प्रसंगवश – रोहित वेमुला की मौत और सामाजिक कार्यकर्ता की पीड़ा

रोहित वेमुला की मौत पर कोई असम्वेदनशील नहीं हो सकता| रोहित वेमुला की मौत पर अपने विचार व्यक्त करने से पहले मैं रोहित की मनस्थिति को पूरी निष्पक्षता से अनुभव करना चाहता था| रोहित की मौत के बाद अनेक विचार तत्काल आये| इसमें से अधिकाँश राजनीतिक नफ़ा नुक्सान से प्रेरित थे| कुछ पूरे विषय को विश्वविद्यालयों के प्रबंधन , उच्च शिक्षा के स्तर से जोड़ रहे थे| कुछ ने इसे पूर्वाग्रह जनित विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना उचित समझा| सबसे अधिक आश्चर्य मुझे देश के गिरते राजनीतिक धरातल को लेकर हो रहा है| जो लोग रोहित की मौत को इसलिए महत्वपूर्ण मानते हैं कि वह एक वर्ग विशेष के प्रति उपेक्षा को मुखर स्वर देता है वे भी राजनीति कर रहे हैं और जो इस मौत को इसलिए महत्व नहीं देना चाहते कि वह उस विशेष वर्ग से नहीं आता था वे तो और भी नीचे जाकर राजनीति कर रहे हैं | क्या रोहित की आत्महत्या या उससे जुड़े प्रश्न केवल इसलिए महत्व रखते हैं कि वह किस वर्ग से आता है और क्या रोहित की मौत का दुःख या संवेदना इसलिए कम हो जाती है कि वह उस वर्ग विशेष से नहीं आता?
मैंने रोहित के आत्महत्या के साथ  लिखे गए पत्र से जो कुछ समझा असल में वह सभी युवाओं के लिए एक सन्देश है फिर वह किसी भी वर्ग, समुदाय से क्यों न हो? रोहित की आत्महत्या वास्तव में एक युवा की उस विवशता और स्वयं को छला महसूस किये जाने की व्यथा है जो इस आधुनिक युग में युवाओं को एक दिशा देती है और सावधान करती है|
एक युवा जो कुछ आदर्शों , मूल्यों के साथ समाज में अपनी अलग पहचान बनाने के संघर्ष के साथ अपने अस्तित्व की तलाश शुरू करता है और अपने आदर्श और मूल्यों के सहारे इस शरीर से परे अपनी आत्मा को पकड़ना चाहता है पर उसे सही मार्गदर्शन नहीं मिलता और आदर्श और मूल्यों का पाखण्ड करने वाले संगठन , विचारधाराएँ ऐसे युवकों को अपना सही लक्ष्य नजर आता है और ऐसे युवा अपना सब कुछ भूलकर इन संगठनों या विचारधाराओं के साथ एकात्म हो जाते हैं पर जब अधिक निकट जाते हैं तो उन्हें एहसास होता है कि यहाँ न आदर्श है, न मूल्य है है तो केवल सत्ता तक जाने की भूख और इस भूख को पूरा करने के लिए आदर्श और मूल्य का पाखंड जबकि ऊपर तो सबके हित आपस में जुड़े हैं और उनमें आपसी सहमती है |
रोहित ने स्वयं को इसी आदर्श और मूल्यों के पाखंड के साथ छला महसूस किया और यह दर्द केवल रोहित का नहीं है कितने ही युवाओं का है पर वे इसे समझ नहीं पाते रोहित ने समझ लिया और अपने बलिदान से देश के युवाओं को एक नया मार्ग दिखाया और मार्ग यह है कि अपनी अलग पहचान के लिए अपने अस्तित्व की तलाश तुम्हें अकेले ही करनी होगी | व्यक्ति की हर यात्रा स्वयं से आरम्भ होकर स्वयं तक समाप्त होती है|
यदि आधुनिक युग में युवाओं को अधिक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर रहना है तो अपनी समस्याओं का समाधान दूसरों में नहीं स्वयं में ढूँढना होगा , किसी व्यक्ति, समुदाय, विचारधारा के अन्याय के कारण हम पीछे नहीं हैं और न ही हमारी असफलता के लिए दूसरा जिम्मेदार है असल में अन्धभक्ति , अपनी असफलता के लिए c खडा कर उसे नष्ट करने में अपनी सकारात्मक ऊर्जा नष्ट करने से हम कभी स्वयं से जुड़ नहीं पाते और दूसरे व्यक्ति, संगठन या विचारधारा के उद्देश्य की प्राप्ति का माध्यम बन जाते हैं और खुद को छला हुआ पाते हैं |
आज ये बातें भले ही मुनासिब न लगती हों पर जब तक इस देश का युवा स्वयं को स्वयं से नहीं जोड़ेगा और बिना तर्क किये केवल इसलिए अन्धानुकरण करेगा कि वह सवाल उठाने का साहस नहीं कर सकता तो न जाने कितने रोहित इसी प्रकार घुट घुट कर मरते रहेंगे और दूसरों के लिए इस्तेमाल होते रहेंगे|