ये हिन्दुत्व नहीं गुण्डागर्दी है
कल सुबह सुबह जब समाचार पत्र उठाया और उसमें पढ्ने को मिला कि कर्नाटक में कुछ तथाकथित हिन्दुत्व के ठेकेदारों ने मँगलोर में एक पब में घुसकर मार पीट की और लडकियों को निशाना बनाया तो सर शर्म से झुक गया। आखिर जो काम किया गया उसकी जितनी निन्दा की जाये वह कम है। केवल इसलिये नहीं कि यह शर्मनाक है बल्कि इसलिये भी कि जो ऐसा कर रहे हैं उन्हें यह भी नहीं पता कि वे उस महान हिन्दू धर्म की छवि को कितनी क्षति पहुँचा रहे हैं जो वर्तमान विश्व परिदृश्य में मानवता के लिये आशा की एक किरण नजर आ रहा है। आखिर हिन्दुत्व के नाम पर इतने संगठन और उनके संकीर्ण एजेण्डे का राज क्या है? Read more
मालेगाँव मामले में जाँच हो रही है या कुछ और?
29 सितम्बर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगाँव में हुए विस्फोट के पश्चात जिस प्रकार जाँच के बहाने हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा का सृजन करने का प्रयास हुआ है उसके अपने निहितार्थ हैं और अब तक यदि पूरे घटनाक्रम में बयानबाजी से लेकर मीडिया ट्रायल को ध्यान से देखा जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह जाँच नहीं कुछ और है और यह कुछ और क्या है इसका निर्णय आप कुछ तथ्यों के आधार पर स्वयं करें।
29 सितम्बर को मालेगाँव विस्फोट में महाराष्ट्र एटीएस की ओर से जाँच की प्रक्रिया आरम्भ ही की गयी थी कि 5 अक्टूबर को एनसीपी के नेता शरद पवार ने घोषणा कर दी कि आतंकवादी मामलों में मुसलमानों को बदनाम किया जाता है लेकिन हिन्दू आतंकी गुटों पर कार्रवाई नहीं हो रही है। इससे दो बातें स्पष्ट हैं कि एक तो शरद पवार ने जाँच से पूर्व ही घोषित कर दिया कि मालेगाँव विस्फोट हिन्दुओं ने किया है और वे आतंकवादी हैं। इसके बाद तो जाँच मात्र औपचारिकता ही रह गयी थी जिसकी दिशा स्पष्ट थी। शरद पवार के बयान के एक सप्ताह पश्चात मालेगाँव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा को एटीएस ने पूछताछ के लिये सम्पर्क किया। इसी के साथ महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर.पाटिल भी समाचार माध्यमों से कहते रहे कि आरोपियों के विरुद्ध ठोस साक्ष्य हैं।
इसके बाद आरम्भ हुआ जाँच की प्रक्रिया के दौरान कुछ चुनी हुई खबरों को लीक करने का दौर। सबसे पहले एटीएस ने भारत के सबसे तेज हिन्दी न्यूज चैनल को कान में बताया कि साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित ने अपनी पूछताछ और नार्को टेस्ट में एक धर्मगुरु और हिन्दू संगठन के बडे नेता का नाम लिया है। इसके बाद मीडिया को इस बात का लाइसेंस मिल गया कि वह किसी भी धर्माचार्य को ललकारे और उसे कटघरे में खडा कर दे। इस पूरी कसरत में स्टार न्यूज और एनडीटीवी की भूमिका अग्रणी रही।
एटीएस द्वारा धर्माचार्य का नाम लेकर संशय की स्थिति निर्माण करने के पीछे प्रयोजन कुछ भी रहा हो परंतु इस बहाने देश के कुछ बडे संतों को पूरे मामले में घसीटने का प्रयास हुआ। इसी बीच एटीएस ने मीडिया को बताया कि इस विस्फोट के आरोपियों के उन विस्फोटों से सम्बन्ध होने की जाँच की जा रही है जिसमें मुसलमान ही मारे गये हैं और यह विस्फोट हैं समझौता ट्रेन विस्फोट, मक्का मस्जिद विस्फोट, अजमेर शरीफ विस्फोट। इस विषय को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया कि सन्देह के आधार पर सम्बन्धित एजेंसियों या राज्य सरकारों की पुलिस की जाँच को अंतिम निष्कर्ष मान कर प्रस्तुत किया और एनडीटीवी ने तो अपने कार्यक्रम हम लोग में तो बकायदा इन विस्फोटों को हिन्दू आतंकवादियों पर चस्पा करते हुए हिन्दू आतंकवाद पर बहस ही आरम्भ कर दी। अब प्रश्न यह है कि इन विस्फोटों की पूरी जाँच होने से पूर्व इसे कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा और दयानन्द पांडे के माथे मढने के पीछे मंतव्य क्या था? जब इन विस्फोटों की जाँच करने के लिये सम्बन्धित राज्यों की पुलिस ने कर्नल पुरोहित से सम्पर्क किया तो पता लगा कि इन विस्फोटों अर्थात समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद विस्फोट और अजमेर विस्फोट से इन आरोपियों का कोई सम्बन्ध नहीं है। इस पूरे मामले में जिस प्रकार एटीएस ने अति सक्रियता दिखाई और जाँच को मीडिया केन्द्रित रखा उससे स्पष्ट है कि एटीएस निष्पक्ष रूप से कार्य करने को स्वतंत्र नहीं है। इस बीच एटीएस का बयान देना फिर खण्डन करने का दौर भी चलता रहा। यहाँ तक कि समझौता एक्सप्रेस में आरडीएक्स से विस्फोट करने की कहानी आयी और फिर उसका खण्डन एटीएस ने किया।
इन बयानबाजियों के बाद पूरी कहानी में मोड आया जब मालेगाँव विस्फोट के दायरे को बढा कर कुछ वर्ष पूर्व हुए बम विस्फोटों की सीबीआई जाँच को भी इसके साथ जोड दिया गया। यह प्रयास भी यही सिद्ध करता है कि अब इतनी सक्रियता क्यों? आखिर इन मामलों की जाँच पहले क्यों नहीं की गयी और यदि की गयी तो क्या अब उस जाँच पर भरोसा नहीं रह गया।
वास्तव में एटीएस और उनके राजनीतिक आकाओं के सामने एक समस्या है कि इस पूरी जाँच को ये लोग दो स्तर पर प्रयोग करना चाहते थे। एक तो देश में हिन्दू आतंकवाद का एक सुव्यवस्थित नेटवर्क दिखाने का प्रयास ताकि न्यायालय में इसे साक्ष्य बनाया जा सके और सामान्य जनता को दिखाया जा सके कि देश में हिन्दू आतंकवाद है। वास्तव में आतंकवाद की परिभाषा है और इसके अनुसार आतंकवाद के लिये एक नेट्वर्क होना चाहिये, उसकी वित्तीय सहायता होनी चाहिये, आतंकवादियों के प्रशिक्षण के लिये लोग और हथियार होने चाहिये, आतंकवादियों को हथियार मिलने चाहिये और उसे उपलब्ध कराने वाले लोग चाहिये। यही कारण है कि एटीएस ने इन तथ्यों के लिये साक्ष्य प्राप्त करने में गोपनीयता बरतने के स्थान पर मीडिया को समय समय पर लीक किया और कुछ समाचार चैनलों और समाचार पत्रों को इस आधार पर कपोलकल्पित कहानियाँ बनाने का पूरा अवसर दिया।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में जो सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है वह यह कि जिस प्रकार कुछ राजनीतिक दल और मीडिया संस्थान हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा सृजित करने में दिन रात लगे हुए हैं उसके अपने निहितार्थ हैं।
अब कुछ समाचार चैनलों की अति सक्रियता पर दृष्टि डालें। स्टार न्यूज, एनडीटीवी और न्यूज 24 ने इस विषय में अति सक्रियता दिखाई। इसमें न्यूज 24 और एनडीटीवी की बात तो समझ में आती है कि एक तो कांग्रेस के बडे नेता का चैनल है और दूसरे का सम्बन्ध कम्युनिस्ट पार्टी से है। परंतु स्टार न्यूज की सक्रियता इस लिये महत्वपूर्ण है कि यहाँ पूरा जिम्मा इस चैनल में सबसे बडे पद पर बैठे एक सदस्य ने उठा रखा है जो एक समुदाय विशेष से हैं। इन सज्जन के बारे में बताया जाता है कि जब दिल्ली में जामिया नगर में एनकाउंटर हुआ था तो इन्होंने सभी मीडिया के लोगों को एसएमएस कर आग्रह किया था कि इस पूरे मामले में संयम रखें और जामिया नगर का नाम न लें और न ही जामिया मिलिया विश्वविद्यालय का नाम लें क्योंकि इससे स्थान और संस्थान बदनाम होता है। इसके साथ ही उनका तर्क था कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन यही सिद्धांत तब गायब हो गया जब मालेग़ाँव में हिन्दू आरोपी बनाये गये। ये सज्जन पूरे मामले में व्यक्तिगत रूचि लेकर न्यूज फ्लैश चलाने से लेकर स्क्रिप्ट बनाने तक का पूरा विषय स्वयं देखते हैं और पूरे चैनल को इनका निर्देश है कि मालेगाँव मामले को विशेष कवरेज दिया जाये। इन सज्जन की व्यक्तिगत रूचि थी कि साध्वी की दीक्षा को इन्होंने आतंकवाद से जोड्ने का प्रयास किया। साध्वी प्रज्ञा के गुरु को ललकारा और कहा कि वे भाग खडे हुए हैं। जबकि बाद में इन्हीं संत ने अपनी प्रेस कांफ्रेस में बताया कि वे कथाओं में व्यस्त थे और उनकी कथाओं का सीधा प्रसारण कुछ टीवी चैनल पर भी हो रहा था। इसी प्रकार इन सज्जन ने श्री श्री रविशंकर को भी इस पूरे मामले में घसीटने का प्रयास किया।
आज यदि स्टार न्यूज को ध्यान से देखा जाये तो यह बात साफ तौर पर दिखाई देती है कि इस चैनल की मालेग़ाव विस्फोट की जाँच में विशेष रूचि है। यह मामला अत्यंत संवेदनशील है कि यदि किसी चैनल के शीर्ष पद पर बैठा कोई व्यक्ति पत्रकारिता के सिद्धांतों के अतिरिक्त किसी अन्य भाव से प्रेरित है तो यह बात निश्चय ही चौंकाने वाली है।
स्टार न्यूज ने मकोका अदालत में मालेगाँव विस्फोट के 7 आरोपियों की पेशी पर जिस प्रकार स्वयं अदालत से पहले निर्णय सुना दिया और संवाददाता शीला रावल ने मकोका अदालत में साध्वी के आरोपों पर सुनवाई से पूर्व ही अपना निर्णय सुना दिया और कह दिया कि ये आरोप निराधार हैं और इन्हें सिद्ध करना साध्वी और अन्य आरोपियों के लिये आसान नहीं होगा। यह जल्दबाजी क्यों जबकि मकोका अदालत इन आरोपों पर सुनवाई मंगलवार को करेगी। सारे चैनल जब साध्वी के आरोपों पर एटीएस को घेर रहे थे उस समय स्टार न्यूज का एटीएस की पैरवी करना कुछ सन्देह पैदा करता है। आखिर स्टार न्यूज ने यही पुलिस प्रेम जामिया नगर एनकाउंटर में क्यों नहीं दिखाया था? यही नहीं यदि मीडिया का कार्य सूचनाओं को सामने लाना ही है तो एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के बारे में कुछ समाचार माध्यमों में सनसनीखेज तथ्य आने पर इस बारे में कोई खोज क्यों नहीं हुई कि जब वे रोजा इफ्तार में कांग्रेस की पार्टी में शामिल हुए। अपने पुत्र के सऊदी अरब के व्यवसाय में वे कांग्रेसी नेताओं के सम्पर्क का लाभ उठाते हैं और इससे भी बडी बात कि वे पहले रा ( रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) में थे और कन्धार विमान अपहरण में अपनी लापरवाही के चलते वहाँ से हटा दिये गये थे। बाद में काफी लाबिंग के बाद वे महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख बने। अब सारे न्यूज चैनल जो हिन्दू आतंकवाद से सम्बन्धित सारी खोजी पत्रकारिता कर रहे हैं इस मामले में कोई खोज क्यों नहीं करते जबकि यह अत्यंत गम्भीर तथ्य हैं।
मालेगाँव विस्फोट की पूरी जाँच ने भारत में एक नये युग का पदार्पण किया है और इससे देश में राजनीतिक, बौद्धिक और मानवाधिकार के स्तर पर एक स्पष्ट ध्रवीकरण देखने को मिल रहा है। आज देश में सेक्युलरिज्म के नाम पर राजनीति कर रहे दल, कुछ मीडिया संस्थान, मानवाधिकार संगठन और बुद्धिजीवी लोग पूरी तरह मुस्लिम परस्त और एकांगी हो गये हैं। इस जाँच ने एक बडा जटिल सवाल खडा किया है कि हिन्दू जिसका इस विश्व में केवल एक देश है और बहुसंख्यक होकर भी अपने देश में बेबस है तो वह क्या करे? आखिर बिडम्बना देखिये कि देश में जेहाद के नाम पर इस्लाम और अल्लाह के नाम पर इस्लामी आतंकवादी मन्दिरों, संसद और बाजारों में आक्रमण करते हैं और निर्दोष हिन्दुओं का खून बहाते हैं और फिर सरकार इस्लामी आतंकवाद से लड्ने के स्थान पर हिन्दुओं को अपमानित, लाँक्षित और प्रताडित करती है। इस विषम स्थिति का क्या करें कि दोनों ओर से हिन्दुओं को ही मरना है आतंकवादी आक्रमण मुसलमान करें, जेहाद वे करें, चिल्ला चिल्ला कर कहें कि हम इस्लाम और अल्लाह के नाम पर हिन्दुओं को मार रहे हैं तो मुस्लिम समाज को खुश करने के लिये और इस्लाम की छवि सुधारने के लिये हिन्दुओं को प्रताडित किया जाये। ऐसा न्याय और आतंकवाद के विरुद्ध ऐसी लडाई विश्व के किसी कोने में न तो लडी गयी और न भविष्य में लडी जायेगी। अमेरिका और यूरोप ने अपने देशों पर हुए आक्रमणों के बाद इस्लामी आतंकवाद का उत्तर ईसाई आतंकवाद की अवधारणा सृजित कर नहीं दिया और न ही इजरायल ने इस्लामी आतंकवाद के समानान्तर यहूदी आतंकवाद को सृजित किया फिर भारत में ऐसा आत्मघाती कदम क्यों?
आज इस विषय पर बहस होनी चाहिये कि सेक्युलर दल और मीडिया ऐसा केवल वोट बैंक की राजनीति के चलते कर रहे हैं या फिर इसके पीछे कोई अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है। अभी एक दिन पूर्व कुछ समाचार पत्रों ने समाचार प्रकाशित किया कि खुफिया एजेंसियाँ उन संतों और संगठनों पर नजर रखे हुए हैं जिनमे इजरायल के साथ अच्छे सम्बन्ध हैं क्योंकि उन्हें शक है कि कहीं एक लोग इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद से तो नहीं जुडे हैं। अर्थात भारत को एक सक्षम, सशक्त और सम्पन्न बनाने के गैर सरकारी प्रयासों के लिये समाज में शंका का भाव उत्पन्न किया जा रहा है।
जिस देश में सेक्युलरिज्म के नाम पर कोयम्बटूर बम धमाकों के आरोपी को सरकार के आदेश पर जेल में पंच सितारा सुविधायें दी जाती हैं। जिस देश में फिलीस्तीनी नेता और सैकडों यहूदियों को इंतिफादा में मरवाने वाले यासिर अराफात के नाम पर केरल के विधानसभा चुनावों में वोट माँगे जाते हैं उसी देश में खुफिया एजेंसियों को आदेश दिया जाता है कि इजरायल के साथ सम्बन्ध रखने वालों पर नजर रखी जाये।
मालेगाँव विस्फोट की जाँच को इसके व्यापक दायरे में समझने की आवश्यकता है यह विषय वोट बैंक की राजनीति से भी बडा है और ऐसा प्रतीत होता है कि शरियत के आधार पर विश्व पर शासन करने की आकाँक्षा से प्रेरित इस्लामवादी आन्दोलन ने भारत की व्यवस्था में अपनी जडें जमा ली हैं और व्यवस्था उनका सहयोग कर रही है और देश में हर उस प्रयास और संस्था को कमजोर करने का प्रयास हो रहा है जो इस्लामवादी और जेहादी आन्दोलन को चुनौती दे सकता है।
डिजिटल मीडिया का भविष्य़
पिछले दिनों दिल्ली में वेब दुनिया से जुडे लोगों के लिये एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का आयोजन हुआ और इंटरनेट और डिजिटल मीडिया से जुडे जिस भी व्यक्ति या संस्थान ने उस अवसर को गँवाया उसने निश्चय ही कुछ गँवाया। 16 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक डिज़िटल एम्पावरमेण्ट फाउण्डॆशन के तत्वावधान में दक्षिण एशिया के स्तर पर मंथन पुरस्कारों का आयोजन किया गया और इसमें तीन दिनों तक पुरस्कार की श्रेणी में शामिल किये गये संस्थानों और व्यक्तियों सहित अनेक गैर सरकारी संगठनों, व्यावसायिक कम्पनियों ने अपने अनुभव लोगों के साथ बाँटे। इस पूरे आयोजन से जो निष्कर्ष मूल रूप में निकल कर आया वह मुख्य रूप से यह था कि डिजिटल युग आ चुका है जो व्यापक स्तर पर परिवर्तन करने जा रहा है और यह परिवर्तन सोच के स्तर से कार्य करने के स्तर सहित जीवन के नय क्षेत्रों को भी प्रभावित करने जा रहा है। पूरे आयोजन में उन लोगों को पुरस्कारों की श्रेणी में शामिल किया गया था जिन्होंने डिजिटल मीडिया में कुछ नये प्रयोग किये हैं और इस श्रेणी में लोकमंच के सहायक शशि सिंह को उनके संयुक्त उपक्रम पोड भारती के लिये सांस्कृतिक और मनोरंजन श्रेणी में चुना गया था जो उन्होंने हिन्दी ब्लागिंग के आरम्भिक पुरोधाओं में से एक देवाशीष चक्रवर्ती के साथ आरम्भ किया है। पोड भारती डिजिटल मीडिया के एक आयाम पोडकास्टिंग का प्रयोग है। हालाँकि पोड भारती को यह पुरस्कार नहीं मिल सका पर दक्षिण एशिया स्तर के किसी आयोजन और भारी प्रतिस्पर्धा के मध्य अपना स्थान बना पाना भी एक विशेष उपलब्धि रही।
तीन दिनों के इस आयोजन में जो कुछ विषय विशेष रूप से उभर कर आये उनमें से एक यह था कि डिजिटल मीडिया को एक प्रभावी और सक्षम माध्यम मान कर प्रशासन जनता के साथ निचले स्तर पर सम्पर्क स्थापित करने के लिये इस माध्यम को विश्व स्तर पर अपनाने को कटिबद्ध हो रहा है। 1990 के दशक से आरम्भ हुई सूचना क्रांति को अब जनोपयोगी बनाने की दिशा में चिंतन आरम्भ हो गया है और डिजिटल विभाजन जो कि साधन सम्पन्न और बिना साधन वालों के मध्य है उसे पाटने का प्रयास किया जा रहा है। तीन दिन के इस कार्यक्रम में जिन भी गैर सरकारी संस्थानों और व्यावसायिक कम्पनियों ने अपने विचार और कार्यक्रमों का उल्लेख किया उससे एक बात स्पष्ट थी कि अब इस तकनीक को हर स्तर पर आगे ले जाने के प्रयास हो रहे हैं और उनमें व्यावसायिक के साथ साथ जनोपयोगी प्रयास भी हैं। डिजिटल मीडिया के विस्तार से सूचना एक उद्योग में परिणत हो जायेगा और सम्भवतः भारत में मनोरंजन के पश्चात सबसे बडा कोई उद्योग पनपने जा रहा है तो वह सूचना उद्योग है।
इस पूरे आयोजन से कुछ उत्साहजनक संकेत भी मिले जैसे कि सूचना के व्यापक सम्भावना वाले उद्योग को देखते हुए विश्व स्तर पर कम्प्यूटर बनाने वाले कम्पनियाँ इस बात पर गम्भीरता से विचार कर रही हैं कि किस प्रकार 100 डालर की राशि वाला कम्प्यूटर लोगों को उपलब्ध कराया जा सके ताकि डिजिटल क्रांति से नीचे स्तर तक भी लोगों को अपने साथ जोडा जा सके और सूचना उद्योग अधिक व्यापक हो सके। इस सम्बन्ध में प्रशासनिक स्तर पर शासन को अधिक पारदर्शी और जनोन्मुख करने के लिये विकासशील देशों की सरकारें अपने आँकडों और डिजिटल स्वरूप देने और गैर सरकारी संगठनों की सहायता से शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी ढाँचों को सशक्त करने के लिये डिजिटल क्रांति की ओर बडी आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। तीन दिन के इस आयोजन मे जिस प्रकार कुछ राज्यों की सरकारों और गैर सरकारी संगठनों ने अपने कार्य दिखाये उससे यह विश्वास किया जा सकता है कि यदि तकनीक का आधारभूत ढाँचा सामान्य लोगों की पहुँच में आ जाये को इस तकनीक के सहारे शिक्षा और स्वास्थ्य की दिशा में अच्छी प्रगति हो सकती है। जैसे आन्ध्र प्रदेश राज्य की ओर से पालिटेक्निक संस्थानों के पाठ्यक्रम को जिस प्रकार 14,000 अध्यापकों ने 100 दिनों के भीतर तैयार कर उसे अधिक सहज और जनोन्मुखी बनाने के साथ एक साथ हजारों अध्यापकों को तकनीक के साथ जोड दिया उससे यह सम्भावना बलवती होती है कि सूचना क्रांति के उपयोग से कुछ क्रांतिकारी परिणाम भी आ सकते हैं। इसी प्रकार कर्नाटक के एक छोटे से गाँव में कुछ बच्चों के साथ प्रयोग हो रहा है कि किस प्रकार गणित के फोबिया से उन्हें मुक्ति दिलाकर विषय को सहज बनाया जा सके। हमारे समक्ष ज्ञान दर्शन और इग्नू का उदाहरण है किस प्रकार तकनीक के उपयोग से शिक्षा को जन जन तक कुछ हद तक पहुँचाया जा सकता है।
डिजिटल मीडिया के भविष्य़ को देखते हुए अनेक व्यावसायिक कम्पनियाँ विज्ञान और गणित जैसे विषयों को चित्रों के द्वारा और अधिक सही ढँग से समझाने के प्रयास में लगी हैं और इस सम्बन्ध में उन्हें डिजिटल क्रांति के दौर में आधारभूत ढाँचों और तकनीक से सस्ते होने और अधिक लोगों तक पहुँच पाने की अपेक्षा है।
पूरे आयोजन में जो एक बात अधिक उत्साहजनक थी वो यह कि अब डिजिटल क्रांति को अपने अपने कारणों से अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने का प्रयास आने वाले दिनों में किया जायेगा और शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और जनता के अधिकारों के लिये कार्य करने वाले संगठनों की माँग सूचना क्रांति के दूसरे चरण में बढने वाली है जब सामग्री या कंटेंट को लेकर व्यापक प्रयास हो रहा है।
तीन दिन के इस आयोजन में पूरा समय इस बात पर दिया गया कि किस प्रकार कंटेंट सृजित किया जाये क्योंकि डिज़िटल मीडिया और सूचना क्रांति के पास सबसे बडा संकट कंटेन को लेकर है क्योंकि तकनीक को लोगों तक पहुँचा कर उसे बाजारोन्मुखी तब तक नहीं बनाया जा सकता जब तक तकनीक प्रयोग करने वाले के लिये कोई उपयोगी जानकारी उस तक न पहुँच पा रही हो। परंतु सूचना क्रांति के इस चरण का सर्वाधिक लाभ यह है कि कंटेन्ट या सामग्री को लेकर सारी मारामारी स्थानीय स्तर तक पहुँचने की है। सूचना क्रांति के इस दूसरे चरण में स्थानीय भाषाओं, स्थानीय संस्कृतियों और अधिक जनसंख्या वाले समूहों का बोलबाला होने वाला है।
डिजिटल मीडिया का नया स्वरूप पत्रकारिता को भी प्रभावित करने वाला है। अब इंटरनेट पर टेलीविजन, मोबाइल पर टेलीविजन के साथ फिल्मों का प्रीमियर भी मोबाइल सेट पर अति शीघ्र ही हो सकेगा। लेकिन इन सबके मध्य डिजिटल मीडिया के समक्ष सबसे बडा संकट अब भी सामग्री का है और विविधता का दावा करने वाले और अपने संसाधनों का बडा अंश सामग्री के लिये व्यय करने वाली बडी बडी कम्पनियाँ भी अभी भी उन्नत सामग्री के अभाव से ग्रस्त हैं और इसका इस बडा कारण अब भी भारत में लेखक या बुद्धिजीवी वर्ग का तकनीक से भागना रहा है। जो लोग तकनीक के प्रसार की इस बात के लिये आलोचना करते हैं कि यह ऊटपटाँग चीजें परोस रहा है उन्हें डिजिटल मीडिया में सामग्री को लेकर छाए इस शून्य का लाभ उठाना चाहिये परंतु अधिकतर लोग तकनीक सीखने के स्थान पर उसे कोसने में अधिक सहजता अनुभव करते हैं। लेकिन आने वाले दिनों में सामग्री का भी एक बडा बाजार बनेगा और साथ ही अनुवाद का भी।
सूचना क्रांति के इस नये दौर में पत्रकारिता का क्या स्वरूप होगा यह भी एक प्रश्न है। आज भी भारत में विशेषकर हिन्दी पत्रकारिता रूढिवादी है और तकनीक को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। 40 से अधिक या 50 के आस पास की अवस्था के पत्रकार अब भी ब्लागिंग और इंटरनेट के मह्त्व को स्वीकार कर पाने का साहस नहीं कर पा रहे हैं और यही कारण है कि अनेक पत्रकार अज्ञानतावश वेब आधारित पत्रकारिता को ड्रायिंग रूम की अनैतिक पत्रकारिता भी कहने में नहीं हिचकते पर शायद वे भूल जाते हैं को वेब केवल एक तकनीकी परिवर्तन है और पत्रकारिता का मूल भाव कि तथ्यों का वास्तविक मूल्याँकन करने की परिपाटी वही है। भारत में तो वेब आधारित पत्रकारिता और ब्लागिंग तो पिछले कुछ वर्षों में आयी है पर पश्चिम में तो यह एक वैकल्पिक पत्रकारिता का स्वरूप ले चुकी है और तथाकथित मुख्यधारा की पत्रकारिता भी इसके सन्दर्भों का हवाला देती है और इसे प्रामाणिक मानती है।
डिजिटल मीडिया के प्रभाव से पत्रकारिता में स्थानीय वैश्विकता की नयी प्रवृत्ति का समावेश होगा अर्थात विश्व के किसी भी कोने में बैठा कोई व्यक्ति अपनी स्थानीयता से जुड सकेगा और साथ ही स्थानीय व्यक्ति विश्व की गतिविधियों से जुड सकेगा। हिन्दी पत्रकारिता इसी परिवर्तन के सन्दर्भ में रूढिवादी है और वह केवल स्थानीय विषयों को उठाने को अधिक समर्पित और जमीन से जुडी आदर्श पत्रकारिता मान कर चलती है। डिजिटल मीडिया के इस दौर में लोगों की वैश्विक पहुँच और आकाँक्षा हो गयी है और इन दोनों में संतुलन बनाने का प्रयास आगे इस युग में हिन्दी पत्रकारिता को करना सीखना होगा। उदाहरण के लिये यदि झारखण्ड और छत्तीसगढ के गाँवों में और बिहार की बाढ की वास्तविकता विदेशों में बैठा भारतीय या देश के अन्य हिस्से में बैठा भारतीय जानना चाहता है तो वहीं भारत का व्यक्ति सूचना क्रांति के चलते विश्व से जुड गया है और वह यह जानने को भी उत्सुक है कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में क्या चल रहा है, या फिर
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कौन से घटनाक्रम हैं जो भारत को प्रभावित करते हैं। हिन्दी पत्रकारिता में अब भी नयी प्रवृत्ति को अपनाने का प्रयास करने के स्थान पर उसकी आलोचना करने की प्रवृत्ति अधिक दिख रही है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हिन्दी पत्रकारिता में नयी पीढी अभी अपना स्थान नहीं बना पायी है।
आरुषि के बहाने
पिछले चार पाँच दिन से समाचार माध्यमों में नोएडा की रहने वाली आरुषि की रहस्यमय हत्या का मामला छाया है। मीडिया द्वारा इस विषय को महत्व देना कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है, इससे पूर्व भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हुई हत्याओं को काफी महत्व मिलता रहा है। परंतु इस घटना के समय को लेकर एक प्रश्न मन में अवश्य उठता है कि जब इसी समय अभी कोई दस दिन पहले राजस्थान की राजधानी जयपुर में आतंकवादी आक्रमण हुआ है और उस सम्बन्ध में भी जाँच चल रही है तो हमारे समाचार माध्यमों का ध्यान उस ओर क्यों नहीं जा रहा है या फिर यूँ कहें कि उनका ध्यान उस ओर से पूरी तरह हट गया है। यह एक ऐसा विषय है जिस पर गम्भीरतापूर्वक सोचने की आवश्यकता है।
आरुषि हत्याकाण्ड में जिस प्रकार समाचार माध्यमों ने रुचि दिखाई और पुलिस प्रशासन को दबाव में लिया कि नोएडा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को बकायदा प्रेस कांफ्रेस करनी पडी और इस मामले में जाँच में हो रही प्रगति के सम्बन्ध में मीडिया को बताना पडा। यह मीडिया की शक्ति की ओर संकेत करता है पर वहीं एक प्रश्न यह भी उठता है कि आरुषि के मामले को इतना तूल देकर कहीं मीडिया ने जयपुर मामले में बहस से लोगों का ध्यान हटाने का शुभ कार्य तो नहीं किया है। निश्चय ही मीडिया के इस कार्य से सरकार काफी राहत मिली है और उसी राहत का अनुभव करते हुए भारत के गृहमंत्री ने बयान दे डाला कि मोहम्मद अफजल को फांसी की पैरवी नहीं करनी चाहिये।
आरुषि मामले को मीडिया द्वारा तूल देने के पीछे कोई षडयंत्रकारी पक्ष देखना तो उचित तो नहीं होगा पर इससे कुछ प्रश्न अवश्य उठते है। क्या मीडिया जयपुर जैसी घटनाओं को नजरअन्दाज करने की रणनीति अपना रहा है। इस बात के संकेत मिलते भी हैं। पिछले तीन वर्षों में यदि इस्लामी आतंकवाद के सम्बन्ध में मीडिया की रिपोर्टिंग पर नजर डाली जाये तो कुछ स्थिति स्पष्ट होती है। 11 जुलाई 2006 को देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई में लोकल रेल व्यवस्था पर आक्रमण हुआ और उस समय की रिपोर्टिंग और अब जयपुर में हुए आक्रमण की प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया की रिपोर्टिंग में कुछ गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। यह गुणात्मक परिवर्तन इस सन्दर्भ में है कि ऐसी घटनाओं की क्षति, लोगों पर इसके प्रभाव और इस आतंकवाद में लिप्त लोगों पर चर्चा को उतना ही रखा जाये जितना पत्रकारिता धर्म के विरुद्ध नहीं है। इस नजरिये से घटना की रिपोर्टिंग तो होती है परंतु घटना के बाद इस विषय से बचने का प्रयास किया जाता है। यह बात 2006 से आज तक हुए प्रत्येक आतंकवादी आक्रमण के सम्बन्ध में क्रमशः होती रही है। यदि जयपुर आक्रमण के बाद विभिन्न समाचार पत्रों में सम्पादकीय या उससे सम्बन्धित लेखों की संख्या देखी जाये तो ऐसा लगता है कि इस सम्बन्ध में खाना पूरी की जा रही है और जोर इस बात पर अधिक है कि यह घटना लोगों के स्मरण से कितनी जल्दी दूर हो जाये या इसे लोग भूल जायें।
मीडिया के इस व्यवहार की समीक्षा इस पृष्टभूमि में भी की जा सकती है कि कहीं आतंकवादी घटनाओं की अधिक रिपोर्टिंग और उस पर अधिक चर्चा नहीं करने को भी इस आतंकवाद से निपटने का एक तरीका माना जा रहा है जैसा कि प्रसिद्ध आतंकवाद प्रतिरोध विशेषज्ञ बी रमन ने हाल के अपने एक लेख में सुझाव दिया है। उनका मानना है कि आतंकवादी आक्रमणों के बाद ऐसा प्रदर्शन नहीं करना चाहिये कि हमारे जीवन पर इसका कोई प्रभाव हो रहा है क्योंकि इससे आतंकवादियों को लगता है कि वे अपने उद्देश्य में सफल हैं। बी रमन मानते हैं कि आतंकवादी न तो साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड पाये हैं और न ही पर्यटन स्थलों पर आक्रमण कर लोगों को ऐसे स्थलों पर जाने से रोक सके हैं।
इसी प्रकार का सुझाव जुलाई 2006 में मुम्बई में स्थानीय रेल व्यवस्था पर हुए आक्रमण के पश्चात संसद एनेक्सी में कुछ मुस्लिम संगठनों द्वारा बुलाए गये आतंकवाद विरोधी सम्मेलन में प्रधानमंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री की उपस्थिति में दिया गया था और मीडिया को अमेरिका और यहूदियों का एजेंट बताकर उनपर आरोप लगाया गया था कि वे आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों और इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे सुझाव अब असर करने लगे हैं और इस्लामी आतंकवाद को लेकर मीडिया ने अपने ऊपर एक सेंसरशिप थोप ली है और इस सम्बन्ध में क्षमाप्रार्थना का भाव व्याप्त कर लिया है। अब प्रश्न यह उठता है कि इस रूख से किसे लाभ होने जा रहा है और क्या इस रूख से आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के इस युग में हम आतंकवाद पर विजय प्राप्त कर सकेंगे? निश्चित रूप से इससे आतंकवाद के युद्ध में आतंकवादियों को ही लाभ होने जा रहा है और उन राजनीतिक दलों को लाभ होने जा रहा जो इस्लामी आतंकवाद से मुस्लिम समुदाय के जुडाव के कारण इस विषय में न कोई चर्चा करना चाहते हैं और न ही कोई कार्रवाई।
जयपुर पर हुए आक्रमण के बाद जिस प्रकार आक्रमण में घायल हुए लोगों, जाँच की प्रगति और आतंकवाद के मोर्चे पर पूरी तरह असफल केन्द्र सरकार की कोई खबर मीडिया ने नहीं ली उससे एक बात स्पष्ट है कि आज लोकतंत्र के सभी स्तम्भ यहाँ तक कि पाँचवा स्तम्भ माना जाने वाला मीडिया भी शुतुरमुर्गी रवैया अपना रहा है और इन सबकी स्थिति उस कबूतर की भाँति है जो बिल्ली के सामने अपनी आंखें बन्द कर सोचता है कि बिल्ली भाग जायेगी। लोकतंत्र में मीडिया की अपनी भूमिका होती है लेकिन जिस प्रकार मीडिया बहस से भाग रहा है उससे इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वालों को यही सन्देश जा रहा है कि हमारे अन्दर इच्छाशक्ति नहीं है और मुकाबले के स्थान पर पलायन का रूख अपना रहे हैं।
आखिर यह अंतर क्यों आया है। जयपुर के सम्बन्ध में अंतर यह आया है कि अब यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में स्थानीय मुसलमानों का एक वर्ग इस्लाम के नाम पर पूरे विश्व में चल रहे जिहाद के साथ जुड चुका है और वह देश में आतंकवादियों के लिये हर प्रकार का वातावरण निर्माण कर रहा है। इसी कारण इस मामले से हर कोई बचना चाहता है।
इस प्रकार का रवैया अपना कर हम पहले दो बार जिहादवाद के विस्तार को रोकने का अवसर खो चुके हैं और तीसरी बार वही भूल करने जा रहे हैं। पहली बार जब 1989 में जम्मू कश्मीर में आतंकवाद ने प्रवेश किया तो हमारे नेताओं, पत्रकारो और बुद्धिजीवियों ने उसे कुछ गुमराह और बेरोजगार युवकों का काम बताया और बाद में इन्हीं गुमराह युवकों ने हिन्दुओं को घाटी से निकाल दिया और डंके की चोट पर घोषित किया कि यह जिहाद है। इसी प्रकार जब भारत में कश्मीर से बाहर पहली जिहादी घटना 1993 में मुम्बई में श्रृखलाबद्ध बम विस्फोटों के रूप में हुई तो भी इसे जिहाद के स्थान पर बाबरी ढाँचे के 1992 में ध्वस्त होने की प्रतिक्रिया माना गया। वह अवसर था जब जिहादवाद भारत में विस्तार कर रहा था पर उस ओर ध्यान नहीं दिया गया। आज हम तीसरा अवसर खो रहे हैं जब हमें पता चल चुका है कि भारत में मुस्लिम जनसंख्या का एक बडा वर्ग वैश्विक जिहाद के उद्देश्य से सहानुभूति रखता है तो उस वर्ग का विस्तार रोकने के लिये कठोर कानूनी और विचारधारागत कदम उठाने के स्थान पर हम इस पर बहस ही नहीं करने को इसका समाधान मानकर चल रहे हैं।
जयपुर में हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद जिस प्रकार इस मामले को मीडिया ने ठण्डे बस्ते में डाला है वह सराहनीय नहीं है। इस सम्बन्ध में लोगों की सहनशीलता को असीमित मानकर चलने की यह भावना खतरनाक है। ऐसे आक्रमणों का सामना इनकी अवहेलना कर नहीं इस पर बहस कर किया जा सकता है। क्योंकि बहस न होने से यह पता लगा पाना कदापि सम्भव नहीं होगा इस विषय पर देश में क्या भाव है और लोग इसके मूलभूत कारणों के बारे में क्या सोचते हैं। कहीं ऐसा न हो कि इस विषय में संवादहीनता का परिणाम आगे चलकर भयावह हो जाये जैसा कि पहले कई अवसरों पर हम देख भी चुके हैं।
क्या भारत बदल रहा है?
कल सायंकाल जब टेलीविजन सेट खोलकर समाचार देखने का प्रयास किया तो देखा कि भारत का मशहूर रेसमर खली तीन वर्षों के बाद अपने देश वापस आ रहा है। खली को देखने के लिये एयरपोर्ट पर उसके प्रशंसकों की भीड उमड रही थी और टेलीविजन चैनल उस रोमांच का सीधा प्रसारण कर रहे थे। टेलीविजन के इस प्रसारण को लेकर कुछ लोगों की अलग- अलग राय हो सकती है कि यह टीआरपी का चक्कर रहा होगा आदि आदि पर यहाँ मैं इस विषय पर बिलकुल चर्चा नहीं करना चाहता कि टेलीविजन चैनलों का खली की वापसी दिखाना गलत था या सही। मैं यहाँ उस रूझान की ओर पाठकों का ध्यान खींचना चाहता हूँ जो पिछ्ले कुछ वर्षों से भारत में देखने को मिल रहा हैं।
इससे पूर्व भारत के एकदिवसीय और टी- 20 टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के नेतृत्व में जब भारत ने पहला टी-20 विश्व कप जीत था तो उसकी अगवानी में भी भारी भीड मुम्बई में उमडी। यही नजारा एक बार फिर जूनियर क्रिकेट टीम के विश्व कप जीतने और भारत द्वारा आस्ट्रेलिया को एकदिवसीय श्रृंखला में हराने पर हुआ। दोनों ही अवसरों पर भारत के लोग खिलाडियों के स्वागत में उमड पडे और यह वेग असाधारण लगा। आखिर यह घटनायें क्या संकेत देती हैं। यदि यह बात केवल क्रिकेट तक सीमित होती तो शायद यह मानने का कारण था कि भारतवासियों में क्रिकेट को लेकर जुनून है। लेकिन जब यही स्वागत कुश्ती के नायक लिये भी हो रहा है तो इस रूझान पर गौर करना ही होगा।
पिछ्ले कुछ महीनों से जब खली को भारत में टीवी चैनलों ने घर घर तक पहुँचाया तो भी आश्चर्य हुआ कि क्या टीवी चैनल के पास खबरों का अकाल हो गया। ऐसा नहीं है। वास्तव में अब भारत बदल रहा है और यह बदलाव पूरे भारत में एक साथ हो रहा है। यह बदलाव है भारतवासियों की आकांक्षा का बदलाव। अब भारतवासी एक ऐसे भारत को देखना चाहते हैं जो दुनिया में अपना रूतबा रखता हो और जिसमें सुपर पावर या महाशक्ति बनने की शक्ति हो। यही कारण है कि अब क्रिकेट में खेल के मैदान में आस्ट्रेलिया के खिलाडियों को स्लेजिंग का जवाब स्लेजिंग से देने वाले खिलाडियों को जनता सर माथे पर बैठाती है।
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने जब टी-20 के नये संस्करण में ढला हुआ आईपीएल का फार्मूला लोगों के सामने परोसा तो उत्सुकता इसी बात को लेकर नहीं थी कि इस खेल के नये संस्करण से मनोरंजन होगा वरन इसके पीछे यह भाव भी सन्निहित था कि अब क्रिकेट जैसे खेल का गुरुत्व केन्द्र भारत में आ गया और जिस खेल पर कभी गोरी चमडी वालों को आधिपत्य हुआ करता था वे ही लोग आज भारतीय क्रिकेट बोर्ड के इशारों पर नाच रहे हैं। क्योंकि आज दर्शक और उससे होने वाली विज्ञापन की आय भारत पर निर्भर है।
इसलिये खली हो या क्रिकेट ये तो प्रतीक मात्र हैं जो देश के जनमानस की उस आकांक्षा को प्रकट करते हैं जो भारत को एक महाशक्ति के रूप में देखना चाहती है।
भारत में यह आकांक्षा तो सदियों से रही है पर उसका स्वाभिमानी स्वरूप वैश्वीकरण और उन्मुक्त अर्थव्यवस्था के बाद आया है। आज सूचना तंत्रों के व्याप के बीच भारत के हर स्तर के व्यक्ति को पता चल चुका है अमेरिका में नासा में उच्च पदों पर बैठे लोग भी भारतीय मूल के हैं और वहाँ इंजीनियर, डाक्टर और आईटी के लोग भारतीय मूल के हैं और अमेरिका के अर्थव्यवस्था का अधिकाँश भारत पर निर्भर है। आज विदेशों में बैठे भारतीय अपने लिये सम्मान और बराबरी चाहते हैं। सूचनाओं के व्याप से पूरे भारत में ऐसी सूचनायें पहुँचती हैं और इन उपलब्धियों से प्रत्येक भारतीय अपने आप को जोड्ता है।
नयी बाजारमूलक अर्थव्यवस्था के अनेक दोष हमारे सामने आ रहे हैं परंतु इसने हमारे लिये अनेक ऐसे द्वार भी खोले हैं जो भारत के बदलते स्वरूप को दर्शाता है। मध्य वर्ग की बढ्ती ताकत ने राष्ट्रवाद की इस आकांक्षा को और सशक्त किया है। अपने सामान्य जीवन स्तर को लेकर असुरक्षा के भाव से मुक्त होकर वह विदेश नीति, विश्व में भारत के स्तर सहित अनेक विषयों पर अपनी राय और आकांक्षा रखने लगा है और यह राष्ट्रवाद का भाव भले ही मध्य वर्ग में सशक्त हुआ हो परंतु इस नये रूझान से पूरा देश आप्लावित है इसका प्रकटीकरण क्रिकेट में इसलिये हो रहा है कि आज समाज में ऐसे महापुरुष ही नहीं हैं जिन्हें भारतवासी अपना आदर्श बना सकें।
परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है और हम इसे स्वीकार करें या नहीं यह अपने अनुसार स्वाभाविक विकास करता ही है। उसी प्रकार भारत में भी बहुत सी चीजें बदल रही हैं। एक ओर वैश्वीकरण और उन्मुक्त अर्थव्यवस्था से सशक्त हुआ समाज भी है तो वहीं इससे बुरी तरह प्रभावित समाज भी है परंतु इन सबके मध्य भी भारत में राष्ट्रवाद की प्रखरता स्पष्ट दिखाई पड रही है। निश्चित रूप से इस भाव को सकारात्मक स्वरूप तभी मिलेगा जब विश्व स्तर पर हो रहे परिवर्तन के प्रति अपनी नजर रखते हुए हम इसकी निष्पक्ष समीक्षा करें और संक्रमणकालीन स्थिति में भी देश में पनप रहे उत्साह के वातावरण को बनाये रख सकें। समाज में हो रहे परिवर्तनों को कुछ अंशों में स्वीकार भी करना सीखें।

