What Political system needs?
When I see the recent political development I have different perception from others . This is not the political crisis between UPA and its allies. In recent months the discussion on federalism has been intensified at the same time regional satrap system has become strong. It has provided a chance to all of us to look for some structural changes in our political system as a whole. Read more
भारत में उथल पुथल पर कुछ सुझाव
भारतीय राजनीति का भविष्य
जब हम भारतीय राजनीति की बात करते हैं तो हम इसे आम तौर पर देश की स्वतन्त्रता के पश्चात से देखने का आरम्भ करते हैं और शायद आज के संदर्भ में यही प्रासंगिक भी है । इस आधार पर यदि हम अगले दशक की भारतीय राजनीति के स्वरूप का आकलन करने का प्रयास करें तो हमें भारत की राजनीति के प्रमुख घटकों और राजनीति और समाज में उनके स्थान पर भी चर्चा करनी होगी। Read more
इस्लामी कट्टरता का नया दौर
पाकिस्तान में पिछले दिनों जब प्रमुख प्रांत पंजाब के राज्यपाल सलमान तासीर की हत्या उनके ही अंगरक्षक द्वारा कर दी गयी तो अनेक प्रश्न एक साथ उठ खडे हुए। इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढना अत्यंत आवश्यक है। पाकिस्तान में जिस प्रकार यह हत्या अन्जाम दी गयी है वही अपने आप में सनसनीखेज है और जिस प्रकार इस हत्या के बाद पाकिस्तान के प्रमुख इस्लामी मजहबी संगठन और राजनीतिक दल इस घटना को न केवल सही ठहरा रहे हैं वरन इसे इस्लाम और पैगम्बर की चौदह सौ वर्ष पुरानी परम्परा के अनुक्रम में प्रशंसित कर रहे हैं उससे निश्चय ही यह आवश्यक हो गया है कि इस पूरी घटना को समग्रता में देखा जाये। समग्रता से आशय यह है कि क्या यह घटना पाकिस्तान की अराजक स्थिति का परिचायक है या फिर किसी नये रुझान का आरम्भ है। निश्चय ही इसे केवल कानून व्यवस्था के गिरावट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये विशेष रूप से तब जब कि तालिबान ने इस हत्या की जिम्मेदारी भी ले ली है। हालाँकि इस दावे की सत्यता अभी प्रमाणित नहीं हुई है लेकिन फिर भी इससे कुछ गम्भीर प्रश्न अवश्य खडे हुए हैं। Read more
विकीलीक्स के प्रकाश में हमारी कूट्नीतिक स्थिति
अभी कुछ दिनों पूर्व ही विकीलीक्स ने एक बार फिर अमेरिका के अनेक गोपनीय दस्तावेजों और राजनयिकों के केबल संदेश को सार्वजनिक कर सनसनी मचा दी है। विकीलीक्स ने जिन विषयों को स्पर्श किया है वे काफी व्यापक हैं लेकिन जिन विषयों का सीधे सीधे भारत से सम्बन्ध है उनके प्रकाश में निश्चय ही भारत की कूटनीतिक स्थिति की समीक्षा की जा सकती है। विकीलीक्स से सम्बन्धित जो विषय भारत के लिये मह्त्व के हैं उनमें अधिकतर का सम्बन्ध 26 नवम्बर 2008 को भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण से है। विकीलीक्स से एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो गयी है कि इस आक्रमम के पश्चात जिस तरह से तत्कालीन भारत सरकार ने अपनी कूटनीतिक विजय की आत्मश्लाघा की थी वह देश को गुमराह करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। इस आक्रमण के पश्चात एक तरीके से ऐसा वातवरण बनाया गया कि सरकार के किसी कदम की आलोचना करना बलिदान देने वाले सैनिकों और सामान्य जनों के शवों पर राजनीति करने के समान मान लिया जाता था और उसी भावुकता का लाभ उठाकर तत्कालीन सरकार ने विश्व पटल पर भारत की छवि को क्या स्वरूप दिया यह तो आज विकीलीक्स के खुलासों से स्पष्ट है। Read more
क्यों हारी भाजपा ?
चुनाव परिणाम आ चुके हैं और सारी स्थितियाँ स्पष्ट हो चुकी हैं। लेकिन यह जनादेश एक मायने में अत्यंत रोचक है। कांग्रेस 1989 के अपने आँकडे से आगे बढ गयी है जब उसे 197 सीटें मिली थी और भाजपा 1991 के अपने आँकडे के आस पास पहुँच गयी है लेकिन दोनों में अंतर यह है कि 1989 की कांग्रेस अपने पराभव पर थी और 1991 की भाजपा अपने उद्भव पर थी पर आज स्थिति पूरी तरह उलट गयी है। भाजपा के लिये यह आँकडा उसे उदास करता है और उसके पतन की कहानी कहता है तो कांग्रेस के लिये यह आँकडा उसके पुनरोत्थान की कहानी बयाँ करता है। लेकिन दोनों ही दलों के लिये समय नयी शुरुआत का है। यह बात और है कि कांग्रेस उसके लिये तैयार है और भाजपा उस आरम्भ से डरती है। यह आरम्भ है नये नेतृत्व का। कांग्रेस को इस बात में कोई दुबिधा नहीं है कि उसका अगला नेता कौन होगा लेकिन भाजपा पिछले कई वर्षों से इस प्रक्रिया को रोक कर रखे है। पहले आडवाणी को प्रधानमंत्री घोषित करना और फिर् दिल्ली प्रदेश में भाजपा का अध्यक्ष एक बुजुर्ग व्यक्ति को बनाना यही प्रमाणित करता है कि भाजपा नयी पीढी के नेतृत्व की आपसी लडाई की भयावह कल्पना से इस कदर भयभीत है कि बुजुर्गों के सहारे इस लडाई पर एक कृत्रिम आवरण डाले हुए है।
2007 में गुजरात के चुनाव परिणामों के उपरांत मैंने अपने विश्लेषण में कहा था कि मोदी की विजय से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और लालकृष्ण आडवाणी इस कदर भयभीत हो गये थे कि आनन फानन में बिना किसी भूमिका के आड्वाणी को देश का अगला प्रधानमंत्री पद का भाजपा का प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। इस निर्णय पर संघ परिवार भी सहमत हो गया क्योंकि उसे भी पता था कि नये नेतृत्व की लडाई कहीं अधिक भयावह होगी और ऐसे में 2009 में भाजपा की सत्ता में वापसी की सम्भावना धूमिल हो जायेगी। लेकिन बात वहीं से बिगड्नी आरम्भ हो गयी। जिस आडवाणी को उनकी ही पार्टी और संघ परिवार ने जिन्ना के मामले पर भाजपा के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने को विवश कर दिया था और समाज में उनके व्यक्तित्व को धराशायी कर दिया था उनको ही फिर से देश का नेता स्वीकार करने को समाज को विवश किया। इस सोच के पीछे कहीं न कहीं संगठन का यह अहंकार कार्य कर रहा था कि इतना बडा संगठन फिर से समाज की सोच को बदल देगा और आडवाणी स्वीकार्य हो जायेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
भाजपा ने विधानसभा चुनावों में आतंकवाद के मुद्दे को जोरशोर से उठाया लेकिन मुम्बई में हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद भी दिल्ली जैसे महानगर में सत्ता प्राप्त करने में असफल रहने के बाद लोकसभा चुनावों में अपनी रणनीति बदल दी और आतंकवाद के मुद्दे से पूरी तरह परहेज किया। इसी प्रकार भाजपा की पराजय का कारण पूरे पाँच वर्षों में उसकी संभ्रम की स्थिति के कारण उसके प्रति एक नकारात्मक छवि का निर्माण होना रहा। जैसे संसद सत्र के दौरान अधिक समय मुद्दों को उठाने के स्थान पर संसद के बहिष्कार पर जोर देना, राष्ट्रपति चुनाव के दौरान सकारात्मक विपक्ष की भूमिका न निभाकर एक गलत रणनीति अपनाकर नकारात्मक सन्देश देना।
भाजपा ने 2004 के चुनावों के उपरांत इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया कि कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गान्धी के तथाकथित प्रधानमंत्री पद के त्याग के बाद कांग्रेस की छवि आम जनता के मन में एक सकारात्मक राजनीतिक दल के रूप में उभरी थी और इस छवि को तोड्ने का कार्य भाजपा नहीं कर सकी। 2004 के बाद भाजपा कभी भी स्वयं को सकारात्मक विपक्ष के रूप में अनुभव न कर सकी और मुद्दों के आधार पर राजनीतिक शिक्षण के द्वारा अपनी खोई जमीन प्राप्त करने के स्थान पर शार्ट कट का रास्ता तलाशती रही। उदाहरण के लिये अमेरिका के साथ भारत की परमाणु सन्धि के मामले में भाजपा की रणनीति पूरी तरह दिशाहीन रही। जिस करार को एक प्रगतिशील कदम माना गया और जिसका समर्थक वर्ग वही था जो भाजपा का ही समर्थक वर्ग माना जाता है उसके बीच एक बार फिर भाजपा ने नकारात्मक विपक्ष की छवि बनायी। इसके बाद अगला कदम संसद में वोट के बदले नोटकाण्ड था जिसका प्रबन्धन इतना घटिया हुआ कि फिर यह पार्टी हँसी का पात्र बन कर रह गयी। इन प्रबन्धनों के फ्लाप होने का सबसे बडा कारण यह था कि भाजपा ने अपने को जनप्रतिनिधि राजनीतिक दल के स्थान पर प्रबन्धन मूलक राजनीतिक दल के रूप में परिवर्तित कर लिया है।
यही सोच चुनाव के प्रबन्धन में भी नजर आयी। भाजपा के तथाकथित वार रूम में जो चुनाव प्रबन्धन अपनाया गया वह पूरी तरह विनाशकारी रहा। एक तो प्रमुख रणनीति यह रही कि विचारधारा को स्पर्श न किया जाये ताकि अल्पसंख्यक मत भाजपा के विरुद्ध एकजुट न हो और अल्पसंख्यकों के बिखराव में भाजपा की सफलता देखी गयी अर्थात स्वय़ं के पुरुषार्थ से अधिक दूसरों की कमजोरी का लाभ उठाकर विजित होने की चेष्टा। यदि चुनाव प्रबन्धन को वार रूम कहा गया था तो युद्ध का पहला नियम है कि शत्रु को अपनी भूमि पर लाकर युद्ध किया जाता है। भाजपा ने अपनी रणनीति में पूरा चुनावी युद्ध कांग्रेस की भूमि पर जाकर लडा और कांग्रेस को रक्षात्मक करने के स्थान पर उसे आक्रामक होने का अवसर दिया। उदाहरण के लिये पूरे पाँच वर्ष भाजपा कहती रही कि कांग्रेस आतंकवाद पर नरम है और यह बात देश में हुए अनेक विस्फोटों के बाद देश के अधिकाँश लोग मान भी रहे थे परंतु भाजपा के एजेण्डे से यह मुद्दा लोकसभा चुनाव में गायब था। विडम्बना तो यह है कि आतंकवाद पर कांग्रेस ने भाजपा को घेर लिया क्योंकि भाजपा ने आतंकवाद पर वह तेवर नहीं अपनाये जो कांग्रेस का पसीना छुडा सकते थे क्योंकि वार रूम के कुछ सदस्य मानते थे कि भाजपा को ऐसी कोई बात नहीं करनी चाहिये जिससे अल्पसंख्यक इस दल के विरुद्ध एकजुट हों। इस चुनाव में विचारधारा की बात न करके भाजपा ने स्वयं को कांग्रेस की श्रेणी में लाकर खडा कर लिया ।
इसी प्रकार भाजपा ने कमजोर प्रधानमंत्री का मुद्दा उठाया लेकिन आडवाणी जी ने देश को यह नहीं बताया कि वे कठोर कैसे हैं। यदि बिजली, सड्क पानी ही कठोर प्रधानमंत्री देगा तो मनमोहन सिंह ही क्या बुरे हैं जो जैसे तैसे सरकार तो चला ही रहे थे। भाजपा यह नहीं बता पाई कि मनमोहन कमजोर क्यों हैं और आडवाणी कठोर क्यों हैं?
इस चुनाव में पहली बार प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी जो स्वयं को कठोर कह रहा था वह न तो विदेश नीति की बात कर रहा था, न सुलग रहे पाकिस्तान से भारत को बचाने की रणनीति बता रहा था और न ही विश्व बिरादरी में भारत की हनक बढाने का कोई स्वप्न दिखा रहा था जबकि उसका मतदाता अधिकतर वही है जो भारत को सुपर पावर के रूप में देखना चाहता है। इसके विपरीत यह चुनाव भाजपा ने ऐसे लडा मानों एक साथ पूरे देश के राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे हों। राज्यों में वोट अपने मुख्यमंत्रियों के काम के आधार पर माँगे जा रहे थे । अब यदि लाडली योजना चलाने के लिये ही देश का प्रधानमंत्री चुनना है, किसानों की कर्ज माफी को ही चुनाव का आधार बनाना है तो मनमोहन सिंह का प्रदर्शन प्रधानमंत्री के रूप में कहाँ बुरा रहा है?
पूरे चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा देश के मतदाताओं से अधिक टीवी चैनल और अंग्रेजी समाचार पत्रों में अपनी छवि और उसके फीड बैक पर आश्रित रही। वरुण गान्धी के मामले में भाजपा का रवैया पूरी तरह असमंजस का रहा। या तो भाजपा चुनाव आयोग की सलाह मान लेती या फिर उन परिस्थितियों पर बहस चलाती जिनके चलते वरुण ने ऐसा बयान दिया। लेकिन ऐसा करने के स्थान पर भाजपा के नेता एक ओर तो कहते रहे कि उत्तर प्रदेश में हम इस विषय़ पर आन्दोलन चलायेंगे और वहीं दूसरी ओर जमीन पर कार्यकर्ताओं को ऐसा कुछ करने से रोकते रहे। भाजपा को उत्तर प्रदेश से बहुत उम्मीदे थीं परंतु उसकी उम्मीद का आधार मुस्लिम वोटों का बँटवारा था लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आजम खान के सपा से नाराज होने के बाद यह वोट कांग्रेस को चला गया और भाजपा यह आशा लगाये रही कि बसपा से असंतुष्ट सवर्ण भाजपा में आ जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यह वोट भी कांग्रेस के खाते में चला गया। भाजपा उत्तर प्रदेश में जिस मुस्लिम वोट को अपने विरुद्ध गोलबन्द होने से रोकना चाहती थी उसे वह रोक नहीं सकी क्योंकि मुस्लिम मतदाताओं ने आडवाणी को रामरथ की छवि से कभी मुक्त नहीं किया लेकिन आडवाणी के सलाहकारों ने उन्हें यह विश्वास दिला दिया था कि पाकिस्तान के मुसलमानों में अपनी पैठ बनाकर वह भारत के मुस्लिम समाज का दिल जीत लेंगे। इसीलिये आडवाणी गुजरात की जनसभाओं में जनता को यह नारा लगाने से रोकते रहे कि जो हिन्दू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा और कहा कि हिन्दू हित नहीं राष्टृहित की बात करो। इसके साथ ही उन्होंने एक प्रसिद्ध टीवी चैनल को साक्षात्कार देकर कहा कि अभी तक हम कहते थे कि किसी का तुष्टीकरण नहीं लेकिन अब मेरा नारा है कि किसी के साथ भेदभाव नहीं। पूरे चुनाव प्रचार में लौह पुरुष की इस बदलती छवि से लोग आश्चर्यचकित थे।
एक और कारण जिस पर चुनाव प्रबन्धन में अधिक जोर दिया गया वह है ओवर एक्सपोजर। जो लोग कहते हैं कि टीवी चैनल भाजपा विरोधी अभियान में लगे रहे उनसे मैं सहमत नहीं हूँ क्योंकि मीडिया ने भाजपा को अधिक कवरेज दिया और भाजपा के नेता विशेष रूप से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी लालकृष्ण आडवाणी की मीडिया से सहज उपलब्धता ने उनके व्यक्तित्व को हल्का कर दिया। राजनीतिक दलों ने अब भी तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया के मुकाबले स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाई मीडिया की उपयोगिता नहीं समझी है।
आडवाणी जी ने भाजपा को हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी से मध्यमार्गी पार्टी बनाने का प्रयास किया लेकिन उनके इस प्रयास को जनता ने नकार दिया। अब भाजपा ऐसे मोड पर खडी है जहाँ से उसके लिये दो रास्ते जाते हैं एक तो यथास्थिति बनाये रखते हुए अपने क्षरण को बरकरार रख कर तब तक प्रतीक्षा करना जब तक वह पूरी तरह समाप्त न हो जाये या फिर देश में विचारधारा के अपने क्षेत्र को फिर से वापस प्राप्त करना। भाजपा को दूसरे रास्ते पर लाने के लिये पार्टी से बाहर के तत्वों को भी कुछ कठोर फैसले लेने होंगे।

