दिल्ली में मदरसे कहीं बन न जायें सिरदर्द
सच्चर कमेटी की सिफारिशों को क्रियांवित करने के लिये केन्द्र सरकार समान अवसर आयोग का गठन करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है जो पूरी तरह अल्पसंख्यक मंत्रालय के अधीन होगा और इस आयोग के द्वारा सभी क्षेत्रों में राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायायिक सहित पुलिस बलॉं तक में मुस्लिम आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया जायेगा। सरकार की दृष्टि में मुस्लिम समाज का कम प्रतिनिधित्व देश के सेक्युलर ढाँचे के साथ मेल नहीं खाता इसलिये अब इस समस्या का साम्प्रदायिक हल ढूँढा जा रहा है। लेकिन इस आयोग के आने से पहले ही देश के प्रशासन में यह भावना घर करती जा रही है कि मुस्लिम समस्या से अब आँख मूँद लेनी चाहिये।
अमेरिका पर 11 सितम्बर 2001 को हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के उपरांत अमेरिका सहित समस्त विश्व इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि परम्परागत इस्लामी शिक्षा व्यवस्था और मदरसों में सुधार की आवश्यकता है क्योंकि मदरसों में जिस प्रकार क़ुरान और शरियत की शिक्षा दी जाती है वह मदरसे के छात्रों को बडी आसानी से इस्लाम के नाम पर आत्ंकवाद की ओर मोड देती है। यहाँ तक कि इस्लामी आतंकवाद के एक बडे स्रोत पाकिस्तान ने भी स्वीकार किया कि मदरसों की शिक्षा ही उनके यहाँ इस्लामी आतंकवाद का मूल कारण है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्र्रफ ने इस सम्बन्ध में अनेक कदम उठाये और मदरसों पर सरकार का नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। भारत सरकार के नये शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल ने भी केन्द्रीय मदरसा बोर्ड स्थापित करने का प्रयास किया लेकिन इस्लामी संगठनों के दबाव के आगे वे झुक गये।
देश में मदरसे जिस प्रकार की शिक्षा देते हैं वह तो किसी से छुपी नहीं है लेकिन मदरसे पर्सनल कानून की बात करके और अल्पसंख्यक राजनीति का लाभ लेकर देश के लिये एक बडा खतरा बनते जा रहे हैं। अभी हाल में दिल्ली में एक ऐसा ही मामला सामने आया है जिसमें धौला कुँआ स्थित एक मदरसे की शिकायत मसूद आलम नामक युवक ने पुलिस से करनी चाही तो उसकी एफ आई आर तक दर्ज नहीं की गयी। धौला कुँआ स्थित मदरसा तरतीलुल, कुरान मस्जिद कँगाल शाह का मसूद आलम कानूनी दृष्टि से प्रभारी है लेकिन उसका आरोप है कि उसे और उसकी पत्नी को छोड्कर परिवार के शेष लोग इस मदरसे में अनेक गैरकानूनी गतिविधियाँ चलाते हैं और उनमें से सर्वप्रमुख है कि मसूद आलम का भाई मेवात स्थिति अपने एक और मदरसे की आड में मेवात से गायें लाकर धौला कुँआ के मदरसे में रात के अँधेरे में काट्ते हैं और बकरे के माँस के साथ मिलाकर बाजार में बेचते हैं। साथ ही इस मदरसे में सोने की नकली ईंट और नकली गिन्नियों का धन्धा भी जोर शोर से चलाया जाता है। साथ ही अनेक सन्दिग्ध लोग रातों को बडे बडे बैग के साथ मदरसे में रुकते हैं।
मसूद आलम का आरोप है कि जब भी उसने इस चीजों का विरोध किया तो घर के अन्य लोगों ने उसे मारा पीटा और चुप करा दिया
मसूद आलम ने अपनी एफ आई आर जो अभी तक दर्ज नहीं हुई है उसमें कहा है कि उसने मदरसे से शिक्षा ग्रहण नहीं की है इस कारण उसकी सोच खुली और साफ है और इसी कारण वह स्वाभिमानी जीवन जीना चाहता है और हराम की कमाई नहीं खाना चाहता। मसूद आलम के अनुसार उसे धौला कुँआ स्थिति मदरसे के प्रभारी का प्रमाण पत्र दिल्ली वफ्फ बोर्ड ने दे दिया और वह कानूनी तौर पर इस मदरसे का प्रभारी हो गया और मदरसे में गैर कानूनी कार्यों का विरोध करने के कारण मसूद के पिता ने अपने दूसरे पुत्र महमूद को मदरसे की देखभाल के लिये बुला लिया और मसूद और उसकी पत्नी कानूनी रूप से मदरसे के प्रभारी होते हुए भी बाहर किराये के मकान में रहने लगे और कभी कभार मदरसे में आने लगे।
मसूद के पिता और भाई का आपराधिक इतिहास है और 12 जनवरी 2002 को आर के पुरम सेक्टर 12 में अवैध रूप से गाय चुराते हुए उन्हें रंगे हाथों पकडा गया और मामला दर्ज हुआ जो मुकदमा अब भी चल रहा है और यह मामला पटियाला कोर्ट में चल रहा है। मसूद के पिता ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों और पुलिस से पहचान बना रखी है और असामाजिक तत्वों के सहारे अपनी धाक जमा रखी है।
मसूद आलम का कहना है कि कानूनी रूप से मदरसे का प्रभारी होने के कारण पिछले माह की 7 तारीख को वह स्थाई रूप से अपने परिवार के साथ मदरसे में रहने लगा और रमजाने के दौरान 10 गायें लाकर काटी गयीं और मसूद आलम ने उसका विरोध किया तो उसे धमकी दी गयी। धीरे धीरे मसूद आलम का गाय काट्ने के मामले पर अपने पिता, भाई और उनके ग़ुट से झगडा बढ गया। मसूद ने अपनी बहन वहीदा के पति शफी खान पर आरोप लगाया है कि वह अश्लील सीडी का धन्धा करता है जिसका केन्द्र भी मदरसा ही है और विजय इंक्लेव में उनकी सीडी की दुकान है। 26 सितम्बर 2009 प्रातःकाल 9 बजे मसूद आलम की पिटाई होने लगी तो उसने 100 नम्बर पर पीसीआर वैन को फोन किया लेकिन कोई भी नहीं आया। स्थानीय थाने ने भी इसे रोज रोज का मामला बताकर प्रार्थना पत्र लेने से मना कर दिया। उसी शाम को चार बजे मसूद आलम के परिवार के अन्य लोग फिर दो गायें लेकर आये तो मसूद आलम ने विरोध किया तो उसे जवाब मिला कि स्थानीय पुलिस चौकी को इतना पैसा खिलाया है कि कोई तेरी सहायता के लिये आगे नहीं आयेगा। इसके बाद मसूद के ऊपर एक साथ हमला हुआ जिसमें उसे काफी चोटें आयी हैं। मसूद आलम ने अपने पिता हामिद रिवजर, भाई महमूद आलम, बहन वहीदा, उसके पति शजी खान, महमूद की बेटी हारूनी, चाचा हनीफ , नवाब उर्फ कसाई, छात्र अरशद और छात्र अहमद रजा के विरुद्ध एफ आई आर की है जो अभी तक दर्ज नहीं हुई है।
इस पूरे प्रकरण ने कुछ गम्भीर प्रश्न खडे किये हैं कि क्या पुलिस प्रशासन रिश्वत लेकर ऐसे मामले भी दबाने में जुट गया है जो न केवल साम्प्रदायिक रूप ले सकता है वरन देश की राजधानी की सुरक्षा के लिये भी खतरा बन सकता है। एक ओर इस्लामी आत्ंकवाद के नेट्वर्क को देखते हुए और दिन प्रतिदिन आत्ंकी घटनाओं की आशंकाओं के मध्य इस प्रकार मदरसों के खुले आम गैर कानूनी गतिविधियों में लिप्त होने पर पुलिस प्रशासन की लापरवाही आश्चर्यजनक है। आखिर मसूद आलम ने अपनी शिकायत में कहा है कि रात को उसने स्वयं संदिग्ध लोगों को बैग के साथ मदरसे में देखा है फिर भी पुलिस की चुप्पी सन्देह उत्पन्न करती है कि क्या पुलिस पर कोई दबाव है?
लाचार भारत या लाचार नेतृत्व ?
भारत के लिये कूटनीटिक समस्यायें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर के विषय को उठाने के बाद और इसे एक स्वतन्त्र देश का दर्जा देने की माँग उठाने के बाद विश्व के मुस्लिम देशों के संगठन आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कांफ्रेंस ने जम्मू कश्मीर के लिये विशेष राजदूत की नियुक्ति कर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की मुश्किलें और बढा दी हैं। ओआईसी के इस निर्णय का भारत की स्थिति पर दूरगामी प्रभाव पड्ने वाला है। इससे एक ओर तो पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले देश के रूप में विश्व भर में बन रही अपनी पहचान से लोगों का ध्यान हटाकर कश्मीर के विषय को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप का बना सकेगा और इसी के साथ कश्मीर में कार्यरत अलगाववादी संगठन नयी परिस्थितियों में कश्मीर के मुद्दे को पुनर्परिभाषित कर सकेंगे।
पिछले कुछ दिनों से भारत सरकार और कश्मीरी अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के मध्य नये सिरे से बातचीत के लिये प्रयास हो रहे हैं और अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि इस माह के अंतिम सप्ताह में इन दोनों पक्षों में बातचीत का दौर आरम्भ हो सकता है। कश्मीर के विषय पर भारत सरकार हुर्रियत के साथ जो बातचीत करना चाहती है उसके पीछे एक तो अमेरिका का दबाव काम कर रहा है तो वहीं पिछले दिनों पाकिस्तान की सरकार द्वारा गिलगित और बालटिस्तान के क्षेत्र को एक अध्यादेश द्वारा स्वायत्तता देने के बाद भी उसे प्रकारांतर से पाकिस्तान के अधीन कर लेने से भी स्थितियों में कुछ परिवर्तन आया है।
गिलगित और बालटिस्तान क्षेत्र जम्मू कश्मीर का अंग नहीं था वरन जम्मू कश्मीर का उत्तरी क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। भारत पाकिस्तान के विभाजन के उपरांत 1 नवम्बर 1948 को यह क्षेत्र् डोगरा राज्य से अलग हो गया और पाकिस्तान में विलय कर लिया परंतु पाकिस्तान ने इसे पाक अधिकृत कश्मीर का अंग नहीं बनाया और एक विशेष कानून के द्वारा इसे प्रशासित किया। इस पर लागू होने वाला कानून अंग्रेजों के समय का ही कानून था जिसने अंतर्गत इस क्षेत्र के लोगों को किसी भी प्रकार की प्रशासनिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं दी गयी और ये लोग लगभग मार्शल ला की स्थिति में जीने को विवश रहे। पाक अधिकृत कश्मीर ने से अपने क्षेत्र का अंग बनाने से मना कर दिया क्योंकि इसके निवासी शिया और इस्मायली थे और पाक अधिकृत कश्मीर के शासकों का आशंका थी कि इस क्षेत्र के आने से उनका सुन्नी प्रभाव क्षीण हो जायेगा।
1980 के दशक में इस क्षेत्र में जनरल जिया उल हक ने शिया और इस्मायली लोगों का दमन कर यहाँ सुन्नी प्रभाव बढाने का प्रयास किया जिसके चलते इस क्षेत्र में भी शिया सुन्नी संघर्ष हुआ जिससे कि इस दशक में पूरा पाकिस्तान प्रभावित था और खुफिया एजेंसियों का तो कहना है कि जनरल जिया उल हक के विमान की दुर्घटना में इसी क्षेत्र के शिया तत्वों का हाथ था क्योंकि उस समय तक विमान के लिये तकनीकी और सेवाकर्मियों के लिये इसी क्षेत्र के शिया लोगों की भर्ती की जाती थी।
इस घटना के बाद से पाकिस्तान के शासक वर्ग ने गिलगित और बालटिस्तान में कडे कानून और सेंसरशिप के जरिये इस क्षेत्र में किसी राजनीतिक आन्दोलन या यहाँ की सूचनायें बाहर नहीं जाने देने का पूरा प्रयास किया। इसके साथ ही यह पहाडी क्षेत्र पाकिस्तान के लिये रणनीतिक दृष्टि से भी काफी लाभदायक था और कराकोरम पहाडी क्षेत्र इसी क्षेत्र में होने के कारण 1980 के दशक में पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान ने इसी पहाडी क्षेत्र का उपयोग कर चीन, ईरान और उत्तर कोरिया के साथ परमाणु तकनीक का आदान प्रदान किया। 1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत रूस के विरुद्ध पाकिस्तान का उपयोग करते हुए अमेरिका ने पाकिस्तान की परमाणु तस्करी की ओर से आंखें मूँदें रखीं और अमेरिकी कांग्रेस प्रति वर्ष उसे परमाणु के सम्बन्ध में चरित्र प्रमाण पत्र देती रही। इसी के साथ गिलगित और बाल्टिस्तान में जो दमन चक्र चलाया गया उस ओर से भी शेष विश्व ने आँख मूँद ली।
2001 में अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद बदली हुए परिस्थितियों में विशेषकर अब्दुल कदीर खान के परमाणु तस्करी के नेटवर्क के खुलासे के बाद इस्लामी आतंकवादियों के हाथ में परमाणु तकनीक चले जाने के भय से अमेरिका और इजरायल सहित पश्चिमी देशों के पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर नजर रखे जाने से कराकोरम पहाडी क्षेत्र का रणनीतिक मह्त्व बढ गया और साथ ही पिछले अनेक दशक से गिलगित और बालटिस्तान में राजनीतिक और व्यक्तिगत अधिकारों के लिये चल रहे संघर्ष को कुछ हद तक शांत करने के लिये पाकिस्तान ने अब इस क्षेत्र को स्वायत्तता देने का नाटक रचा है जबकि इस बहाने इस क्षेत्र को पाकिस्तान के नियंत्रण में ले लिया गया है। इस क्षेत्र को लेकर पाकिस्तान में अनेक मत हैं और अनेक बार पाक अधिकृत कश्मीर के न्यायालय और पाकिस्तान के न्यायालय में टकराव हो चुका है कि इस क्षेत्र को विवादित माना जाये या फिर पाक अधिकृत कश्मीर का अंग माना जाये। कुल मिलाकर वर्तमान स्थिति यह है कि इसे एक राजनीतिक मुद्दा मान लिया गया है। क्योंकि 1 नवम्बर 1948 को पाकिस्तान में विलय के समय भी पाकिस्तान ने इसे अपना अंग नहीं बनाया था और इसे विवादित क्षेत्र ही माना था जिसके भाग्य का फैसला भविष्य़ में कश्मीर की स्थिति पर निर्भर करेगा।
ऐसी परिस्थिति में एक तो यह क्षेत्र पूरी तरह स्वायत्त है और 15 अगस्त 1947 से पूर्व की स्थिति के अनुसार इस क्षेत्र पर पाकिस्तान का कोई अधिकार नहीं बनता है। लेकिन इस पूरे मामले में भारत सरकार की ओर से जो भी ढीली ढाली प्रतिक्रिया आयी है उससे तो यही लगता है कि देश की संसद ने 1994 में जो प्रस्ताव पारित किया था कि पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेंगे उसके प्रति अब सरकार गम्भीर नहीं है और पाक अधिकृत कश्मीर तो दूर एक अन्य विवादित क्षेत्र के पाकिस्तान का अंग बना लेने पर भी भारत सरकार ने मुखर होकर इसका विरोध नहीं किया।
कश्मीर के मुद्दे को छोडकर गिलगित और बालटिस्तान का पहाडी क्षेत्र और कराकोरम का क्षेत्र रणनीतिक स्थिति से अत्यंत संवेदनशील है ऐसे में चीन की इस क्षेत्र में बढती भूमिका को देखते हुए भी इस क्षेत्र पर पाकिस्तान की प्रशासनिक पकड निश्चित रूप से भारत के लिये चिंता का कारण होना चाहिये परंतु भारत सरकार ने इस विषय को जनता से बचाने का ही प्रयास अधिक किया और मीडिया ने भी इस विषय को अधिक मह्त्व देना उचित नहीं समझा।
1980 के दशक की भाँति एक बार फिर अफगानिस्तान में अमेरिका को पाकिस्तान की आवश्यकता है साथ ही उसके पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और बलूचिस्तान में स्थित अल कायदा और तालिबान के लडाकों और नेतृत्व को समाप्त करने के लिये भी वह पूरी तरह पाकिस्तान पर निर्भर है। अमेरिका की इस लाचारी का लाभ उठाकर पाकिस्तान उसे अपने हित में उसी प्रकार प्रयोग कर रहा है जैसे 1980 के दशक में किया था।
अमेरिका के राष्ट्रपति और उनका प्रशासन भी पाकिस्तान के इस तर्क से सहमत हुआ सा लगता है कि यदि भारत से लगी सीमा पर शांति रहे तो पाकिस्तान को आतंकवाद से लड्ने में अधिक सहायता होगी। इस तर्क के सहारे पाकिस्तान भारत पर कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का दबाव डाल रहा है और बडी चालाकी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे इस्लामिक राजनीति से जोड रहा है।
भारत सरकार ने एक बार फिर हुर्रियत कांफ्रेस के साथ बातचीत का जो निर्णय लिया है उसके सकारात्मक परिणाम मिलने की सम्भावना अत्यंत क्षीण है क्योंकि हुर्रियत कांफ्रेंस एक ओर तो पाकिस्तान के नेताओं के निकट सम्पर्क में है और ओआईसी जैसे संगठनों के साथ मिलकर कश्मीर के मुद्दे को वैश्विक इस्लामी राजनीतिक के साथ जोड रहा है और दूसरी ओर इसी आक्रामक कूट्नीति के सहारे भारत को बातचीत के लिये विवश कर रहा है। ऐसे में पिछले दो दशक से चल रहे इस्लामी आतंकवाद और अलगाववादी आन्दोलन को नया आयाम प्राप्त हो जायेगा और इन तत्वों को लगेगा कि आतंकवाद के बल पर सरकारों को कूटनीतिक मेज पर घसीटा जा सकता है।
11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद जिस प्रकार आतंकवाद की परिभाषा उभर कर आयी थी और विश्व समुदाय में आतंकवाद की पुरानी अवधारणा कि एक के लिये आतंकवादी दूसरे के लिये स्वतंत्रता का संघर्ष करने वाला है ध्वस्त हो गयी थी और कश्मीर से लेकर चेचन्या तक सभी को आत्ंकवादी ही माना जाने लगा था। यह स्थिति अब बदल रही है। जो लोग जार्ज बुश की पराजय और बराक ओबामा की विजय से नये विश्व का उदय देख रहे हैं उन्हें ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद कश्मीर की स्थिति में आये बदलाव की ओर भी ध्यान देना चाहिये।
कश्मीर में उमर अब्दुल्ला की सरकार के गठन के साथ ही जम्मू कश्मीर में एक विशेष प्रकार की राजनीति के दर्शन हमें हो रहे हैं। जम्मू कश्मीर में उमर अब्दुल्ला ने एक नरम अलगाववाद की नीति अपनाकर हुर्रियत कांफ्रेस और पीडीपी का राजनीतिक विस्तार समाप्त करने का प्रयास किया लेकिन इस सरकार के गठन के बाद से ही पीडीपी और हुर्रियत कांफ्रेंस ने किसी न किसी विषय को लेकर रोज कश्मीर की सडकों पर प्रदर्शन और हिंसा को आम कर दिया है ताकि विश्व समुदाय को यह सन्देश दिया जा सके कि कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन चरम पर है और इस क्षेत्र के लोग स्वतंत्रता चाहते हैं। इसी स्थिति के मध्य पाकिस्तान की ओर से सीमा पार घुसपैठ की घटनायें तेज हो गयी हैं और रोज सैन्य बलों के साथ पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों की मुठभेड के समाचार आते हैं लेकिन सामान्य जनता को इससे कोई फर्क नहीं पडता क्योंकि उन्हें अब इस क्षेत्र के प्रति कोई संवेदना नहीं रही और उन्हें पता है कि यहाँ रोज ऐसी घटनायें होती रहती हैं। देश के लोगों की यही संवेदनहीनता भारत सरकार को कश्मीर के मामले पर ढुलमुल् रवैया अपनाने का साहस प्रदान करती है।
पिछले अनेक अवसरों पर हम देख चुके हैं कि हुर्रियत और सरकार के मध्य बातचीत का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता है सिवाय इसके कि हुर्रियत जैसे पाकिस्तान परस्त अलगाववादी संगठन को मान्यता देकर भारत सरकार प्रकारांतर से पाकिस्तान को भी कश्मीर की समस्या का अंग बना लेती है। कुछ लोगों का तर्क है कि यदि बातचीत नहीं तो इस समस्या का निदान क्या है? निश्चित रूप से बातचीत होनी चाहिये लेकिन देश को यह तो पता होना चाहिये कि आखिर सरकार इस बातचीत से हासिल क्या करना चाहती है? केवल किसी के कहने पर या दबाव में बातचीत का अर्थ ही क्या हुआ? क्या बातचीत के द्वारा हुर्रियत के इस तर्क को स्वीकार किया जायेगा कि आतंकवाद के आरोप में जेलों में बन्द लोग राजनीतिक कैदी हैं , या फिर कश्मीर से सेना हटाने के प्रस्ताव को माना जायेगा?
जितनी बार भी हुर्रियत जैसे संगठ्नों के साथ बातचीत का प्रस्ताव किया जाता है निश्चित रूप से उन इस्लामी आतंकवादी संगठनों को सन्देश जाता है कि लगातार आतंकवाद की नीति का परिणाम होता है और आतंकवाद से लड्ते लड्ते अंततः राज्य, सरकार और जनता बातचीत की मेज पर आ ही जाती है और ऐसे थके और हारे लोगों के साथ मनमानी शर्तों पर बातचीत की जा सकती है।
ऐसी स्थिति में जबकि भारत में पिछले वर्ष 26 नवम्बर को मुम्बई पर हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के बाद आज दस महीने व्यतीत हो जाने पर भी भारत सरकार पाकिस्तान को कुछ भी करने के लिये बाध्य नहीं कर पाई जबकि इसके विपरीत पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनेक माध्यमों से उठवाने में सफल रहा और अब भारत ने पाकिस्तान परस्त कश्मीरी अलगाववादी संगठन के साथ बातचीत के प्रस्ताव को मानकर अपनी कूटनीतिक विवशता का परिचय दे दिया है। आज की स्थिति में पाकिस्तान भारत के लिये एजेंडा बना रहा है और भारत उसका पालन करने के लिये विवश है। 110 करोड की जनसंख्या वाला, परमाणु सम्पन्न देश जो महाशक्ति बनने का स्वप्न देख रहा है उसकी यह विवशता देखकर कष्ट आश्चर्यजनक है क्योंकि यह विवशता इस देश के लोगों की नहीं है वरन इस देश के राजनीतिक नेतृत्व की है। यह विवशता तो तब और उजागर होती है जब हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ यदि शांति प्रक्रिया नहीं चली तो उसका अर्थ होगा युद्ध लेकिन शायद प्रधानमंत्री जी भूल जाते हैं कि पाकिस्तान तो भारत के साथ पिछले 62 वर्षों से नित्य प्रति प्रच्छ्न्न युद्ध लड रहा है और हम नये नये तर्कों के सहारे अपनी विवशता, लाचारी और कमजोरी को छिपा रहे हैं।
हम आतंकवाद से हार रहे हैं?
मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण के तत्काल बाद मैंने अपने आलेख में आशंका व्यक्त की थी कि पिछले अनेक आक्रमणों की भाँति इस बार भी घटना का विश्लेषण होगा, सरकार की ओर से भारी भरकम वक्तव्य आयेंगे, समाचार पत्रों में बडॆ बडे लेख लिखे जायेंगे, टीवी चैनलों पर टिप्पणीकार अपनी टिप्पणियाँ देंगे और यह कर्मकाण्ड कुछ महीनों में थम जायेगा यह सोचकर कि लोग रोजमर्रा के कामों में उलझकर इसे भूल जायेंगे। अभी मुम्बई पर आक्रमण को एक महीने भी नहीं बीते हैं पर मेरी आशंकायें सत्य सिद्ध होने लगी हैं। अमेरिका और यूरोप के देशों के सहारे आतंकवाद की लडाई लड्ने का भारत सरकार का स्वप्न बिखरता नजर आ रहा है। इसका आरम्भ उस समय हुआ जब अमेरिका ने मुम्बई आक्रमण के लिये पकिस्तान की धरती का उपयोग सम्बन्धी तर्क स्वीकार कर लिया और लश्कर के मातृसंगठन जमात उद दावा पर प्रतिबन्ध सम्बन्धी प्रस्ताव भी संयुक्त राष्ट्र संघ में पारित करवा दिया लेकिन जब आईएसआई की बारी आयी तो अमेरिका ने भारत से कहा कि बिना साक्ष्यों के किसी पर आरोप लगाना उचित नहीं है। अमेरिका के इस बदले रूख से भारत सरकार चित्त हो गयी है और पाकिस्तान के हौंसले बुलन्द हो गये हैं। Read more
आतंकवाद जिहाद का ही एक स्वरूप है- डैनियल पाइप्स
पिछले वर्ष 26 नवम्बर को मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण के उपरांत आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध का विषय एक बार फिर से विश्व के एजेण्डे में सबसे ऊपर आ गया है। यह आक्रमण अनेक मायनों में पिछले आक्रमणों से भिन्न था क्योंकि इसने विश्व भर का ध्यान अपनी ओर खींचा। फिर भी भारत के विरुद्ध आक्रमण भारत के विरुद्ध युद्ध है और इसे भारत को ही लडना होगा। कुछ दिनों पूर्व इन्हीं विषयों पर मध्य पूर्व की राजनीति और विषय के जानकार और इस्लामी राजनीति के जानकारों में सबसे बडे नामों में से एक डा. डैनियल पाइप्स के साथ लोकमंच के सम्पादक अमिताभ त्रिपाठी ने एक साक्षात्कार किया। इस साक्षात्कार में अनेक वे प्रश्न उठाये गये जिनका उत्तर सामान्य तौर पर पाठक जानना चाहते हैं। प्रस्तुत हैं उसी साक्षात्कार के कुछ प्रमुख अंश। Read more
मुम्बई पर आक्रमण से क्या सीखें?
मुम्बई पर आतंकवादी आक्रमण को आज चार दिन बीत गये हैं और आज कहीं जाकर मेरा कुछ लिखने का मन हो रहा है। कुछ भी न लिख पाने के पीछे दो मुख्य कारण हैं। एक तो इस घटना ने मुझे इतना दुखी और स्तब्ध कर दिया कि तीन दिन तक ठीक से सो भी नहीं सका। दूसरा कारण कुछ भी न लिखने के पीछे यह था कि प्रत्येक आतंकवादी आक्रमण के बाद चर्चायें होती हैं, मीडिया में बहस होती है, टीवी पर विशेषज्ञ आते हैं और सुझाव देते हैं और फिर यह कर्मकाण्ड कुछ दिनों बाद समाप्त हो जाता है और फिर सब कुछ सामान्य और प्रतीक्षा अगले आतंकवादी आक्रमण की होने लगती है। 26 नवम्बर को मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद से ताज होटल में अंतिम आतंकवादी के मार गिराये जाने तक मैं पूरा घटनाक्रम टीवी पर चिपक कर देखता रहा। इस घटनाक्रम को देखते हुए एक प्रश्न मेरे मस्तिष्क में बार बार कौंध रहा था कि क्या वास्तव में इससे कोई सबक लेगा और निश्चित रूप से मुझे यही लगा कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला। क्योंकि आतंकवादी आक्रमण कोई पहला नहीं है और मानवीय क्षति के सन्दर्भ में इससे भी बडी घटनायें हो चुकी हैं। तो फिर इस आतंकवादी आक्रमण के सन्दर्भ में नया क्या है? एक तो यह घटना देश के उस शहर में हुई जिसे देश की आर्थिक राजधानी माना जाता है और मुम्बई में हुई अन्य घटनाओं की अपेक्षा इस बार इसका अंतरराष्ट्रीय सन्देश अधिक था और यही वह कारण है जिसने इस आक्रमण को विश्वव्यापी स्तर पर चर्चा में ला दिया। जिस प्रकार विदेशी नागरिकों और विशेष रूप से अमेरिकी, ब्रिटिश और इजरायल और भारतीय यहूदियों को निशाना बनाया गया उसने इस बात की आशंका बढा दी कि इस आतंकवादी आक्रमण की पीछे कहीं न कहीं वैश्विक जेहादी आन्दोलन और नेटवर्क की भूमिका है।
मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद दो तीन दिनों तक पूरे विश्व का ध्यान भारत की ओर लगा रहा कि हम इस स्थिति से कैसे निपटते हैं। मुम्बई का यह संकट समाप्त होने के उपरांत इसकी समीक्षा आरम्भ हुई है। विश्व के अनेक देशों की खुफिया एजेंसियाँ इस बात पर एकमत हैं कि इस आक्रमण के पीछे पाकिस्तान स्थित इस्लामी आतंकवादियों की भूमिका है परंतु उनका यह भी मानना है कि यह आक्रमण कुछ नये संकेत भी दे रहा है। एक तो यह कि अल कायदा अब आतंकवादी आक्रमण करने वाला आतंकवादी संगठन मात्र ही नहीं रह गया है वरन वह एक विचारधारा बन चुका है जो विश्व के अनेक क्षेत्रों में विभिन्न इस्लामी उग्रवादी संगठनों को एक छतरी के नीचे लाकर उनसे घटनाओं को अंजाम दिलाता है और निर्णय और विचार उसका होता है और घटनायें विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय इस्लामी उग्रवादी संगठन करते हैं। मुम्बई में हुए आतंकवादी आक्रमण से यही संकेत मिलता है कि यह योजना अल कायदा की है और इसे अंजाम देने का दायित्व भारत में अपनी पैठ जमा चुके लश्कर-ए- तोएबा को दी गयी।
मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण से समस्त विश्व हिल गया है क्योंकि इस आक्रमण ने जेहादी इस्लामी आन्दोलन की विश्वव्यापी पहुँच को रेखाँकित किया है। अमेरिका के खुफिया एजेंसी के अधिकारी और आतंकवाद विषय के विशेषज्ञ मानते हैं कि अल कायदा अमरिका की वर्तमान स्थिति को देखते हुए किसी बडी घटना को क्रियान्वित करने की फिराक में है ताकि बुश को बिदाई दी जा सके और बराक ओबामा का स्वागत किया जा सके। इस आधार पर इस बात की आशंका व्यक्त की जा रही है कि मुम्बई का आतंकवादी आक्रमण अल कायदा की योजना का ही परिणाम है क्योंकि जिस लश्कर ने आतंकवादियों को प्रशिक्षित किया वह 1998 में ओसामा बिन लादेन द्वारा गठित किये गये इण्टरनेशनल इस्लामिक फ्रंट का घटक है।
इस्लामी आतंकवाद और अल कायदा विषयों के विशेषज्ञ डां रोहन गुणारत्ना के अनुसार अल कायदा अब एक विचार बन चुका है और मध्य पूर्व, एशिया, उत्तरी अफ्रीका, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में अपनी गहरी पैठ बना चुका है। अब अल कायदा एक केन्द्रीय कमान के रूप में कार्य करने के स्थान पर विभिन्न इस्लामी उग्रवादी संगठनों को अपनी योजना और निर्णय को आउटसोर्स कर रहा है। अल कायदा ने जिस प्रकार मीडिया, इंटरनेट के सहारे मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा के द्वारा समस्त विश्व के मुसलमानों के मध्य एक वातावरण बना दिया है कि इस्लाम खतरे में है और उसे निशाना बनाया जा रहा है और इस प्रचार ने सामान्य मुसलमानों को ध्रुवीक्रत किया है और विशेष रूप से नयी पीढी के मुसलमानों को अधिक कट्टरपंथी और मुखर बनाने का कार्य किया है। अल कायदा के इसी अभियान का परिणाम है कि अमेरिका की विदेश नीति और इजरायल तथा अरब देशों का संघर्ष सभी मुसलमानों के मध्य न केवल चर्चा का विषय बन चुका है वरन इस्लामी आतंकवादियों के आक्रमणों को कुछ हद तक न्यायसंगत ठहराने का माध्यम भी बन चुका है।
भारत के प्रसिद्ध आतंकवाद प्रतिरोध के विशेषज्ञ बी रमन ने मुम्बई पर आतंकवादी आक्रमण के बाद अपने एक आलेख में इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि नवम्बर 2007 में उत्तर प्रदेश के न्यायालयों में श्रृखलाबद्ध विस्फोटों के बाद इसकी जिम्मेदारी लेनेवाले इंडियन मुजाहिदीन संगठन को लेकर भारत सरकार और खुफिया एजेंसियों के पास अत्यन्त कम सूचनायें हैं। जबकि इसने 2007 से 2008 के मध्य अनेक बडी घट्नायें अंजाम दी हैं। इंडियन मुजाहिदीन के कुछ लोग जब दिल्ली में हुए विस्फोटों के बाद पकडे गये तो उनका कार्य करने का ढंग, उनकी प्रेरणा और मीडिया का उनका उपयोग पूरी तरह अल कायदा से प्रभावित था और उनके पास से फिलीस्तीनी इस्लामी आतंकवादी अब्दुल्ला अज़्ज़ाम का साहित्य भी मिला था जो ओसामा बिन लादेन का गुरु है और अल कायदा उसी की जेहाद की भावना से प्रेरित है। इसी प्रकार मुम्बई पुलिस ने कुछ महीनों पूर्व जब इंडियन मुजाहिदीन के मीडिया विंग के लोगों को पकडा था तो उसमें भी अनेक तकनीक विशेषज्ञ पकडे गये थे। इंडियन मुजाहिदीन को जिस प्रकार से हल्के में लिया गया वह भारी पड सकता है क्योंकि इंडियन मुजाहिदीन के कार्य करने का तरीका पूरी तरह अल कायदा से प्रभावित है और यह इस आशंका को पुष्ट करता है कि विभिन्न देशों में विभिन्न इस्लामी संगठन सामने आ रहे हैं जो आवश्यक नहीं कि अल कायदा से सीधे सीधे निर्देश ग्रहण करते हों पर वे उसी इस्लामी जेहादी विचार को आगे बढाने के लिये कार्य कर रहे हैं।
मुम्बई में हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद एक बात पूरी तरह स्पष्ट है कि अब इस समस्या से अनेक स्तरों पर लडना होगा। इस प्रकार के आतंकवाद से लड्ने में खुफिया विभाग की सक्षमता, आतंकवाद प्रतिरोध संस्थाओं का राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता प्रमुख तत्व हैं पर इसके अतिरिक्त इस समस्या से विचारधारागत स्तर पर भी लडना आवश्यक है। जिस प्रकार इस्लामी आतंकवादियों ने समस्त विश्व में 48 घण्टे से अधिक समय तक टीवी पर लोगों को अपनी ताकत देखने के लिये बाध्य किया उसके दो निहितार्थ हैं एक तो इससे सामान्य लोगों में आतंकवादियों के एजेण्डे को जानने की उत्सुकता होती है और दूसरा खौफ और अराजकता फैलती है जो राज्य को कमजोर बनाता है। इसके अतिरिक्त इस प्रकार के कार्य न केवल फिदायीन बन कर जन्नत प्राप्त करने की इस्लामी आतंकवादियों की मंशा को उजागर करते हैं वरन और अधिक युवकों के मुजाहिदीन के रूप में भर्ती होने को प्रेरित करते हैं। क्योंकि ऐसे आतंकवादियो के लिये वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के भरभराते भवन, मैरियट होटल का धू धू कर जलता दृश्य अधिक प्रेरित करता है। इस बात को समझने की आवश्यकता है और इसलिये इस्लामी जेहाद के इस आन्दोलन को उसकी समग्रता में समझ कर उसका समाधान करने की आवश्यता है।
आज इस बात पर बहस करने से कोई लाभ नहीं है कि इस्लाम शांति की शिक्षा देता है कि नहीं और इसका भी कोई मतलब नहीं है कि कितने इस्लामी संगठनों ने आतंकवाद के विरुद्ध फतवा जारी किया आज मानवता के अस्तित्व का प्रश्न है और इस अस्तित्व पर प्रश्न खडा किया है ऐसे इस्लामवादी आन्दोलन ने जो विश्व पर फिर से इस्लामी साम्राज्य स्थापित करने की आकाँक्षा लिये शरियत का शासन स्थापित करना चाहता है और इसके लिये कुरान और हदीथ का उपयोग कर रहा है। इस इस्लामवादी आन्दोलन ने प्रथम विश्व युद्ध से द्वितीय विश्व युद्ध के मध्य हुए नाजी आन्दोलन, फासीवादी आन्दोलन और शीत युद्ध में चले कम्युनिस्ट आन्दोलन से अधिनायकवादी विचार लेकर एक नया आन्दोलन खडा किया है जिसने इस्लाम के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण से एक सन्देश स्पष्ट है कि अब यदि समस्या को नही समझा गया और इसके जेहादी और इस्लामी पक्ष की अवहेलना की गयी तो शायद भारत को एक लोकतांत्रिक और खुले विचारों वाले देश के रूप में बचा पाना सम्भव न हो सकेगा और यही चिंता समस्त विश्व को हुई है कि कहीं इस्लामवादी आन्दोलन अब मध्य पूर्व के बाद दक्षिण एशिया में अपनी पैठ न बना ले क्योंकि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश पहले ही इस्लामी चरमपंथियों के हाथ में खेल रहे हैं और भारत सहित दक्षिण एशिया की मुस्लिम जनसंख्या कुल जनसंख्या के 57 प्रतिशत से भी अधिक है और यदि यह क्षेत्र इस्लामी कट्टरपंथियों के हाथ में आ गया तो विश्व का नक्शा क्या होगा?
अब पाकिस्तान और बांग्लादेश को दोष देने से ही काम नहीं चलेगा और इन देशों की खुफिया एजेंसियों द्वारा जिस प्रकार भारत में इस्लामी तत्वो में घुसपैठ की गयी है उस पर कठोर कदम उठाना होगा और विभिन्न इस्लामी विचारधाराओं चाहे वह अहले हदीस. बरेलवी, देवबन्द, सलाफी, वहाबी हो इनसे सम्बन्धित मस्जिदों, मदरसों, आर्थिक स्रोतों पर नजर रखते हुए इनके इस्लामवादी आन्दोलन के साथ सम्बन्धों की जाँच करते रहनी होगी। आज पाकिस्तान और बांग्लादेश की खुफिया एजेंसियों ने भारत के हर हिस्से में अपनी पैठ कर ली है फिर वह उत्तर पूर्व हो, दक्षिण भारत हो, उत्तर भारत हो, मध्य भारत हो या पश्चिम भारत हो। मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण ने हमें अंतिम अवसर दिया है कि हमारे राजनेता आतंकवाद को वोट बैंक की राजनीति से जोडकर देखने के बजाय समस्या की गहराई को समझें और जानें कि आतंकवाद क्या है? इसके पीछे सोच क्या है? इसे कौन सहायता दे रहा है? न कि इस्लामी आतंकवाद के समानांतर हिन्दू आतंकवाद को खडाकर स्थिति को और अधिक उलझायें।
मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को गहरा धक्का पहुँचाया है और हमारी कमजोरियों की पोल खोल दी है आज विश्व स्तर पर भारत सरकार की नरम नीतियों को लेकर लेख लिखे जा रहे हैं फिर भी लगता है कि कुछ ही दिनों में घटिया राजनीति फिर आरम्भ हो जायेगी और केन्द्र सरकार आतंकवाद को अल्पसंख्यक वोट से जोडकर बयानबाजी और आरोप प्रत्यारोप आरम्भ कर देगी।

