Dhruv

ध्रुव

आखिर वह कौन सी बात है जो एक शक्तिशाली राजा को खाए जा रही है| समस्त वैभव और यश के मध्य भी एक पल को भी वह भाव राजा  उत्तानपाद के मन से क्यों नहीं उतर पा रहा है जो उन्हें भौतिक जीवन में सामर्थ्य से परिपूर्ण होने पर भी स्वयं से पराजित होने का आभास दिलाता है | राजा उत्तानपाद को भी अपने समकालानी राजाओं की तरह एक से अधिक विवाह करने की प्रवृत्ति को न्यायसंगत ठहराने में स्वयं से अनेक तर्क करने पड़ते हैं और उनमें राजनीतिक हित से लेकर राज्य विस्तार और उसकी सीमाओं की सुरक्षा के तर्क भी शामिल हैं फिर भी एक शक्तिशाली सम्राट जब भी अकेले में होता है तो उसे न जाने क्यों स्वयं से हार जाने की ग्लानि सताए जाती है |
राजा उत्तानपाद जब भी अपनी दोनों रानियों सुनीति और सुरुचि की ओर देखते हैं तो वे स्वयं से नजरें नहीं मिला पाते क्योंकि सुनीति के पुत्र को सुरुचि से छुपाकर पिता का प्रेम देने की विवशता उनके साथ सदैव रहती है उन्हें पता है कि सुनीति के पुत्र के किसी दोष के बिना उसे वर्तमान और भविष्य दोनों में दंड मिलना है और राजा उत्तानपाद इसी अनहोनी को टालना चाहते हैं पर उनकी विवशता न तो उन्हें समझ आती है और न ही वे स्वयं को इस स्थिति में पाते हैं कि अपनी इस विवशता की व्याख्या कर सकें | आज राजा उत्तानपाद ने सुरुचि से भी दूरी बनाकर रात में अकेले स्वयं से कुछ प्रश्नों का उत्तर माँगा है|
व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या सदियों से चली आ रही परम्पराओं को घसीटते रहना क्रांति से भयभीत होना है या फिर मष्तिष्क और ह्रदय के विस्तार को अवसर न दे पाने के कारण परम्परा से विद्रोह न कर पाने का साहस एकत्र न कर पाने की विवशता को परम्परा का नाम देना है| कुछ भी हो राजा उत्तानपाद एक बार फिर स्वयं का सामना नहीं कर पाए और उस प्रश्न को अधूरा छोड़ गए कि उन्होंने सुनीति के बाद भी सुरुचि से विवाह राजनीतिक विवशता और राजनीतिक हित में किया या फिर सामान्य मानवीय विकार से ग्रस्त होकर सुरुचि के आकर्षण में सुनीति को भूल गए| उन्होंने इस प्रश्न को सदैव की भांति अपने हाल पर छोड़ दिया और एक भाग्यवादी की भांति इसे भी भाग्य का खेल मानकर आगे  निकल गए|
स्वयं से ही भागते उत्तानपाद को एक चिंता हमेशा सताए जा रही थी कि उनकी बड़ी पत्नी सुनीति के पुत्र ध्रुव का क्या होगा? बिना किसी अपराध के उसे वर्तमान और भविष्य दोनों में दण्डित होने का अभिशाप मिला गया है| आज उत्तानपाद को लग रहा था कि क्या अतीत में स्थापित की गयी परम्परा के बोझ तले वर्तमान और भविष्य को दबाया जा सकता है या किसी के पूर्वजों द्वारा स्थापित तात्कालिक सामाजिक या राजनीतिक व्यवस्था के लिए उसका दंड उसकी आगे आने वाली पीढ़ियों को भुगतने देने के लिए विवश करना नीतिसंगत और न्यायसंगत है| इसका उत्तर भी उत्तानपाद के पास नहीं है यदि कुछ उनके पास है तो उनकी विवशता जो उन्हें एक ऐसी संवेदनशील पीढी का प्रतिनिधि बनाती है जो अपनी परम्परा के नाम पर व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और नारी के स्वाभिमान और अधिकार पर हो रहे अतिक्रमण के प्रति संवेदना रखता है पर परम्पराओं को तोड़ने का सामाजिक और आत्मिक साहस नहीं जुटा सकता है | उत्तानपाद उस स्थिति से बचना चाहते हैं जो उन्हें दिख रही है कि जब उन्हें अपने पुत्र ध्रुव को विवश होकर उसके अधिकारों से वंचित करना होगा पर उन्हें इसके आगे घटित होने वाले घटनाक्रम को लेकर कुछ भी अनुमान नहीं लग पा रहा है|
आखिर वह अवसर आ ही गया जब उत्तानपाद के अंतर्विरोधों और आत्मग्लानि के भावों से अनजान बालक ध्रुव ने अपने पिता की गोद में अपने सहज अधिकार का सुख भोगना चाहा पर परम्पराओं में  जकड़ा, अंतर्विरोधों से ग्रस्त और आत्मग्लानि से अपना सर झुकाए एक राजा जो स्वयं से कब का हार चुका था ध्रुव को वह अधिकार भी नहीं दे सकता था |
ध्रुव के अपने पिता की गोद में जाते ही उत्तानपाद की दूसरी पत्नी सुरुचि ने ध्रुव से कहा कि राजा उत्तानपाद की गोद में बैठने का अधिकार तुम्हें नहीं है| बालक ध्रुव ने सोचा कि वह तो अपने पिता की गोद में बैठने का अधिकार मांग रहा था पर उसे क्या पता कि राजा उत्तानपाद अब पिता से अधिक राजनीति की विवशताओं , राज्य विस्तार और सीमा सुरक्षा के नाम पर एकाधिक विवाह करने की राज्य परम्परा से बंधे एक विवश राजा थे जिनके लिए सुनीति से अधिक महत्व सुरुचि का था और इस गूढ़ अंतर को न समझते हुए बालक ध्रुव सीधे अपनी  माँ सुनीति के पास गया और पिता की गोद में अपने अधिकार की मांग की |
बालक ध्रुव के इस अधिकार की मांग पर सुनीति के समक्ष दो ही विकल्प थे | बालक ध्रुव को राजनीतिक दांवपेंच की शिक्षा देकर उसे उस भविष्य के लिए तैयार करे जब वह अपने पूरे  यौवन को एक अन्याय की हीनभावना से ग्रस्त होकर प्रतिशोध की अपनी भविष्य की तैयारी में बिता दे या फिर ध्रुव को उस क्रांतिकारी के रूप में विकसित होने की शिक्षा दे कि वह अपने आत्मिक बल को विकसित कर अपने मन और ह्रदय का विस्तार करे और राजनीति के क्षरण की प्रवृत्ति को रोकते हुए राज सत्ता को राजा की सुरुचि या लोभ के आधार पर संचालित होने के  स्थान पर उसे फिर से सुनीति के मार्ग पर ला सके जहां कि राजा अपने स्वार्थ, पूर्वाग्रह, शरीर के सुख के आधार पर अपनी प्राथमिकता सुनिश्चित न  कर एके  और न ही  स्वयं से पराजित होकर परम्परा के नाम पर अपनी कमजोरी को संस्थागत स्वरुप प्रदान करे|
ध्रुव की माँ ने दूसरे मार्ग का अवलंबन किया और ध्रुव से कहा कि जिस राजा की गोद में तुम अपना अधिकार मांग रहे हो वह उस ऊंचाई पर नहीं है जो तुम्हें उस शिखर पर ले जा सके जिस शिखर से तुम्हारी संस्कृति दिखाई देती है यह राजसत्ता की वह गोद है जहां राजसत्ता सुरुचि के आस पास घूम रही है , न तो इसमें स्वयं से लड़ने का साहस है और न ही सुनीति का पालन करते हुए अपनी समस्त प्रजा को समभाव से देखने का नैतिक बल है इसलिए तुम्हें न केवल अपने उद्धार के बारे में सोचना है वरन राजनीति में आध्यात्मिक सूत्र को पुर्स्थापित करने के लिए आत्मशुद्धि और तप का मार्ग चुनना होगा|
सुनीति का यह कठोर संकल्प ध्रुव जैसे बालक के लिए कठिन था क्योंकि जिस सत्ता को प्राप्त करने के लिए निर्दोष लोगों की बलि चढ़ाई जाती हो और हर प्रकार की नैतिकता और सिद्धांत को त्याग दिया जाता हो उसी सत्ता को त्याग कर अपने आत्मिक बल को मजबूत्त करने के लिए तप के मार्ग का आदेश एक क्रांतिकारी आदेश था |
ध्रुव को सब कुछ समझते कदापि देर न लगी और उसने तय कर लिया कि उसकी क्रान्ति का मार्ग    हिंसा और विप्लव की  उस  अंधी गली से नहीं गुजरता जहां कि अपने पूर्वाग्रह, हीन भावना , प्रतिशोध , विद्वेष और व्यक्तिगत जीवन की असफलताओं से  उपजी कुंठा को एक संगठित स्वरुप देकर क्रान्ति का नाम दे दिया जाता है और जो क्रान्ति विवेकशून्य है, प्रज्ञा विहीन है | ध्रुव की क्रान्ति एक व्यापक क्रान्ति है पर उस क्रान्ति को आरम्भ करने से पूर्व उसे स्वयं आत्मिक बल की उस ऊंचाई पर जाना है जहां वह अपने पूर्वाग्रह , प्रतिशोध , विद्वेष और अपनी व्यक्तिगत असफलताओं की टीस को अपने विवेक और प्रज्ञा पर हावी न होने दे|
ध्रुव के इस संकल्प ने नारद को भी विचलित कर दिया और उत्तानपाद तो निशब्द रह गए परन्तु उन्हें इस बात पर गर्व भी था कि जिस अंतर्विरोध , आत्मग्लानि और हीन भावना से वे गुजर रहे थे और स्वयं पर विजय प्राप्त करने के लिए आवश्यक जिस आत्मिक शाक्ति का संचय उनसे नहीं हो पा रहा था उस पर विजय प्राप्त करने का मार्ग उनके पुत्र ने  ढूंढ लिया है|