कितने ईश्वर

फ़र्ज़ करो इस दुनिया में दो ईश्वर होते क्या होता ?
रोज़ सुबह दोनों में झगड़ा सूरज के कब्जे को होता
शाम ढले फिर दोनों लड़ते गोधूलि की सन्ध्या को लेकर
कैसे होती यह दुनिया गर दो दो ईश्वर इसे चलाते
एक उसी क्षण प्रलय काटता और दूसरा उसे काटता
अगर प्रकृति के नियम एक से , कर्मवाद की सद्गति एक
तो निश्चय ही ईश्वर भी तो कभी एक ही होता होगा
इसे सभ्यता कैसे कह दें जब संकीर्ण हुआ है चेतन
पृथ्वी से अगणित लोकों तक शान्ति मंत्र का ध्येय जहाँ था
आज उसी धरती के बालक कुछ सदियों के इम्तिहान से
इतने व्याकुल और हताश हैं, अपना मूल स्वरूप त्याग कर
सब कुछ वही समेट रहे हैं जो सदियों की गाद गर्द है
आत्मतत्व की अपनी महिमा को अब तो हम स्वीकार करें
और दूसरों से तुलना कर क्यों कर हम निस्तेज रहें

फ़र्ज़ करो इस दुनिया में दो ईश्वर होते क्या होता ?
रोज़ सुबह दोनों में झगड़ा सूरज के कब्जे को होता
शाम ढले फिर दोनों लड़ते गोधूलि की सन्ध्या को लेकर
कैसे होती यह दुनिया गर दो दो ईश्वर इसे चलाते
एक उसी क्षण प्रलय काटता और दूसरा उसे काटता
अगर प्रकृति के नियम एक से , कर्मवाद की सद्गति एक
तो निश्चय ही ईश्वर भी तो कभी एक ही होता होगा
इसे सभ्यता कैसे कह दें जब संकीर्ण हुआ है चेतन
पृथ्वी से अगणित लोकों तक शान्ति मंत्र का ध्येय जहाँ था
आज उसी धरती के बालक कुछ सदियों के इम्तिहान से
इतने व्याकुल और हताश हैं, अपना मूल स्वरूप त्याग कर
सब कुछ वही समेट रहे हैं जो सदियों की गाद गर्द है
आत्मतत्व की अपनी महिमा को अब तो हम स्वीकार करें
और दूसरों से तुलना कर क्यों कर हम निस्तेज रहें

फ़र्ज़ करो इस दुनिया में दो ईश्वर होते क्या होता ?
रोज़ सुबह दोनों में झगड़ा सूरज के कब्जे को होता
शाम ढले फिर दोनों लड़ते गोधूलि की सन्ध्या को लेकर
कैसे होती यह दुनिया गर दो दो ईश्वर इसे चलाते
एक उसी क्षण प्रलय काटता और दूसरा उसे काटता
अगर प्रकृति के नियम एक से , कर्मवाद की सद्गति एक
तो निश्चय ही ईश्वर भी तो कभी एक ही होता होगा
इसे सभ्यता कैसे कह दें जब संकीर्ण हुआ है चेतन
पृथ्वी से अगणित लोकों तक शान्ति मंत्र का ध्येय जहाँ था
आज उसी धरती के बालक कुछ सदियों के इम्तिहान से
इतने व्याकुल और हताश हैं, अपना मूल स्वरूप त्याग कर
सब कुछ वही समेट रहे हैं जो सदियों की गाद गर्द है
आत्मतत्व की अपनी महिमा को अब तो हम स्वीकार करें
और दूसरों से तुलना कर क्यों कर हम निस्तेज रहें