द्रौपदी के प्रश्न

आज द्रौपदी पूछ रही है हमसे फिर कुछ तल्ख सवाल
मेरे इस धरती से जाए देखो बीते कितने काल
फिर भी अगर नहीं कुछ बदला तो नारी का बड़ा मलाल
कितने ही युग बदले चाहे हों प्राचीन या अर्वाचीन
अगर नहीं कुछ बदला तो नारी के प्रति सबका अनुमान
अपने चिर परिचित केशों को हाथों से सुलझाती वह
अपने तापयुक्त यौवन से फिर से आग लगाती वह
अपने प्रश्नों की रिमझिम बारिश में मुझको भिगो रही थी
उसने पूछा जिस भारत ने वर्ण व्यवस्था की जड़ता से युद्ध किया
फिर मेरे ही प्रतिद्वंदी सूतपूत्र को अपना नायक मान लिया,
कितने ग्रन्थ लिखे उस पर और कल का परिमार्जन आज किया
पर मेरा क्या? आख़िर क्यों मैं अब तक रचनाओं में पांडव की पत्नी बनती हूं
उस धर्मयुद्ध का लांछन मेरे केशों को अब भी मिलता है
मेरा दोष यही तो है मैं स्वयंसिद्ध एक आत्मा भी थी ,
अपने तापयुक्त यौवन को अपने केशों से और संवारा
और इसी सुन्दरता को भी अपना ही वैभव माना था
फिर क्यों इसे अहं का दर्जा तुम लोगों ने दिया हुआ है
अगर तुम्हारी रचनाओं में परिप्रेक्ष्य कर्ण का बदल रहा है
तो पांडव की पत्‍‌नी को भी केशों के इस महाजाल से मुक्त करो |

घटोत्कच और अभिमन्यु का बलिदान

महाभारत के जिस युद्ध की पटकथा कितनी ही पीढ़ियों पहले लिखी जा चुकी थी जब महाराज शांतनु ने भरत वंश की उच्च परम्परा द्वारा स्थापित व्यक्ति और राजा के मध्य के स्पष्ट विभेद को गरिमाहीन किया और एक व्यक्ति शांतनु से एक संस्थारूपी राजा पराजित हो गया और राजा शांतनु अपने आकर्षण के वशीभूत होकर उस दुविधा में पड़ गए कि उन्हें यह पता भी नहीं चल सका कि उन्होंने भारत के इतिहास को ऐसा मोड़ दे दिया है कि यह अनेक विसंगतियों , संघर्ष और टकरावों के दौर से गुजरता हुआ उस बिंदु तक पहुँच जाएगा जहां उसे भारत को एक विस्तारित स्वरुप देने के लिए आत्ममंथन के दौर से गुजरना होगा और सांस्कृतिक विस्तार से लेकर महायुद्ध की यात्रा भी इसे पार करनी होगी |
जिस महाभारत की पटकथा सदियों पहले लिखी जा चुकी थी और कुरु वंश के आपसी टकराव या राज्य उत्तराधिकार को लेकर होने वाला यह कोई सामान्य संघर्ष नहीं था और इस संघर्ष की आशंका हर पीढी के साथ और बढ़ती जाती थी | कौरव और पांडव के ज्येष्ठ पुत्रों के मध्य उत्तराधिकार का यदि सामान्य संघर्ष भर होता तो आज महाभारत के युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में चल रहे भीषण युद्ध के मध्य दो पांडव भ्राता के पुत्र जो पूरी तरह अलग संस्कृति और संस्कारों में पले थे एक पक्ष में खड़े न होते | आज अर्जुन पुत्र अभिमन्यु और भीम पुत्र घटोत्कच में संस्कार, संस्कृति , पालन पोषण की पद्धति , उपासना पद्धति में कुछ भी समान नहीं है परन्तु फिर भी वे दोनों ही स्वयं को धर्म के पक्ष में खड़ा हुआ पा रहे हैं |
दोनों महाभारत के युद्ध के मध्य जब एक दूसरे से प्रेमाकुल भाव से गले मिल रहे हैं तो उन्हें अपनी विषमताओं और सांस्कृतिक भिन्नता या उपासना पद्धति की विविधता में कुछ भी विरोधाभाषी नहीं लग रहा है | एक ओर अभिमन्यु जो युग के महानायक कृष्ण के सानिध्य में पलने वाला राजवंश के सम्बन्ध रखता है और विष्णु के स्वयं अवतार के रूप में प्रचलित उस व्यक्ति के सानिध्य में है कि जिसे बहुत लोग स्रष्टि के संचालक के रूप में देखते है जो योगेश्वर भी हैं और उनके साथ अभिमन्यु ने भी सात्विक और दैविक संस्कारों का अनुपालन किया है तो दूसरी ओर घटोत्कच रक्ष संस्कृति की अनुपालक और घोर तामसिक , तंत्र साधना में निपुण हिडिम्बा के संस्कारों से बंधा है पर महाभारत के युद्ध के मध्य इन दोनों का प्रेम और लक्ष्य के प्रति समर्पण उन्हें उस महाभारत के लक्ष्य के प्रति प्रेरित करता है जो कुरुक्षेत्र में लड़ा जाने वाला युद्ध भर नहीं है वरन हस्तिनापुर से चलने वाले भरत वंश को अपनी सांस्कृतिक सीमाओं से पार लाकर उसे महाभारत बनाने की प्रक्रिया का अंग भी है|
जिस पांडव वंश में युधिष्ठिर जैसा धर्मराज है, अर्जुन जैसा नारायण भक्त नर है, जिनके मध्य स्वयं अग्नि से उत्पन्न अग्नि के समान तेजस्वी द्रौपदी है उसी कुल में रक्ष संस्कृति की हिडिम्बा को स्वीकार करना भरत वंश की अपनी जड़ताओं को तोड़कर भारत की सीमाओं में व्याप्त संस्कृतियों , उनके स्वरुप के साथ उन्हें सम्मान देने की उदारता की प्रक्रिया का एक अंग है और यह सब कुछ कृष्ण के क्रांतिकारी और वैज्ञानिक विचारों का परिणाम ही तो है कि सुभद्रा और हिडिम्बा दोनों को पाण्डव वंश की पुत्रवधू होने का गौरव प्राप्त हो सका |
महाभारत के इस युद्ध के मध्य अभिमन्यु और घटोत्कच भले ही पहली बार मिले हैं पर उन्हें एक दूसरे के बारे में सब कुछ पहले से पता है और उन दोनों के मध्य आपसी संवाद का एक ही संदर्भ है कि अपने जन्म से लेकर अभी तक उन्हें एक की प्रशिक्षण मिला है कि उन्हें किसी ऐतिहासिक घटना का हिस्सा बनना है और स्वयं को उसके लिए पात्र बनाना है |
दो अलग प्रष्ठभूमि से आये , अलग संस्कारों में पले , अलग संस्कृति और परम्परा का पालन करने के बाद भी आज वे स्वयं को एक व्रहद परिवार का अभिन्न अंग मान रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि जिस भारतवर्ष के वे अंश हैं उसके पूर्वज राजा भरत भी शकुन्तला और राजा दुष्यंत के गान्धर्व विवाह का परिणाम थे और वह घटना भी दो पूरी तरह अलग संस्कृतियों का मिलन था और अपने पूर्वजों के इतिहास को पूरी तरह समझते हुए व इसे पूरी तरह अंगीकार करते हुए अभिमन्यु और घटोत्कच भारत की उस विशाल और उदार परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं जिसने विविध परम्पराओं को खुले ह्रदय से स्वीकार कर प्रत्येक अंतराल पर भारत को महाभारत का स्वरुप दिया है|
महाभारत के युद्ध की विभीषिका और उसके परिणाम के बारे में कोई भी अनुमान लगाना उसी प्रकार असंभव है जैसे कि कौरव और पांडव के मध्य चल रहे शीतयुद्ध में यह अनुमान लगाना असम्भव था कि युद्ध का अंतिम स्वरुप क्या होगा और युद्ध राज्य उत्तराधिकार का युद्ध होगा या फिर इसके कहीं अधिक निहितार्थ होंगे|
अभिमन्यु ने अपने जन्म से ही अपने मामा कृष्ण के मुंह से सुना था कि किसी ऐतिहासिक क्षण के लिए तुम्हें तैयार रहना है और युद्ध के आरम्भ से ही अभिमन्यु स्वयं को उस क्षण में देख रहा है परन्तु आज जब गुरु द्रोंण ने वह व्यूह रचना कर ली है कि जिसके बाद इस युद्ध का निर्णय कौरवों के पक्ष में हो जाएगा क्योंकि चक्रव्यूह के भेदन की कला केवल अभिमन्यु के पिता अर्जुन को आती है और उन्हें तो छल से कौरव सेना युद्ध भूमि से दूर ले जा चुकी है और यदि युधिष्ठिर को गुरु द्रोंण ने बंदी बना लिया तो आज पांडवों को आत्मसमर्पण करना होगा |
इस क्षण को देखकर अभिमन्यु को समझते देर न लगी कि जिस ऐतिहासिक क्षण की बात उसके मामा उससे करते आये थे वास्तव में वह यही क्षण है| आज अभिमन्यु के समक्ष दो विकल्प है चक्रव्यूह का भेदन करने के लिए व्यूहरचना में प्रवेश करना और इसे अपना कर्म मानकर अपने मामा के कर्मवाद के सिद्धांत पर अटूट विश्वास रखना या फिर स्वयं को अपरिपक्व , हीन मानकर युद्धभूमि में उपस्थित अन्य महारथियों से अपनी तुलना करते हुए अपना समय नष्ट करना | अभिमन्यु ने पहले विकल्प को चुना क्योंकि उसने एक योद्धा के साथ एक कर्मयोगी होने का आदर्श भी सीखा था और कर्मवाद व आत्मा की अमरता के सिद्धांत की छाया में पला उसका जीवन उसे भयभीत होने की आज्ञा नहीं दे रहा था और न ही किसी भी स्तर पर स्वयं को कमतर आकने का अवसर दे रहा था|
चक्रव्यूह में प्रवेश करने के साथ एक एक कर द्वारों को तोड़ते हुए उसने जब कौरव सेना में हाहाकार मचाया तो कौरव सेना के सभी महारथी और रणनीतिकार इस तूफ़ान को समझ नहीं पा रहे थे , उन्हें पहली बार कृष्ण की शक्ति का अनुभव हो रहा था जिन्होंने कि अर्जुन के विवेक को जाग्रत किया था और सारथी बनकर यह सुनिश्चित किया था कि जहां तक संभव हो विपरीत परिस्थितियों में भी यह धर्मयुद्ध ही बना रहे | चक्रव्यूह में अभिमन्यु के पराक्रम ने कौरव महारथियों को धर्म और अधर्म की मर्यादा के मध्य की पतली रेखा को और पतला देखने पर विवश कर दिया और उन्होंने युद्ध की मर्यादाओं के विपरीत अभिमन्यु पर आक्रमण किया परन्तु इसके मध्य अभिमन्यु को केवल यही स्मरण रहा कि आखिर उसने इतिहास के साथ अपने निर्णायक पल को जी लिया | अभिमन्यु के एक दिन के पराक्रम के लिए उसे बाल्यकाल, किशोर और युवावस्था तक कठोर परिश्रम करना पडा परन्तु युद्ध में घायल अभिमन्यु की सोती जा रही आँखे जो अब न अपने पिता , न माता और न ही अपने मामा के दर्शन कर पाएंगी इतना सोचकर संतुष्ट हो रही थीं कि उसके बलिदान से यह सुनिश्चित हो गया है कि अब पांडव आत्मसमर्पण करने को विवश नहीं होंगे और न ही उसके मामा या पिता पर पराजित पक्ष के साथ खड़े होने का कलंक लगेगा | चिरनिद्रा में लीन होने को तत्पर अभिमन्यु की ऑंखें अब अपने भ्राता घटोत्कच को भी देखना चाहती थीं कि आखिर उसका पालन पोषण भी तो इसी प्रकार किसी ऐतिहासिक क्षण के लिए हुआ है और इसी शुभकामना के साथ अभिमन्यु की आँखें बंद हो गयीं कि इतिहास में जो स्थान उसे मिला है वही स्थान उसके भ्राता घटोत्कच को भी मिले|
अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार कृष्ण के समदर्शी और स्थितिप्रज्ञ होने के सिद्धांत के व्यावहारिक परीक्षण का अवसर था और अर्जुन के लिए अपने उस ज्ञान को चरितार्थ करने का क्षण था जो युद्ध से ठीक पहले उन्हें कृष्ण ने दिया था जब अर्जुन ने अपने सगे लोगों के रक्त से सने इस युद्ध में हथियार उठाने से मना कर दिया था|
अभिमन्यु के इस पराक्रम ने घटोत्कच को भी प्रेरित किया और प्रतिदिन युद्ध में जाने की उत्सुकता उसे लगी रहती थी और अंत में उसे भी वह अवसर मिल ही गया जब उसके पराक्रम ने भी कौरव सेना के रोंगटे खड़े कर दिए और हाहाकार मचाती सेना अपने लिए मार्ग नहीं ढूंढ पा रही थी | आज समस्त पांडव भ्राता हिडिम्बा और भीम के विवाह की उपयोगिता और भरत वंश और रक्ष संस्कृति के मिलन के निहितार्थ और इसके आगामी इतिहास पर पड़ने वाले प्रभाव को अनुभव कर पा रहे थे | युद्ध के इस दौर में भी जब कृष्ण धर्म से पूरी तरह विमुख नहीं होना चाहते थे पर दुर्योधन के मायावी और छल प्रपंचों का उत्तर देना भी आवश्यक था तो ऐसे में तामसिक और मायावी शक्तियों से भरपूर घटोत्कच में पांडव पक्ष को अपना भविष्य दिखाई दे रहा था|
शायद यही महाभारत की विशेषता है कि भारत ने अपने मूल आदर्शों को यथावत रखते हुए भी उदारतापूर्वक उसे भी स्वीकार किया और सम्मान दिया जो आम तौर पर असहज दिखता है पर जिस कृष्ण ने कंश और जरासंध के एकाधिकार को तोड़ा और कर्मवाद का सिद्धांत दिया और गोवर्धन पर्वत की पूजा से वैज्ञानिक सन्देश देकर अंधभक्ति के विरुद्ध लोगों को जागरूक किया , उसी के उदार विचारों का परिणाम था कि रक्ष संस्कृति की हिडिम्बा को भी पांडव कुल की पुत्रबधू का दर्जा भी मिला|
घटोत्कच ने अपने पराक्रम से कौरव सेना को इस कदर विचलित कर दिया कि अर्जुन के प्राण हरने के लिए जिस दिव्यास्त्र को कर्ण ने अपने पास रखा था उसे दुर्योधन के कहने पर उसे घटोत्कच पर छोड़ना पडा |
अभिमन्यु की भांति घटोत्कच ने भी अपने जीवन के उस क्षण को जी लिया जिसके लिए उसे तैयार किया गया था | आज घटोत्कच को भी अपने भ्राता अभिमन्यु की भांति इस बात का संतोष था कि उसने पांडवों की विजय के मार्ग में आ रही बाधा को पार करने और उनकी विजय सुनिश्चित करने में अपनी ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह कर दिया है|
अपने दो महावीर पुत्रों के बलिदान पर पांडव पक्ष यही सोच रहा है और कहीं न कहीं सभी महारथी स्वयं को कुछ क्षणों के लिए छोटा भी पा रहे हैं कि इस धर्मयुद्ध की विजय के बाद इतिहास युधिष्ठिर, अर्जुन और भीम के पराक्रम को इस विजय का श्रेय देगा पर क्या अभिमन्यु और घटोत्कच ने अपने जीवन के निर्णायक दिन युद्धभूमि में न जिए होते तो यह विजय संभव होती? आज पांडवों को ही नहीं सभी को यह लग रहा है कि इतिहास में कौन नायक बनता है महत्व इसका नहीं है क्योंकि नायक को भी पता होता है कि न जाने कितने ऐसे मूक बलिदानियों के बलिदान की गाथा की अंतर्कथा से एक नायक का महाकाव्य पूरा होता है इसलिए महत्व अपने कर्म से मिलने वाले संतोष से है न कि इतिहास में नायक के रूप में याद किये जाने से |

 

द्रौपदी कृष्ण संवाद

साक्षात अग्नि से उत्पन्न द्रौपदी अपने जन्म के रहस्यों और स्त्री के रूप में अपने अस्तित्व के प्रश्नों में उलझी राजदरबार में हुए अपने अपमान के भाव से उबर नहीं सकी है और किसी भी प्रकार इसे स्त्री की नियति और भाग्य मानकर समझौता करने को तैयार नहीं है|
पांडवों के साथ वनवास के कितने ही वर्ष व्यतीत हो गए पर शायद ही कोई ऐसा दिन बीता हो जब द्रौपदी ने पांडवों के अन्दर प्रतिशोध की आग को ठंडा होने दिया हो पर आज जब वनवास में पांडवों के शिविर में कृष्ण का आगमन हुआ है तो द्रौपदी ने अनेक गूढ़ प्रश्न उनके समक्ष रखे हैं जो समस्त संस्कृति को झकझोर देने वाले हैं | द्रौपदी को पता है कि कृष्ण ने अवश्यम्भावी महाभारत युद्ध को धर्मयुद्ध बनने तक रोक रखा है पर जिस द्रौपदी ने उसी पांडव कुल में जहां कि कुंती ने बिना प्रतिरोध या विरोध का स्वर उठाये माद्री को पांडु की पत्नी के रूप में विजय के प्रसाद के रूप में स्वीकार कर लिया था उसी कुल में द्रौपदी ने सुभद्रा को अर्जुन की पत्नी का स्वागत बिना विरोध और तर्क के नहीं किया और यह जानते हुए भी कि सुभद्रा कृष्ण की बहन हैं | कृष्ण को भारत के इस बदलते स्वरुप और स्त्री के बदलते स्वरुप का पता है इसलिए वे बदलते परिद्र्श्य में द्रौपदी के प्रश्नों से भाग नहीं रहे हैं पर उन्हें सबसे अधिक असुविधा वर्तमान के प्रश्नों से नहीं अतीत के प्रश्नों से हो रही है क्योंकि वर्तमान के संदर्भ में अतीत को सही सिद्ध करना या उसके आधार पर वर्तमान में उन सांस्कृतिक मूल्यों से परहेज करना दोनों ही अतिरेकी विचार हैं |
द्रौपदी ने कृष्ण से पहला ही प्रश्न उनके विष्णु रूप में राम के रूप में अवतार लेने पर स्त्री के सम्बन्ध में उनके विचारों पर किया और कृष्ण किसी भी प्रकार न तो इन प्रश्नों से बचना चाहते हैं और न ही आज के संदर्भ में कल की व्याख्या करना चाहते हैं |
कृष्ण ने राम के रूप में अपनी कथा उस समय से आरम्भ की जब उन्होंने पहली बार जनक वाटिका में जानकी को देखा था , मेरी जानकी से मुलाक़ात कोई संयोग नहीं था क्योंकि विश्वामित्र इछवाकू वंश की जड़ता से चिंतिति थे जिस वंश ने ऐसे महारथी राजा दिए जो देवताओं के साथ राक्षसों से युद्ध करने तो गए पर वे अब अपनी ओर से पहल कर संस्कृति के विस्तार के लिए अपने राजमहल से बाहर आकर वास्तविकता को समझने और अन्य संस्कृतियों व अन्य नस्ल व विचार के लोगों को व्यापक सांस्कृतिक परिधि में लाने के प्रयास से विमुख थे या तो वे युद्ध की भाषा जानते थे या फिर अयोध्या की सीमाओं तक सीमित राजभोग |
विश्वामित्र ने इस जड़ता को तोड़ने के लिए मुझे और लक्ष्मण के गुरुकुल से वापस आने की प्रतीक्षा की और वापस आते ही हमें अयोध्या की सीमाओं से बाहर लाकर पिता दशरथ द्वारा निश्चित किये गए भविष्य से विपरीत कुछ नया सोचा और इसी क्रम में मेरी और जानकी की मुलाक़ात हुई जो कि राम के रूप में मेरी व्यापक कथा का पहला बड़ा पडाव था | हमारे गुरु विश्वामित्र ने कोशल और जनकपुरी के मिलन के साथ आर्यावर्त के सांस्कृतिक विस्तार की आधारशिला रखी जो अब अपनी जड़ता से बाहर आकर सांस्कृतिक संवाद और गतिशीलता के नए दौर में प्रवेश करने वाला था |
गुरु विश्वामित्र को विश्वास था कि धनुष का भंग मेरे द्वारा ही होगा पर आज तक मैं सोचता हूँ कि यदि मुझसे पहले किसी और ने वह धनुष तोड़ दिया होता तो क्या होता? शायद यही मानव के और उसकी सभ्यता के विकास की अंतर्कथा है कि वर्तमान युग के संदर्भ में वह राम जो जानकी से प्रेम करता था पर धनुष भंग के लिए अपने गुरु के आदेश की प्रतीक्षा करता रहा वह द्वापर के कृष्ण से पूरी तरह भिन्न है जिसने कि रुक्मिणी से प्रेम किया और उसके परिजनों द्वारा उसका विवाह उसकी इच्छा के विरुद्ध तय किये जाने पर उसके सहयोग से उसका हरण करने में संकोच नहीं किया| कृष्ण ने राम के रूप में अपने पिछले अवतार की चर्चा को फिर से आरम्भ करते हुए द्रौपदी के स्त्री विमर्श संबंधी प्रश्न का उत्तर देने के क्रम में कथा को जारी रखा और उस प्रसिद्ध अहिल्या की कथा का उल्लेख किया जब उन्होंने अहिल्या का उद्धार किया था| राम रूप में जब अहिल्या का विषय मेरे सम्मुख आया तो मुझे यह सामान्य रूप से दुविधा का विषय लगा क्योंकि एक ओर गौतम ऋषि का अपनी साधना में लीन होकर गृहस्थ धर्म से पलायन का प्रश्न था और दूसरी ओर एक स्त्री के सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर अपनी इच्छा थोपने का विषय था | यदि गौतम ऋषि को गृहस्थ जीवन में रूचि नहीं थी तो उन्हें अहिल्या से यह अपेक्षा रखने का अधिकार भी नहीं था कि वह अपने यौवन और अपनी सांसारिक अभिलाषा का परित्याग कर समस्त जीवन एक सन्यासिनी की तरह व्यतीत करे आखिर इस वैदिक संस्कृति का मूल स्तम्भ तो कर्मवाद के चयन के अधिकार पर आधारित है किसी भी स्थिति में , परिवेश में जन्म लेने के चयन का अधिकार किसी को नहीं है पर जन्म लेने के बाद अपने चिंतन के आधार पर अपने कर्म का चयन करने का अधिकार उसे है और उसके फल को भोगने के लिए वह स्वतंत्र है समाज का कर्तव्य उसे यह बताना भर है कि इस कर्म का प्रतिफल यह होगा शेष उसका निर्णय है कि वह क्या करना चाहता है?
इस सिद्धांत के आधार पर गौतम ऋषि को कोई अधिकार नहीं बनता था कि वे अहिल्या से उन्हीं आदर्शों या सिद्धांतों का पालन करने की अपेक्षा करें जो उनके अनुसार उचित है पर अहिल्या के अनुसार नहीं और इसी कारण जब मेरे समक्ष यह प्रश्न आया कि अहिल्या के स्वतंत्र निर्णय के अधिकार को उसके जीवन का अभिशाप बना दिया गया है तो मैंने अहिल्या का पक्ष लेकर और आर्यावर्त के मूल कर्मवाद और चयन की स्वतंत्रता के मूल्य के आधार पर अहिल्या को उसकी अपराधबोध की भावना से मुक्त किया और आर्यावर्त में स्त्री के विषय में वर्षों से छाई जड़ता और धुंध को स्पष्ट किया |
कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि मुझे पता है कि राम के रूप में लिए गए अनेक निर्णयों पर उठ रहे प्रश्नों का बोझ मैं अनेक पीढियों से ढो रहा हूँ और शायद अगली अनेक पीढ़ियों तक ढोता रहूँगा पर यह भी सत्य है कि जो ऐसे प्रश्न मुझपर खड़े करते हैं वे यह तय नहीं कर पाते कि वे मुझे एक राजा मानते हैं या विष्णु का अवतार क्योंकि यदि मैं राजा हूँ तो एक सामान्य मानव के रूप में युग काल परिस्थिति के अनुरूप मैंने निर्णय लिए जो मेरे अनुसार सही थे भले ही आधुनिक संदर्भ में वे उचित न हों और यदि मैं विष्णु अवतार हूँ तो मैं तो कोई भूल कर ही नहीं सकता और जो कुछ भी था वह लीला थी|
परन्तु यह भी सत्य है कि जिस जानकी से मैंने प्रेम किया , उसके सम्मान की रक्षा के लिए समस्त रक्ष संस्कृति से महायुद्ध किया और जो आर्यावर्त के स्वाभिमान और सम्मान की प्रतीक थी उसके प्रति निरादर या उसे उत्पीडित करने का भाव तो नहीं ही हो सकता | अगर कुछ हुआ है तो वह युग के अनुरूप बने सामाजिक नियमों का परिणाम था और शायद मैं अपने राम के स्वरूप में क्रांतिकारी नहीं था और मुझे मेरे पुरुषार्थ से अधिक दूसरों के प्रेम , समर्पण और त्याग ने मुझे भगवान बना दिया|
विश्वामित्र ने पहले मुझे अयोध्या की सीमाओं से बाहर लाकर व्यापक स्वरुप दिया , पिता जी के वनवास के आदेश के बाद भ्राता लक्ष्मण , भरत और जानकी सहित समस्त अयोध्या की जनता के अपार प्रेम ने फिर हनुमान , सुग्रीव और विभीषण के प्रेम ने मुझे सदैव भगवान बना रहने दिया क्योंकि मैंने कभी भगवान बनने का मोह नहीं पाला और युगानुकूल कर्म करता रहा और यदि अपने कर्म के लिए मुझे यशोगान मिला तो आलोचना भी हुई और इसमें कुछ बुरा नहीं है और जो आलोचना करते हैं वास्तव में वे भी मुझ में कहीं न कहीं आस्था रखते हैं और मुझे अपने विचार और आदर्शों के अनुरूप ढालकर मुझे स्वीकार कर लेना चाहते हैं क्योंकि सत्य तो एक ही है और बौद्धिक छलावे से इस सत्य को नहीं बदला जा सकता और मुझे लेकर ऐसे प्रश्न होते रहेंगे महत्वपूर्ण यह है कि मैं अपने कर्म से संतुष्ट हूँ या नहीं और अपने कर्मों को लेकर कोई अपराधबोध या बोझ तो नहीं है|
कृष्ण ने अपने कृष्णावतार के काल के घटनाक्रम के संदर्भ में द्रौपदी को सांत्वना देते हुए कहा कि जैसे जैसे मानव सभ्यता विकास करती जायेगी स्त्री के प्रति नजरिया भी बदलता जाएगा क्योंकि प्रकृति के संचालन के मूल में जो योगमाया है और उसकी शक्ति है उसी का साकार रूप स्त्री है और उसका तेज, उसकी ऊर्जा , शक्ति पुरुष से कई गुना अधिक है और पुरुष अपनी शक्ति और सत्ता के नियंत्रण के लिए प्रकृति पर नियंत्रण करना चाहता है और इसी क्रम में वह स्त्री के अस्तित्व और व्यक्तित्व को नियंत्रित करना चाहता है पर जब भी कोई देवता या भगवान का दर्जा प्राप्त करेगा तो उसे स्त्री को बराबर का नहीं स्वयं से ऊपर का दर्जा देना होगा| धर्म और अधर्म की परिभाषा हो या किसी संस्कृति या सभ्यता का मापदंड हो इसी से निर्धारित होता है कि वह स्त्री के साथ कैसा व्यवहार करती है |
कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि मैं पांडवों के साथ इसलिए हूँ कि युधिष्ठिर सहित पांडवों ने तुम्हें जुवे में दांव पर लगाया जरूर है पर वे इसका प्रायश्चित भी कर रहे हैं और तुम्हारे सम्मान की पुनर्स्थापना के लिए बलिदान को तत्पर हैं इस भावी महाभारत में तुम्हारे सम्मान की पुनर्स्थापना हो जायेगी पर तुम्हारे द्वारा उठाये गए कुछ प्रश्नों का उत्तर भारत को आगे भी ढूंढना होगा और वह है स्त्री के अस्तित्व, सत्ता और उसके व्यक्तित्व को उसकी आत्मा के साथ स्वीकार करना और उसे सामाजिक नियमों के दायरे में लाकर उसकी स्वतंत्रता को सीमित करने के प्रयास करने से बचना होगा क्योंकि किसी भी स्त्री से सीता बनने की अपेक्षा तभी करनी चाहिए कि जब सामने वाला भी राम हो और राम और कृष्ण आदर्श होते हैं जिसे प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है पर स्त्री और पुरुष के मध्य सम्बन्ध की सही परिभाषा द्रौपदी और उसका कुरु राजवंश के साथ सम्बन्ध में निहित है|
अब भी द्रौपदी को अपने अस्तित्व, व्यक्तित्व और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए दुर्योधन का अहंकार, कर्ण की कुंठा, पांडवों का उसे अपनी संपत्ति मानने की भूल के पडावों से गुजरते हुए अपना संघर्ष जारी रखना होगा पर इस संस्कृति में राम और कृष्ण का साथ उसे मिलता रहेगा जो अपनी समस्त भूलों के बाद भी स्त्री के सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहेंगे|