राजनीतिक विरोध का गिरता स्तर

हास्यास्पद स्थिति है कि यदि नेहरू का विरोध करना ही है तो उनके मुकाबले विचार खड़ा कर होना चाहिये| उनके और उनके परिवार पर ओछे हमले करते हुए नहीं| नेहरू की नीतियां उनके समय के लिए कतई अनुचित नहीं थीं, इसी प्रकार 60 के दशक़ में इन्दिरा जी की समाजवादी नीतियों का भी समकालीन महत्व था| बहस इस पर होनी चाहिये कि 80 के दशक के बाद आए देश दुनिया के परिवर्तन में क्या भारत पीढ़ीगत बदलाव के संदर्भ में कोई नया विचार दे पाया तो उत्तर है नहीं क्योंकि वर्तमान समय में तीन दशक में कुछ परिवर्तन हुए हैं जिसने बदलावों की दिशा पूरी तरह बदल दी है|
सामाजिक परिवर्तन, समाज संचालन में धर्म का सस्थागत स्वरूप महत्वहीन होना और वैज्ञानिक व पदार्थवादी सोच का मुख्यधारा बनना,
तकनीक और आर्थिक नीतियों के परिवर्तन से शेष दुनिया से जुड़ने की मजबूरी, तेजी से परिवर्तित होते आमूलचूल व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहर के चलते पहचान खोने के भय से बढ़ती असुरक्षा और उससे उत्पन्न उत्तेजना और आक्रामकता|
इन सबका सामना वही कर सकता है जो अपना प्रिय से प्रिय कुछ मात्रा में छोड़ने और अप्रिय को कुछ मात्रा में ग्रहण करने का स्वभाव विकसित करेगा| दुनिया बड़ी हो गयी है, जागरूकता ने सभी व्यक्तियों और वर्गों में अपेक्षा बड़ा दी है और अपना प्रभाव व स्थान समाज में कम न हो जाए इसका भय सभी को संकीर्ण कर रहा है पर अब किसी एक व्यक्ति , वर्ग, समुदाय , विचार , देश की नहीं चल सकती| व्यक्तिगत् स्वतंत्रता और सामाजिक नियमन के मध्य संतुलन स्थापित जो कर सकेगा वही प्रासंगिक रह सकेगा|