राजनीति में “ तत्व” का अभाव

हमने जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया है उसके अंतर्गत वास्तविक संप्रभुता जनता के हाथों में है और जनता उस संप्रभुता का उपभोग संसद के माध्यम से करती है और अपनी सम्प्रभुता को उसने अपने प्रतिनिधियों के हाथों में सशर्त दे रखा है जो संसद के माध्यम से उसके हितों में उसके लिए उपयोग करते है| भारतीय संविधान में पश्चिम आधारित व्यवस्था के उपरांत भी प्राचीन राज व्यवस्था और अध्यात्म आधारित राजनीति और समाज व्यवस्था को स्थान दिया गया है ” सत्यमेव जयते” और ” शुद्ध अन्तकरण ” व ” सत्यनिष्ठा ” से ली जानी वाली प्रतिज्ञा इस तथ्य को उजागर करती है कि संविधन निर्माता सारी व्यावाहरिक बाधाओं के बाद भी अपनी पारंपरिक व्यवस्था को बचाकर रखने की आवश्यकता के महत्व को समझते थे|
आज अनेक दशकों के बाद कहीं न कहीं राजनीतिक दलों में व्हिप और अनुशासन के नाम पर व्यक्ति के शुद्ध अन्तकरण के भाव को कोई मह्त्व नहीं दिया जाता और जो संप्रभुता वास्तव में जनता के हाथों में रहती है वह ऊपर तक आते आते अपने मायने बदल लेती है और जनादेश व जनता की संप्रभुता की व्याख्या पूरी तरह अलग हो जाती है|
आख़िर कुछ सोच कर ही ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, नगर पालिका, महानगरपालिका और राज्य विधानसभा , लोकसभा व राज्य सभा की सोच तथा कार्य अलग अलग सोचा गया होगा| इसी प्रकार एक मेयर और प्रधानमंत्री की सोच व उससे होने वाली अपेक्षा भी अलग ही सोची गयी होगी| अब इस बात पर अवश्य सोचना चाहिये कि कहीं देश में विकास के नाम पर पिछले अनेक वर्षों से बौद्धिक दिवालियापन को बढ़ावा देकर और मौलिक सोच से हमें दूर् कराने का सुनियोजित प्रयास तो नहीं हो रहा है , जहाँ देश की सर्वोच्च पंचायत और देश के प्रधानमंत्री से की जाने वाली अपेक्षायें वही रह गयी हैं जो एक ग्राम प्रधान और सभासद से होती हैं और ये लोग इन्हीं की श्रेणी के अपने कार्य की उपलब्धियाँ प्रचारित कराते हैं |
यदि विकास के नाम पर जड़ता को बढ़ावा देना और संस्कृति को भूलने की विवशता को ही राजनीति का मूल उद्देश्य माना जा रहा है तो इसी लोकतांत्रिक परिधि में रहकर अपनी संस्कृति के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए सभी को मिलकर कुछ तो नया सोचना ही होगा|