विकीलीक्स के प्रकाश में हमारी कूट्नीतिक स्थिति
अभी कुछ दिनों पूर्व ही विकीलीक्स ने एक बार फिर अमेरिका के अनेक गोपनीय दस्तावेजों और राजनयिकों के केबल संदेश को सार्वजनिक कर सनसनी मचा दी है। विकीलीक्स ने जिन विषयों को स्पर्श किया है वे काफी व्यापक हैं लेकिन जिन विषयों का सीधे सीधे भारत से सम्बन्ध है उनके प्रकाश में निश्चय ही भारत की कूटनीतिक स्थिति की समीक्षा की जा सकती है। विकीलीक्स से सम्बन्धित जो विषय भारत के लिये मह्त्व के हैं उनमें अधिकतर का सम्बन्ध 26 नवम्बर 2008 को भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण से है। विकीलीक्स से एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो गयी है कि इस आक्रमम के पश्चात जिस तरह से तत्कालीन भारत सरकार ने अपनी कूटनीतिक विजय की आत्मश्लाघा की थी वह देश को गुमराह करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। इस आक्रमण के पश्चात एक तरीके से ऐसा वातवरण बनाया गया कि सरकार के किसी कदम की आलोचना करना बलिदान देने वाले सैनिकों और सामान्य जनों के शवों पर राजनीति करने के समान मान लिया जाता था और उसी भावुकता का लाभ उठाकर तत्कालीन सरकार ने विश्व पटल पर भारत की छवि को क्या स्वरूप दिया यह तो आज विकीलीक्स के खुलासों से स्पष्ट है। Read more
कश्मीर समस्या के विविध आयाम
इन दिनों कश्मीर समस्या एक बार फिर पूरे विकराल् स्वरूप के साथ हमारे समक्ष उपस्थित है। आज कश्मीर समस्या का जो स्वरूप हमें दिखाई दे रहा है उसके अनेक ऐतिहासिक कारण हैं जिनकी चर्चा समय समय पर होती रहती है परंतु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज भी कश्मीर हमारे समक्ष इतिहास के अनसुलझे प्रश्न की तरह मुँह फैलाये खडा है।
कश्मीर समस्या निश्चित रूप से देश की स्वतंत्रता के बाद देश के नेतृत्व की उस मानसिकता का परिचायक ही है कि देश का नेतृत्त्व क़िस प्रकार उन शक्तियों के हाथ में चला गया जो न तो भारत को एक सांस्कृतिक और न ही आध्यात्मिक ईकाई मानते थे। वे तो भारत को एक भूखण्ड तक ही मानते थे जिसका सौदा विदेशी दबाव में या अपनी सुविधा के अनुसार किया जा सकता है। आज कश्मीर के सम्बन्ध में यह बात पूरी तरह समझने की है कि कश्मीर भारत की मूल पहचान और संस्कृति का अभिन्न अंग सह्स्त्रों वर्षों से रहा है। कश्मीर के सम्बन्ध में एक बडी भूल यही होती है कि हम इसे भारत का अभिन्न अंग मानते हुए भी इसे एक राजनीतिक ईकाई भर मान कर संतुष्ट हो जाते हैं जिसका इतिहास 194 से आरम्भ होता है। कश्मीर के प्रति भारत का भावनात्मक लगाव जब तक उसकी ऐतिहासिकता के साथ चर्चा मे नहीं लाया जाता तब तक इसका पक्ष अधूरा रहेगा। इसी पक्ष के अभाव के चलते इस समस्या को पूरी तरह राजनीतिक सन्दर्भ में देखा जाता है और भारत का एक वर्ग कहीं न कहीं जाने अनजाने इस सम्बन्ध में हीन भावना से ग्रस्त होता जा रहा है कि कश्मीर में स्वायत्तता या फिर स्वतंत्रता की माँग पर विचार किया जा सकता है। इस प्रकार कश्मीर समस्या का एक आयाम तो उसे उसके सांस्कृतिक सातत्य में न देखने की भूल है। Read more
देश की सेक्युलर राजनीति के पुनर्मूल्याँकन का समय ?
पिछले वर्ष देश में हुए आम चुनावों के बाद से सामान्य तौर पर एक नारा देश की सेक्युलर शक्तियाँ लगा रही हैं कि अब भारत बदल गया है और लोग विकास चाहते हैं और पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति से तंग आ चुके हैं। यह बाद कहते समय जो बात इन तत्वों के ध्यान में रहती है वह यह कि अब विश्व में वैश्वीकरण का युग है और विश्व में एक क्षेत्र को दूसरे से पूरी तरह अलग थलग नहीं रखा जा सकता। ऐसे में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है कि जो कुछ रुझान समस्त विश्व मे हमें देखने को मिल रहा है उस पृष्ठभूमि में ही यदि भारत की राजनीति को समझने का प्रयास किया जाये तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सम्मुख हमारे उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर हमें देना ही होगा। इन प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि सेक्युलर परिभाषा और राजनीति का स्वरूप क्या होना चाहिये? इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार यूपीए सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में और फिर अपने दूसरे कार्यकाल में अभी तक पूरी तरह पश्चिम की शक्तियों के प्रभाव में अपनी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति को क्रियांवित करने का प्रयास किया है ठीक उसके विपरीत आतंकवाद और इस्लाम व मुस्लिम जनता के साथ सम्बन्धों को परिभाषित करने में इस माड्ल को अपनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। Read more
मालेगाँव विस्फोट से मुंतज़र अल जैदी तक
आज प्रातः काल जब एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र उठाकर देखा तो उसमें ठीक एक वर्ष पूर्व मालेगाँव में हुए विस्फोट में मारी गयी एक मुस्लिम बालिका के बारे में बताया गया था कि किस प्रकार उसके सपने अधूरे रह गये। सहानुभूति के इस ढंग पर मैं यह नहीं कहूँगा कि यह समाचार पत्र पक्षपातपूर्ण है क्योंकि इसी समाचार पत्र ने मुम्बई में हुए अनेक विस्फोटों की भी ऐसी ही कहानियाँ प्रकाशित की थीं जिनमें मारे गये लोग हिन्दू थे। मालेगाँव विस्फोट के एक वर्ष पूरे होने पर साध्वी प्रज्ञा सहित 11 लोगों पर मुकदमा चल रहा है और नासिक के एक न्यायालय द्वारा इन आरोपियों पर मकोका हटाये जाने के निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय ने स्टे दे दिया है। फिलहाल महाराष्ट्र एटीएस काफी कुछ साक्ष्य प्राप्त करने का दावा कर रही है देखना है इस मामले में पूरी वास्तविकता कब तक सामने आती है।
बीते एक वर्ष में वैश्विक स्तर पर अनेक परिवर्तन देखने को मिले। एक वर्ष पूर्व इस्लामी आतंकवाद शब्द को लेकर समस्त विश्व के मुसलमान दबाव में आये तो उन्होंने दोतरफा रणनीति अपनाई। एक ओर तो अनेक इस्लामी संगठनों ने फतवे जारी किये और इस्लाम को शांति का धर्म घोषित किया तो दूसरी ओर इस्लामी आतंकवाद शब्द पर आपत्ति करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर समस्त विश्व में अभियान चलाया कि इस शब्द के प्रयोग को रोका जाये क्योंकि यह आतंकवाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश की नीतियों की प्रतिक्रिया है। स्वाभाविक रूप से इसके कुछ परिणाम भी दिखने लगे और भारत में मालेगाँव विस्फोट में कुछ मुस्लिम लोगों के मारे जाने में हिन्दुओं का हाथ होने से भारत में पिछले दो दशक से चल रहा इस्लामी आतंकवाद का बदला पूरा हो गया और यह सिद्ध हो गया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और सभी धर्मों के कुछ कट्टरपंथी अपने धर्म का गलत प्रयोग और व्याख्या कर रहे हैं। कम से कम सामान्य बौद्धिक वर्ग तो इसी निष्कर्ष पर पहुँच गया लगता है।
अमेरिका में इस वर्ष के आरम्भ में इस देश की जनता ने जार्ज बुश की नीतियों को अस्वीकार कर बराक हुसैन ओबामा को नया राष्ट्रपति चुन लिया। जिस देश ने 2003 में इराक में सद्दाम हुसैन को सत्ताच्युत करने के लिये सैनिक अभियान चलाया उसी देश के लोगों ने पाँच वर्ष बाद हुसैन मध्यनामधारी एक व्यक्ति को अपना सर्वोच्च कमांडर चुन लिया तो यह कुछ संकेत ही है। वैसे इस्लामवादी आजकल हर घटनाक्रम का समाधान कुरान से ढूँढ कर दिखा देते हैं। निश्चय ही इसका समाधान उनके पास है कि अब विश्व में काफी कुछ बदलने वाला है।
लेकिन जो बदलाव पिछले एक वर्ष में हुआ है उसकी ओर हमें अवश्य ध्यान देने की आवश्यकता है। पिछले वर्ष के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश जब इराक की अपनी अंतिम यात्रा पर थे तभी एक प्रेसकांफ्रेंस में स्थानीय टीवी चैनल के पत्रकार मुंतजर अल जैदी ने उनके ऊपर जूता फेंक दिया और उसके बाद उनकी गिरफ्तारी हुई लेकिन अब उन्हें छोड दिया गया है। मुंतजर अल जैदी ने जेल से छोडे जाने के बाद एक पत्र में अपने विचार व्यक्त किये जिसका सार संक्षेप यही है कि उनके देश पर एक विदेशी शासन को वे सहन नहीं कर सके, अपने देश के लोगों का खून बहता देख उन्हें सहन नहीं हुआ और उनका व्यवसाय पीछे रह गया और उनकी देशभक्ति उन पर हावी हो गयी।
भारत में भी कुछ पत्रकारों ने इसे अनूदित किया और उसे यहाँ वहाँ प्रकाशित किया। कुछ मुस्लिम पत्रकारों की इस विषय में रुचि अवश्य आश्चर्यचकित करती है कि एक इराकी व्यक्ति की देशभक्ति से इतना प्रभावित होने के पीछे क्या आशय है?
मुंतजर अल जैदी को जिस प्रकार समस्त विश्व में सहानुभूति मिली और देखते देखते जार्ज बुश को खलनायक बना दिया गया वह एक विशेष मानसिकता की ओर संकेत करता है जिसका शिकार समस्त विश्व पिछले अनेक दशकों से होता चला आ रहा है और वह मानसिकता है प्रताडित होने का प्रदर्शन करने की। आज समस्त विश्व में यह भाव देखा जाता है कि अपराधी, उग्रवादी, आतंकवादी स्वयं को तर्कों के सहारे न्यायसंगत सिद्ध करने का प्रयास करते हैं और समस्त मीडिया, मानवाधिकार संगठन, बौद्धिक वर्ग उनके प्रति सहानुभूति का भाव रखता है।
वास्तव में द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत युद्ध नीति में आया यह बडा परिवर्तन है। इससे पूर्व दो महायुद्धों में विजित पक्ष अपनी शक्ति, पराक्रम, क्र्रूरता का प्रदर्शन कर शत्रु पक्ष के ह्रदय में भय उत्पन्न करता था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पारम्परिक युद्ध का स्वरूप बदल गया और विशेष रूप से शीतयुद्ध के काल में शक्ति संतुलन का सिद्धांत विकसित हुआ जिसके चलते युद्ध का स्थान लोगों का मन होने लगा। मीडिया, पुस्तक, बौद्धिक वर्ग और छवि निर्माण के लिये प्रचार तंत्र के सहारे युद्ध जीता जाने लगा। शीत युद्ध के दौरान समस्त विश्व में रूस की खुफिया एजेंसी और अमेरिकी खुफिया एजेंसी के बीच इसी प्रकार का छवि निर्माण का दौर चला। शीत युद्ध काल में कम्युनिज्म के प्रभाव के चलते विश्व के अनेक क्षेत्रों में कम्युनिष्ट विचारधारा से प्रभावित लोगों ने प्रताडित होने के भाव को पूरे बौद्धिक जगत में एक सिद्धांत के रूप में स्थापित किया ताकि राज्य व्यवस्था को प्रताडित करने वाला बता कर क्रांति और उपद्रव को न्यायसंगत सिद्ध किया जा सके। इसी का परिणाम है कि कम्युनिष्ट आन्दोलन के लिये सहयोगी तत्वों को अत्यंत निरीह, शोषित और प्रताडित सिद्ध किया जाता रहा है और कम्युनिष्ट आन्दोलन के लिये हथियार उठाने वालों को न केवल महिमामंडित किया जाता है वरन उनके गिरफ्तार होने या मारे जाने पर प्रताडित होने का भाव वाला सिद्धांत आगे रखकर समस्त मीडिय़ा, बौद्धिक जगत, मानवाधिकार संगठन एकजुट होकर उनके प्रति सहानुभूति का वातावरण बनाने का प्रयास करने लगते हैं।
पूरे विश्व में वामपंथ और दक्षिणपंथ का विभाजन कर दिया गया है और मानवाधिकार, नारी अधिकार, पर्यावरण विषय, पशु प्रेम, अल्पसंख्यक अधिकार,सर्वहारा अधिकार, व्यवस्था परिवर्तन् सहित सभी विषय वामपंथ की झोली में डाल दिये गये हैं । इससे उदारवादी वामपन्थी जिनका कम्युनिष्टों से कोई वास्ता नहीं है जैसे यूरोप के वामपंथी वे भी इस वैश्विक बहस में अनजाने ही हिस्सा बन जाते हैं।
वर्तमान युग में छवि निर्माण और प्रताडित होने के भाव से सहानुभूति प्राप्त कर एक ऐसे अन्यायपूर्ण वातावरण का निर्माण हो गया है कि कुछ पक्षों को पूरी तरह निर्दोष और कुछ को नरभक्षी मान लिया गया है। आज कोई भी निर्णय न्याय के आधार पर करने के स्थान पर प्रचार तंत्र के प्रभाव में आकर भावुकता के वशीभूत होकर पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर किया जाता है।
समस्त विश्व में इस्लाम को निशाना बनाया जा रहा है। अमेरिका, पश्चिम और इजरायल उसे नष्ट करना चाहते हैं। भारत का मुसलमान अत्यंत गरीब और पिछडा है। आतंकवाद का किसी मजहब से कोई लेना देना नहीं वह तो गरीबी और बेबसी के शिकार लोग अपनी कुंठा में कर रहे हैं। अमेरिका और इजरायल जो कुछ फिलीस्तीनियों के साथ कर रहे हैं उसके बाद उनके विरुद्ध आतंकवाद न्यायसंगत है। ये कुछ इसी प्रकार के तर्क हैं जो बौद्धिक वर्ग और मीडिया के ह्र्दय में उतर चुके हैं।
वर्तमान युग में प्रचार तन्त्र का उपयोग किस प्रकार स्वयं को प्रताडित सिद्ध करने के लिये किया जाता है इसके कितने ही उदाहरण हमारे पास है। विश्व भर के इस्लामवादियों ने कहा कि इजरायल और अमेरिका की खुफिया एजेंसियों ने स्वयं ही 11 सितम्बर की घटना कर ली ताकि इस्लाम के विरुद्ध युद्ध किया जा सके और तेल के स्रोतों पर नियंत्रण किया जा सके। इसी प्रकार भारत में गोधरा में कारसेवकों को साबरमती रेलगाडी में जलाये जाने के बाद हुए दंगों के बाद स्वयं को प्रताडित सिद्द करने के लिये इस्लामवादियों और मुस्लिम पक्ष की ओर से तर्क आया कि रेल में आग तो अन्दर से लगी थी। फिर भारत में 2004 से लेकर लगातार हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमणों के बाद इनकी ओर से तर्क आया कि यह कार्य भी हिन्दू संगठनों का है। ऐसे ही न जाने कितने प्रचार विश्व भर में मुसलमानों के मध्य किये जाते हैं ताकि स्वयं को प्रताडित दिखाकर न केवल सहानुभूति प्राप्त की जाये वरन आतंकवाद को न्यायसंगत सिद्ध कर शेष समाज और सरकार पर दबाव डाला जाये कि हमारी प्रताडना और आर्थिक व सामाजिक अवनति का कारण आप लोग हैं इसलिये हमारे साथ विशेष व्यवहार हो और विशेषाधिकार दिया जाये। यदि यही तर्क है तब तो भारत में पिछडों और दलितों को मुस्लिम समाज से अपना अधिकार माँगना चाहिये कि 700 वर्षों तक उनके शासन में रहने के बाद भी उनका जीवन स्तर क्यों नहीं सुधरा?
मुंतजर अल जैदी के जूते के प्रति समस्त विश्व के बौद्धिक और मीडिया वर्ग ने जो सहानुभूति दिखाई उसने कभी सोचा कि इसका दूसरा पक्ष भी है। कोई भी सिद्धांत , देश या धर्म पूरी तरह निरपेक्ष सहानुभूति का पात्र कैसे हो सकता है और कोई भी सिद्धांत, देश , धर्म सतत निन्दा का पात्र कैसे हो सकता है। ये स्थितियाँ तो देश काल परिस्थितियों के सापेक्ष होती हैं। लेकिन समाज के बौद्धिक वर्ग और मीडिया के साथ यही हो रहा है। यदि मालेगाँव में विस्फोट करने वाले तर्क दें कि पिछले चार वर्षों से जिस प्रकार निर्दोष हिन्दुओं को निशाना बनाया गया और खुलेआम मीडिया में ईमेल के जरिये हिन्दू धर्म के विरुद्ध जेहाद की बात की गयी उससे हमारा मन बेचैन हो गया और हम सुध बुध खो बैठे और हमें लगा कि यदि अब सरकार कुछ नहीं कर सकती तो हिन्दुओं की रक्षा का दायित्व हमें अपने हाथों में लेना होगा। जरा कल्पना करिये कि बौद्धिक वर्ग और मीडिया की प्रतिक्रिया क्या होगी? लेकिन यदि इसी भाव से इराक का पत्रकार अमेरिका के सर्वोच्च सेनापति के ऊपर जूता फेंकता है तो उसे महिमामंडित किया जाता है। क्योंकि यह जूता अमेरिका पर फेंका गया है। मुंतजर अल जैदी के हाथ में उस समय केवल जूता था सो उसने फेंक दिया और जिसके हाथ में हथियार है वह जेहाद कर रहा है। अधिक तो छोडिये जरा कल्पना करिये कि भारत में कोई हिन्दू पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री पर जूता फेंक दे तो कितने पत्रकार उसे शाबासी देंगे।
प्रचार के इस युग में जिस प्रकार प्रताडित किये जाने का भाव निर्माण कर आतंकवाद का प्रच्छन्न युद्ध जीता जा रहा है उससे सावधान रहने की आवश्यकता है। मीडिया , सरकारें, मानवाधिकार संगठन सहित बौद्धिक समाज इसी ग्रंथि का शिकार है और सहज रूप में कभी माओवादी नेताओं, कभी संसद पर आक्रमण के लिये दोषी तो कभी मुम्बई में सैकडों निर्दोषों को जान लेने वाले के लिये मानवीय आधार पर सोचने लगते हैं। यही इस युद्द की सबसे बडी विजय है। इस तथ्य को हमें समझना होगा।
आज युद्ध के परम्परागत स्वरूप को भूलकर नये सन्दर्भ में इसे समझने की आवश्यकता है। आज इस्लामी आतंकवाद और माओवाद को पराजित करने में इसीलिये कठिनाई हो रही है क्योंकि फासिस्टों, कम्युनिष्टों और नाजियों की भाँति इसका संचालन एक देश नहीं कर रहा है किस उस पर आक्रमण कर आप इसे नष्ट कर सकते हैं। आज इस्लामवाद और जेहाद किसी ओसामा बिन लादेन या जवाहिरी तक सीमित नहीं है यह ब्लागों, समाचार पत्रों, कालेज कैम्पसों, चैट रूम, एसएमएस से लेकर सभी आधुनिक सूचना तकनीकों तक पहुँच चुका है। जो भी किसी न किसी प्रकार मुस्लिम उत्पीडन के सिद्धांत को पुष्ट करता है या इस्लामिक सर्वोच्चता के सिद्धांत को प्रचारित करने का प्रयास करता है वह जाने अनजाने इस्लामवादी आन्दोलन को सशक्त कर रहा है। यही तथ्य माओवाद के सम्बन्ध में भी सत्य है। जिस प्रकार कोबाद गाँधी और लालगढ में माओवादियों की गिरफ्तारी पर मीडिया ने इनके प्रति सहानुभूति का रवैया अपनाया है वह चिंता का विषय है। लेकिन इसका समाधान सरकारी सेंसरशिप भी नहीं है इसका समाधान यही है कि उन तटस्थ लोगों को इन आत्ंकवादी आन्दोलनों की इस बौद्धिक खुराक की वास्तविकता से परिचित कराया जाये ताकि सहानुभूति के प्रवाह में बहने से पहले यह जाँच लें कि न्यायपूर्ण क्या है?
आज वैश्वीकरण, अमेरिका, इजरायल और हिन्दुत्व का विरोध करना तो आम फैशन है क्योंकि आप बौद्धिक विरादरी में तभी स्थान पा सकते हैं जब आपमें ये योग्यतायें हों। लेकिन जो लोग अपने कम्प्यूटर पर बैठकर इन तत्वों की आलोचना करते हैं उसी का लाभ उठाकर ऐसा कर पा रहे हैं। वैश्वीकरण ने राष्ट्र, राज्य, सरकार और सेंसरशिप जैसी परिकल्पनाओं को कालबाह्य कर दिया है और व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता प्रदान की है। जिस वैश्वीकरण के विरोध में कम्युनिष्ट और समाजवादी लामबन्द होते हैं क्या वे स्वतंत्रता के इसी सिद्धांत का पालन करने देंगे?
अमेरिका और इजरायल ने मध्य पूर्व में इस्लामवादी आन्दोलन को संगठित होने से रोक रखा है जिससे भारत में लोग सुकून से बैठकर अर्थसाधना कर पा रहे हैं। क्योंकि तेल अवीव से नई दिल्ली तक केवल दो लोकतांत्रिक देश हैं भारत और इजरायल और यही तथ्य यह प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त है कि इस क्षेत्र में इजरायल न हो तो भारत की सुरक्षा पर क्या प्रभाव होगा?
भारत में इस बात को काफी प्रचारित किया गया है कि इस्लामी आतंकवाद के वैश्विक स्वरूप से भारत को कोई खतरा नहीं है क्योंकि यह अरब देशों में पश्चिम की इजरायल परस्त नीतियों और उनके देशों में पश्चिम सैनिकों की तैनाती की प्रतिक्रिया है। लेकिन वास्तविकता तो यह है कि मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया की इस्लामवादी शक्तियों के साथ भारत के मुस्लिम संगठनों की सहानुभूति का पुराना इतिहास है। अंग्रेजों के समय 1909 से खिलाफत की पुनर्स्थापना के लिये भारत में अल्लामा इकबाल ने जबर्दस्त आन्दोलन चलाया और अंग्रेजों के विरुद्ध तुर्क सेना के लिये हर प्रकार की सहायता की। शाह वलीउल्लाह ने तो अंग्रेजों के विरुद्ध ईरान के शाह और अफगानिस्तान के शासकों को भारत पर आक्रमण के लिये मनाने का प्रयास किया। जिन दिनों मिस्र में सैयद कुत्ब मुस्लिम ब्रदरहुड के द्वारा जिहादी इस्लामी आतंकवादी आन्दोलन की पृष्ठभूमि रख रहे थे उसी कालखण्ड में भारतीय उपमहाद्वीप में मौदूदी जमायते इस्लामी की नींव रख रहे थे।
यह बात सत्य है कि 700 वर्षों तक भारत में शासन करने के दौरान इस्लाम ने अपने स्वरूप में कुछ परिवर्तन किया था और सूफी इस्लाम ने उसमें आध्यात्मिकता का कुछ पुट भर दिया था और अनेक मुगल शासकों ने अपनी अनेक विवशताओं के चलते शरियत के साथ कुछ समझौते किये थे परंतु अंग्रेजों के हाथ में शासन जाने के बाद भारत में जो भी जिहादी आन्दोलन चला वह वैश्विक इस्लामी आन्दोलन से गहराई से जुडा था और इसका उद्देश्य खिलाफत संस्था की पुनर्स्थापना, भारत को पुनः इस्लामी राज्य बनाना और कुरान और शरियत के आधार पर शासन व्यवस्था स्थापित करना था। इसलिये भारत के सम्बन्ध में यह तर्क सत्य से पूरी तरह परे है कि मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया की इस्लामी राजनीति या आन्दोलन का भारत के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। आज की परिस्थितियों में सूचना के अबाध प्रवाह के चलते यह और भी सरल हो गया है कि मध्य पूर्व की राजनीति के साथ स्वयं को जोडे रखा जाये।
बराक ओबामा की उम्मीदवारी
अमेरिका में राष्ट्रपति पद के प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया लगभग पूर्ण हो चुकी है और यह तय हो गया है कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट की ओर से क्रमशः प्रत्याशी कौन होगा। रिपब्लिकन की ओर से जान मैक्केन का नाम काफी पहले ही घोषित हो गया था और डेमोक्रेट में काँटे की टक्कर चल रही थी कि बराक ओबामा और हिलेरी क्लिंटन के बीच कौन बाजी मार ले जाता है। अंततोगत्वा अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय के बराक ओबामा को डेमोक्रेट प्रत्याशी बनने में सफलता प्राप्त हुई। बराक ओबामा के प्रत्याशी बनने की सम्भावनाओं के मध्य ही अनेक कथायें सामने आ रही थीं। अब जबकि बराक ओबामा अमेरिका में अश्वेत होकर भी देश के सर्वोच्च पद के लिये चुनाव लड्ने जा रहे हैं तो इस रूझान के अनेक अंतरराष्ट्रीय मायने भी हैं। एक ओर इसे अमेरिका में ऐंग्लो सेक्शन समुदाय के वर्चस्व के समापन का आरम्भ तक भी मान कर चला जा रहा है तो वहीं इसे लेकर विश्व में अमेरिका पूँजीवादी प्रभुत्व के लिये भी एक चुनौती मानकर चला जा रहा है। भारत के लोगों की अमेरिका की राजनीति में प्रत्यक्ष कोई भूमिका नहीं है परंतु इस बार भारत में अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर जिज्ञासा काफी प्रबल है।
जब अमेरिका में दो प्रमुख दलों की ओर से प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया चल रही थी उसी समय से भारत में बराक ओबामा को लेकर काफी उत्साह का वातावरण था। अब जबकि यह निश्चित हो गया है कि ओबामा नवम्बर के चुनाव में रिपब्लिकन जान मैक्केन को टक्कर देंगे तो ओबामा के सम्बन्ध में दंतकथाओं का सिलसिला तेज हो गया है।
भारत मूल रूप से एक भावुक देश है और यहाँ के लोग कुछ सूचनाओं की गहराई में गये बिना सामने वाले के साथ स्वयं को भावना के स्तर पर जोड लेते हैं। ऐसा ही भारत में कुछ वर्गों के साथ ओबामा के सम्बन्ध में हो रहा है। भारत के समाचार पत्रों में जब यह समाचार आया कि ओबामा ने अपने पूरे अभियान में कुछ प्रतीक अपने साथ रखे और उसमें हनुमान जी का लाकेट भी था तो इसे भावुकता के साथ लिया गया। लेकिन क्या यह उचित है कि अमेरिका जैसे देश के राष्ट्रपति के चुनाव की समीक्षा अपने राष्ट्रीय हितों और अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य में करने के स्थान पर भावुकता के आधार पर की जाये। वैसे जहाँ तक ओबामा के अपने साथ हनुमान जी के लाकेट को रखने का प्रश्न है तो उन्होंने इसे अमेरिका की प्रसिद्ध पाप गायिका मैडोना के साथ रख रखा था। इस विषय पर जब मैंने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों से प्रश्न किया तो उन्होंने कहा कि इस विषय को भावना से जोडना कतई उचित नहीं होगा क्योंकि इसे ओबामा का हिन्दू धर्म के प्रति लगाव नहीं वरन पश्चिम में एंटीक पीस रखने के शौक से जोड्कर देखना चाहिये।
इसी प्रकार भारत के समाचार पत्रों में इस आशय के समाचार भी प्रकाशित हुए कि ओबामा के पूरे अभियान में महात्मा गान्धी उनके प्रेरणास्रोत रहे। यहाँ भी यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि पश्चिम में गान्धीजी को मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मण्डॆला जैसे अश्वेत उद्धारकों के साथ रंगभेद के विरुद्ध उनके अभियान के लिये खडा किया जाता है और इसके पीछे भी ओबामा के भारत के प्रति लगाव की भावना देखना जल्दबाजी होगी।
बराक ओबामा के प्रति एक भारतवासी का दृष्टिकोण क्या होना चाहिये। मेरी दृष्टि में विशुद्ध व्यावहारिक कि ओबामा के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से विश्व राजनीति किस दिशा में जायेगी और भारत का इस पर क्या प्रभाव होगा। इस कसौटी पर कसते समय एक ही विचार ध्यान में आता है कि अमेरिका इस समय युद्ध की स्थिति में है उस युद्ध के साथ चाहे अनचाहे सभी देशों का हित जुड गया है और भारत का हित तो विशेष रूप से। यह युद्ध है इस्लामवाद के विरुद्ध युद्ध।
11 सितम्बर 2001 को अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आक्रमण के बाद अमेरिका ने इस्लाम के नाम पर कट्टरपंथी रास्ता अपनाने वाली शक्तियों को अपने निशाने पर लिया और आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध को लेकर अमेरिका की नीति उचित रही अनुचित यह तो अलग चर्चा का विषय है पर इस युद्ध को लेकर आज विश्व में ऐसी स्थिति निर्मित हो चुकी है कि इस युद्ध में कोई भी तटस्थ नहीं रह सकता।
विशेषकर भारत अपनी विशेष परिस्थितियों के कारण तो बिलकुल भी तटस्थ नहीं रह सकता। इसलिये इस पृष्ठभूमि में बराक ओबामा का विश्लेषण करने की आवश्यकता है। बराक ओबामा ने विदेश नीति के सम्बन्ध में जो बातें कही हैं उनमें एक तो यह कि वे इराक से अमेरिकी सेनाओं को तत्काल वापस बुला लेंगे और दूसरा वे ईरान के राष्ट्रपति के साथ आमने सामने बैठकर बात करेंगे। इन दोनों ही बयानों से स्पष्ट है कि बुश की आक्रामक विदेश नीति को बदलना चाहते हैं। परंतु इन दोनों ही स्थितियों में कोई भी एकपक्षीय कदम घातक होगा। यदि आज इराक को इस स्थिति में छोड्कर अमेरिका चला जाता है तो वहाँ का प्रशासन किसी भी प्रकार इराक को सम्भाल पाने की स्थिति में नहीं होगा और पाकिस्तान और अफगानिस्तान की भाँति इराक भी अल कायदा और तालिबान का नया अड्डा बन जायेगा जो कि पाकिस्तान के कबायली क्षेत्रों में पहले से ही पुनः संगठित हो चुके अल कायदा को नया जीवन प्रदान करने जैसा होगा।
इसी प्रकार एक बडा प्रश्न ईरान का है जिस पर किसी का ध्यान अभी नहीं जा रहा है। जिस प्रकार ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने बार बार इजरायल को विश्व के मानचित्र से मिटाने या इसे समाप्त करने की बात दुहराई है वह अब लफ्फाजी के स्तर से आगे जाकर माथे पर चिंता की लकीरें डालने लगी है। जिन लोगों को अभी अहमदीनेजाद के बयानों का निहितार्थ समझ में नहीं आता उन्हें पूरे इस्लामवादी आन्दोलन का स्वरूप समझना चाहिये। इस्लामवादी आन्दोलन की मूल प्रेरणा और इस्लामवादी आतंकवाद का पूरा ताना बाना इजरायल- फिलीस्तीनी संघर्ष और मुस्लिम भूमि पर पश्चिमी देशों द्वारा थोपा गये यहूदी देश की अवधारणा के इर्द गिर्द बुना गया है। अहमदीनेजाद जो कि स्वयं एक कट्टरपंथी इस्लामवादी की श्रेणी में आते हैं और शिया परम्परा के अनुसार बारहवें पैगम्बर या महदी के अवतरण में विश्वास करते हुए स्वयं में कुछ चमत्कारिक शक्तियों का अंश देखकर एक विशिष्ट चिंतन पर चलते हैं इजरायल के विरुद्ध अपने बयानों के निहितार्थ समझने को विवश करते हैं।
अहमदीनेजाद ने पिछ्ले वर्ष अमेरिका के राष्ट्रपति को और फिर जर्मनी की चांसलर को एक खुला पत्र लिखकर अपने उद्देश्य स्पष्ट कर दिये थे कि वे अमेरिका विरोधी और पश्चिम विरोधी धरातल पर विश्व की अनेक शक्तियों को एकत्र करना चाहते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर द्वारा यहूदियों के व्यापक जनसन्हार को एक कपोलकल्पित और गलत इतिहास की संज्ञा देने के लिये ईरान में राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने इतिहासकारों का एक सम्मेलन बुलाया जो इतिहास के इस तथ्य को सत्य नहीं मानते। अहमदीनेजाद का मानना है कि इस कपोलकल्पित ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर यहूदियों ने पश्चिम को बन्धक बना रखा है और उसी का हवाला देकर विशेषाधिकार प्राप्त किये हैं। ईरान के राष्ट्रपति के ये प्रयास उनके इस्लामवादी आन्दोलन के नेता बनने की उनकी महत्वाकांक्षाओं की ओर संकेत तो करते ही हैं विश्व स्तर पर वामपंथ और इस्लामवाद के गठजोड की कडी बनते भी दिखते हैं। ऐसी परिस्थिति में बराक ओबामा का फिलीस्तीन के प्रति नरम रूख अपनाना विश्व स्तर पर इस्लामवाद प्रतिरोधी शक्तियों को कमजोर करेगा।
इसके अतिरिक्त कुछ और भी कारण है जिन्हें लेकर बराक ओबामा की उम्मीदवारी प्रश्न खडा करती है। बराक ओबामा निश्चित रूप से एक अच्छे वक्ता, लोकप्रिय नेता हैं पर एक प्रशासक के रूप में उनकी क्षमताओं पर सन्देह है। अनेक अवसरों पर बराक ओबामा ने दबाव में आकर अपनी स्थिति बदल दी या उस पर सफाई दे डाली। जैसे अमेरिका के जिस अश्वेत चर्च से वे जुडे थे उस शिकागो के ट्रिनीटी यूनाइटेड चर्च आफ क्राइस्ट के पास्टर जेर्मियाह राइट जूनियर के 11 सितम्बर 2001 के अमेरिका पर आक्रमण सम्बन्धी बयान कि यह अमेरिका के कर्मों का फल है, के बाद ओबामा ने वह चर्च छोड दिया। इसी प्रकार अमेरिका के यहूदियों के समक्ष भावुक भाषण देकर जब उन्होंने जेरुसलम को अविभाजित इजरायल की राजधानी रखने का वादा किया तो फिलीस्तीनी अथारिटी के मोहम्मद अब्बास की आपत्ति के बाद ओबामा यहूदियों के समक्ष कही गयी अपनी बात से मुकर गये। यह ओबामा के कमजोर होने का प्रमाण है।
बराक ओबामा के सम्बन्ध में एक और बात ध्यान देने योग्य है कि उन्होंने भारत के साथ अमेरिका के परमाणु समझौते के सम्बन्ध में सीनेट में जो संसोधन का प्रस्ताव रखा था उसके अनुसार भारत को कोई भी विशेषाधिकार न दिया जाये और भारत को 123 समझौते की परिधि में लाने के लिये उससे सीटीबीटी पर हस्ताक्षर के लिये कहा जाये। अब यदि बराक ओबामा का प्रशासन कार्यभार सम्भालता है तो भारत के ऊपर सीटीबीटी पर हस्ताक्षर और विशेष सहूलियतों का दौर समाप्त हो जायेगा। इसी के साथ कश्मीर के विषय में भी ओबामा की राय जो है उससे पाकिस्तानी प्रोपेगैण्डा के आधार पर कश्मीर विश्व के विभिन्न कूट्नीतिक मंचों पर फिर से प्रमुख विषय बन सकता है क्योंकि बराक ओबामा की राय में अल-कायदा के विरुद्ध पाकिस्तान का सहयोग प्राप्त करने के लिये आवश्यक है कि पाकिस्तान का ध्यान कश्मीर के मामले में न बँटे। ओबामा के इस रूख से कश्मीर में आतंकवादी संगठनों को नया जीवन मिल सकता है और वैश्विक जिहाद को नया आयाम। आज इस विषय पर बहुत ध्यान पूर्वक सोचने की आवश्यकता है कि बराक ओबामा जहाँ एक ओर अमेरिका में आप्रवासियों के लिये सम्भावनायें जगाते हैं वहीं उनका अति वामपंथी और इस्लामवाद के प्रति अपेक्षाकृत नरम होना विश्व के वर्तमान परिदृश्य के लिये नकारात्मक विकास है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अन्ध अमेरिका विरोध के नाम पर कहीं उन शक्तियों के प्रति सहानुभूति न दिखाने लगें जो हमारी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिये गम्भीर खतरा हैं। आर्थिक नीतियों के आधार पर या वैश्व्वीकरण के नाम पर अमेरिका विरोध के नाम पर वामपंथी-इस्लामवादी धुरी का अंग बनने से भी हमें अपने आप को रोकना होगा।

