हिरण्यकश्यप की दुविधा

हिरण्यकश्यप जब भी अपने पुत्र प्रहलाद के बारे में सोचता है या अपनी पत्नी कयादु के बारे में सोचता है तो अन्य सामान्य प्राणियों की भांति भावुक हो जाता है , प्रहलाद के जीवन को समाप्त करने के दो असफल प्रयासों के बाद एक बार फिर हिरण्यकश्यप स्वयं से कुछ प्रश्न कर रहा है|
हरि विष्णु के विरुद्ध  मेरे  मन में सुलग रही प्रतिशोध की आग ही तो आखिर मेरे जीवन की प्रेरणा है , हिरण्यकश्यप स्वयं को शांत करते हुए किसी भी स्तर पर अंतर्मन की गहराइयों में उठाने वाले किसी भी सकारात्मक विचार की तरंग को दबा देना चाहता है| “ यदि मेरे मन में सामान्य नर या देव की भांति सात्विक , सकारात्मक या रचनात्मक विचार उत्पन्न होने लगे तो मैं अपने असुर  पूर्वजों को क्या मुंह दिखाऊंगा? मैं अपने भ्राता हिरण्याक्ष को वराह रूप में आये विष्णु के हाथों मारे  जाने का प्रतिशोध कैसे लूंगा ? आखिर मेरे जन्म और विकास का मूल लक्ष्य तो केवल प्रतिशोध है, यदि मैं भी तामसिक विचारों को त्याग कर सात्विक विचार स्वीकार कर अतीत की घटनाओं का प्रतिशोध भविष्य में नहीं लेने के विचार को पुष्ट करने लगा तो असुर संस्कृति और मूल्यों का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा | आखिर देव और असुर में अंतर ही कितना है? हम भी तो ऋषियों और दक्ष प्रजापति की ही संतान हैं यदि अंतर है तो केवल सत्व, रज और तम गुणों के संतुलन में विश्वास न करते हुए केवल तामसिक गुणों और व्यवहार के आदर्श पर जीवन व्यतीत करना, सत्ता और शक्ति का केन्द्रीकरण कर मात्र अपनी ही जयजयकार सुनने का अभ्यास रखना, प्रकृति के समस्त संसाधनों का केन्द्रीकरण कर विवेक नहीं व्यक्तिगत पसंद नापसंद के आधार पर उसका वितरण करना  और हरि विष्णु के प्रति असीम जुगुप्सा के भाव को जीवन का उद्देश्य बनाना|”
हिरण्यकश्यप का स्वयं से  वार्तालाप समाप्त ही नहीं हो पा रहा है क्योंकि बाहरी आवरण से अपने प्रतिशोध और अपनी असुर संस्कृति के प्रति घोर प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करते हुए भी वह प्रहलाद के दो बार बच कर निकल जाने से असुरक्षा के भाव से ग्रस्त है| हिरन्यकश्यप से अधिक कौन इस सत्य से परिचित है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति सदैव असुरक्षा के भय से ग्रस्त रहता है और उसका समस्त विचार, क्रियाकलाप सत्ता को संजोये रहने के प्रपंचों को फैलाए रखने में व्यस्त रहता है|
हिरण्यकश्यप को विष्णु का भय सताने लगा है जैसे जैसे समय व्यतीत हो रहा है और प्रह्लाद की विष्णु में निष्ठा बढ़ती जा रही है और उसकी अटूट निष्ठा , नारद के सहारे उसे प्राप्त होने वाला देवताओं का समर्थन और स्वयं राजसत्ता में हिरण्यकश्यप के प्रयासों को असफल करने के लिए प्रहलाद को दिया जाने वाला गुप्त समर्थन अब हिरण्यकश्यप के आत्मविश्वास को हिला रहा है|
हिरण्यकश्यप अपनी पत्नी कयादु से प्रेम करता है और असुर संस्कृति के अनुपालक होने के चलते उसे तांत्रिक और रहस्य विद्या का पर्याप्त ज्ञान है उसे आशंका है कि दैविक शक्तियों ने जिन्होंने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वर दिया था और कर्म के सिद्धांत के अनुरूप ऐसा करने को विवश थे उन्होंने उसे वर देने के साथ ही उसके पूरी तरह निरंकुश हो जाने और खुले रूप में आसुरिक प्रदर्शन से हाहाकार  मचाने की स्थिति के विकल्प की तैयारी उसी समय कर ली थी पर उसे जगत के इस संकल्प का ज्ञान होते हुए भी कि “ प्रश्न का समाधान सदैव प्रश्न में ही छुपा होता है” देवताओं के इस विकल्प से सर्वथा अनजान रहा कि उसकी पत्नी कयादु के गर्भ में पल रहा उसका पुत्र प्रहलाद ही वास्तव में देवताओं के लिए  हिरण्यकश्यप का विकल्प है|
हिरण्यकश्यप ने अपने मन में उठने वाली आशंकाओं से स्वयं को मुक्त कर लिया है और तय कर लिया है कि असुर संस्कृति की स्थापना, विष्णु से प्रतिशोध और तामसिक विचार और संकल्प के आधार पर समाज और शासन की स्थापना से वह विचलित नहीं हो सकता और अब प्रहलाद उसके लिए उसका पुत्र नहीं उसका शत्रु है और यदि उसने प्रहलाद को भावनाओं के आधार पर देखा तो उसमें और देवताओं में कदापि अंतर नहीं रह जाएगा |
प्रह्लाद की विष्णु के प्रति बढ़ती निष्ठा ने हिरण्यकश्यप के मन में विष्णु के विरुद्ध प्रतिशोध के भाव को कई गुना बढ़ा दिया है | अब उसने प्रहलाद को विद्रोह का प्रतीक मान लिया है और उसे मार्ग से हटाने के लिए असुर संस्कृति के माया और छल के तरीके को भी अपना लिया है |
हिरण्यकश्यप और प्रहलाद के इस प्रछन्न युद्ध में प्रहलाद की माता कयादु अपनी भूमिका सुनिश्चित नहीं कर पा रही है क्योंकि भले भी यह विचार और संस्कृति का युद्ध हो पर दोनों ओर से हानि तो उसे ही हो रही है एक ओर उसके वर्तमान का स्वाभिमान है और दूसरी ओर भविष्य की आशा | कयादु ने सब कुछ समय पर छोड़ दिया है| उसे पता है कि दोनों के मध्य सुलह और मध्यस्थता की गुंजायश नहीं है और अब उसे दोनों में से किसी एक के साथ रहने के लिए स्वयं को मानसिक रूप से तैयार कर लेना चाहिए |
उधर हिरण्यकश्यप भी अब व्यक्तिगत मोह के दायरे से बाहर निकलकर अपने असुर पूर्वजों के मोहपाश में बंध चुका है और प्रतिशोध ही उसके जीवन का उद्देश्य बन चुका है उसे लगता है कि अपने भाई हिरण्याक्ष की वराह के हाथों हुए वध का प्रतिशोध लिए बिना न तो वह असुर संस्कृति के  लिए योगदान कर सकता है और न ही अपने जीवन को सफल कर सकता है |
इसीलिये उसने अपनी बहन होलिका को भी इस प्रछन्न युद्ध में उतार दिया है और उसे अपनी उस मायावी शक्ति का प्रयोग करने का आग्रह किया है जिसके बाद उसे पूर्ण विश्वास है कि प्रहलाद का भी अंत हो जाएगा और जिस विद्रोह और क्रान्ति का सूत्रपात वह करना चाहता है वह भी समाप्त हो जायेगी |
हिरण्यकश्यप अत्यधिक उत्सुकता से उस पल की प्रतीक्षा कर रहा है जब उसे उसकी  बहन होलिका यह शुभ समाचार देगी कि प्रहलाद अग्नि में असमय पंचतत्व को प्राप्त हो गया पर एक बार फिर नियति, समय और दैविक शक्तियों का योग उसके साथ नहीं है और हिरण्यकश्यप को वह समाचार सुनने को विवश होना पडा जो वह सुनना नहीं चाहता था | एक बार फिर प्रहलाद जीवित शेष रह गया और होलिका को भस्म होना पड़ा |
इस घटना ने हिरण्यकश्यप के आत्मविश्वास को झकझोर कर रख दिया अब उसे पता चल गया कि उसे वरदान देते समय ब्रह्मा ने इस वरदान के तोड़ के रूप में जो व्यूहरचना की थी उसके फलीभूत होने का समय आ गया है और अब हिरण्यकश्यप के पास छद्म आत्मविश्वास के प्रदर्शन के साथ अपनी समस्त आसुरी शक्ति को एकत्र कर अंतिम वार के लिए तैयार होने के अतिरिक्त अन्य विकल्प शेष ही नहीं है |
हिरण्यकश्यप को अपने असुर पूर्वजों का स्मरण हो रहा है और वह विष्णु की शक्ति और अपरायजेता को अब स्वीकार कर रहा है पर अपने कर्म और संकल्प के अनुरूप विष्णु की अगली चाल और उनकी शक्ति का फिर से आकलन कर लेना चाहता है क्योंकि उसे पता है कि देव और असुर के  इस संग्राम में वह सदैव एक पक्ष रहेगा क्योंकि देवों की महिमा तभी तक है जब तक उनके समक्ष असुर हैं और जगत का समस्त संचालन ही इस सिद्धांत पर आधारित है कि दो परस्पर विरोधी शक्तियां एक दूसरे के पूरक के रूप में सदैव कार्यरत रहती हैं पर उसे यह भी पता है कुछ कालखंड के लिए तामसिक शक्तियां लोगों के विवेक पर शासन करते हुए अपना रौद्र और निरंकुश रूप  भले ही   प्रदर्शित करें पर अंत में विजय सात्विक शक्तियों की ही होती है|
इसी कारण आज नरसिंह के रूप में अवतरित विष्णु के हाथों मारे जाने को अपनी नियति मानकर हिरण्यकश्यप ने एक बार फिर विष्णु को चुनौती देते हुए कहा है कि सूक्ष्म और स्थूल जगत में देव और असुर का यह संग्राम शाश्वत है और कभी वह अवसर अवश्य आयेगा जब स्वयं को देव संस्कृति का अनुकरण करने वाले मानने वाले लोग आसुरिक प्रवृत्ति में लिप्त हो जायेंगे और दक्षिण और वाम विचार के लोग  एक दूसरे से अदला बदली कर लेंगे और दोनों के आचरण से यह   पहचान कर पाना असम्भव हो जाएगा कि कौन देव संस्कृति का अनुपालक है और कौन असुर संस्कृति का ?