इस्लामी आतंकवाद से जूझता एक बौद्धिक योद्धा
वर्तमान विश्व में जब हम समस्याओं की बात करते हैं तो सर्वाधिक ध्यान जिस समस्या कि ओर जाता है वह समस्या है आतंकवाद की। वैसे तो इस विश्व में अनेक प्रकार के आतंकवाद हैं परंतु जिस आतंकवाद ने सभी देशों और सभ्यताओं को संकत में डाल रखा हैं वह आतंकवाद है इस्लामी आतंकवाद और इस आतंकवाद ने सभी देशों को अपनी नीतियों में इस प्रकार संशोधन के लिये विवश कर दिया कि इस्लामी आतंकवाद सभी देशों के लिये पहली प्राथमिकता बन गया है। पिछ्ले दिनों दिल्ली में भारत के एक प्रमुख हिन्दी दैनिक समचार पत्र समूह की ओर से एशिया में उपस्थित अनेक समस्याओं को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह गोष्ठी अंतरराष्ट्रीय इस सन्दर्भ में थी कि इसमें भाग लेने वाले अनेक वक्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर के थे। इस संगोष्ठी में अनेक विषयों के अतिरिक्त धार्मिक आतंकवाद और उससे निपटने के उपायों पर भी चर्चा होनी थी। इस विषय पर लोगों का मार्गदर्शन करने के लिये विशेष रूप से अमेरिका स्थित मिडिल ईस्ट फोरम के निदेशक डा. डैनियल पाइप्स को बुलाया गया था। डा. पाइप्स न केवल अमेरिका में वरन समस्त विश्व में मध्य पूर्व की राजनीति और इस्लामी राजनीति के जानकार माने जाते हैं। डा. पाइप्स की यह कोई पहली भारत यात्रा नही थी इससे पूर्व वे चार बार भारत आ चुके हैं। इस बार उनकी यात्रा का मह्त्व इस सन्दर्भ में अधिक था कि इससे पूर्व जब भी वे भारत आये विश्व में इस्लामी राजनीति और इस्लामी आतंकवाद उस चरमोत्कर्ष पर नहीं था जहाँ आज वह है।
पाइप्स इस्लामी राजनीति और इस्लामवाद पर पिछ्ले 28 वर्षों से लिख रहे हैं और 1970 के दशक में ईरान में हुई इस्लामी क्रांति के बाद से ही इस्लाम में बढ. रहे कट्टरपंथ की ओर समस्त विश्व और विशेषकर पश्चिम का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। 1980 के दशक से ही पाइप्स अपने लेखों का केन्द्र कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों को बनाते रहे हैं उन्होंने न केवल इस्लामी अतिवाद की बढती प्रव्रत्ति की ओर संकेत किया वरन् प्रत्येक घटना का बारीकी से अध्ययन कर उसमें छुपी जेहादी प्रव्रत्ति को ढूँढ निकाला। हालांकि उनके लेखों को इस्लामीफोबिक कह कर हवा में उडा दिया गया परंतु जब 11 सितम्बर 2001 को वर्ल्ड ट्रएड सेंटर पर आतंकवादी आक्रमण हुआ तो अमेरिका के अनेक अग्रणी समाचार पत्रों ने अपने विश्लेषण में कहा कि यदि डा. डैनियल पाइप्स की बातों को ध्यान से सुना गया होता तो इस आक्रमण को टाला जा सकता था। 11 सितम्बर की घटना के उपरांत डा. पाइप्स को समस्त विश्व में इस्लामी राजनीति के विशेषज्ञ के रूप में लिया जाने लगा और उनकी ओर विश्व एक आशाभरी निगाहों से देखने लगा कि उनके पास इस समस्या का कोई इलाज होगा। इसी क्रम में जब वे इस बार भारत आये तो उनसे मिलने की उत्सुकता भी थी।
हिन्दी समाचार पत्र समूह द्वारा आयोजित कार्यक्रम 16 जनवरी को था और डैनियल पाइप्स 15 जनवरी को भारत आ गये थे। लोकमंच को इसकी सूचना थी और इसी कारण लोकमंच के सम्पादक अमिताभ त्रिपाठी और कर्यकारी सम्पादक शशि कुमार सिंह दो अन्य सदस्यों रघुनाथ शरण पाठक और मनीष के साथ डा. पाइप्स से मिलने दिल्ली स्थित ताज पैलेस होटल पहुँचे जहाँ डा. पाइप्स ठहरे थे। करीब 45 मिनट की इस भेंट में अनेक विषयों पर चर्चा हुई। सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय यह रहा कि उन्होंने जब इस्लाम की राजनीति की चर्चा समस्त विश्व के सन्दर्भ में की तो उनके मूल में वही विषय सामने आये जो भारत में हैं अर्थात समस्या की ओर से आंख मूँदकर मुस्लिम तुष्टीकरण में लिप्त हो जाना। यह जानकर अत्यंत आश्चर्य हुआ कि समस्त विश्व में इस्लामी राजनीति एक ही परिपाटी पर चल रही है और इस्लामी आतंकवाद से निपटने के सम्बन्ध में भी एक ही जैसा प्रयास है। डा. पाइप्स ने जब पश्चिम के नजरिये के सम्बन्ध में बात की तो ऐसा लगा मानों वे हमारे देश की बात कर रहे हों। उन्होंने बताया कि पश्चिम में भी इस्लामी अतिवाद का कारण वामपंथियों कि नजर में इस्लाम के साथ हुआ अन्याय है और इसके समाधान के रूप में मुसलमानों को अधिक से अधिक विशेषाधिकार दिये जाने की आवश्यकता है। पश्चिम के देशों में भी मुसलमान शरियत के आधार पर संचालित होते हैं और अधिक से अधिक बच्चे पैदाकर भूजनांकिकी का संतुलन बिगाड.रहे हैं।
डा. पाइप्स केवल समस्याओं का ही उल्लेख नहीं करते वरन समाधान भी सुझाते हैं। डा. पाइप्स का मानना है कि समस्या समस्त इस्लाम धर्म नहीं है वरन इस्लाम धर्म का राजनीतिक उपयोग है। उनके अनुसार जब तक इस्लाम 1200 वर्षों तक विजय पथ पर अग्रसर होता रहा तब तक उसके अनुयायी प्रसन्न रहे परंतु जब यूरोप ने तरक्की कर ली और इस्लाम पीछे रह गया और उसे पता लगा कि वह पीछे रह गया है तो उसमें कट्टरता का समावेश हो गया और जब भी इस्लाम पिछ्ड.ता है तो उसमें जेहादी तत्वों का प्राधान्य हो जाता है। डा. पाइप्स के अनुसार विश्व में कुल मिलाकर तीन खतरनाक विचारधारायें हैं वामपंथी, फासिस्ट और इस्लामवादी। इन तीनों ही विचारधाराओं के मुकाबले के लिये सभ्य विश्व को पहल करनी होगी। डा. पाइप्स के विचारों में सर्वाधिक संतोष प्रदान करने वाला जो तथ्य है वह यह है कि जब वे सभ्य विश्व की बात करते हैं तो उनमें बीसवीं शताब्दी की पश्चिम की सभ्य विश्व की अवधारणा नहीं है जिसमें सभ्य का अर्थ केवल ईसाई देशों से था। डा. पाइप्स जब सभ्य विश्व की बात करते हैं तो उनकी नजर में भारत की भी एक भूमिका है।
डा. पाइप्स इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि नरमपंथी इस्लाम के विकास की सम्भावनायें हैं और उसी नेतृत्व के विकास पर जोर दिया जाना चाहिये। उनके अनुसार इस्लामी आतंकवाद ने सर्वाधिक नुकसान मुसलमानों को ही पहुँचाया है. इस कारण एक बार नरमपंथी इस्लाम के विकास की प्रक्रिया आरम्भ हुई तो इसमें मुसलमानों का भी सहयोग मिलेगा।डा. पाइप्स पिछ्ले कुछ वर्षों से अपने लेखों का अनुवाद विश्व की विभिन्न भाषाओं में करा रहे हैं और इसी क्रम में उनके कार्य का हिन्दी अनुवाद भी हो रहा है और यह कार्य लोकमंच के द्वारा किया जा रहा है। डा. डैनियल पाइप्स लोकमंच के सलाह्कार भी हैं। उन्होंने लोकमंच के प्रतिनिधियों से भेंट में लोकमंच का हर प्रकार से हरसम्भव सहयोग का आश्वाशन दिया है। डा. पाइप्स ने लोकमन्च के प्रतिनिधियों के साथ भेंट में भारत के सम्बन्ध में विभिन्न जानकारियों में विशेष रुचि दिखायी और माना कि विश्व के इस भाग के सम्बन्ध में उनका ज्ञान अल्प है, परंतु यह अवश्य कहा कि अब वे जल्दी जल्दी भारत की यात्रा करेंगे और अपना सन्देश आम जनता तक ले जाने का प्रयास करेंगे।
बुश पर बढ़ता दबाव
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन द्वारा जार्ज बुश प्रशासन पर कुख्यात आतंकवादी सरगना ओसामा बिन लादेन को पकड़ने के लिये पर्याप्त प्रयास न करने के आरोप के साथ ही अमेरिका में आतंकवाद के मुद्दे पर बुश की कठिनाइयाँ बढ़ती ही जा रही हैं. अमेरिकी काँग्रेस के समक्ष खुफिया एजेन्सी द्वारा आतंकवादियों की पूछताछ के लिये कुछ गोपनीय जेलों की बात स्वीकार करने के बाद बुश को अपने ही दल में पहली बार स्पष्ट ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है. पूर्व विदेश मन्त्री कोलिन पावेल के नेतृत्व में तीन प्रमुख सीनेटरों ने जार्ज बुश द्वारा प्रस्तावित उस कानून का स्पष्ट विरोध किया है जिसमें युद्धबन्दियों के साथ होने वाले व्यवहार को निर्धारित करने वाले मानक जिनेवा अन्तरराष्ट्रीय सन्धि की धारा 3 में संशोधन कर आतंकवादियों के साथ पूछताछ के विशेष प्रावधान बनाने का सुझाव दिया गया है. इस संशोधन पर रिपब्लिकन सीनेटरों की आपत्ति यह है कि इस संशोधन से अमेरिका के संविधान की मूलभूत आत्मा पर चोट पहुँचेगी और मानवाधिकार तथा व्यक्ति की स्वतन्त्रता के उसके नैतिक सिद्धान्त पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.
वहीं इस संशोधन के पैरोकारों का अपना तर्क है उनके अनुसार जिनेवा सन्धि में युद्ध की स्थिति के अनुसार नियम बनाये गये हैं जब शत्रु युद्ध सम्बन्धी अन्तरराष्ट्रीय नियमों का पालन करता है अब बदली परिस्थितियों में जब आतंकवादी ऐसे किसी अन्तरराष्ट्रीय नियम का अनुपालन नहीं करते तो उन्हें जिनेवा सन्धि की छूट नहीं मिलनी चाहिये और उनके साथ विशेष असाधारण व्यवहार होना चाहिये.
यह कोई पहला अवसर नहीं है जब बुश की आतंकवाद सम्बन्धी नीति पर परस्पर विरोधी विचार सामने आये है. इससे पूर्व कुछ माह पहले अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने क्यूबा में ग्वान्टेनामो बे में आतंकवादियों की पूछताछ के लिये स्थापित की गई विशेष जेलों को समाप्त करने का आदेश दिया था. अमेरिका के संविधान में सर्वोच्च न्यायालय की नैतिक सर्वोच्चता के चलते इस निर्णय को भी बुश की नीतियों के लिये एक बड़ा झटका माना गया था. हालांकि अमेरिका के राष्ट्रपति को वीटो अधिकार से कोई भी कानून अन्तिम रूप में पारित कराने के विशेषाधिकार के चलते सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय बुश के लिये कानूनी रूप से भले ही विवशता न बना हो परन्तु उनकी स्थिति को कमजोर करने के लिये पर्याप्त था. इन घटनाक्रमों के बीच यह समझना अत्यन्त आवश्यक है कि आखिर बुश पर बढ़ते दबाव के पीछे उनकी कौन सी नीतियाँ दोषी हैं.
11 सितम्बर 2001 को न्यूयार्क पर हुये आतंकवादी हमले के बाद समस्त विश्व ने एकजुट होकर न केवल इस घटना की निन्दा की वरन् अमेरिका के राष्ट्रपति के आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध के आह्वान को सहर्ष स्वीकार भी किया. इस घटना के दोषियों को खोज निकालने के लिये अमेरिका ने अफगानिस्तान की तालिबान सरकार पर हमला किया और तालिबान का प्रभाव इस क्षेत्र में समाप्त कर दिया. परन्तु आज पाँच वर्षों के उपरान्त अफगानिस्तान में तालिबान फिर जोर मारने लगा है. इसी बीच 2003 में ईराक पर हुये आक्रमण को न्यायसंगत ठहराने में बुश की असफलता और अमेरिकी सैनिकों की मृत्यु सहित दिनोंदिन वहाँ की बिगड़ती स्थिति ने आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध की धारणा पर प्रश्न खड़े कर दिये हैं.
वास्तव में इन दोनों युद्धों के पश्चात इन क्षेत्रों में उपजी अराजकता को समझने के लिये हमें अमेरिका की पूरी नीति को समझना होगा. इन दोनों ही युद्धों की पूरी रणनीति अमेरिकी रक्षामन्त्री डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने बनाई जिन्होंने अमेरिका की हवाई क्षमता पर पूरा भरोसा रखते हुये जमीन पर लड़ाई को अधिक प्राथमिकता नहीं दी जिसका परिणाम कई बार गलत लोगों को निशाना बनाने के रूप में सामने आया . जैसे 2003 में ईराक के फालुजा शहर में हुई बमबारी में मारे गये निर्दोष ईराकियों ने पूरी दुनिया में आतंकवादियों और उनके समर्थकों को मुस्लिमों पर अत्याचार के सिद्धान्त को विश्वव्यापी रूप से मनमाना और मनगढ़न्त स्वरूप देने का अवसर मिल गया. ऐसे आक्रमणों के कारण देश के असन्तुष्ट गुट भी खुलकर अमेरिका का साथ देने की स्थिति में नहीं रहे. इसके साथ ही रम्सफेल्ड की रणनीति में आक्रमण किये गये देश के असन्तुष्ट वर्ग को देश पर विजय प्राप्त करने के बाद साथ लिया गया. इससे इन देशों में आशंका व्याप्त हुई कि अमेरिका लोकतन्त्र की स्थापना के स्थान पर इन क्षेत्रों में अपना कठपुतली शासन स्थापित करना चाहता है.
बुश की रिपब्लिकन पार्टी मूल रूप से नव परम्परावादियों या निवो कन्जर्वेटिव विचारधारा पर अवलम्बित है जिसका मूल उद्देश्य मध्य पूर्व में इजरायल विरोधी शक्तियों को कमजोर करते हुये वहाँ के तेल संसाधनों पर नियन्त्रण स्थापित रखना ताकि ये देश तेल कूटनीति को अमेरिका के विरूद्ध प्रयोग न कर सकें. इसके साथ ही आतंकवाद पर कड़े कदम उठाते हुये इस्लामी देशों को लोकतान्त्रिक बनाने की प्रक्रिया तीव्र करते हुये पूरी दुनिया में परमाणु अप्रसार और जनसंहारक हथियारों के अप्रसार से अमेरिका को भय रखना भी इस विचारधारा का मुख्य ध्येय है. यही कारण है कि मध्य पूर्व में इजरायल के अस्तित्व के लिये खतरा बनने वाला देश सीधे अमेरिका के निशाने पर आता है. परन्तु इस विचारधारा के क्रियान्वयन को लेकर नव-परम्परावादी एकमत नहीं हैं.
अफगानिस्तान और ईराक दोनों ही देशों में तालिबान और सद्दाम के शासन के पतन के पश्चात जिस प्रकार इन देशों की व्यवस्था को सम्भालने का कार्य यहाँ की स्थानीय शक्तियों को न देकर अमेरिका की सेना के अधीन ही रखा गया उसमें लोगों को अमेरिका अमेरिका की नीयत में खोट दिखने लगा.
कुछ वर्ष पूर्व प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक सैमुअल हटिंगटन ने “Who are we: The challenges to America’s national identity “पुस्तक के माध्यम से अमेरिका को अपनी पहचान बनाये रखने के लिये साम्राज्यवादी रास्ता अपनाते हुये अपनी सेना और आर्थिक सत्ता के सहारे समस्त विश्व को अमेरिका बनाने का सुझाव दिया था तो नवपरम्परावादी लेखक डैनियल पाइप्स ने इसे अव्यावहारिक बताते हुये कहा था कि अमेरिकी जनता साम्राज्यवादी विस्तार के लिये अपना धन और अर्थ बहाने को कतई तैयार नहीं है. वास्तव में ईराक की विजय के बाद ईराक को अमेरिका की महत्वाकांक्षाओं और भावी योजनाओं की प्रयोगशाला के रूप में प्रयोग किया, जहाँ आधुनिक सन्दर्भों में वैचारिक ईमानदारी के अभाव में बुश को मुँह की खानी पड़ी . आज आतंकवाद पर बुश की रणनीति हो या अफगानिस्तान और ईराक में विजय के पश्चात आतंकवादियों की फिर से बढ़ती सक्रियता हो सभी मामलों में वे अपने देश सहित समस्त विश्व समुदाय को अपनी रणनीति की सार्थकता समझा पाने में काफी हद तक असफल रहे हैं, फिर भी इससे यह अर्थ लगाना काफी जल्दबाजी होगी कि इससे बुश कमजोर पड़ जायेंगे या अमेरिका की नीति में कोई विशेष अन्तर आ जायेगा.
अमेरिका में प्रस्तावित नवम्बर माह के मध्यावधि आम चुनावों से पूर्व डेमोक्रेट और रिपब्लिकन के मध्य इसी प्रकार आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलेगा और बुश पर दबाव और बढ़ेगा.

