प्रसंगवश – हिन्दू धर्म और स्त्री

महाराष्ट्र के एक शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर देश और देश से बाहर हो रही चर्चाओं के मध्य कुछ विषयों पर स्थिति स्पष्ट कर लेना आवश्यक है| इस पूरी बहस से कहीं न कहीं यह सन्देश देने की चेष्टा भी हो रही है कि हिन्दू धर्म में महिलाओं के प्रति बराबरी का व्यवहार नहीं होता और उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है| इस पूरे संदर्भ में कुछ ऐतिहासिक संदर्भ के साथ पूरे घटनाक्रम और बहस को देखने की आवश्यकता है|
मूल रूप में आज हम जिसे हिन्दू धर्म कहते हैं वह मूल रूप में वैदिक दर्शन पर आधारित धर्म नहीं है जो कि वेद से होते हुए उपनिषद् और फिर रामायण और महाभारत काल तक वेद की शिक्षा को युगानुकूल आधार पर समेटे हुआ था , वर्तमान हिन्दू धर्म आदि शंकराचार्य की मीमांसा और वैदिक दर्शन और बौद्ध दर्शन के मिश्रण पर आधारित है और मंदिर व्यवस्था , मठ प्रणाली, संतों का मिशनरी अंदाज में धर्म का प्रचार आदि बौद्ध मठ, चैत्य और विहार का हिन्दू संस्करण है|
वैदिक दर्शन में मंदिर उस रूप में नहीं होते थे जैसे कि आज देवालय होते हैं यदि पूजा स्थल होते थे तो खुले स्थान पर या पीपल के पेड़ के नीचे ग्राम देवता , कुल देवता या अधिक से अधिक महादेव के प्रतीक के रूप में शिवलिंग हुआ करते थे ( शिवलिंग भी निराकार आत्मा का साकार प्रतीक भर था)|विश्व के पहले मिशनरी रिलीजन बौद्ध धर्म के व्यापक प्रचार के बाद वैदिक परम्परा ने इससे मुकाबले के लिए इसके अनेक गुणों को अंगीकार किया और बौद्ध चैत्य और विहार की तर्ज पर हिन्दू मंदिर या देवालय बनने लगे और जिस प्रकार इनके प्रबंधन में महिलाओं को स्थान नहीं था उसी प्रकार हिन्दू मंदिर का प्रबंधन भी पुरुष प्रधान ही बना रहा | इसके पीछे एक और कारण भी है बौद्ध धर्म के आरम्भिक दिनों में भगवान् बुद्ध मठों में या अन्य मिशनरी कामों में महिलाओं की भागीदारी के पक्ष में नहीं थे और काफी बाद में अपने शिष्य आनंद के आग्रह पर उन्होंने बौद्ध भिक्षुणियों को प्रवेश दिया था | इसी तर्ज पर हिन्दू मंदिर में पूरी व्यवस्था पुरुष प्रधान ही रही |
स्त्रियों को मंदिर या बौद्ध मठ से दूर रखने के पीछे केवल प्रबंधन की बात भर नहीं थी |वैदिक दर्शन मूल रूप में प्रक्रति पुरुष के दर्शन को भी परिलक्षित करता था और जगत के निर्माण और संचालन में स्त्रियों की पूरी सहभागिता स्वीकार की गयी है और इसी कारण प्रकृति ( पेड़ पौधे, नदी समुद्र नहीं जिसे आम तौर पर लोग प्रकृति का स्वरूप मानते हैं और जब हिन्दू को प्रकृति पूजक कहते हैं तो वे यहीं धोखा खा जाते हैं और मानते हैं कि पेड़ पौधे, नदी, पहाड़, पत्थर की पूजा करते हैं जबकि यह तो दार्शनिक प्रकृति का प्रतीक है जिसका मूल अर्थ आज हिन्दू भी भूल चुका है पर देवी उपासना , तंत्र साधना की ओर आकर्षण और अधिकतर व्रत उपवास और कन्या खिलाना आदि उसी मूल प्रकृति पुरुष दर्शन का अंश भर है) को कभी शिव की सहचरी , कभी जगदम्बा , कभी काली , कभी नौ दुर्गा के रूप में सम्मानित की गयी है और यहाँ तक कि राम ने भी अंतिम युद्ध से पहले नौरात्र अनुष्ठान किया था और देवी की उपासना की थी |
परन्तु बौद्ध धर्म में जिस प्रकार सांसारिक जीवन और ग्रहस्थ जीवन के प्रति नीरसता का भाव उत्पन्न किया गया उससे एक लम्बे समय तक बुद्ध की तर्ज पर ग्रहस्थ जीवन को त्याग कर मठ परिपाटी के अनुरूप बौद्ध दर्शन के प्रचार को ही अधिकतर मेधावी लोग अपने जीवन का ध्येय मानने लगे और इसी कारण स्त्री को आध्यात्मिक जीवन की प्रगति में एक बड़ी बाधा मानने का स्वभाव सामाज में रूढ़ हो गया और आगे चलकर जब आदि शंकराचार्य ने भी मठों की स्थापना की तो हिन्दू धर्मं में भी स्त्री को आध्यात्मिक जीवन की उन्नति में बाधा माना जाने लगा ( जबकि वैदिक और पौराणिक काल में ऋषि , मुनि ग्रहस्थ रहते हुए भी साधक होते थे और अनेक बार तो इन ऋषि मुनियों को अनेक प्रतापी राजा अपनी कन्या विवाह के लिए दे जाते थे ) और अभी तक यही धारणा बनी है कि यदि इसी लोक में ही परलोक को साधना है या समाज के लिए कुछ बड़ा करना है तो स्त्री से दूर रहो और यदि विवाह हो भी जाए तो उसे साथ मत रखो क्योंकि वह मार्ग से विचलित कर देगी|
बाद में बौद्ध धर्मं की भाँती ईसाई धर्म में भी धर्म के मूल को प्राप्त करने के लिए और जीसस के मत के प्रचार के लिए पूरा जीवन खपाने के लिए स्त्री को अपवित्र मानकर उससे दूर रहने की सलाह को ही अधिक प्रचारित किया गया |
आज विश्व में नारीवादी यदि यह मानते हैं कि केवल धर्मस्थानों में स्त्रियों के प्रवेश मात्र से उनके सम्मान को प्राप्त किया जा सकता है तो उनकी सोच गलत है| जब तक विभिन्न धर्मों और संगठनों में स्त्री को अपवित्र और आध्यात्मिक उन्नति में बाधा उत्पन्न करने वाली चीज के रूप में देखा जाएगा यह अन्याय चलता रहेगा |
आज नारीवादियों को आध्यात्मिक उन्नति में और समाज के लिए कुछ बड़ा करने के नाम पर स्त्री को अवरोध मानने की सोच और उसे मात्र सेक्स सिम्बल के रूप में देखकर बिना आत्मा के अस्तित्व के केवल एक वस्तु मानते रहने से उसे बराबर का दर्जा न दे पाने की पुरुष की एकांगी सोच से समाज को मुक्त कराने के अभियान पर अधिक जोर देना चाहिए , मंदिर , मस्जिद और चर्च में स्त्री के प्रवेश के आन्दोलन से उन्हें वह सम्मान और अधिकार हासिल नहीं होगा जिसकी उन्हें आवश्यकता है|