इस समस्या का साम्प्रदायिक हल ढूँढा जा रहा है। लेकिन इस आयोग के आने से पहले ही देश के प्रशासन में यह भावना घर करती जा रही है कि मुस्लिम समस्या से अब आँख मूँद लेनी चाहिये।
अमेरिका पर 11 सितम्बर 2001 को हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के उपरांत अमेरिका सहित समस्त विश्व इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि परम्परागत इस्लामी शिक्षा व्यवस्था और मदरसों में सुधार की आवश्यकता है क्योंकि मदरसों में जिस प्रकार क़ुरान और शरियत की शिक्षा दी जाती है वह मदरसे के छात्रों को बडी आसानी से इस्लाम के नाम पर आत्ंकवाद की ओर मोड देती है। यहाँ तक कि इस्लामी आतंकवाद के एक बडे स्रोत पाकिस्तान ने भी स्वीकार किया कि मदरसों की शिक्षा ही उनके यहाँ इस्लामी आतंकवाद का मूल कारण है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्र्रफ ने इस सम्बन्ध में अनेक कदम उठाये और मदरसों पर सरकार का नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। भारत सरकार के नये शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल ने भी केन्द्रीय मदरसा बोर्ड स्थापित करने का प्रयास किया लेकिन इस्लामी संगठनों के दबाव के आगे वे झुक गये।
देश में मदरसे जिस प्रकार की शिक्षा देते हैं वह तो किसी से छुपी नहीं है लेकिन मदरसे पर्सनल कानून की बात करके और अल्पसंख्यक राजनीति का लाभ लेकर देश के लिये एक बडा खतरा बनते जा रहे हैं। अभी हाल में दिल्ली में एक ऐसा ही मामला सामने आया है जिसमें धौला कुँआ स्थित एक मदरसे की शिकायत मसूद आलम नामक युवक ने पुलिस से करनी चाही तो उसकी एफ आई आर तक दर्ज नहीं की गयी। धौला कुँआ स्थित मदरसा तरतीलुल, कुरान मस्जिद कँगाल शाह का मसूद आलम कानूनी दृष्टि से प्रभारी है लेकिन उसका आरोप है कि उसे और उसकी पत्नी को छोड्कर परिवार के शेष लोग इस मदरसे में अनेक गैरकानूनी गतिविधियाँ चलाते हैं और उनमें से सर्वप्रमुख है कि मसूद आलम का भाई मेवात स्थिति अपने एक और मदरसे की आड में मेवात से गायें लाकर धौला कुँआ के मदरसे में रात के अँधेरे में काट्ते हैं और बकरे के माँस के साथ मिलाकर बाजार में बेचते हैं। साथ ही इस मदरसे में सोने की नकली ईंट और नकली गिन्नियों का धन्धा भी जोर शोर से चलाया जाता है। साथ ही अनेक सन्दिग्ध लोग रातों को बडे बडे बैग के साथ मदरसे में रुकते हैं।
मसूद आलम का आरोप है कि जब भी उसने इस चीजों का विरोध किया तो घर के अन्य लोगों ने उसे मारा पीटा और चुप करा दिया
मसूद आलम ने अपनी एफ आई आर जो अभी तक दर्ज नहीं हुई है उसमें कहा है कि उसने मदरसे से शिक्षा ग्रहण नहीं की है इस कारण उसकी सोच खुली और साफ है और इसी कारण वह स्वाभिमानी जीवन जीना चाहता है और हराम की कमाई नहीं खाना चाहता। मसूद आलम के अनुसार उसे धौला कुँआ स्थिति मदरसे के प्रभारी का प्रमाण पत्र दिल्ली वफ्फ बोर्ड ने दे दिया और वह कानूनी तौर पर इस मदरसे का प्रभारी हो गया और मदरसे में गैर कानूनी कार्यों का विरोध करने के कारण मसूद के पिता ने अपने दूसरे पुत्र महमूद को मदरसे की देखभाल के लिये बुला लिया और मसूद और उसकी पत्नी कानूनी रूप से मदरसे के प्रभारी होते हुए भी बाहर किराये के मकान में रहने लगे और कभी कभार मदरसे में आने लगे।
मसूद के पिता और भाई का आपराधिक इतिहास है और 12 जनवरी 2002 को आर के पुरम सेक्टर 12 में अवैध रूप से गाय चुराते हुए उन्हें रंगे हाथों पकडा गया और मामला दर्ज हुआ जो मुकदमा अब भी चल रहा है और यह मामला पटियाला कोर्ट में चल रहा है। मसूद के पिता ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों और पुलिस से पहचान बना रखी है और असामाजिक तत्वों के सहारे अपनी धाक जमा रखी है।
मसूद आलम का कहना है कि कानूनी रूप से मदरसे का प्रभारी होने के कारण पिछले माह की 7 तारीख को वह स्थाई रूप से अपने परिवार के साथ मदरसे में रहने लगा और रमजाने के दौरान 10 गायें लाकर काटी गयीं और मसूद आलम ने उसका विरोध किया तो उसे धमकी दी गयी। धीरे धीरे मसूद आलम का गाय काट्ने के मामले पर अपने पिता, भाई और उनके ग़ुट से झगडा बढ गया। मसूद ने अपनी बहन वहीदा के पति शफी खान पर आरोप लगाया है कि वह अश्लील सीडी का धन्धा करता है जिसका केन्द्र भी मदरसा ही है और विजय इंक्लेव में उनकी सीडी की दुकान है। 26 सितम्बर 2009 प्रातःकाल 9 बजे मसूद आलम की पिटाई होने लगी तो उसने 100 नम्बर पर पीसीआर वैन को फोन किया लेकिन कोई भी नहीं आया। स्थानीय थाने ने भी इसे रोज रोज का मामला बताकर प्रार्थना पत्र लेने से मना कर दिया। उसी शाम को चार बजे मसूद आलम के परिवार के अन्य लोग फिर दो गायें लेकर आये तो मसूद आलम ने विरोध किया तो उसे जवाब मिला कि स्थानीय पुलिस चौकी को इतना पैसा खिलाया है कि कोई तेरी सहायता के लिये आगे नहीं आयेगा। इसके बाद मसूद के ऊपर एक साथ हमला हुआ जिसमें उसे काफी चोटें आयी हैं। मसूद आलम ने अपने पिता हामिद रिवजर, भाई महमूद आलम, बहन वहीदा, उसके पति शजी खान, महमूद की बेटी हारूनी, चाचा हनीफ , नवाब उर्फ कसाई, छात्र अरशद और छात्र अहमद रजा के विरुद्ध एफ आई आर की है जो अभी तक दर्ज नहीं हुई है।
इस पूरे प्रकरण ने कुछ गम्भीर प्रश्न खडे किये हैं कि क्या पुलिस प्रशासन रिश्वत लेकर ऐसे मामले भी दबाने में जुट गया है जो न केवल साम्प्रदायिक रूप ले सकता है वरन देश की राजधानी की सुरक्षा के लिये भी खतरा बन सकता है। एक ओर इस्लामी आत्ंकवाद के नेट्वर्क को देखते हुए और दिन प्रतिदिन आत्ंकी घटनाओं की आशंकाओं के मध्य इस प्रकार मदरसों के खुले आम गैर कानूनी गतिविधियों में लिप्त होने पर पुलिस प्रशासन की लापरवाही आश्चर्यजनक है। आखिर मसूद आलम ने अपनी शिकायत में कहा है कि रात को उसने स्वयं संदिग्ध लोगों को बैग के साथ मदरसे में देखा है फिर भी पुलिस की चुप्पी सन्देह उत्पन्न करती है कि क्या पुलिस पर कोई दबाव है?
लाचार भारत या लाचार नेतृत्व ?
भारत के लिये कूटनीटिक समस्यायें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर के विषय को उठाने के बाद और इसे एक स्वतन्त्र देश का दर्जा देने की माँग उठाने के बाद विश्व के मुस्लिम देशों के संगठन आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कांफ्रेंस ने जम्मू कश्मीर के लिये विशेष राजदूत की नियुक्ति कर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की मुश्किलें और बढा दी हैं। ओआईसी के इस निर्णय का भारत की स्थिति पर दूरगामी प्रभाव पड्ने वाला है। इससे एक ओर तो पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले देश के रूप में विश्व भर में बन रही अपनी पहचान से लोगों का ध्यान हटाकर कश्मीर के विषय को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप का बना सकेगा और इसी के साथ कश्मीर में कार्यरत अलगाववादी संगठन नयी परिस्थितियों में कश्मीर के मुद्दे को पुनर्परिभाषित कर सकेंगे।
पिछले कुछ दिनों से भारत सरकार और कश्मीरी अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के मध्य नये सिरे से बातचीत के लिये प्रयास हो रहे हैं और अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि इस माह के अंतिम सप्ताह में इन दोनों पक्षों में बातचीत का दौर आरम्भ हो सकता है। कश्मीर के विषय पर भारत सरकार हुर्रियत के साथ जो बातचीत करना चाहती है उसके पीछे एक तो अमेरिका का दबाव काम कर रहा है तो वहीं पिछले दिनों पाकिस्तान की सरकार द्वारा गिलगित और बालटिस्तान के क्षेत्र को एक अध्यादेश द्वारा स्वायत्तता देने के बाद भी उसे प्रकारांतर से पाकिस्तान के अधीन कर लेने से भी स्थितियों में कुछ परिवर्तन आया है।
गिलगित और बालटिस्तान क्षेत्र जम्मू कश्मीर का अंग नहीं था वरन जम्मू कश्मीर का उत्तरी क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। भारत पाकिस्तान के विभाजन के उपरांत 1 नवम्बर 1948 को यह क्षेत्र् डोगरा राज्य से अलग हो गया और पाकिस्तान में विलय कर लिया परंतु पाकिस्तान ने इसे पाक अधिकृत कश्मीर का अंग नहीं बनाया और एक विशेष कानून के द्वारा इसे प्रशासित किया। इस पर लागू होने वाला कानून अंग्रेजों के समय का ही कानून था जिसने अंतर्गत इस क्षेत्र के लोगों को किसी भी प्रकार की प्रशासनिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं दी गयी और ये लोग लगभग मार्शल ला की स्थिति में जीने को विवश रहे। पाक अधिकृत कश्मीर ने से अपने क्षेत्र का अंग बनाने से मना कर दिया क्योंकि इसके निवासी शिया और इस्मायली थे और पाक अधिकृत कश्मीर के शासकों का आशंका थी कि इस क्षेत्र के आने से उनका सुन्नी प्रभाव क्षीण हो जायेगा।
1980 के दशक में इस क्षेत्र में जनरल जिया उल हक ने शिया और इस्मायली लोगों का दमन कर यहाँ सुन्नी प्रभाव बढाने का प्रयास किया जिसके चलते इस क्षेत्र में भी शिया सुन्नी संघर्ष हुआ जिससे कि इस दशक में पूरा पाकिस्तान प्रभावित था और खुफिया एजेंसियों का तो कहना है कि जनरल जिया उल हक के विमान की दुर्घटना में इसी क्षेत्र के शिया तत्वों का हाथ था क्योंकि उस समय तक विमान के लिये तकनीकी और सेवाकर्मियों के लिये इसी क्षेत्र के शिया लोगों की भर्ती की जाती थी।
इस घटना के बाद से पाकिस्तान के शासक वर्ग ने गिलगित और बालटिस्तान में कडे कानून और सेंसरशिप के जरिये इस क्षेत्र में किसी राजनीतिक आन्दोलन या यहाँ की सूचनायें बाहर नहीं जाने देने का पूरा प्रयास किया। इसके साथ ही यह पहाडी क्षेत्र पाकिस्तान के लिये रणनीतिक दृष्टि से भी काफी लाभदायक था और कराकोरम पहाडी क्षेत्र इसी क्षेत्र में होने के कारण 1980 के दशक में पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान ने इसी पहाडी क्षेत्र का उपयोग कर चीन, ईरान और उत्तर कोरिया के साथ परमाणु तकनीक का आदान प्रदान किया। 1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत रूस के विरुद्ध पाकिस्तान का उपयोग करते हुए अमेरिका ने पाकिस्तान की परमाणु तस्करी की ओर से आंखें मूँदें रखीं और अमेरिकी कांग्रेस प्रति वर्ष उसे परमाणु के सम्बन्ध में चरित्र प्रमाण पत्र देती रही। इसी के साथ गिलगित और बाल्टिस्तान में जो दमन चक्र चलाया गया उस ओर से भी शेष विश्व ने आँख मूँद ली।
2001 में अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद बदली हुए परिस्थितियों में विशेषकर अब्दुल कदीर खान के परमाणु तस्करी के नेटवर्क के खुलासे के बाद इस्लामी आतंकवादियों के हाथ में परमाणु तकनीक चले जाने के भय से अमेरिका और इजरायल सहित पश्चिमी देशों के पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर नजर रखे जाने से कराकोरम पहाडी क्षेत्र का रणनीतिक मह्त्व बढ गया और साथ ही पिछले अनेक दशक से गिलगित और बालटिस्तान में राजनीतिक और व्यक्तिगत अधिकारों के लिये चल रहे संघर्ष को कुछ हद तक शांत करने के लिये पाकिस्तान ने अब इस क्षेत्र को स्वायत्तता देने का नाटक रचा है जबकि इस बहाने इस क्षेत्र को पाकिस्तान के नियंत्रण में ले लिया गया है। इस क्षेत्र को लेकर पाकिस्तान में अनेक मत हैं और अनेक बार पाक अधिकृत कश्मीर के न्यायालय और पाकिस्तान के न्यायालय में टकराव हो चुका है कि इस क्षेत्र को विवादित माना जाये या फिर पाक अधिकृत कश्मीर का अंग माना जाये। कुल मिलाकर वर्तमान स्थिति यह है कि इसे एक राजनीतिक मुद्दा मान लिया गया है। क्योंकि 1 नवम्बर 1948 को पाकिस्तान में विलय के समय भी पाकिस्तान ने इसे अपना अंग नहीं बनाया था और इसे विवादित क्षेत्र ही माना था जिसके भाग्य का फैसला भविष्य़ में कश्मीर की स्थिति पर निर्भर करेगा।
ऐसी परिस्थिति में एक तो यह क्षेत्र पूरी तरह स्वायत्त है और 15 अगस्त 1947 से पूर्व की स्थिति के अनुसार इस क्षेत्र पर पाकिस्तान का कोई अधिकार नहीं बनता है। लेकिन इस पूरे मामले में भारत सरकार की ओर से जो भी ढीली ढाली प्रतिक्रिया आयी है उससे तो यही लगता है कि देश की संसद ने 1994 में जो प्रस्ताव पारित किया था कि पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेंगे उसके प्रति अब सरकार गम्भीर नहीं है और पाक अधिकृत कश्मीर तो दूर एक अन्य विवादित क्षेत्र के पाकिस्तान का अंग बना लेने पर भी भारत सरकार ने मुखर होकर इसका विरोध नहीं किया।
कश्मीर के मुद्दे को छोडकर गिलगित और बालटिस्तान का पहाडी क्षेत्र और कराकोरम का क्षेत्र रणनीतिक स्थिति से अत्यंत संवेदनशील है ऐसे में चीन की इस क्षेत्र में बढती भूमिका को देखते हुए भी इस क्षेत्र पर पाकिस्तान की प्रशासनिक पकड निश्चित रूप से भारत के लिये चिंता का कारण होना चाहिये परंतु भारत सरकार ने इस विषय को जनता से बचाने का ही प्रयास अधिक किया और मीडिया ने भी इस विषय को अधिक मह्त्व देना उचित नहीं समझा।
1980 के दशक की भाँति एक बार फिर अफगानिस्तान में अमेरिका को पाकिस्तान की आवश्यकता है साथ ही उसके पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और बलूचिस्तान में स्थित अल कायदा और तालिबान के लडाकों और नेतृत्व को समाप्त करने के लिये भी वह पूरी तरह पाकिस्तान पर निर्भर है। अमेरिका की इस लाचारी का लाभ उठाकर पाकिस्तान उसे अपने हित में उसी प्रकार प्रयोग कर रहा है जैसे 1980 के दशक में किया था।
अमेरिका के राष्ट्रपति और उनका प्रशासन भी पाकिस्तान के इस तर्क से सहमत हुआ सा लगता है कि यदि भारत से लगी सीमा पर शांति रहे तो पाकिस्तान को आतंकवाद से लड्ने में अधिक सहायता होगी। इस तर्क के सहारे पाकिस्तान भारत पर कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का दबाव डाल रहा है और बडी चालाकी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे इस्लामिक राजनीति से जोड रहा है।
भारत सरकार ने एक बार फिर हुर्रियत कांफ्रेस के साथ बातचीत का जो निर्णय लिया है उसके सकारात्मक परिणाम मिलने की सम्भावना अत्यंत क्षीण है क्योंकि हुर्रियत कांफ्रेंस एक ओर तो पाकिस्तान के नेताओं के निकट सम्पर्क में है और ओआईसी जैसे संगठनों के साथ मिलकर कश्मीर के मुद्दे को वैश्विक इस्लामी राजनीतिक के साथ जोड रहा है और दूसरी ओर इसी आक्रामक कूट्नीति के सहारे भारत को बातचीत के लिये विवश कर रहा है। ऐसे में पिछले दो दशक से चल रहे इस्लामी आतंकवाद और अलगाववादी आन्दोलन को नया आयाम प्राप्त हो जायेगा और इन तत्वों को लगेगा कि आतंकवाद के बल पर सरकारों को कूटनीतिक मेज पर घसीटा जा सकता है।
11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद जिस प्रकार आतंकवाद की परिभाषा उभर कर आयी थी और विश्व समुदाय में आतंकवाद की पुरानी अवधारणा कि एक के लिये आतंकवादी दूसरे के लिये स्वतंत्रता का संघर्ष करने वाला है ध्वस्त हो गयी थी और कश्मीर से लेकर चेचन्या तक सभी को आत्ंकवादी ही माना जाने लगा था। यह स्थिति अब बदल रही है। जो लोग जार्ज बुश की पराजय और बराक ओबामा की विजय से नये विश्व का उदय देख रहे हैं उन्हें ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद कश्मीर की स्थिति में आये बदलाव की ओर भी ध्यान देना चाहिये।
कश्मीर में उमर अब्दुल्ला की सरकार के गठन के साथ ही जम्मू कश्मीर में एक विशेष प्रकार की राजनीति के दर्शन हमें हो रहे हैं। जम्मू कश्मीर में उमर अब्दुल्ला ने एक नरम अलगाववाद की नीति अपनाकर हुर्रियत कांफ्रेस और पीडीपी का राजनीतिक विस्तार समाप्त करने का प्रयास किया लेकिन इस सरकार के गठन के बाद से ही पीडीपी और हुर्रियत कांफ्रेंस ने किसी न किसी विषय को लेकर रोज कश्मीर की सडकों पर प्रदर्शन और हिंसा को आम कर दिया है ताकि विश्व समुदाय को यह सन्देश दिया जा सके कि कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन चरम पर है और इस क्षेत्र के लोग स्वतंत्रता चाहते हैं। इसी स्थिति के मध्य पाकिस्तान की ओर से सीमा पार घुसपैठ की घटनायें तेज हो गयी हैं और रोज सैन्य बलों के साथ पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों की मुठभेड के समाचार आते हैं लेकिन सामान्य जनता को इससे कोई फर्क नहीं पडता क्योंकि उन्हें अब इस क्षेत्र के प्रति कोई संवेदना नहीं रही और उन्हें पता है कि यहाँ रोज ऐसी घटनायें होती रहती हैं। देश के लोगों की यही संवेदनहीनता भारत सरकार को कश्मीर के मामले पर ढुलमुल् रवैया अपनाने का साहस प्रदान करती है।
पिछले अनेक अवसरों पर हम देख चुके हैं कि हुर्रियत और सरकार के मध्य बातचीत का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता है सिवाय इसके कि हुर्रियत जैसे पाकिस्तान परस्त अलगाववादी संगठन को मान्यता देकर भारत सरकार प्रकारांतर से पाकिस्तान को भी कश्मीर की समस्या का अंग बना लेती है। कुछ लोगों का तर्क है कि यदि बातचीत नहीं तो इस समस्या का निदान क्या है? निश्चित रूप से बातचीत होनी चाहिये लेकिन देश को यह तो पता होना चाहिये कि आखिर सरकार इस बातचीत से हासिल क्या करना चाहती है? केवल किसी के कहने पर या दबाव में बातचीत का अर्थ ही क्या हुआ? क्या बातचीत के द्वारा हुर्रियत के इस तर्क को स्वीकार किया जायेगा कि आतंकवाद के आरोप में जेलों में बन्द लोग राजनीतिक कैदी हैं , या फिर कश्मीर से सेना हटाने के प्रस्ताव को माना जायेगा?
जितनी बार भी हुर्रियत जैसे संगठ्नों के साथ बातचीत का प्रस्ताव किया जाता है निश्चित रूप से उन इस्लामी आतंकवादी संगठनों को सन्देश जाता है कि लगातार आतंकवाद की नीति का परिणाम होता है और आतंकवाद से लड्ते लड्ते अंततः राज्य, सरकार और जनता बातचीत की मेज पर आ ही जाती है और ऐसे थके और हारे लोगों के साथ मनमानी शर्तों पर बातचीत की जा सकती है।
ऐसी स्थिति में जबकि भारत में पिछले वर्ष 26 नवम्बर को मुम्बई पर हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के बाद आज दस महीने व्यतीत हो जाने पर भी भारत सरकार पाकिस्तान को कुछ भी करने के लिये बाध्य नहीं कर पाई जबकि इसके विपरीत पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनेक माध्यमों से उठवाने में सफल रहा और अब भारत ने पाकिस्तान परस्त कश्मीरी अलगाववादी संगठन के साथ बातचीत के प्रस्ताव को मानकर अपनी कूटनीतिक विवशता का परिचय दे दिया है। आज की स्थिति में पाकिस्तान भारत के लिये एजेंडा बना रहा है और भारत उसका पालन करने के लिये विवश है। 110 करोड की जनसंख्या वाला, परमाणु सम्पन्न देश जो महाशक्ति बनने का स्वप्न देख रहा है उसकी यह विवशता देखकर कष्ट आश्चर्यजनक है क्योंकि यह विवशता इस देश के लोगों की नहीं है वरन इस देश के राजनीतिक नेतृत्व की है। यह विवशता तो तब और उजागर होती है जब हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ यदि शांति प्रक्रिया नहीं चली तो उसका अर्थ होगा युद्ध लेकिन शायद प्रधानमंत्री जी भूल जाते हैं कि पाकिस्तान तो भारत के साथ पिछले 62 वर्षों से नित्य प्रति प्रच्छ्न्न युद्ध लड रहा है और हम नये नये तर्कों के सहारे अपनी विवशता, लाचारी और कमजोरी को छिपा रहे हैं।
मालेगाँव विस्फोट से मुंतज़र अल जैदी तक
आज प्रातः काल जब एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र उठाकर देखा तो उसमें ठीक एक वर्ष पूर्व मालेगाँव में हुए विस्फोट में मारी गयी एक मुस्लिम बालिका के बारे में बताया गया था कि किस प्रकार उसके सपने अधूरे रह गये। सहानुभूति के इस ढंग पर मैं यह नहीं कहूँगा कि यह समाचार पत्र पक्षपातपूर्ण है क्योंकि इसी समाचार पत्र ने मुम्बई में हुए अनेक विस्फोटों की भी ऐसी ही कहानियाँ प्रकाशित की थीं जिनमें मारे गये लोग हिन्दू थे। मालेगाँव विस्फोट के एक वर्ष पूरे होने पर साध्वी प्रज्ञा सहित 11 लोगों पर मुकदमा चल रहा है और नासिक के एक न्यायालय द्वारा इन आरोपियों पर मकोका हटाये जाने के निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय ने स्टे दे दिया है। फिलहाल महाराष्ट्र एटीएस काफी कुछ साक्ष्य प्राप्त करने का दावा कर रही है देखना है इस मामले में पूरी वास्तविकता कब तक सामने आती है।
बीते एक वर्ष में वैश्विक स्तर पर अनेक परिवर्तन देखने को मिले। एक वर्ष पूर्व इस्लामी आतंकवाद शब्द को लेकर समस्त विश्व के मुसलमान दबाव में आये तो उन्होंने दोतरफा रणनीति अपनाई। एक ओर तो अनेक इस्लामी संगठनों ने फतवे जारी किये और इस्लाम को शांति का धर्म घोषित किया तो दूसरी ओर इस्लामी आतंकवाद शब्द पर आपत्ति करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर समस्त विश्व में अभियान चलाया कि इस शब्द के प्रयोग को रोका जाये क्योंकि यह आतंकवाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश की नीतियों की प्रतिक्रिया है। स्वाभाविक रूप से इसके कुछ परिणाम भी दिखने लगे और भारत में मालेगाँव विस्फोट में कुछ मुस्लिम लोगों के मारे जाने में हिन्दुओं का हाथ होने से भारत में पिछले दो दशक से चल रहा इस्लामी आतंकवाद का बदला पूरा हो गया और यह सिद्ध हो गया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और सभी धर्मों के कुछ कट्टरपंथी अपने धर्म का गलत प्रयोग और व्याख्या कर रहे हैं। कम से कम सामान्य बौद्धिक वर्ग तो इसी निष्कर्ष पर पहुँच गया लगता है।
अमेरिका में इस वर्ष के आरम्भ में इस देश की जनता ने जार्ज बुश की नीतियों को अस्वीकार कर बराक हुसैन ओबामा को नया राष्ट्रपति चुन लिया। जिस देश ने 2003 में इराक में सद्दाम हुसैन को सत्ताच्युत करने के लिये सैनिक अभियान चलाया उसी देश के लोगों ने पाँच वर्ष बाद हुसैन मध्यनामधारी एक व्यक्ति को अपना सर्वोच्च कमांडर चुन लिया तो यह कुछ संकेत ही है। वैसे इस्लामवादी आजकल हर घटनाक्रम का समाधान कुरान से ढूँढ कर दिखा देते हैं। निश्चय ही इसका समाधान उनके पास है कि अब विश्व में काफी कुछ बदलने वाला है।
लेकिन जो बदलाव पिछले एक वर्ष में हुआ है उसकी ओर हमें अवश्य ध्यान देने की आवश्यकता है। पिछले वर्ष के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश जब इराक की अपनी अंतिम यात्रा पर थे तभी एक प्रेसकांफ्रेंस में स्थानीय टीवी चैनल के पत्रकार मुंतजर अल जैदी ने उनके ऊपर जूता फेंक दिया और उसके बाद उनकी गिरफ्तारी हुई लेकिन अब उन्हें छोड दिया गया है। मुंतजर अल जैदी ने जेल से छोडे जाने के बाद एक पत्र में अपने विचार व्यक्त किये जिसका सार संक्षेप यही है कि उनके देश पर एक विदेशी शासन को वे सहन नहीं कर सके, अपने देश के लोगों का खून बहता देख उन्हें सहन नहीं हुआ और उनका व्यवसाय पीछे रह गया और उनकी देशभक्ति उन पर हावी हो गयी।
भारत में भी कुछ पत्रकारों ने इसे अनूदित किया और उसे यहाँ वहाँ प्रकाशित किया। कुछ मुस्लिम पत्रकारों की इस विषय में रुचि अवश्य आश्चर्यचकित करती है कि एक इराकी व्यक्ति की देशभक्ति से इतना प्रभावित होने के पीछे क्या आशय है?
मुंतजर अल जैदी को जिस प्रकार समस्त विश्व में सहानुभूति मिली और देखते देखते जार्ज बुश को खलनायक बना दिया गया वह एक विशेष मानसिकता की ओर संकेत करता है जिसका शिकार समस्त विश्व पिछले अनेक दशकों से होता चला आ रहा है और वह मानसिकता है प्रताडित होने का प्रदर्शन करने की। आज समस्त विश्व में यह भाव देखा जाता है कि अपराधी, उग्रवादी, आतंकवादी स्वयं को तर्कों के सहारे न्यायसंगत सिद्ध करने का प्रयास करते हैं और समस्त मीडिया, मानवाधिकार संगठन, बौद्धिक वर्ग उनके प्रति सहानुभूति का भाव रखता है।
वास्तव में द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत युद्ध नीति में आया यह बडा परिवर्तन है। इससे पूर्व दो महायुद्धों में विजित पक्ष अपनी शक्ति, पराक्रम, क्र्रूरता का प्रदर्शन कर शत्रु पक्ष के ह्रदय में भय उत्पन्न करता था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पारम्परिक युद्ध का स्वरूप बदल गया और विशेष रूप से शीतयुद्ध के काल में शक्ति संतुलन का सिद्धांत विकसित हुआ जिसके चलते युद्ध का स्थान लोगों का मन होने लगा। मीडिया, पुस्तक, बौद्धिक वर्ग और छवि निर्माण के लिये प्रचार तंत्र के सहारे युद्ध जीता जाने लगा। शीत युद्ध के दौरान समस्त विश्व में रूस की खुफिया एजेंसी और अमेरिकी खुफिया एजेंसी के बीच इसी प्रकार का छवि निर्माण का दौर चला। शीत युद्ध काल में कम्युनिज्म के प्रभाव के चलते विश्व के अनेक क्षेत्रों में कम्युनिष्ट विचारधारा से प्रभावित लोगों ने प्रताडित होने के भाव को पूरे बौद्धिक जगत में एक सिद्धांत के रूप में स्थापित किया ताकि राज्य व्यवस्था को प्रताडित करने वाला बता कर क्रांति और उपद्रव को न्यायसंगत सिद्ध किया जा सके। इसी का परिणाम है कि कम्युनिष्ट आन्दोलन के लिये सहयोगी तत्वों को अत्यंत निरीह, शोषित और प्रताडित सिद्ध किया जाता रहा है और कम्युनिष्ट आन्दोलन के लिये हथियार उठाने वालों को न केवल महिमामंडित किया जाता है वरन उनके गिरफ्तार होने या मारे जाने पर प्रताडित होने का भाव वाला सिद्धांत आगे रखकर समस्त मीडिय़ा, बौद्धिक जगत, मानवाधिकार संगठन एकजुट होकर उनके प्रति सहानुभूति का वातावरण बनाने का प्रयास करने लगते हैं।
पूरे विश्व में वामपंथ और दक्षिणपंथ का विभाजन कर दिया गया है और मानवाधिकार, नारी अधिकार, पर्यावरण विषय, पशु प्रेम, अल्पसंख्यक अधिकार,सर्वहारा अधिकार, व्यवस्था परिवर्तन् सहित सभी विषय वामपंथ की झोली में डाल दिये गये हैं । इससे उदारवादी वामपन्थी जिनका कम्युनिष्टों से कोई वास्ता नहीं है जैसे यूरोप के वामपंथी वे भी इस वैश्विक बहस में अनजाने ही हिस्सा बन जाते हैं।
वर्तमान युग में छवि निर्माण और प्रताडित होने के भाव से सहानुभूति प्राप्त कर एक ऐसे अन्यायपूर्ण वातावरण का निर्माण हो गया है कि कुछ पक्षों को पूरी तरह निर्दोष और कुछ को नरभक्षी मान लिया गया है। आज कोई भी निर्णय न्याय के आधार पर करने के स्थान पर प्रचार तंत्र के प्रभाव में आकर भावुकता के वशीभूत होकर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर किया जाता है।
समस्त विश्व में इस्लाम को निशाना बनाया जा रहा है। अमेरिका, पश्चिम और इजरायल उसे नष्ट करना चाहते हैं। भारत का मुसलमान अत्यंत गरीब और पिछडा है। आतंकवाद का किसी मजहब से कोई लेना देना नहीं वह तो गरीबी और बेबसी के शिकार लोग अपनी कुंठा में कर रहे हैं। अमेरिका और इजरायल जो कुछ फिलीस्तीनियों के साथ कर रहे हैं उसके बाद उनके विरुद्ध आतंकवाद न्यायसंगत है। ये कुछ इसी प्रकार के तर्क हैं जो बौद्धिक वर्ग और मीडिया के ह्र्दय में उतर चुके हैं।
वर्तमान युग में प्रचार तन्त्र का उपयोग किस प्रकार स्वयं को प्रताडित सिद्ध करने के लिये किया जाता है इसके कितने ही उदाहरण हमारे पास है। विश्व भर के इस्लामवादियों ने कहा कि इजरायल और अमेरिका की खुफिया एजेंसियों ने स्वयं ही 11 सितम्बर की घटना कर ली ताकि इस्लाम के विरुद्ध युद्ध किया जा सके और तेल के स्रोतों पर नियंत्रण किया जा सके। इसी प्रकार भारत में गोधरा में कारसेवकों को साबरमती रेलगाडी में जलाये जाने के बाद हुए दंगों के बाद स्वयं को प्रताडित सिद्द करने के लिये इस्लामवादियों और मुस्लिम पक्ष की ओर से तर्क आया कि रेल में आग तो अन्दर से लगी थी। फिर भारत में 2004 से लेकर लगातार हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमणों के बाद इनकी ओर से तर्क आया कि यह कार्य भी हिन्दू संगठनों का है। ऐसे ही न जाने कितने प्रचार विश्व भर में मुसलमानों के मध्य किये जाते हैं ताकि स्वयं को प्रताडित दिखाकर न केवल सहानुभूति प्राप्त की जाये वरन आतंकवाद को न्यायसंगत सिद्ध कर शेष समाज और सरकार पर दबाव डाला जाये कि हमारी प्रताडना और आर्थिक व सामाजिक अवनति का कारण आप लोग हैं इसलिये हमारे साथ विशेष व्यवहार हो और विशेषाधिकार दिया जाये। यदि यही तर्क है तब तो भारत में पिछडों और दलितों को मुस्लिम समाज से अपना अधिकार माँगना चाहिये कि 700 वर्षों तक उनके शासन में रहने के बाद भी उनका जीवन स्तर क्यों नहीं सुधरा?
मुंतजर अल जैदी के जूते के प्रति समस्त विश्व के बौद्धिक और मीडिया वर्ग ने जो सहानुभूति दिखाई उसने कभी सोचा कि इसका दूसरा पक्ष भी है। कोई भी सिद्धांत , देश या धर्म पूरी तरह निरपेक्ष सहानुभूति का पात्र कैसे हो सकता है और कोई भी सिद्धांत, देश , धर्म सतत निन्दा का पात्र कैसे हो सकता है। ये स्थितियाँ तो देश काल परिस्थितियों के सापेक्ष होती हैं। लेकिन समाज के बौद्धिक वर्ग और मीडिया के साथ यही हो रहा है। यदि मालेगाँव में विस्फोट करने वाले तर्क दें कि पिछले चार वर्षों से जिस प्रकार निर्दोष हिन्दुओं को निशाना बनाया गया और खुलेआम मीडिया में ईमेल के जरिये हिन्दू धर्म के विरुद्ध जेहाद की बात की गयी उससे हमारा मन बेचैन हो गया और हम सुध बुध खो बैठे और हमें लगा कि यदि अब सरकार कुछ नहीं कर सकती तो हिन्दुओं की रक्षा का दायित्व हमें अपने हाथों में लेना होगा। जरा कल्पना करिये कि बौद्धिक वर्ग और मीडिया की प्रतिक्रिया क्या होगी? लेकिन यदि इसी भाव से इराक का पत्रकार अमेरिका के सर्वोच्च सेनापति के ऊपर जूता फेंकता है तो उसे महिमामंडित किया जाता है। क्योंकि यह जूता अमेरिका पर फेंका गया है। मुंतजर अल जैदी के हाथ में उस समय केवल जूता था सो उसने फेंक दिया और जिसके हाथ में हथियार है वह जेहाद कर रहा है। अधिक तो छोडिये जरा कल्पना करिये कि भारत में कोई हिन्दू पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री पर जूता फेंक दे तो कितने पत्रकार उसे शाबासी देंगे।
प्रचार के इस युग में जिस प्रकार प्रताडित किये जाने का भाव निर्माण कर आतंकवाद का प्रच्छन्न युद्ध जीता जा रहा है उससे सावधान रहने की आवश्यकता है। मीडिया , सरकारें, मानवाधिकार संगठन सहित बौद्धिक समाज इसी ग्रंथि का शिकार है और सहज रूप में कभी माओवादी नेताओं, कभी संसद पर आक्रमण के लिये दोषी तो कभी मुम्बई में सैकडों निर्दोषों को जान लेने वाले के लिये मानवीय आधार पर सोचने लगते हैं। यही इस युद्द की सबसे बडी विजय है। इस तथ्य को हमें समझना होगा।
आज युद्ध के परम्परागत स्वरूप को भूलकर नये सन्दर्भ में इसे समझने की आवश्यकता है। आज इस्लामी आतंकवाद और माओवाद को पराजित करने में इसीलिये कठिनाई हो रही है क्योंकि फासिस्टों, कम्युनिष्टों और नाजियों की भाँति इसका संचालन एक देश नहीं कर रहा है किस उस पर आक्रमण कर आप इसे नष्ट कर सकते हैं। आज इस्लामवाद और जेहाद किसी ओसामा बिन लादेन या जवाहिरी तक सीमित नहीं है यह ब्लागों, समाचार पत्रों, कालेज कैम्पसों, चैट रूम, एसएमएस से लेकर सभी आधुनिक सूचना तकनीकों तक पहुँच चुका है। जो भी किसी न किसी प्रकार मुस्लिम उत्पीडन के सिद्धांत को पुष्ट करता है या इस्लामिक सर्वोच्चता के सिद्धांत को प्रचारित करने का प्रयास करता है वह जाने अनजाने इस्लामवादी आन्दोलन को सशक्त कर रहा है। यही तथ्य माओवाद के सम्बन्ध में भी सत्य है। जिस प्रकार कोबाद गाँधी और लालगढ में माओवादियों की गिरफ्तारी पर मीडिया ने इनके प्रति सहानुभूति का रवैया अपनाया है वह चिंता का विषय है। लेकिन इसका समाधान सरकारी सेंसरशिप भी नहीं है इसका समाधान यही है कि उन तटस्थ लोगों को इन आत्ंकवादी आन्दोलनों की इस बौद्धिक खुराक की वास्तविकता से परिचित कराया जाये ताकि सहानुभूति के प्रवाह में बहने से पहले यह जाँच लें कि न्यायपूर्ण क्या है?
आज वैश्वीकरण, अमेरिका, इजरायल और हिन्दुत्व का विरोध करना तो आम फैशन है क्योंकि आप बौद्धिक विरादरी में तभी स्थान पा सकते हैं जब आपमें ये योग्यतायें हों। लेकिन जो लोग अपने कम्प्यूटर पर बैठकर इन तत्वों की आलोचना करते हैं उसी का लाभ उठाकर ऐसा कर पा रहे हैं। वैश्वीकरण ने राष्ट्र, राज्य, सरकार और सेंसरशिप जैसी परिकल्पनाओं को कालबाह्य कर दिया है और व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता प्रदान की है। जिस वैश्वीकरण के विरोध में कम्युनिष्ट और समाजवादी लामबन्द होते हैं क्या वे स्वतंत्रता के इसी सिद्धांत का पालन करने देंगे?
अमेरिका और इजरायल ने मध्य पूर्व में इस्लामवादी आन्दोलन को संगठित होने से रोक रखा है जिससे भारत में लोग सुकून से बैठकर अर्थसाधना कर पा रहे हैं। क्योंकि तेल अवीव से नई दिल्ली तक केवल दो लोकतांत्रिक देश हैं भारत और इजरायल और यही तथ्य यह प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त है कि इस क्षेत्र में इजरायल न हो तो भारत की सुरक्षा पर क्या प्रभाव होगा?
भारत में इस बात को काफी प्रचारित किया गया है कि इस्लामी आतंकवाद के वैश्विक स्वरूप से भारत को कोई खतरा नहीं है क्योंकि यह अरब देशों में पश्चिम की इजरायल परस्त नीतियों और उनके देशों में पश्चिम सैनिकों की तैनाती की प्रतिक्रिया है। लेकिन वास्तविकता तो यह है कि मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया की इस्लामवादी शक्तियों के साथ भारत के मुस्लिम संगठनों की सहानुभूति का पुराना इतिहास है। अंग्रेजों के समय 1909 से खिलाफत की पुनर्स्थापना के लिये भारत में अल्लामा इकबाल ने जबर्दस्त आन्दोलन चलाया और अंग्रेजों के विरुद्ध तुर्क सेना के लिये हर प्रकार की सहायता की। शाह वलीउल्लाह ने तो अंग्रेजों के विरुद्ध ईरान के शाह और अफगानिस्तान के शासकों को भारत पर आक्रमण के लिये मनाने का प्रयास किया। जिन दिनों मिस्र में सैयद कुत्ब मुस्लिम ब्रदरहुड के द्वारा जिहादी इस्लामी आतंकवादी आन्दोलन की पृष्ठभूमि रख रहे थे उसी कालखण्ड में भारतीय उपमहाद्वीप में मौदूदी जमायते इस्लामी की नींव रख रहे थे।
यह बात सत्य है कि 700 वर्षों तक भारत में शासन करने के दौरान इस्लाम ने अपने स्वरूप में कुछ परिवर्तन किया था और सूफी इस्लाम ने उसमें आध्यात्मिकता का कुछ पुट भर दिया था और अनेक मुगल शासकों ने अपनी अनेक विवशताओं के चलते शरियत के साथ कुछ समझौते किये थे परंतु अंग्रेजों के हाथ में शासन जाने के बाद भारत में जो भी जिहादी आन्दोलन चला वह वैश्विक इस्लामी आन्दोलन से गहराई से जुडा था और इसका उद्देश्य खिलाफत संस्था की पुनर्स्थापना, भारत को पुनः इस्लामी राज्य बनाना और कुरान और शरियत के आधार पर शासन व्यवस्था स्थापित करना था। इसलिये भारत के सम्बन्ध में यह तर्क सत्य से पूरी तरह परे है कि मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया की इस्लामी राजनीति या आन्दोलन का भारत के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। आज की परिस्थितियों में सूचना के अबाध प्रवाह के चलते यह और भी सरल हो गया है कि मध्य पूर्व की राजनीति के साथ स्वयं को जोडे रखा जाये।

