इस्लामी कट्टरता का नया दौर

पाकिस्तान में पिछले दिनों जब प्रमुख प्रांत पंजाब के राज्यपाल सलमान तासीर की हत्या उनके ही अंगरक्षक द्वारा कर दी गयी तो अनेक प्रश्न एक साथ उठ खडे हुए। इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढना अत्यंत आवश्यक है। पाकिस्तान में जिस प्रकार यह हत्या अन्जाम दी गयी है वही अपने आप में सनसनीखेज है और जिस प्रकार इस हत्या के बाद पाकिस्तान के प्रमुख इस्लामी मजहबी संगठन और राजनीतिक दल इस घटना को न केवल सही ठहरा रहे हैं वरन इसे इस्लाम और पैगम्बर की चौदह सौ वर्ष पुरानी परम्परा के अनुक्रम में प्रशंसित कर रहे हैं उससे निश्चय ही यह आवश्यक हो गया है कि इस पूरी घटना को समग्रता में देखा जाये। समग्रता से आशय यह है कि क्या यह घटना पाकिस्तान की अराजक स्थिति का परिचायक है या फिर किसी नये रुझान का आरम्भ है। निश्चय ही इसे केवल कानून व्यवस्था के गिरावट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये विशेष रूप से तब जब कि तालिबान ने इस हत्या की जिम्मेदारी भी ले ली है। हालाँकि इस दावे की सत्यता अभी प्रमाणित नहीं हुई है लेकिन फिर भी इससे कुछ गम्भीर प्रश्न अवश्य खडे हुए हैं। Read more

देश की सेक्युलर राजनीति के पुनर्मूल्याँकन का समय ?

पिछले वर्ष देश में हुए आम चुनावों के बाद से सामान्य तौर पर एक नारा देश की सेक्युलर शक्तियाँ लगा रही हैं कि अब भारत बदल गया है और लोग विकास चाहते हैं और पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति से तंग आ चुके हैं। यह बाद कहते समय जो बात इन तत्वों के ध्यान में रहती है वह यह कि अब विश्व में वैश्वीकरण का युग है और विश्व में एक क्षेत्र को दूसरे से पूरी तरह अलग थलग नहीं रखा जा सकता। ऐसे में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है कि जो कुछ रुझान समस्त विश्व मे हमें देखने को मिल रहा है उस पृष्ठभूमि में ही यदि भारत की राजनीति को समझने का प्रयास किया जाये तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सम्मुख हमारे उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर हमें देना ही होगा। इन प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि सेक्युलर परिभाषा और राजनीति का स्वरूप क्या होना चाहिये? इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार यूपीए सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में और फिर अपने दूसरे कार्यकाल में अभी तक पूरी तरह पश्चिम की शक्तियों के प्रभाव में अपनी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति को क्रियांवित करने का प्रयास किया है ठीक उसके विपरीत आतंकवाद और इस्लाम व मुस्लिम जनता के साथ सम्बन्धों को परिभाषित करने में इस माड्ल को अपनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। Read more

पश्चिम की इस्लाम को चुनौती

पिछ्ले कुछ दिनों से एक ऐसी घटना की भूमिका बन रही है जो आने वाले दिनों में बडा तूफान खडा कर सकती है। यह घटना पिछ्ले दो दशकों से पश्चिम और इस्लाम के मध्य चल रही उस अदावट को नया आयाम दे सकती है जिसका आरम्भ 1989 में उस समय हुआ था जब ब्रिटिश मूल के लेखक सलमान रश्दी ने सेटेनिक वर्सेज नामक पुस्तक लिखी थी और उसमें इस्लाम के तथाकथित पवित्र ग्रंथ कुरान की कुछ आयतों पर टिप्प्णी की थी जो सदियों से समस्त विश्व और गैर मुसलमानों के मध्य चर्चा का विषय रही हैं। इस पुस्तक के प्रकाशित होते ही पूरे इस्लामी जगत में मानों भूचाल आ गया और ईरान के सर्वोच्च धर्मगुरु अयातोला खोमेनी ने सलमान रश्दी के विरुद्ध फतवा जारी कर उनका सर कलम करने का आदेश इस्लाम धर्मावलम्बियों को दे दिया। इस फतवे के बाद सलमान रुश्दी को अपनी जान के लाले पड गये और यह पुस्तक प्रायः सभी देशों में प्रतिबन्धित हो गयी।

यह पहला अवसर था जब समस्त विश्व के सामने अभियक्ति की स्वतंत्रता और इस्लाम के विशेषाधिकार को लेकर बहस आरम्भ हुई। इसके बाद अगला वह अवसर 1997 में आया जब इस्लाम के अनुयायियों ने पश्चिम के किसी कदम को अपने धर्म के सिद्धांतों के प्रतिकूल माना और इसे लेकर आक्रामक प्रदर्शन तक हुए यह अवसर तब आया जब अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने परिसर में इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद की उस प्रतिमा को हटाने की अनुमति नहीं दी जिसमें उन्हें विश्व के कानून प्रदाताओं के साथ खडा किया गया था। 1930 की इस प्रतिमा के सम्बन्ध में मुसलमानों का तर्क था कि इस्लाम के अनुसार पैगम्बर की प्रतिमा नहीं हो सकती। अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के उपरांत अनेक स्थानों पर आक्रामक प्रदर्शन हुए।  2002 में एक अवसर फिर आया जब हमें पश्चिम की ओर से आये किसी वक्तव्य के कारण इस्लामी जगत में उसकी घोर प्रतिक्रिया देखने को मिली।

 2002 में एक ईसाई धर्मप्रचारक जेरी फाल्वेल ने पैगम्बर मोहम्मद को एक इंटरव्यू में पहला आतंकवादी कह दिया और इसके बाद सर्वत्र आक्रामक प्रदर्शन हुए। इस प्रदर्शन में अनेक लोग घायल भी हुए और कुछ लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पडा। इस प्रदर्शन की लपट भारत तक भी आयी और देश के अनेक हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए। इसी प्रकार 2005 में प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका न्यूजवीक में एक अफवाह जैसा समाचार छपा कि अमेरिका द्वारा आतंकवादियों के लिये बनाई गयी जेल ग्वांटेनामो बे में किसी अमेरिकी जेल अधिकारी ने कैदियों के सामने कुरान की प्रति शौचालय में बहा दी है। इस समाचार के आने के बाद मानों हडकम्प मच गया और जैसी उम्मीद थी उसी अनुसार हिंसा और प्रदर्शन हुए।

पश्चिम और इस्लाम का यह संघर्ष फरवरी  2006 में  फिर  देखने को मिला जब डेनमार्क की एक प्रसिद्ध पत्रिका जायलेंड पोस्टेन ने इस्लामी पैगम्बर मोहम्मद के कुछ कार्टून प्रकाशित किये और यही कार्टून फिर यूरोप के अनेक देशों की पत्र पत्रिकाओं ने प्रकाशित किये। इस घटना ने समस्त इस्लामी विश्व को उद्वेलित कर दिया और विश्व के अनेक हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन हुए और इस अभूतपूर्व हिंसा में समस्त विश्व के अनेक हिस्सों में 100 से अधिक लोग मारे गये और अनेक धार्मिक स्थलों को भी नुकसान हुआ। भारत में भी कश्मीर, लखनऊ, हैदराबाद में हिंसा हुई और अनेक लोग घायल हुए। इसके बाद सितम्बर 2006 में रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धर्म गुरू पोप बेनेडिक्ट ने अपने एक वक्तव्य में इस्लाम के सन्दर्भ में बायजेंटाइन सम्राट को उद्ध्रत करते हुए कहा कि इस्लाम के पास कुछ भी नया नहीं है और जो भी है वह बुरा और अमानवीय है। पोप की यह टिप्पणी अपनी नहीं थी परंतु इस्लामी विश्व में इस पर जमकर बवाल हुआ और पूरी दुनिया में अनेक दिनों तक हिंसक विरोध प्रदर्शन होते रहे। भारत में जामा मस्जिद के इमाम सैयद बुखारी ने पोप को जान से मारने की बात कही। आक्रोश का यही आलम विश्व के अनेक इस्लामी हिस्सों में रहा और इस विषय पर भी हिंसा हुई। 

पश्चिम और इस्लाम की इस अदावट की नवीनतम कडी में हालैण्ड की संसद के सदस्य और आप्रवास विरोधी राजनीतिक दल के नेता गीर्ट वाइल्डर्स ने कुरान पर एक फिल्म बनाने का निर्णय लिया है और यही नहीं तो वे फिल्म पूरी भी कर चुके हैं पहले यह फिल्म जनवरी में प्रस्तावित थी परंतु अब यह मार्च के महीने में कभी भी आ सकती है। इस को लेकर सारी दुनिया में चर्चा हो रही है। इस चर्चा के पीछे दो प्रमुख कारण हैं एक तो वाइल्डर्स हालैंड की संसद के सदस्य हैं, संसद की कुल 150 सदस्य संख्या में उनके 9 सदस्य है और इससे पूर्व भी वे कुरान को हिंसा का प्रेरणा स्रोत मानते हुए उस पर प्रतिबन्ध लगाने की बात कर चुके हैं। उन्होंने कुरान की तुलना हिटलर की आत्म कथा मीन कैम्फ से की है। अभी तक पश्चिम और इस्लाम के मध्य विवाद के जितने उदाहरण हमारे सामने आये थे उसमें पहल या तो धार्मिक व्यक्ति द्वारा या किसी लेखक द्वारा हुई थी और इन सभी विषयों पर कानून निर्माताओं की एक ही राय होती थी कि इस्लाम मतावलम्बियों की भावना को ठेस नहीं लगनी चाहिये। इससे पूर्व के सभी मामलों में पूरे मामले को शांत करने का प्रयास होता था।

पहली बार इस्लाम की आलोचना की पहल किसी कानून निर्माता द्वारा हुई है। इस फिल्म को लेकर हालैण्ड की सरकार ने जो रुख दिखाया है वह भी बडा रोचक है। सरकार ने इस पूरे विषय पर दो स्तर की रणनीति बनाई है जिसमें एक ओर जहाँ फिल्म को प्रदर्शित होने से रोकने के प्रयास करने की बात की गयी है वहीं दूसरी ओर इस फिल्म के प्रदर्शन पर होने वाली मुस्लिम प्रतिक्रिया से अपने  देश में और विदेश में निपटने के विकल्पों पर भी चर्चा हो रही है। वाइल्डर्स के आसपास पुलिस निगरानी बढा दी गयी है और उनके शेष सांसदों की भी निगरानी हो रही है। हालांकि हालैण्ड के टी वी चैनलों ने वाइल्डर्स की फिल्म फितना को प्रदर्शित करने से मना कर दिया है परंतु वाइल्डर्स ने इसके लिये अलग वेबसाइट बनायी है और यू ट्यूब पर भी फिल्म दिखाने की बात कही है। हालैण्ड की सरकार के प्रबन्धों पर वाइल्डर्स का  मानना है कि सरकार के रूख से लगता है कि वह भी फिल्म के प्रदर्शन के लिये तैयार है। यही वह बिन्दु है जिसे टर्निंग प्वांइट कहा जा सकता है। 

 हालैण्ड वह पहला यूरोपिय देश है जहाँ इस्लाम के विशेषाधिकार को सबसे पहले चुनौती दी गयी। इस देश के  राजनीतिक नेता पिम फार्च्यून ने सबसे पहले हालैण्ड में मुस्लिम आप्रवास पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग की बाद में वे एक पशु कार्यकर्ता द्वारा मार दिये गये। इसके बाद प्रसिद्ध कलाकार थिओ वान गाग ने सोमालिया मूल की इस्लामी महिला अयान हिरसी अली के साथ मिलकर इस्लाम में महिलाओं की दयनीय स्थिति पर एक फिल्म सबमिसन अर्थात समर्पण जो कि इस्लाम का अर्थ होता है निर्मित की। इस फिल्म को लेकर काफी प्रतिक्रिया हुई और इस फिल्म को इस्लाम और अल्लाह का अपमान बताया गया और 2004 में एक अफ्रीकी मुसलमान ने दिनदहाडे वान गाग की हत्या कर दी। वान गाग के ह्त्यारे मोहम्मद बायेरी ने इसे जेहाद बताया और मुकदमे के दौरान गर्व से स्वीकार किया कि उसने अपने धर्म के अपमान का बदला लिया है।  2004 में इस घटना के बाद हालैण्ड में अभिवयक्ति की स्वतंत्रता और इस्लाम के विशेषाधिकार पर चर्चा आरम्भ हुई।

2006 में पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून को लेकर पूरे पश्चिम में जो बह्स आरम्भ हुई तो उसका सर्वाधिक मुखर बिन्दु यह था कि इस्लाम को पश्चिमी समाज की लोकतांत्रिक परम्पराओं के दायरे में लाने के लिये इस बात के लिये बाध्य किया जाये कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धर्मों तथा पैगम्बरों की आलोचना के सामान्य सिद्धांतों को स्वीकार करे। हालैण्ड की फ्रीडम पार्टी के नेता गीर्ट वाइल्डर्स ने अब कुरान पर न केवल वक्तव्य दिया है वरन उसे पुष्ट करने के लिये उसे चित्र में भी लाने का प्रयास किया है। वे स्वयं भी कह्ते हैं कि इस फिल्म में वे वह प्रदर्शित करेंगे जिस पर वे विश्वास करते हैं। इस फिल्म को लेकर हालैण्ड की सरकार तथा अन्य राजनीतिक दलों का जो रवैया है वह निश्चय ही इस बात का संकेत है कि वे इस फिल्म का प्रदर्शन चाह्ते हैं। इसके पीछे असली कारण यही है कि हालैण्ड वह यूरोपिय देश बन रहा है जो इस्लाम को बहस के दायरे में लाकर उसके विशेषाधिकार पर चोट करने जा रहा है।  निश्चय ही यह घटना आने वाले दिनों में समस्त विश्व में चर्चा का विषय बनने वाली है और यह घटना पश्चिम और इस्लाम की अदावट को नया आयाम प्रदान कर सकती है। इस घटना के विकास और परिपक्व रूप लेने के बीच के घटनाक्रम से एक बात स्पष्ट हो रही है कि पश्चिम में इस्लाम को लेकर चिंतन नये सिरे से आरम्भ हो गया है और पश्चिम इस्लाम को अपने अनुरूप ढालने की कवायद में जुट गया है। फिर वह मुस्लिम आप्रवास हो, मुसलमानों का व्यक्तिगत कानून हो , जेहाद हो या फिर समस्त विश्व को शरियत के आधार पर चलाने की उनकी मंशा।

कंधामल की घटना से सबक

उड़ीसा राज्य एक बार फिर ऐसी घटनाओं के लिये चर्चा में है कि इस कारण चर्चा में रहना शायद वह पसन्द न करे। ईसाइयों के प्रमुख पर्व क्रिसमस के दिन उड़ीसा राज्य ईसाइयों और हिन्दुओं के मध्य साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार हो गया। उड़ीसा के कन्धामल जिले में पिछले अनेक वर्षों से धर्मान्तरण के विरूद्ध अभियान चला रहे हिन्दू सन्त लक्ष्मणानन्द सरस्वती के ऊपर कुछ लोगों ने हमला कर दिया जिनके बारे में हिन्दू संगठनों का आरोप है कि वे ईसाई मिशनरी थे और सन्त की धर्मान्तरण विरोधी अभियान की सफलता से हताश होकर यह आक्रमण किया। इस आक्रमण में स्वयं सन्त लक्ष्मणानन्द सरस्वती और उनका वाहन चालक घायल हो गया जिन्हें कटक के अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस आक्रमण के विरोध में राज्य में हिन्दूवादी संगठनों विश्व हिन्दू परिषद ने कुछ घण्टों के बन्द का आयोजन किया जिसके बाद हिंसा भड़की और कन्धामल से जुड़े कुछ अन्य जिलों में भी इसकी लपट पहुँची। उग्र भीड़ ने एक मन्त्री के घर को आग लगा दी और अनेक कच्चे घरों में बने चर्चों को भी निशाना बनाया।

 वैसे अधिकतर आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियाँ लोगों के कच्चे घरों को ही चर्च के रूप में प्रयोग में लाती हैं इस कारण चर्च में आगजनी की घटना के सम्बन्ध में किसी सूचना के आने पर यह निश्चय करना आवश्यक हो जाता है कि यह आगजनी कामचलाऊ पूजा स्थल में हुई है या फिर आधिकारिक चर्च में।  वैसे इस कारण को आधार बनाकर पूजा स्थल में आगजनी को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता परन्तु ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती।

इस साम्प्रदायिक हिंसा के लिये ईसाई मिशनरी भी उतने ही दोषी हैं जितने हिन्दू संगठन। इस हिंसा को लेकर जो भी बहस होनी चाहिये उसमें दोनों पक्षों की भूमिका पर बहस होनी चाहिये। हमारे देश में समाचार माध्यम अब भी वास्तविक तथ्यों की तह में जाने के स्थान पर प्रचार या प्रोपैगैण्डा पर अधिक ध्यान देते हैं। एक बार फिर इस घटना को कुछ वर्ष पूर्व उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स को उनके बच्चों सहित जीवित जलाने की घटना का स्मरण कराने वाला मानकर प्रचारित किया जा रहा है। निश्चित रूप से दोनों घटनाओं में बिलकुल समानता नहीं है वैसे तो ग्राहम स्टेन्स को जलाने वालों के भी अपने तर्क हैं फिर यदि उन्हें अस्वीकार भी कर दें तो भी कन्धामल की घटना उससे पूरी तरह भिन्न है। यहाँ हिंसा का आरम्भ एक प्रतिष्ठित सन्त पर हमले के बाद हुआ। यह हमला ही अपने आप में काफी कुछ कह देता है।

 ऐसी घटनायें एक ऐसे संघर्ष को इंगित करती हैं जो विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में हिन्दुओं और ईसाइयों के मध्य चल रहा है। यह संघर्ष है धर्मान्तरण का संघर्ष। ईसाई जिसे सेवा कार्य कहते हैं उसके बारे में स्थानीय हिन्दू सन्तों और हिन्दू संगठनों का आरोप रहता है कि यह आदिवासियों का धर्मान्तरण है। इस समस्या पर तार्किक और वास्तविक ढंग से ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।  ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों को लेकर, उनके उद्देश्य और मन्तव्य को लेकर देश की स्वाधीनता से लेकर अब तक 6 दशकों में अनेक आयोग बन चुके हैं और उनकी रिपोर्ट का लब्बोलुवाब यही रहा है कि ईसाई मिशनरियाँ सेवा कार्यों के बहाने धर्मान्तरण के कार्य में अधिक रूचि लेती हैं जो कालान्तर में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये भी खतरा बन सकता है जैसा कि पूर्वोत्तर के प्रमुख ईसाई प्रदेशों में हो रहा है। इस कारण अब वह समय आ गया है कि ईसाई मिशनरियों की विदेशी सहायता, उनके उद्देश्य, मन्तव्य और धर्मान्तरण के प्रति उनके जुनून पर रोक लगाने के ठोस प्रबन्ध किये जायें ताकि आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे संघर्षों को टाला जा सके।

पोप के बयान

September 16, 2006 · Filed Under धर्म · 1 Comment 

पोप बेनेडिक्ट 16 द्वारा पिछले दिनों जर्मनी के रेजेनबर्ग विश्विद्यालय के एक कार्यक्रम में इस्लाम पर दिये गये उनके बयान ने एक विवाद का स्वरूप ग्रहण कर लिया है. एक समारोह में इस्लाम की जिहाद की अवधारणा  और उसमें अन्तर्निहित हिंसा को पोप ने ईश्वर की इच्छा के विपरीत घोषित करते हुये इस सम्बन्ध में पूर्वी रोमन साम्राज्य के ईसाई शासक मैनुअल द्वितीय को उद्धृत करते हुये कहा कि मोहम्मद ने कुछ भी नया नहीं किया. इस्लाम में जो भी है अमानवीय और हिंसक है तथा इस धर्म का प्रचार तलवार के बल पर हुआ है.      पोप के इस बयान के बाद अनेक मुस्लिम देशों और गैर-मुस्लिम देशों के  मुसलमानों के मध्य तीव्र प्रतिक्रिया हुई है , इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में यह समझना अत्यन्त आवश्यक है कि इस बयान के माध्यम से कैथोलिक ईसाइयों के सर्वश्रेष्ठ धर्मगुरू आखिर क्या सन्देश देना चाहते हैं.           

                            पोप बेनेडिक्ट के पूर्ववर्ती पोप जॉन पॉल ने इस्लाम के साथ संवाद आरम्भ कर दोनों धर्मों के मध्य आपसी समझ स्थापित करने का प्रयास किया था और इस क्रम में वर्ष 2001 में उन्होंने सीरिया की मस्जिद में प्रवेश किया था और वे ऐसा करने वाले पहले ईसाई धर्म गुरू थे. परन्तु वर्ष 2003 तक विश्व के निचले श्रेणी के पादरी या कार्डिनल अनेक बैठकों में दारूल इस्लाम में रहने वाले 4 करोड़ ईसाई अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले द्वितीय श्रेणी के व्यवहार का प्रश्न उठाने लगे थे और इसी दबाव के चलते पोप जॉन पॉल ने 2003 में समान व्यवहार का विषय उठाना आरम्भ कर दिया था.        

                     पोप जॉन पॉल के उत्तराधिकारी बेनेडिक्ट 16 कार्डिनल राटजिंगर की भूमिका में भी इस्लाम के सम्बन्ध में अपने कठोर विचारों के लिये जाने जाते थे. पोप बनने के बाद इस्लाम के साथ ईसाइयों का सम्बन्ध उनके एजेण्डे में सर्वोपरि था. इस क्रम में उन्होंने वेटिकन में कुछ बड़ी बैठकें आयोजित कर इस विषय में पूरी दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के कैथोलिक पादरियों की राय जानने का प्रयास भी किया.    

                          पोप का इस्लाम के सम्बन्ध में पहला सार्वजनिक दृष्टिकोण जनवरी 2006 में सामने आया जब पोप के साथ ह्यूज हेविट शो सेमिनार में भाग लेने वाले फादर जोसेफ डी फेसियो ने रहस्योद्घाटन किया कि इस सेमिनार में पोप ने कुछ नरमपंथी मुस्लिम विद्वानों की इस बात का जोरदार खण्डन किया था कि कुरान में किसी भी प्रकार सुधार सम्भव है. पोप ने इस सम्मेलन में कहा कि कुरान में जो कुछ कहा गया है वह पैगम्बर द्वारा भले कहा गया हो परन्तु वे अल्लाह के सीधे आदेश हैं इसलिये उनमें कोई सुधार सम्भव नहीं है.        

                        अप्रैल 2005 में पोप बनने के बाद यह पहला अवसर था जब बेनेडिक्ट ने इस्लाम पर अपनी सीधी राय व्यक्त की थी. इसी प्रकार अनेक गोपनीय बैठकों में भी पोप ने इस्लाम के संवाद जारी रखने का समर्थन करते हुये भी इसे बेमानी बताया जब तक इस्लाम में जिहाद की अवधारणा और उसमें अन्तर्निहित हिंसा की धारणा खण्डित नहीं होती.    

                         पोप का नवीनतम बयान इस्लाम और ईसाइयों के मध्य सम्बन्धों के सन्तुलन में आये अन्तर का प्रकटीकरण है. दशकों पुरानी नीति में नाटकीय परिवर्तन करते हुये वेटिकन ने  दारूल इस्लाम में रह रहे ईसाइयों की दुर्दशा का कारण फिलीस्तीन में  इजरायल की नीतियों को  मानने के स्थान पर इसे कूटनीतिक और सांस्कृतिक सम्बन्धों के पारस्परिक सम्बन्ध से  जोड़ा है.      

                        डेनमार्क के प्रसिद्ध समाचार पत्र जायलैण्ड्स पोस्टेन में छपे मोहम्मद के तथाकथित कार्टून के बाद वेटिकन की नीति में आया यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ था जब आरम्भ में वेटिकन ने इन कार्टूनों के प्रकाशन का विरोध किया था परन्तु नाईजीरिया और तुर्की में हुई हिंसा में पादरियों के मरने के बाद वेटिकन प्रवक्ता ने आक्रामक लहजे में कहा कि, यदि आप हमारे लोगों से कहेंगे कि उन्हें आक्रमण का अधिकार नहीं है तो हमें अन्य लोगों से भी कहना पड़ेगा कि उन्हें हमें नष्ट करने का अधिकार नहीं है . वेटिकन के विदेश मन्त्री आर्कविशप गिवोवानी लाजोलो ने इसमें जोड़ा कि हमें मुस्लिम देशों में कूटनीतिक सम्पर्कों और सांस्कृतिक सम्पर्कों में सम्बन्धों में उचित प्रतिफल की माँग पर जोर देते रहना चाहिये.              

                        इसी प्रकार मार्च महीने में अफगानिस्तान में अब्दुल रहमान नामक व्यक्ति के ईसाई बनने पर अफगानिस्तान सरकार द्वारा उसे मृत्युदण्ड दिये जाने का जैसा विरोध वेटिकन सहित प्रमुख पश्चिमी ईसाई देशों ने किया था उससे वेटिकन की नई आक्रामक नीति का संकेत मिलता है.       

                      पोप बेनेडिक्ट ने यूरोपियन संघ में तुर्की के शामिल होने का विरोध करते हुये यूरोप में बढ़ रही सेकुलर प्रवृत्ति की भी खुली आलोचना करते हुये यूरोप से अनेक अवसरों पर कहा है कि वह अपनी ईसाई पहचान को न भूले.       

                       वैसे पोप का इस्लाम सम्बन्धी रूख यूरोप के इस्लामीकरण के भय को स्वर देता है. ईसाई जन्म स्थान बेथलहम में पिछली दो सहस्राब्दी में ईसाइयों के अल्पसंख्या में आ जाने के बाद यूरोप में आप्रवास के बहाने बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या और उनका मुखर और आक्रामक स्वभाव यूरोप को अपनी पहचान सहेजने को विवश कर रहा है.    

                        बेथलेहम में 1922 में ईसाइयों की जनसंख्या मुसलमानों से अधिक थी परन्तु आज यह घटकर 2 प्रतिशत रह गयी है, इसी प्रकार अपनी परम्परा और मूल्यों के साथ सम्बन्ध क्षीण करता हुआ यूरोप उत्तर ईसाई समाज बनता जा रहा है. पिछली दो पीढ़ियों में आस्थावान और धर्मपालक ईसाइयों की संख्या इतनी कम हुई है कि पर्यवेक्षकों ने इसे नया अन्ध महाद्वीप कहना आरम्भ कर दिया है. विश्लेषकों का पहले ही अनुमान है कि मस्जिदों में उपासना करने वालों की संख्या प्रत्येक सप्ताह चर्च आफ इंगलैण्ड से अधिक होती है.     

                         किसी जनसंख्या को कायम रखने के लिये आवश्यक है कि महिलाओं का सन्तान धारण करने का औसत 2.1 हो परन्तु पूरे यूरोपीय संघ में दर एक तिहाई 1.5 प्रति महिला है और वह भी गिर रही है . एक अध्ययन के अनुसार यदि जनसंख्या का यही रूझान कायम रहे और आप्रवास पर रोक लगा दी जाये तो 2075 तक आज की 375 मिलियन की जनसंख्या घटकर 275 मिलियन हो हो जायेगी. यहाँ तक कि अपने कारोबार के लिये यूरोप को प्रतिवर्ष 1.6 करोड़ आप्रवासियों की आवश्यकता है. इसी प्रकार वर्तमान कर्मचारी और सेवानिवृत्त लोगों के औसत को कायम रखने के लिये आश्चर्यजनक 13.5 करोड़ आप्रवासियों की प्रतिवर्ष आवश्यकता है.इसी रिक्त स्थान में इस्लाम और मुसलमान को प्रवेश मिल रहा है. जहाँ ईसाइयत अपनी गति खो रही है वहीं इस्लाम सशक्त, दृढ़ और महत्वाकांक्षी है. जहाँ यूरोपवासी बड़ी आयु मे भी कम बच्चे पैदा करते हैं वहीं मुसलमान युवावस्था में ही बड़ी मात्रा में सन्तानों को जन्म देते हैं.यूरोपियन संघ का 5% या लगभग 2 करोड़ लोग मुसलमान हैं. यदि यही रूझान जारी रहा तो 2020 तक यह संख्या 10% पहुँच जायेगी.जैसा कि दिखाई पड़ रहा है कि गैर मुसलमान नयी इस्लामी व्यवस्था की ओर प्रवृत्त हुये तो यह महाद्वीप मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्र बन जायेगा.       

                        इन तथ्यों की पृष्ठभूमि में यह स्पष्ट हो जाता है कि इस्लाम के सम्बन्ध में पोप का बयान कोई भावात्मक या आवेशपूर्ण उक्ति नहीं है वरन् यूरोप और ईसाई समाज की असुरक्षा की भावना की अभिव्यक्ति है. पोप बेनेडिक्ट के दृष्टिकोण से स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में इस्लाम और ईसाइयत के मध्य आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चलेगा और उसका परिणाम आने वाले वर्षों में  विश्व स्तर पर नये  राजनीतिक और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण के तौर पर देखने को मिल सकता है.

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