हिन्दू धर्म का दार्शनिक आधार

आज हम जिसे हिन्दू धर्म कहते हैं वह आदि शंकर के नाम से प्रसिद्ध शंकराचार्य की युगानुकुल व्याख्या और परिभाषा पर आधारित है| जिसमें उन्होंने वेदांत के ब्रह्म तत्व को बौद्ध के शून्यवाद के साथ तालमेल बैठाया और माया की व्याख्या के साथ अद्वैत और द्वैत में समन्वय स्थापित कर जीवन को आध्यात्मिक मूल के बाद भी पलायन से बचाया|
मूल बात यह है कि धर्म कोई जड़ और स्थिर चीज नहीं है समय के साथ सामाजिक, आर्थिक , संस्कृतिगत परिवर्तनों से वह भी प्रभावित होता है| हिन्दू धर्म ने युगानुकूल सामाजिक,दार्शनिक , आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं को अपने अन्दर समेटा और तभी यह आज तक प्रासंगिक है| शाकाहार या माँसहार से परेहज का आग्रह हिन्दू धर्म के मूल दर्शन का आधार नहीं है कि इसमें परिवर्तन आने से धर्म खतरे में पड़ जयेगा| इसी प्रकार गाय का सम्मान एक चलन है दार्शनिक अवधारणा या धार्मिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं है | हिन्दू धर्म न अहिंसा का धर्म है, न शाकाहार का न गाय की रक्षा के लिए मरने मरने का यह एक दर्शन पर आधारित है और वह है : कर्मवाद” इसके अतिरिक्त अन्य सभी व्याख्यायें और चलन है| केवल कर्मवाद की व्याख्या ही हिन्दू धर्म को एक रख सकती है और दुनिया में इसे अधिक लोकप्रिय और युगानुकूल बना सकती है| कर्मवाद के अनुसार व्यक्ति को किसी कुल, देश, जाति या परिस्थिति में जन्म लेने के बाद भी यह चयन का अधिकार है कि उसका कर्म (रोजगार के लिए किया जाने वाला कार्य नहीं वरन्‌ अपने चिंतन और व्यवहार से किया जाने वाला कर्म) क्या है यदि यह सत्य, न्याय, प्रेम और सेवा पर आधारित है तो वह किसी भी स्थिति में या कुल में जन्म लेकर परम् स्थिति का अधिकारी हो सकता है और जिसने इसके विपरीत कर्म का चयन किया है तो उसे इसके विपरीत फल मिलेगा और उसकी जाति और कुछ भी उसे कर्मफल से नहीं बचा सकती|
कोई भी धर्म अपने चलन में आज वैसा नहीं रहता जैसा कल था तभी दुनिया के अनेक हिस्सों में बौद्ध धर्म को जोड़ने वाला तत्व केवल बुद्ध हैं वरना खान, पान , रहन सहन और धर्म की उनकी व्याखाया भी पूरी तरह अलग है| हिन्दू धर्म की समस्या यह है कि पहले बौद्ध , जैन फिर यहूदी, , , इस्लाम और ईसाई आधारित धर्मों में पैगंबर और पुस्तक के आग्रह से पिछली अनेक सदियों से धर्म का पर्याय पैगंबर, पुस्तक और एक जैसी पहचान को मान लिया गया है पर हिन्दू धर्म जो सनातन भी है वह निर्गुण और दर्शन का धर्म है जहाँ सगुण निराकार के दर्शन के साथ प्रकृति के तत्वों में समन्वय है विरोध नहीं| पाप, पुन्य, अच्छा , बुरा , स्वर्ग , नरक ये सभी सामाजिक अनुशासन् के लिए हैं और अधिक वैज्ञानिक होते युग में इन सभी पर नए सिरे से पुनर्विचार कराने से झिझक क्यों है?