जीवन का दर्शन

हर एक पल से बनता जीवन ,
फिर यह पल पल पल कर खिसका जाता
पर हर पल के दर्शन से कब हमने कुछ सीखा अब तक ,
सूखे पत्ते झड़ जाते हैं फिर उन पर आती हरियाली
ऐसा ही क्यों होता है फिर चाहे बीते साल बरस
इस जड़ता में एक जीवन है जो हमको संदेश दे रहा
मूल वही रहता है फिर भी सब कुछ नया बदलता रहता
मोह त्याग कर नवयौवन फिर सूक्ष्म रुप धारण करता हैं
मानव भी जब नवविचार की सूक्ष्म रश्मि में हर पल नव स्नान करे
तभी उसे जीवित रहने का कोई नव आनंद मिले
हर पल ख़ुद में नई इकाई नवविचार नवचेतन लाती
अगर मूल अपना दृढ़ है तो हर पल नव लय प्रलय कथा है
अगर नहीं तो यह जीवन उस गन्ने की याद दिलाता
जो उगने से रस चुसने तक शोषण की जीवंत कथा है
उसका जीवन उसकी गाँठों में ठहरे रस पर निर्भर है
चाहे वह मिल में जाए या फिर फुटकर रस बन जाए
उसकी नियति एक ही है, तब तक उसे घूमना होगा जब तक वह रसहीन न होये
गन्ने का रस जाते ही वह भी सीधे कूड़े में जाता
कल तक जो था रसास्स्वाद वह अब अग्नि भेंट चढ़ने को अपना एक विकल्प मानता
यही व्यथा उन युवकों की है जो अपने को नहीं समझते
वे भी गन्ने की गति पाने को सहज रुप से स्वीकृति देते
आत्मशक्ति के साधक़ बनकर अपने स्वामी स्वयं न बनकर
शोषण का अज्ञान- मार्ग ले भ्रम की मिल में बिना दाम हैं मोल लगाते