धर्म को मैंने  कैसे  समझा ?

वैसे तो दुनिया के किसे भी हिस्से में  रहने वाला कोई भी चिंतनशील व्यक्ति जीवन के किसी दौर में इस प्रश्न का समाधान करने को विवश ही होता है कि आखिर धर्म क्या है? अपने अपने ढंग से इसका समाधान भी मिल ही जाता है पर जिज्ञासा जितनी प्रबल होती है उसके समाधान की प्रकिया और उसके सोपान भी उतने कठिन होते है?
भारत में जन्म लेने वाले व्यक्ति को अपने जीवनकाल में इस  प्रश्न का समाधान मिले बिना उसके बहुत से अन्य प्रश्नों का  समाधान नहीं होता| अन्य लोगों की भाँती मैंने भी धर्म के अनेक स्वरुप और परिभाषाएं देखीं और सुनीं पर जिस निष्कर्ष पर मैं पहुंच पाया वह थेयोरी नहीं प्रेक्टिकल अधिक दीखता है|
बचपन में सबकी तरह मुझे भी धर्म वैसे ही दीखता था जैसे सबको दीखता है , आसमान में ऊपर कहीं कोई जादूगर टाइप का बैठा है जो सब हिसाब किताब कर रहा है और एक्जाम में भजन करने पर अच्छे नंबर दिला देता है, दोस्तों के साथ मैच जितवा देता है, कालेज में सबसे सुन्दर लडकी से फ्रेंडशिप करवा देता है और  इसके बदले में उसे हर मंगलवार को केवल बेसन के लड्डू का प्रसाद भर देना पड़ता है |
इसके बाद के धर्म का स्वरुप धर्मग्रन्थों में पढ़ने में आया , श्लोकों और मन्त्रों को जानने के बाद ऐसा लगा कि अब तो हम धर्म के जानकार हो गए और अब तो सब कुछ अपनी मुट्ठी में है जब जिसे चाहा भस्म कर दिया और जिस मन्त्र से चाहा मनमाफिक फल प्राप्त किया , कई बार ऐसा हुआ भी और अब भी चाहो तो हो जाता है पर इसके बाद का चरण भी आया कि असल में यह भी धर्म नहीं है|
धर्म का मौलिक स्वरुप केवल राम , कृष्ण , शिव , दुर्गा के चरित्रों में समाहित है पर धर्म के असली मर्म को जानने के लिए इनकी उपासना करने के स्थान पर इनसे जुड़ना पड़ता है और इनके कार्यों को  चमत्कार नहीं स्वयं को पूरी तरह पहचानने के चमत्कार का परिणाम मानना होता है|
भारत की संस्कृति के दो बड़े प्रतीक राम और कृष्ण ने अपने जीवन से ही धर्म को समझा दिया |
“ परोपकाराय पुण्याय , पापाय परपीडनम” | आज तक सभी को यह बताया जाता है कि परोपकार करो और क्यों करो यह कोई नहीं बताता | क्योंकि मैं औरों से अलग नहीं हूँ बल्कि स्वयं को सीमित करने से हम स्वयं को सीमित मानते हैं और विस्तार करने से सभी मेरा ही अंश हैं , इसलिए अनावश्यक दूसरे को कष्ट देना स्वयं को कष्ट देना ही है और दूसरों का उपकार करना स्वयं पर उपकार करना ही है|
धर्म की ऐसी व्याख्या से एक अन्तर्विरोध आता है कि क्या अपने जीवन को बचाना , परिवार को बचाना  , समाज को बचाना , देश , या मूल्यों की रक्षा के लिए अपना उपयुक्त कर्म करना दूसरों को कष्ट देना हुआ |असल में राम और कृष्ण का समस्त जीवन इसी अन्तर्विरोध का उत्तर है और धर्म की व्याख्या है|
राम जब समुद्र पार कर लंका में प्रवेश कर गए तो रावण ने अपने दो जासूस उनकी सेना की तैयारियों का जायजा लेने के लिए राम की सेना में भेजे और रावण के दोनों ही जासूस वानर रूप में राम की सेना में घूमघूमकर जायजा ले रहे थे कि उन्हें विभीषण ने पहचान लिया और उन दोनों जासूसों को बंदी बनाकर राम के पास लाया गया , समस्त वानर सेना, लक्ष्मण , विभीषण इसी विचार के थे कि उन दोनों जासूसों को कोई कठोर दंड दिया जाए पर राम ने कहा कि इन्हें मुक्त कर दो| इस पर सभी को आश्चर्य हुआ , विभीषण ने राम से कहा कि इन्हें काफी जानकारी मिल गयी है अब इन्हें इस तरह मुक्त करना उपयुक्त नहीं होगा|
उधर दोनों जासूस राम के चरणों पर गिर पड़े और कहा कि इतना उदार शत्रु हमने नहीं देखा , इस पर राम ने उन दोनों को जो उत्तर दिया वही धर्म का मर्म है| राम ने कहा इस संसार में मेरा तो कोई शत्रु ही नहीं है|
कृष्ण ने अपने जीवन में इसी मर्म को अपने कर्म से और चरितार्थ किया|उन्होंने अपने जीवन में दो सन्देश दिए एक तो यह कि  “ मोह” और “ आसक्ति” कर्म के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है जो विवेक का हरण कर लेता है और दूसरा कि स्वार्थसम्मत कर्म विनाश की ओर ले जाता है और विवेक आधारित कर्म की धर्म कहलाता है|जिस गोकुल की गलियों में कृष्ण ने अपना बचपन बिताया और कितनी ही लीलाएं कीं उसी गोकुल को अपने अगले कर्म के लिए छोड़कर मथुरा आ गए तो जीवन में फिर पलटकर गोकुल की ओर नहीं देखा और उन्होंने गोकुल छोड़ा तो उनके गोकुल के जीवन पर कितने ही शास्त्र और ग्रन्थ अब तक लिखे जा रहे हैं|
जिस मथुरा को उन्होंने कंस के आतंक से मुक्त किया उसी मथुरा के सामान्य जन जब उनके और जरासंध के वर्चस्व के संघर्ष में पिसने लगे तो कृष्ण ने अपनी कर्मभूमि गोकुल के बाद अपनी जन्मभूमि मथुरा भी छोड़ दी और द्वारिका चले गए| द्वारका से उन्होंने नए भारत के निर्माण के लिए महाभारत का नेत्रत्व किया और अपने अपने निहित स्वार्थों को धर्मयुद्ध का नाम देने के लिए व्याकुल अनेक राजघरानों को उन्होंने तब तक युद्धभूमि में जाने से रोके रखा जब तक कुरुक्षेत्र वास्तव में धर्मयुद्ध के लिए तैयार नहीं हो गया|
जिस कृष्ण ने महाभारत को अपने अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए होने वाले युद्ध से रोके रखा और उसे  यथासंभव धर्मयुद्ध होने दिया उन्हीं कृष्ण को महाभारत के लिए अधिकतर रूप से जिम्मेदार गांधारी और ध्र्तराष्ट्र के कोप और अभिशाप का भागी बनना पडा और अपनी आँखों से अपने यादवी कुल का विनाश और शिकारी के हाथों अपनी मौत का साक्षी बनाना पडा|
राम और कृष्ण के जीवन से धर्म के जिस मर्म को मैंने समझा कि “ मोह” और “ आसक्ति” कर्म के मार्ग में सबसे बड़ा बंधन है और कर्म की निरन्तरता तभी है जब “ मोह” और “ आसक्ति” से मुक्ति है और विवेक आधारित कर्म जो अनुराग, द्वेष , नफरत और पूर्वाग्रह से पूरी तरह मुक्त हो वह धर्म आधारित कर्म है|
गांधीजी के प्रति पूरा आदर रखते हुए भी और  सभी मतों के प्रति आदर रखते हुए भी  जो अहिंसा के आत्यंतिक सिद्धांत को धर्म का प्रधान सिद्धांत मानते हैं उनसे इस कारण असहमति रखता हूँ कि यदि सत्य और अहिंसा के स्थान पर  इन महापुरुषों ने सत्य , प्रेम और विवेक की बात कही होती तो लोगों को धर्म के मामले में अनेक अंतर्विरोधों से न जूझना पड़ता | क्योंकि मानव जीवन में आत्यंतिक रूप से अहिंसा या युद्ध से विमुख होना संभव नहीं है और जो यह कहते हैं कि अहिंसा या युद्धमुक्त मानवता हर स्तर पर संभव है वे भी जानते हैं कि यह असंभव है , यदि कुछ संभव है तो विवेक , प्रेम और सत्य के आधार पर जीवन , समाज और नीति का संचालन जिसमें कि राम की तरह कोई शत्रु न हो और कृष्ण की तरह मूल्यों की स्थापना के लिए ही  युद्ध हो पर मूल्य और  धर्म की व्याख्या निहित स्वार्थ से  प्रेरित न हो बल्कि प्रेम , सत्य और विवेक पर आधारित हो|