संकीर्णता और विस्तार

सारा खेल विस्तार और संकीर्णता के मध्य का है| इस सृष्टि में सबसे छोटी और सबसे बड़ी इकाई मानव ही है| जब तक वह स्वयं को ख़ुद तक सीमित रखकर संकीर्ण सोच का होता है अपने से अलग कुछ भी अच्छा होता है तो उसे खीझ होती है , गुस्सा आता है, दूसरों से जलन करता है , लोगों की चुगली करने से लेकर अपने ही अपने अंदर कुढता रहता है और मजे की बात यह सब करते हुए उसे तनिक भी एहसास नहीं होता कि वह कुछ ग़लत कर रहा है|
इसके विपरीत जैसे जैसे स्वयं को केन्द्र में रखकर सोचता है पर सोच को अपने तक ही सीमित नहीं रखता और आस् पास के लोगों, परिवेश को भी अपना ही प्रतिबिंब मानने लगता है सब कुछ बदल जाता है| जिस मात्रा में यह विस्तार का भाव बढ़ता जाता है उसी मात्रा में आनंद और संतोष बढ़ता जाता है| यह कोई लिखी हुई बात नहीं है प्रत्यक्ष अनुभूति है जीवन में अपनाइये सुखद एहसास मिलेगा|

सारा खेल विस्तार और संकीर्णता के मध्य का है| इस सृष्टि में सबसे छोटी और सबसे बड़ी इकाई मानव ही है| जब तक वह स्वयं को ख़ुद तक सीमित रखकर संकीर्ण सोच का होता है अपने से अलग कुछ भी अच्छा होता है तो उसे खीझ होती है , गुस्सा आता है, दूसरों से जलन करता है , लोगों की चुगली करने से लेकर अपने ही अपने अंदर कुढता रहता है और मजे की बात यह सब करते हुए उसे तनिक भी एहसास नहीं होता कि वह कुछ ग़लत कर रहा है|
इसके विपरीत जैसे जैसे स्वयं को केन्द्र में रखकर सोचता है पर सोच को अपने तक ही सीमित नहीं रखता और आस् पास के लोगों, परिवेश को भी अपना ही प्रतिबिंब मानने लगता है सब कुछ बदल जाता है| जिस मात्रा में यह विस्तार का भाव बढ़ता जाता है उसी मात्रा में आनंद और संतोष बढ़ता जाता है| यह कोई लिखी हुई बात नहीं है प्रत्यक्ष अनुभूति है जीवन में अपनाइये सुखद एहसास मिलेगा|

सारा खेल विस्तार और संकीर्णता के मध्य का है| इस सृष्टि में सबसे छोटी और सबसे बड़ी इकाई मानव ही है| जब तक वह स्वयं को ख़ुद तक सीमित रखकर संकीर्ण सोच का होता है अपने से अलग कुछ भी अच्छा होता है तो उसे खीझ होती है , गुस्सा आता है, दूसरों से जलन करता है , लोगों की चुगली करने से लेकर अपने ही अपने अंदर कुढता रहता है और मजे की बात यह सब करते हुए उसे तनिक भी एहसास नहीं होता कि वह कुछ ग़लत कर रहा है|
इसके विपरीत जैसे जैसे स्वयं को केन्द्र में रखकर सोचता है पर सोच को अपने तक ही सीमित नहीं रखता और आस् पास के लोगों, परिवेश को भी अपना ही प्रतिबिंब मानने लगता है सब कुछ बदल जाता है| जिस मात्रा में यह विस्तार का भाव बढ़ता जाता है उसी मात्रा में आनंद और संतोष बढ़ता जाता है| यह कोई लिखी हुई बात नहीं है प्रत्यक्ष अनुभूति है जीवन में अपनाइये सुखद एहसास मिलेगा|