प्रसंगवश

आस्था की दुहाई देकर हर बार देश में उत्तेजना और करो या मरो का नारा लगाया जाता है| मैं भी मानता हूं कि कुछ सवाल हैं ” सेक्युलरिज्म” की व्याख्या हो या राजनीतिक वाम और दक्षिण पंथ की व्याख्या या देश में उसे मिलने वाले सम्मान या मह्त्व का सवाल हो| पर यह भी सत्य है कि देश की आजादी से बाद से इन स्वालों पर देश को मथने के लिए कितनी बार आस्था के प्रश्न उठे और इन सवालों को उठाने वालों को भी देश की जनता ने अवसर दिया तो भी प्रश्न वहीं के वहीं हैं| इसलिए मेरा मत दृढ़ हो चुका है कि हर दशक के बाद जब पीढ़ी बदलती है तो वही घिसे पिटे मुद्दे उठाये जाते हैं ताकि सबकी सेना में भर्ती होती रहे| नहीं तो समय बदलता है, चेहरे बदलते हैं पर मुद्दे नहीं बदलते न तो उनके लिए कुछ ठोस होता है और केवल आस्था के विशयों का उपयोग देश में उत्तेजना फैलने के लिए होता है|
नहीं तो इतिहास गवाह है कि 1960 के दशक में करपात्री जी की अगुवाई में गो रक्षा का आंदोलन चला तब से अब तक कितना राजनीतिक परिवर्तन हुआ पर कोई ठोस फैसला क्यों नहीं हुआ?1990 के दशक में हम विद्यार्थी थे तो ऐसा लगा रहा था कि अयोध्या में रामजन्मभूमि पर मदिर नहीं बना तो हम जियेंगे कैसे पर 25 वर्ष हो गए फिर भी तो जी रहे हैं|
असल में इन सभी मुद्दों से सबके मामले सधते हैं| न किसी को गाय से प्रेम है न राम से| आप पता लगा लीजिये टीवी पर जो गाय के लिए आँसू बहाते हैं वे तो ये भी नहीं जानते होंगे कि गाय और भैंस के दूध में फर्क क्या होता है? गाय की कितनी नस्ल होती है? गाय खाती क्या है?
असल में बात कुछ और है| आजादी के बाद से देश को दुनिया के साथ चलाने और देश को पुरानी परंपरा में ले जाने की बहस चल रही है और पुरानी परंपरा वाली सोच उत्तेजना के सहारे या आस्था के मुद्दों के सहारे कुछ शक्तिशाली होती दिखती है तो अपने असली परंपरावादी रंग में आ जाती है और देश उसके लिए तैयार नहीं है|
इसका उदाहरण है कि कुछ दिनों से तसलीमा नसरीन के सेक्युलरिज्म के बयान को प्रचारीत किया जां रहा है परंतु जैसे ही तस्लीमा के स्त्री स्वतंत्रता और सेक्स के खुलेपन पर उनके विचारों से सामना होगा | दोनों ओर के कट्टरपंथी एक स्वर में बात करेंगे| असली संघर्ष ” अधिक स्वतंत्रता पाने का प्रयास” और ” समाज या धर्म के सहारे स्वतंत्रता को सीमित करने” के विचार के मध्य है|