भाजपा क्यो हैं भ्रम में?
यह लेख जब मैं लिख रहा हूँ तो कोई भी मुझसे यह प्रश्न अत्यंत सहजता से कर सकता है कि क्या मैं भाजपा के राजनीतिक स्वास्थ्य की कामना करते हुए स्वयं को निष्पक्ष मान सकता हूँ तो निश्चय ही कोई तटस्थ हुये बिना भी निष्पक्ष हो सकता है। बौद्धिक वर्ग में तटस्थता जैसी कोई वस्तु नहीं होती क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी विचार का पोषण अवश्य करता है और बौद्धिक व्यक्ति का दायित्व यह होता है कि वह निष्पक्ष होकर अपने पक्ष रखे। इसी धर्म का पालन करते हुए वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा की राजनीतिक दशा और दिशा की समीक्षा करने का प्रयास इस लेख में कर रहा हूँ। Read more
देश की सेक्युलर राजनीति के पुनर्मूल्याँकन का समय ?
पिछले वर्ष देश में हुए आम चुनावों के बाद से सामान्य तौर पर एक नारा देश की सेक्युलर शक्तियाँ लगा रही हैं कि अब भारत बदल गया है और लोग विकास चाहते हैं और पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति से तंग आ चुके हैं। यह बाद कहते समय जो बात इन तत्वों के ध्यान में रहती है वह यह कि अब विश्व में वैश्वीकरण का युग है और विश्व में एक क्षेत्र को दूसरे से पूरी तरह अलग थलग नहीं रखा जा सकता। ऐसे में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है कि जो कुछ रुझान समस्त विश्व मे हमें देखने को मिल रहा है उस पृष्ठभूमि में ही यदि भारत की राजनीति को समझने का प्रयास किया जाये तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सम्मुख हमारे उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर हमें देना ही होगा। इन प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि सेक्युलर परिभाषा और राजनीति का स्वरूप क्या होना चाहिये? इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार यूपीए सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में और फिर अपने दूसरे कार्यकाल में अभी तक पूरी तरह पश्चिम की शक्तियों के प्रभाव में अपनी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति को क्रियांवित करने का प्रयास किया है ठीक उसके विपरीत आतंकवाद और इस्लाम व मुस्लिम जनता के साथ सम्बन्धों को परिभाषित करने में इस माड्ल को अपनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। Read more
हिन्दू जीवन पद्दति नहीं धर्म है
इन दिनों धर्म पर बहस काफी तीव्र हो गयी है और भारत में पिछले 6 दशक में कम्युनिज्म और सेक्युलरिज्म के घालमेल ने बौद्धिक वर्ग में धर्म के विषय को लेकर एक विशेष प्रकार की ग्रंथि का निर्माण कर दिया है जिसके चलते वह धर्म को बहस के दायरे से बाहर रखना चाहता है। ऐसा विशेष रूप से हिन्दुओं में पाया जाता है। राजनीति पर तो काफी खुलकर चर्चा होगी लेकिन जब धर्म की बारी आयेगी तो उस पर कोई भी चर्चा करने से परहेज करते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दू धर्म के शिक्षण और प्रशिक्षण की सार्वजनिक प्रक्रिया पूरी तरह ठप सी हो गयी है। अब नयी पीढी के हिन्दू अपनी धार्मिक पहचान के प्रति आग्रह तो रखते हैं लेकिन अपने धर्म के मूलभूत स्वरूप को लेकर भ्रमित रहते हैं।
इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह है कि पिछले दो दशक में हिन्दूवादी संगठनों सहित अनेक मंचों से इस तथ्य को रूढ कर दिया गया है कि हिन्दू धर्म नहीं वरन जीवन दर्शन है। आज कोई भी बौद्धिक हिन्दू आपके मुँह से हिन्दू धर्म की बात निकलने से पहले ही उसे लपक कर कहता है कि हिन्दू धर्म नहीं वरन जीवन दर्शन है। यह भ्रम आखिर क्यों आया?
आज से कोई सौ वर्ष से पूर्व भी जब स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका और यूरोप में हिन्दू धर्म के बारे में अपने व्याख्यान दिये थे तो उन्होंने स्पष्ट रूप से हिन्दू धर्म को विश्व के सभी धर्मों के साथ तुलनात्मक दृष्टि से एक ऐसा धर्म सिद्ध किया था जिसमें आगे चलकर एक सार्वभौमिक धर्म बनने के गुण विद्यमान हैं। फिर स्वतंत्रता के बाद स्थिति बदल क्यों गयी? इसका कारण यही है कि हिन्दू धर्म को राजनीति और संविधान के दायरे में लाने के लिये उसकी नयी परिभाषा गढी जाने लगी और फिर सर्वोच्च न्यायालय का हिन्दुत्व के पक्ष में निर्णय आने के उपरांत इसे संवैधानिक पुष्टि मिल जाने के बाद तोता रटंत आरम्भ हो गया कि हिन्दुत्व जीवन पद्दति है।
वास्तव में वैश्विक स्तर पर अनेक ऐसे परिवर्तन होते हैं जिनकी दस्तक काफी पहले से मिलने लगती है। यही कुछ आज के सन्दर्भ में भी सत्य है। आज जिस प्रकार समस्त विश्व में धार्मिक पहचान का आग्रह तेजी से बढ रहा है उसका आरम्भ 1990 के दशक से ही हो गया था। कम्युनिज्म ने अपनी नास्तिक विचारधारा के चलते सेक्युलरिज्म को एक क़ृत्रिम आभास के रूप में जीवित रखा था। लेकिन सोवियत संघ के पतन के बाद से देश और लोग संस्कृति और राष्ट्र राज्य की अवधारणा से अधिक अपनी धार्मिक पहचान को आगे कर चल रहे हैं।
पश्चिम के देशों ने और इस्लामी देशों ने कभी भी सेक्युलरिज्म के नाम पर अपनी धार्मिक पहचान से समझौता नहीं किया था। किसी भी ईसाई देश में आज तक गैर ईसाई राष्ट्राध्यक्ष नहीं बना और ऐसा ही इस्लामी देशों के साथ भी है फिर भी भारत में सेक्युलरिज्म के नाम पर उसकी हिन्दू पहचान से उसे वंचित रखा गया और इसी प्रतिक्रिया में 1990 में हिन्दू आन्दोलन खडा हुआ।
हिन्दू आन्दोलन को संवैधानिक दायरे में और सेक्युलरिज्म के दायरे में रखने के लिये हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को पृथक बताया गया और इस घालमेल के परिणामस्वरूप सामान्य हिन्दू जनमानस ने हिन्दू धर्म को एक जीवन पद्धति के रूप में परिभाषित करना आरम्भ कर दिया।
जब धर्म को राजनीति के माध्यम से स्थापित करने का प्रयास किया जाता है तो इसी प्रकार की भ्रम की स्थिति का निर्माण होता है।
आज इस बात की आवश्यकता है कि हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के सम्बन्ध में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की जाये।
हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति बताने का प्रयास इस कारण भी हुआ कि हिन्दू धर्म अन्य सेमेटिक धर्मों की भाँति एक पुस्तक, पैगम्बर पर आधारित नहीं है लेकिन जीवन पद्धति के दायरे में कुछ नियम आते हैं जिन्हें धर्म की पुस्तक या पैगम्बर द्वारा निर्धारित किया जाता है और उसका पालन सुनिश्चित करने के लिये एक संस्थागत ढाँचा तैयार किया जाता है। जैसा कि इस्लाम धर्म में हमें देखने को मिलता है। शरियत और सुन्नत की अवधारणा इसी को प्रकट करते हैं। प्रत्येक इस्लाम धर्मावलम्बी के लिये इस्लाम, शरियत और सुन्ना ( अर्थात पैगम्बर के जीवन का अनुपालन) के आधार पर दिनचर्या और जीवन सुनिश्चित करने के लिये मौलवी, फतवे आदि की व्यवस्था है। इसी प्रकार इस्लाम एक आध्यात्मिक और दार्शनिक अवधारणा से अधिक शरियत के आधार पर जीवन जीने को प्रमुखता देता है। वैसे इस्लाम में भी रोजा, नमाज, जकात और हज आध्यात्मिक उन्नति के लिये ही है लेकिन योग पद्धति के अनुपात में उसका परिणाम अधिक देर से आता है। इसी प्रकार अल्लाह को ब्रह्म के रूप में स्थापित न करके पैगम्बर पर अधिक ध्यान दिया गया है।
वास्तव में सबसे प्राचीन सेमेटिक धर्म यहूदी धर्म में भी यहूदी कानूनों और जीवन पद्धति पर ही अधिक जोर दिया गया था जिसका काफी कुछ अंश इस्लाम में देखने को मिलता है। जैसे सुन्नत, एक ही दिशा में प्रार्थना ( इस्लाम में भी मक्का से पूर्व जेरुसलम की ओर मुँह करके ही प्रार्थना की जाती थी)। यहूदियों के सहस्रों वर्षों तक अपने मूल स्थान से दूर रहने के कारण उनके लिये मूल यहूदी जीवन पद्धति और कानूनों का पालन करना सम्भव नहीं हो सका और जिस देश में वे रहते थे उसी परिवेश के आधार पर उन्होंने स्वय़ं को ढाल लिया इसी कारण यहूदी आज अधिक विकसित और प्रगतिशील हैं। सम्भव है कि वे अपने ही देश में रहते तो उनका स्वरूप कुछ दूसरा होता।
हिन्दू धर्म के जीवन पद्धति के रूप मे परिभाषित करने से हिन्दू के लिये एक समान कानूनी संहिता, रहन सहन, पहनावा, खान-पान और आचार व्यवहार की आवश्यकता होती है। वास्तव में पिछले सहस्रों वर्षों से विश्व में धर्म पर चर्चा होते समय सेमेटिक धर्मों के प्रकाश में अन्य धर्मों के गुणों को परखा जाता है। इस आधार पर एकरूपता को धर्म की पहली शर्त माना जाता है। इसी बहस का परिणाम है कि कुछ धारणायें पूरी तरह उलट गयी हैं। जो धर्म जीवन पद्धति है उसे सर्वश्रेष्ठ धर्म के रूप में आँका जाता है और जिस धर्म में सार्वभौमिक धर्म होने की क्षमता है उसे जीवन पद्धति कहा जाता है।
आज के वैश्वीकरण और वैज्ञानिक युग में इस बात पर टकराव करने का कोई कारण नहीं है कि किसके पैगम्बर या अवतार श्रेष्ठ हैं और किसके कमतर हैं। इस युग में बहस इस बात पर होनी चाहिये कि धर्म के लक्षण क्या हैं और धार्मिक आधार पर टकराव समाप्त करने के लिये किसी सार्वभौमिक धर्म की कल्पना की जा सकती है क्या? लेकिन यदि कोई इसके उत्तर में कहे कि हमारा धर्म ही सार्वभौमिक है क्योंकि हमारे पैगम्बर को ही अंतिम मानो तब तो टकराव ज्यों का त्यों बना रहेगा। इसी प्रकार कोई कहे कि सबके चर्च की शरण में आये बिना सार्वभौमिक धर्म की अवधारणा सफल नहीं हो सकती तो भी टकराव समाप्त नहीं होगा। सार्वभौमिक धर्म वही हो सकता है जो व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करे और उस पर नियम, कायदे, उपासना पद्धति या फिर किसी पैगम्बर का बोझ न डाले।
निश्चित रूप से अभी वह समय नहीं आया है लेकिन वह समय भी अधिक दूर नहीं है। हिन्दू धर्म को लेकर जो दुविधा सदैव से बुद्धिजीवियो में रही है वह दो स्तरों पर है। प्रथम, यदि हिन्दू धर्म की दार्शनिक अवधारणा और उसके औपनिषदिक चिंतन के आधार पर उसकी व्याख्या करें तो उसके लिये एक भौगोलिक ईकाई के आधार पर हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को पुष्ट कर पाना कठिन हो जाता है। क्योंकि हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप आत्मा की अमरता, कर्मफल का सिद्धांत और सृष्टि के बहुत्व में एकत्व की ब्रह्म की अवधारणा है जो योग की अनेक शाखाओं के माध्यम से आत्मतत्व की प्राप्ति का क्रियात्मक पक्ष प्रस्तुत करता है। इस पूरी धारणा में किसी राष्ट्र, जाति, नस्ल या धर्म की सीमायें नहीं हैं और यह आधात्यामिक विज्ञान किसी के लिये भी खुला है लेकिन इस पूरी अवधारणा में भी राष्ट्रवाद के लिये स्थान है क्योंकि भारत में हिन्दुओं के पूर्वजों ने अध्यात्म विज्ञान की खोज की है जो सबसे बडा विज्ञान है कि सृष्टि में जो कुछ भी बहुलता दिखाई देती है उसके बाद भी एक ही तत्व उसकी एकता का आधार है जो सभी से जुडा है। इसी कारण व्यष्टि और समष्टि में समंवय का सिद्धांत हिन्दू धर्म का आधार है जिसका वर्तमान प्रकटीकरण हिन्दुत्व में होता है। अध्यात्म विज्ञान का पेटेंट हिन्दुओं का है इसलिये इसकी रक्षा करने का दायित्व भी उन्हीं का है।
स्वामी विवेकानन्द ने पहली बार किसी भी धर्म की आलोचना या किसी भी पैगम्बर की बहस में पडे बिना धर्म की एक सार्वभौमिक व्याख्या करने का प्रयास किया था। उन्होंने धर्म को पुस्तक और पैगम्बर की बहस के दायरे से बाहर लाकर कुछ मूलभूत सिद्धांतों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया था। वर्तमान वैज्ञानिक युग में और वैश्वीकरण के इस युग में जब सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर सार्वभौमिकता का सिद्धांत स्थापित हो रहा है तो धार्मिक स्तर पर भी सार्वभौमिकता का सिद्धांत स्थापित होना ही चाहिये।
आज जिस तीव्रता से पश्चिम में और अफ्रीकी देशों में हिन्दू धर्म को स्वीकार किया जा रहा है उसका मूलकारण उसकी सार्वभौमिकता और व्यापकता है। हिन्दू धर्म किसी एक अवतार या पुस्तक पर आधारित नहीं है। इसके कुछ मूलभूत सिद्धांत हैं जिसमें आत्मा की अमरता और ब्रह्म की व्यापकता है। इस सिद्धांत को सर्वस्वीकार्य बनाने के लिये और उसका सातत्य बनाये रखने के लिये जितनी दार्शनिक और बौद्धिक कसरत भारत में हमारे पूर्वजों ने की है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं हुई है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक दार्शनिक, पौराणिक और कर्मकाण्ड के स्तर पर एक ही सिद्धांत को प्रतिपादित करने का प्रयास हुआ। पुराणों की कथायें, कर्मकाण्ड ये भी उसी परम सत्ता के प्रति व्यक्ति को उन्मुख करते हैं। भारत में यदि कोई किसी देवता की आराधना करता है, पत्थर की उपासना करता है या फिर साँप की भी पूजा करता है तो वास्तव में उसमें विद्यमान उस ब्रह्म की आराधना करता है। विज्ञान भी तो सभी तत्वों को संचालित करने वाली शक्ति के अंवेषण में ही लगा है। विज्ञान के सभी आविष्कार एक ही दिशा की ओर संकेत करते हैं कि इस सृष्टि में बहुत्व में एकत्व है। लेकिन इस एकत्व को अनुभव करने का विज्ञान हिन्दू धर्म ने वर्षों पूर्व ही खोज निकाला था।
हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति सिद्ध करने का कारण केवल यही रहा है कि हिन्दू धर्म ने अपने मूलभूत सिद्धांतों को धर्म की परिभाषा का आधार बनाने का प्रयास ही नहीं किया। आयुर्वेद, अष्टाँग योग, गंगा, गायत्री, गोमाता, चारों धाम ये भारत की संस्कृति के नहीं हिन्दू धर्म की एकता के आधार हैं। आयुर्वेद, अष्टाँग योग व्यक्ति की वह आरम्भिक तैयारी है जब वह स्वयं को आत्मतत्व और ब्रह्म से साक्षात्कार के लिये तैयार करता है। इसी प्रकार चारों धाम, गंगा और गोमाता एक सामान्य हिन्दू को अपने बुद्धि विवेक के आधार पर हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों और ब्रह्म से जुडाव का आभास देते हैं। चारों धाम की यात्रा हिन्दू देश की सांस्कृतिक एकता का दर्शन करने के लिये नहीं करता वरन अपना परलोक सुधारने के लिये करता है। इसी प्रकार गंगा का दर्शन करने लोग इस भाव से नहीं जाते कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से भावविभोर हो जायें वरन इस भाव से जाते हैं कि गंगा स्वयं शिव की जटा से निकली हैं और इसमें स्नान करने से उनके पापों का मोचन होगा। भारत में सांस्कृतिक विविधता में भी एकता का भाव उसकी बहुत्व में एकत्व की आध्यात्मिक अवधारणा के कारण है और यही कारण है कि राम मन्दिर आन्दोलन में राम उसी ब्रह्म की एकता के प्रतीकरूप थे। राममन्दिर आन्दोलन में लोगों ने भाग विशुद्ध आध्यात्मिक भाव से लिया था।
अब अवसर आ गया है कि हिन्दुत्व को लेकर चल रही बहस पर कुछ ठहर कर विचार किया जाये और बिना सोचे समझे इसे जीवन पद्धति कहते रहने के स्थान पर तुलनात्मक धर्म का विमर्श आरम्भ किया जाये और धर्म के मूलभूत तत्वों के सन्दर्भ में सभी धर्मों की व्याख्या की जाये और जीवन पद्धति और धर्म का अंतर स्पष्ट किया जाये। इतने वर्षों में धर्म के आध्यात्मिक स्वरूप की अवहेलना करते रहने से धर्म का बाह्य स्वरूप ही धर्म का प्रतीक बनता जा रहा है और सारा झगडा बाह्य स्वरूप पर हो रहा है। धर्म के आधार पर खान-पान, रहन-सहन, आचार-व्यवहार को स्थापित करने के प्रयास के कारण विवाद पनपते हैं। भारत में हिन्दुओं में सांस्कृतिक आधार पर विविधता होते हुए भी आपस में एकता का आधार आध्यात्मिक संचेतना का मूलबिन्दु का एक होना है और सभी सांस्कृतिक विविधतायें इसी मूलबिन्दु पर केन्द्रित हैं। जबकि इसके विपरीत अन्य धर्मों का केन्द्रबिन्दु आध्यात्मिक न होने से मूल समस्या है और विषय यह उठाया जाता है कि इतनी सांस्कृतिक विविधताओं के लोग भारत में एक साथ रहते हैं तो फिर कुछ धर्मों के साथ क्या समस्या है? समस्या यही है कि एक तो उनका धार्मिक केन्र्् हिन्दू धार्मिक केन्द्र के साथ मेल नहीं खाता और वे अपनी धार्मिक श्रेष्ठता को भारत पर थोपने का प्रयास करते हैं।
वर्तमान वैश्वीकरण और वैज्ञानिक युग में वही विचारधारा या धर्म लोगों को संतुष्ट कर सकता है जो बहुत्व में एकत्व की बात करे और मानव मात्र को समभाव से देखे। हिन्दू धर्म ने जिस आध्यात्मिक विज्ञान की सर्जना की है वह देश काल परिस्थिति से परे सतत विकासमान धारा है जो शरीर, मन, बुद्धि से परे आत्मा के प्रदेश में ले जाती है और प्रकृति से भी स्वतंत्र कर पूर्ण मुक्ति प्रदान करती है।
इसी सिद्धांत के आधार पर विश्व को आगे बढना उसकी नीयति है। वैसे भी विश्व इतिहास पर यदि दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि जिहाद और क्रुसेड के काल के बाद से व्यक्ति दिनोंदिन स्वतंत्रता की ओर ही बढ रहा है। प्रबोधन युग में यूरोप ने चर्च की जडता को तोडा, फिर व्यक्ति की महत्ता को स्थापित किया गया, फ्राँसीसी क्रांति से पहले रूसो जैसे विद्वानों ने व्यक्ति की इच्छा का सिद्धांत स्थापित कर कहीं न कहीं व्यक्ति के भीतर विद्यमान स्वतंत्र सत्ता को ट्टोलने का प्रयास किया और फिर राजनीतिक संस्थाओं के द्वारा भी व्यक्ति को सार्वभौम सत्ता के रूप में स्थापित किया गया और आधुनिक युग में लोकतंत्र की सैद्धांतिक अवधारणा यही है कि व्यक्ति की इच्छा का सम्मान होना चाहिये। यह बात अलग है कि व्यावहारिक रूप से इसका प्रयोग अपने सिद्धांत के अनुरूप खरा उतरा या नहीं।
औपनिवेशिक काल का नस्ली श्रेष्ठता का विचार भी स्थायी नहीं रहा और फिर भौतिक द्वन्द्व का कम्युनिष्ट सिद्धांत भी अल्पकालिक सिद्ध हुआ। अब वैश्वीकरण का सिद्धांत स्थापित हो रहा है। अनेक पूर्वाग्रहों के चलते इस संक्रमण काल को अनेक रूपॉं में परिभाषित किया जा रहा है लेकिन वैश्वीकरण की यह संस्कृति शनैःशनैः सार्वभौमिकता के सिद्धांत को प्रबल कर रही है। अब राष्टृ राज्य और सरकारों की संस्कृति ढीली पड रही है और बहुराष्ट्रीय संस्कृति पनप रही है जहाँ व्यक्ति नस्ल, जाति, देश और सिद्धांतों की सीमाओं से परे व्यक्तिगत सम्बन्धों को मह्त्व दे रहा है। आज विश्व में अनेक स्थानों पर ऐसे निजी और व्यक्तिगत प्रयास सामने आ रहे हैं जिन्होने किसी भी राज्यगत संस्था से अधिक प्रभाव अर्जित किया है। शनैः शनैः विश्व एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ आने वाले वर्षों में अनेक प्रचलित अवधारणायें ध्वस्त होंगी और व्यक्ति अधिक स्वतंत्रता की ओर उन्मुख होगा और ऐसी स्थिति में शायद धर्म भी उसे सीमित नहीं कर सकेगा यदि उसकी सार्वभौमिक पहुँच नहीं है।
क्या है चीन की मंशा ?
इन दिनों चीन सीमा विवाद अचानक सुर्खियों में आ गया है। देश के एक प्रसिद्ध सामरिक विशेषज्ञ भरत वर्मा ने तो चीन की वर्तमान और भावी परिस्थितियों के आधार पर यह भविष्य़वाणी भी कर दी है कि चीन अपनी आंतरिक स्थितियों के दबाव में देश को कम्युनिष्ट तंत्र के अंतर्गत एकजुट रखने के लिये 2012 तक भारत पर आक्रमण कर सकता है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह काफी कुछ सम्भव सा दिखता है। चीन में कहने को तो काफी तीव्र आर्थिक विकास हुआ है लेकिन इस विकास के साथ ही आर्थिक असमानता भी काफी तेजी से बढी है। इसके अतिरिक्त चीन ने अब अपना मूल बौद्ध ताओ स्वरूप सामने रखने के स्थान पर स्वयं को एक कम्युनिष्ट नस्लवादी शासन के रूप में परिवर्तित कर लिया है जो हान नस्ल को छोड्कर अन्य सभी नस्लों को दबाने और उन्हें द्वितीय श्रेणी का स्तर प्रदान करता है। तिब्बत, उइगर या फिर मंगोलियाई बौद्ध हों सभी के ऊपर चीन के हान कम्युनिष्टों ने अपनी नस्ली श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास किया है।
जो कुछ भी आज चीन का स्वरूप भारत के साथ दिखाई पड रहा है उसे वास्तव में सीमा विवाद माना जा रहा है लेकिन ऐसा चीन के सम्बन्ध में अधिक जानकारी नहीं होने के कारण है। भारत पर चीन के 1962 के आक्रमण के पश्चात एक समाजवादी सांसद शशिभूषण ने पहली बार चीन की यात्रा की थी और उसके बाद चीन की महत्वाकाँक्षाओं और सैन्य तैयारियों के आधार पर 1976 में उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी China, The Myth of Superpower । इस पुस्तक में लेखक ने कुछ मूलभूत बातों की ओर संकेत किया था। चीन ने माओत्से तुंग की अगुवाई में रूस के कम्युनिज्म से भी अधिक हिंसक और फासीवादी माओवादी कम्युनिज्म चलाया जो साम्राज्यवादी, युद्धपरक और दूसरे देशों में माओवाद को फैलाकर वहाँ नये प्रकार का माओवादी कम्युनिज्म स्थापित करना था।
माओ ने कम्युनिज्म के मूल शत्रु अमेरिका से सम्बन्ध स्थापित किये और एशिया में रूस के प्रभाव को समाप्त करने के लिये और स्वयं को साम्यवाद और कम्युनिज्म का प्रणेता सिद्ध करने के लिये रूस विरोधी रणनीति अपनाई और अमेरिका द्वारा वियतनाम पर आक्रमण करने पर वियतनाम का साथ नहीं दिया जबकि यह युद्ध पूरी तरह अमेरिका बनाम कम्युनिज्म का था। माओ के चीन ने अमेरिका के साथ सामरिक हथियारों की खरीद फरोख्त भी की। इस प्रकार चीन ने कम्युनिज्म के वैश्विक आन्दोलन से स्वयं को अलग ही रखा और एक अलग प्रकार का माओवाद खडा किया जो मूल रूप में साम्राज्यवादी और चीन के एशिया में प्रभाव विस्तार की नीति पर आधारित है।
चीन में हान नस्ल के लोगों की संख्या सीमित है परंतु देश के प्रमुख पदों पर उन्हीं का नियंत्रण है और सभी हान कम्युनिष्ट हैं। कम्युनिष्ट शासन के अधीन नस्लवाद का ऐसा स्वरूप खडा किया गया है कि अन्य नस्लों की महिलाओं को हान पुरुष से ही विवाह करना या फिर उनका अपहरण कर उनकी नस्ल बदलने का राज्य प्रायोजित अभियान पूरे चीन में अनेक दशकों से चल रहा है और इसके परिणामस्वरूप तिब्बत और मगोलिया को चीन हडप कर चुका है और सीक्यांग में भी यही नीति लागू कर मुस्लिम विद्रोह को शांत रखा गया है।
चीन में प्राचीन काल से हान राजवन्श के समय से ही चीन में प्रमुख रूप से हान स्वयं को श्रेष्ठ नस्ल के रूप में देखते हैं जिनकी दृष्टि में उन्हें विश्व पर शासन करने का अधिकार मिला है। माओ के काल में माओवाद के साथ हान नस्ल का यह मिलन एक नयी साम्राज्यवादी मानसिकता के रूप में विकसित हुआ है। चीन ने स्वयं को एक बन्द समाज के रूप में रखा जिसकी योजना, राष्ट्र के उद्देश्य और सैन्य मह्त्वाकाँक्षाओं के बारे में बाहर के लोगों को कभी पता नहीं चल सका यही कारण है कि चीन के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के विचार हैं।
भारत में चीन को लेकर दो प्रकार के विचार हैं – एक तो कम्युनिज्म और समाजवाद के प्रभाव से प्रभावित लोग अमेरिका को प्रथम शत्रु मानते हैं इसलिये अमेरिका जैसी बुराई से निपटने के लिये भारत और चीन की आपसी एकता की वकालत करते हैं और दूसरा विचार वह है जो सदैव चीन को शंका की दृष्टि से देखता है।
वास्तव में चीन से सतर्क रहने की आवश्यकता है। जो विचारधारा भारत और चीन को आर्थिक महाशक्ति मानकर संयुक्त रूप से अमेरिका को चुनौती देने की बात करते हैं वे भूल जाते हैं कि दो बराबर की शक्तियाँ आपस में तभी टकराव और युद्ध से बची रह सकती हैं जब उनके सामरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तीनों में से कोई भी हित न टकराता हो। चीन आर्थिक दृष्टि से जितना निकट अमेरिका के है उतना भारत के नहीं है। चीन डायनासोर की तरह बढती अपनी आर्थिक व्यवस्था और उत्पादन के लिये भारत को बाजार की भाँति देखता है जबकि भारत में भी उपभोक्ता से अधिक ऐसी अर्थव्यवस्था है जो भी निर्माण ही करती है इस दृष्टि से अमेरिका चीन के लिये अधिक उपयुक्त बाजार है जहाँ उपभोक्ता अधिक हैं। इसलिये चीन और भारत के आर्थिक हित एक नहीं हैं क्योंकि चीन को बाजार की आवश्यकता है और भारत में भी मझोले, छोटे, कुटीर और ग्रामीण उद्योगों के लिये बाजार की आवश्यकता है ऐसे में भारत का बाजार यदि चीनी माल से पट गया तो भारत के उत्पादकों का क्या होगा?
इसी प्रकार चीन और भारत के सामरिक हित पूरी तरह टकराते हैं। क्योंकि हिन्द महासागर से लेकर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप सहित दक्षिण पूर्व एशिया में चीन अपने पाँव पसारना चाहता है और इस क्षेत्र में चीन का सामरिक प्रभाव भारत के लिये खतरनाक है क्योंकि चीन सामुद्रिक सीमा और भारत से सटी सीमा का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिये निश्चित रूप से करेगा जैसा कि वह पाकिस्तान के माध्यम से करता आया है।
इसी प्रकार भारत और चीन की एकता की बात करने वाले लोग भारत और चीन के सांस्कृतिक सम्बन्धों की दुहाई देते हैं लेकिन यहाँ भी विरोधाभास है क्योंकि चीन भारत की भाँति अपने सांस्कृतिक सातत्य से जुडा नहीं है और अब वहाँ संस्कृति और धर्म के स्थान पर माओवादी कम्युनिज्म को एक सम्प्रदाय के रूप में स्थापित कर दिया गया है। यह सत्य है कि अब भी अधिकाँश चीनी अपनी मूल सांस्कृतिक परम्परा से विमुख नहीं हुए हैं लेकिन माओवादी कम्युनिष्ट शासन के अंतर्गत उनकी आवाज दबी हुई है।
इसी प्रकार चीन किसी भी प्रकार अमेरिका से सामरिक टकराव नहीं चाहता। कभी कभी एक विचार यह भी आता है कि चीन के सीक्यांग प्रांत में इस्लामी अलगाववाद के चलते चीन वृहद आतंक के विरुद्ध युद्ध में साथ आ जायेगा। यह बात भी दिवा स्वप्न है एक तो सीक्यांग प्रांत में चीन के कम्युनिष्ट शासन ने न केवल दमन किया है वरन वहाँ भी हान नस्ली श्रेष्ठता का दाँव खेल कर काफी संख्या में हान वर्चस्व को स्थापित कर दिया है जो किसी भी स्थिति में शक्ति संतुलन का कार्य करेंगे। वैसे भी पाकिस्तान के साथ चीन के अटूट सम्बन्धों के चलते सीक्यांग प्रांत की समस्या के वैश्विक इस्लामी आन्दोलन से जुड्ने की सम्भावना कम ही है। पिछले वर्षों में हमने देखा कि किस प्रकार चीन ने ग्वादर बन्दरगाह पर कार्य कर रहे अपने इंजीनियरों को इस्लामी आतंकवादियों के चंगुल से छुडा लिया और इस कार्य में पाकिस्तान सरकार ने मध्यस्थता की। इसलिये इस बात की सम्भावना अत्यंत क्षीण है कि सीक्यांग की समस्या इतनी बढ जायेगी कि चीन अपने साम्राज्यवादी उद्देश्यों को बदल देगा।
चीन के सम्बन्ध में कोई भी चर्चा और बहस भारत में अभी तक इसलिये अधिक नहीं हुई कि भारत में मीडिया सहित बौद्धिक क्षेत्रों में या तो कम्युनिष्ट या फिर शीत युद्ध कालीन मानसिकता के लोगों का प्रभुत्व है जो अपने अपने कारणों से अमेरिका को ही केन्द्र में रखकर चिंतन करते हैं। इसी कारण पिछले एक दशक में जब समस्त विश्व लादेन और बुश के रूप में ध्रवीकृत हो गया तो चीन ने अपनी तैयारी इस पूरे युद्ध से अलग रहकर बनाये रखी।
सैमुअल हट्टिंगटन ने सभ्यता के संघर्ष की जो परिकल्पना दी थी उसमें लोगों ने इस्लाम बनाम पश्चिम के संघर्ष पर अधिक ध्यान दिया जबकि चीन भी इसी ग्र्ंथि का शिकार है। चीन को अपनी विशाल सेना पर अधिक विश्वास है।
चीन के शासक इस योजना पर वर्षों से विचार कर रहे हैं कि किस प्रकार समस्त एशिया में उनका नियंत्रण हो। चीन में समय समय पर ऐसी पाठ्य पुस्तकों का उल्लेख सामने आता है जिसमें दक्षिण पूर्व एशिया के अनेक देश चीन के मानचित्र में नजर आते हैं। माओ ने जिस वृहद चीन की कल्पना की थी उसमें भारत के भी कुछ हिस्से थे। वास्तव में माओ विश्व इतिहास के उस दौर की पौध हैं जब विश्व ने फासीवाद, साम्राज्यवाद, नाजीवाद का दौर देखा था और माओ ने इन सभी का रूपांतरण चीन के प्राचीन हान राजवंश की साम्राज्यवादी पिपासा के साथ कर दिया और चीन का राष्ट्रीय उद्देश्य निश्चित कर दिया।
आने वाले समय में चीन के साथ भारत का टकराव अवश्यंभावी है और चीन भारत में नक्सलवाद, पूर्वोत्तर में उग्रवाद और पाकिस्तान को सहायता कर भारत में अपने लिये पाँचवा स्तम्भ तैयार कर रहा है।
जो लोग वर्तमान युग में केवल शांति और आर्थिक आधार पर देशों के सम्बन्धों को परिभाषित कर रहे हैं उन्हें समझ लेना चाहिये कि किसी भी युद्ध का कारण किसी देश की साम्राज्यवादी , नस्ली या फिर धार्मिक मह्त्वाकाँक्षा होती है। चीन न केवल भारत के लिये वरन समस्त एशिया के लिये खतरा बनने वाला है।
चीन ने पिछले दस वर्षों में आर्थिक विकास किया और केवल आर्थिक विकास का आभास दिया लेकिन इस दौरान उसने अपनी सामरिक और रणनीतिक स्थिति को अत्यंत सशक्त कर लिया और इसी एक दशक में भारत ने अपनी कमजोरी समस्त विश्व के समक्ष उजागर कर दी। 1999 में विमान अपहरण के बदले आतंकवादियों को छोडना, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री का चीन की यात्रा पर तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग मान लेना, पाकिस्तान बस लेकर जाना और बदले में कारगिल युद्ध लडना, पडोस के तानाशाह परवेज मुशर्रफ को आगरा बुलाना और बदले में 13 दिसम्बर 2001 को भारत की संसद पर आक्रमण झेलना और बदले में कुछ न कर पाना, जम्मू में सेना की छावनी में कालूचक में सेना के परिजनों की हत्या और बदले में सेना को एक वर्ष सीमा पर रखने के बाद भी पाकिस्तान के रवैये में सुधार न करवा पाना, देश में इस्लामी आतंकवाद के चलते हजारों लोगों की मृत्यु के बाद भी 26 नवम्बर 2008 को देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई पर भीषण आक्रमण के बाद भी असहाय सा दिखने के बाद चीन क्या समस्त विश्व को पता चल चुका है कि भारत सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से कितना असहाय है। आज चीन , पाकिस्तान और अमेरिका सभी जानते हैं कि भारत किसी भी कीमत पर शांति चाहता है और इसलिये यदि उसे आक्रामक स्थिति में उलझा दिया जायेगा तो वह समुचित प्रतिकार नहीं कर सकेगा।
आज चीन सीमा पर जो भी टकरावपूर्ण नीति अपना रहा है उसके लिये वर्तमान सरकार ही दोषी नहीं है क्योंकि वर्तमान प्रधानमंत्री वही नीति अपना रहे हैं जो उनसे पूर्व के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनाई थी। पाकिस्तान के साथ किसी भी कीमत पर शांति, कश्मीर में एकतरफा युद्ध विराम और बातचीत से हल निकालना और कश्मीर समस्या के समाधान के लिये बातचीत का दायरा इन्सानियत रखना। चीन से अरुणाचल और सिक्किम के मामले में कोई भी गारण्टी न मिलने पर भी तिब्बत को चीन का अभिन्न मान लेना वास्तव में एक बार फिर भारत की विदेश नीति को जवाहरलाल नेहरू के रास्ते पर ले जाने जैसा था जिस रास्ते को 1991 में पी वी नरसिम्हाराव ने छोड दिया था। आज भारत जो कुछ भी दबाव अनुभव कर रहा है उसके पीछे पिछले एक दशक की भूलें हैं। पिछ्ले एक दशक में राजनीतिक दलों ने देश को विश्व पटल पर हँसी का पात्र बना दिया है जिसके नेता आर्थिक आँकडों में हेरफेर कर जनता को गुमराह कर झूठा भुलावा दे रहे हैं कि सर्वत्र शांति है बस अर्थ साधना में लगे रहो।
एक बार फिर देश की सुरक्षा और मनोबल के विषय को दलीय आधार पर बहस के दायरे में लाया जा रहा है। देश का दुर्भाग्य है कि देश के समक्ष उपस्थित इन खतरों से ध्यान हटाने के प्रयास किये जा रहे हैं। यदि किसी के विमान के इकोनोमी क्लास में यात्रा करने या फिर शताब्दी ट्रेन में यात्रा करने से देश की जटिल समस्याओं का समाधान हो जाता तो फिर नेताओं के कार्यकाल के बाद उनके कार्यों की समीक्षा इतिहास क्योंकर करता?
राजनीति का अजीर्ण
जब से देश में लोकसभा चुनावों का परिणाम आया है सर्वत्र एक ही चर्चा होती आ रही है और वह है राजनीति की। देश का प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार से राजनीति को लेकर ही चिंतित है। किसी की चिंता है कि अब भाजपा का क्या होगा तो किसी की चिंता है कि अब देश में विपक्ष की राजनीति का क्या होगा? बीते तीन माह में अभी तक मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो देश की सुरक्षा, देश के विकास या इसकी संस्कृति से जुडे विषयों पर चर्चा करने का इच्छुक हो कोई भी बात आरम्भ होती है तो ले देकर भाजपा के भविष्य पर टिक जाती है। कभी कभी तो मुझे आश्चर्य होता है कि जिस राजनीतिक दल के लिये लोग इतने चिंतित हैं आखिर वह चुनावों में पराजित कैसे हो गया? खैर यह तो और बात है लेकिन मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि राजनीति पर समाज की इतनी निर्भरता आखिर क्या संकेत देती है? यह समाज के लिये सकारात्मक सन्देश है या नकारात्मक। मेरी अपनी दृष्टि में तो नकारात्मक है। चुनावों के समाप्त होने और नयी सरकार बनने के उपरांत पिछले तीन माह में मैने कुछ भी नहीं लिखा केवल भाजपा की पराजय के कारणों वाला एक लेख छोडकर। इसके पीछे प्रमुख कारण यही रहा कि मैं इस पूरी बहस के थमने की प्रतीक्षा कर रहा था और देखना चाहता था कि क्या राजनीतिक अतिरेक केवल क्षणिक है या फिर यह संस्कार बन चुका है?
इन तीन महीनों में देश के कुछ क्षेत्रों में भ्रमण के उपरांत मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि समाज पूरी तरह राजनीति परक और राज्य मुखापेक्षी हो चुका है। समाज में अब जागरूकता भी है लेकिन राजनीति के प्रति आकर्षण भी गजब का है। इसके पीछे दो कारण हैं। पहला, समाज के विकसित होने और जातिवाद और जमींदारी व्यवस्था के पूरी तरह ढीला पड जाने से समाज में विशेषाधिकार सम्पन्न होने की अभिलाषा राजनीति के द्वारा ही पूर्ण होती दिखती है। अब भी भारत में जनप्रतिनिधि सामान्य जनता से अधिक रूतबे वाला माना जाता है और लोग उसे नमस्कार करते हैं जैसे किसी जमाने में रियासत के राजा और जमींदार को करते थे। यही कारण है कि राजनीति के प्रति आकर्षण तेजी से बढ रहा है। दूसरा प्रमुख कारण पिछले कुछ दशक में राजनीति में धन की अपार सम्भावनाओं ने युवाओं को इसकी चमक दमक से ओत प्रोत कर दिया है। राजनीति में अपार भ्रष्टाचार से और सांसद, विधायक निधि से लेकर पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत स्थानीय निकायों को मिलने वाली विकास राशि ने ठेकों की एक नयी संस्कृति विकसित कर दी है जो राजनेता के इर्द गिर्द रहने से चुट्कियों में लखपति बना देती है। सांसदों, विधायकों और स्थानीय निकाय को मिलने वाले धन ने राजनीति को युवाओं के लिये एक नया व्यवसाय और प्रोफेशन का विकल्प दे दिया है यही कारण है कि पूरे देश में सर्वत्र एक ही चर्चा है और वह है राजनीति।
युवा से लेकर समाज सुधारक तक सभी यह मान बैठे हैं कि यदि अपना या समाज का कोई सुधार करना है तो राजनीति ही वह माध्यम है जिससे सफलता मिल सकती है। अब तो गाँव भी राजनीतिक दलों और विचारधाराओं में बँट गये हैं और ऐसा कि बात दुश्मनी तक आ जाती है।
राजनीति का यह ज्वार इस प्रकार उठा है कि अब प्रत्येक विचारधारा, सोच और आदर्श राजनीति के घटिया दाँव पेंच में उलझ कर रह गया है। समाज का स्वय़ं पर से विश्वास उठता जा रहा है और पूरा समाज प्रवाह पतित की भाँति एक ही दिशा में प्रवाहमान है। हर कोई सोच पाल बैठा है कि समाज का कोई भी सुधार राजनीति के रास्ते ही सम्भव है। इसका परिणाम यह हुआ है कि शब्दों ने अपने मायने बदल दिये हैं। अब बडे बडे आदर्शवादी शब्द केवल इसलिये बोले जाते हैं कि लोकतंत्र में जनता का हुजूम अपने पीछे लाकर अपनी राजनीतिक कीमत लगाई जा सके।
हालाँकि यह बात भी पूरी तरह सत्य है कि भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा इस प्रकार का है कि कोई भी जनान्दोलन या जनअभिव्यक्ति की तार्किक परिणति राजनीति और सत्ता में ही होती है लेकिन समस्त समाज का इस प्रकार राजनीति के प्रति आकर्षण पाल लेना कहाँ तक उचित है यह अवश्य सोचनीय विषय है।
लोकसभा चुनावों के समाप्त होने के उपरांत भारत के समाज के समक्ष कुछ प्रश्न समय ने खडे किये हैं जिनका समाधान भारत को ही करना है और उनमें से एक प्रश्न है भारत अब किस राह चलेगा? इसका समाधान राजनीति में नहीं है। कोई भी राजनीतिक दल वर्तमान व्यवस्था में इसका समाधान नहीं कर सकता और जो भी व्यवस्था परिवर्तन की बात करता है वह समाज को गुमराह करता है क्योंकि जिस व्यवस्था के चलते समस्यायें आती हैं उन्हें बदलने का साहस किसी में नहीं है। क्योंकि अभी तक इस बात पर विचार ही नहीं हुआ कि कौन सी व्यवस्था भारत के लिये उपयुक्त है।
आज देश में जहाँ समाज के अधिकाँश लोग राजनीति के आकर्षण में लिप्त हैं तो वहीं समाज में परिवर्तन की आहट भी सुनायी पड रही है। लेकिन दुखद पक्ष यह है कि परिवर्तन के लिये प्रयासरत शक्तियाँ किसी न किसी विचारधारा को पकड कर चल रही हैं और उन अभी विचारधाराओं में सामयिक परिवर्तन की आवश्यकता है क्योंकि प्रत्येक विचारधारा का एक कालखण्ड होता है क्योंकि कोई भी दृष्टा अपने युग, देश काल परिस्थिति के अनुसार ही परिस्थितिजन्य समाधान समाज को देता है और समाज अर्थात व्यक्तियों का समूह सतत विकासमान रहता है इसलिये कोई कितना भी दृष्टा क्यों न हो एक समय के बाद उसके विचारों के कुछ तत्व निश्चय ही पुराने पड जाते हैं। यही कुछ भारत के सन्दर्भ में हो रहा है। आज भारत में राजनीति का कोई आदर्श और उद्देश्य नहीं रह गया है क्योंकि देश और समाज ने अपने लिये कोई लक्ष्य या उद्देश्य ही निर्धारित नहीं किया है। ऐसी अवस्था में व्यक्तिगत स्वार्थ, अर्थ साधना और भोगवाद चरम पर है।
आज विचार के स्तर पर भारत में जडता आ गयी है और हर विचारधारा सामयिक परिवर्तन के लिये कोई प्रयास ही नहीं कर रही है।
भारत के सभी विचारक और लेखक अपने युग का बोझ ढो रहे हैं। ये लोग अपने पूर्वाग्रहों और युग बोध से आगे नहीं बढ पा रहे हैं और समाज में आये परिवर्तन को भाँप पाने का साहस दिखाते नहीं दिखते।
आज वैश्विक स्तर पर और भारत के स्तर पर कुछ बडे परिवर्तन हो रहे हैं और उनमें से एक है कुछ परिकल्पनाओं का ढहना। इसी प्रकार की एक परिकल्पना है कम्युनिज्म जो पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी है। भारत की स्वतंत्रता के उपरांत जिन दो परिकल्पनाओं ने भारत के मूल हिन्दू जागरण को भ्रमित कर स्वतंत्रता को अपनी हिन्दू पहचान प्राप्त करने के व्यापक अभियान से राजनीतिक अभियान तक सीमित कर दिया था उसमें एक कम्युनिज्म और दूसरा सेक्युलरिज्म है। कम्युनिज्म की समतामूलक समाज की अवधारणा की छाया तले पल रहे समाजवादी आन्दोलनों ने भी दम तोड दिया और सभी समाजवादी परिवारवाद और पूँजीवाद के पैरोकार हो गये। कम्युनिज्म के क्षीण होने से अब धर्म की पहचान का आग्रह सतह पर आ गया है और इसी कारण सेक्युलरिज्म का कृत्रिम आभास भी ध्वस्त होते देर नहीं लगेगी।
वैसे तो सेक्युलरिज्म की परिकल्पना या अवधारणा अपने आप में एक बडा छलावा है। क्योंकि फ्रांसीसी क्रांति के बाद से जिस आधुनिक युरोप का विकास हम राजनीतिक धरातल पर होते हुआ पाते हैं उसके बाद भी युरोप ने कभी भी अपनी ईसाई पहचान के साथ समझौता नहीं किया है। नेपोलियन बोनापार्ट के विरुद्ध युरोप और रूस का एकजुट होने का आधार ही ईसाइयत को बचाना था। वास्तव में जो भी विश्व इतिहास लिखा गया वह वर्ग संघर्ष और भौतिक द्वन्द्व के पूर्वाग्रह से इस कदर प्रभावित रहा है कि युरोप के इतिहास में धर्म के तत्व को पूरी तरह नजरअन्दाज कर दिया गया है। यदि फ्रांसीसी क्रांति के बाद भी युरोप का इतिहास देखा जाये तो पश्चिम ने कभी भी अपनी ईसाई पहचान के साथ समझौता नहीं किया और आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था का चर्च के साथ टकराव इस बात पर रहा कि राज्य का नियंत्रण आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं के हाथ में रहे।
फ्रांसीसी क्रांति के बाद से कम्युनिज्म के क्रमशः विकास के चलते कम्युनिज्म और सेक्युलरिज्म का ऐसा घाल मेल हो गया कि उपनिवेशवाद के पश्चात स्वतंत्र हुए देशों ने सेक्युलरिज्म को अपने मूल धर्म के अवरोध के रूप में अपना लिया जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण भारत के समक्ष है जहाँ हिन्दू धर्म को विकास और राज्य व्यवस्था के लिये प्रतिगामी मान कर उसे हतोत्साहित करने का प्रयास किया गया जबकि वहीं इस्लाम और ईसाइयत को प्रोत्साहन दिया गया।
अब कम्युनिज्म के ध्वस्त होते ही धार्मिक पहचान को लेकर आग्रह बढता जा रहा है क्योंकि अब बौद्धिक वर्ग संशयवाद और नास्तिकता के दौर से बाहर आ चुका है और अपनी धार्मिक पहचान को लेकर मुखर होता जा रहा है।
विश्व में हो रहे इन परिवर्तनों के पीछे सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अब वैश्वीकरण एक स्थापित सत्य बनता जा रहा है जो अनेक आर्थिक और सांस्कृतिक सम्भावनाओं को जन्म देता है। वैश्वीकरण का यह विस्तार अब रुकने वाला नहीं है और बहुराष्ट्र्रीय कारपोरेट संस्कृति और सूचना के प्रवाह के चलते एक विशेष प्रकार के पदार्थवाद और वैज्ञानिकवाद का जन्म हो रहा है। एक ओर वैश्वीकरण के प्रभाव के चलते जहाँ पदार्थवाद और भोगवाद को प्रश्रय मिल रहा है वहीं वैज्ञानिक जिज्ञासा भी बढ रही है और इस कारण कोई भी विचार या मान्यता जो जिज्ञासु मन को शांत नहीं कर सकती अप्रासंगिक होती जायेगी। इस दौर में एक बार फिर सत्य , रहस्य और दार्शनिक विचारों की ओर आकर्षण बढने वाला है इसलिये इसी सन्दर्भ में नये विचारों की माँग समाज कर रहा है।
वैश्विक स्तर पर हो रहे इन परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में भारत को अपनी आध्यात्मिक और सत्यांवेषण प्रधान विचारधारा के अनुरूप समाज और राजनीति का विकास करना होगा। जिस प्रकार आध्यात्मिक स्तर पर बहुत्व में एकत्व का सिद्धांत हमारे ऋषिय़ॉं ने खोज निकाला और सभी आध्यात्मिक धाराओं को एकजुट किया उसी आधार पर समाज और राजनीति को विकसित करने की आवश्यकता है।
इस युग में स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जा सकता। कोई भी राष्ट्र, व्यक्ति, धर्म या जाति किसी अन्य की स्वतंत्रता का अपहरण नहीं कर सकता। इस युग का सत्य है स्वतंत्रता और उसे उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने की आवश्यकता है। स्वतंत्रता की इसी आकाँक्षा के चलते कोई भी एक विचारधारा पर स्थिर नहीं रहना चाहता और अपने स्तर से उपयोगी सत्य का आभास प्राप्त करना चाहता है। आज विचारकों , लेखकों और सृजनात्मक अभिरुचि के व्यक्तियों को अपना युगीन पूर्वाग्रह छोड्कर नये सन्दर्भ में चीजों को देखना चाहिये। इस युग का सत्य यही है कि धर्म और भोगवाद साथ साथ बढ रहे हैं जो वैज्ञानिकवाद को अधिक सशक्त कर रहे हैं जिसकी परिणति है स्वतंत्रता की आकाँक्षा। भारत में सदियों से आध्यात्मिक दृष्टि से स्वतंत्रता रही है अब उसे सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी लाना है।
भारत को दूसरी सबसे बडी आवश्यकता देश की युवा शक्ति को रोजगार के साथ जोडने की है ताकि वह अपनी न्यूनतम आवश्यकता की चिंता से मुक्त होकर राष्टृ और धर्म की रक्षा में सन्नद्ध हो सके। आज भारत को राजनीतिक दलों की नहीं सामाजिक संगठनों की आवश्यकता है जो पढे लिखे ऊर्जावान और राष्ट्रभक्त युवाओं को जो अगले एक दशक में भारत को महाशक्ति के रूप में देखना चाहते हैं उन्हें गाँवों में भेज सकें ताकि कृषि, उद्योग, तकनीकी शिक्षा का एक जाल तैयार किया जा सके और गाँव रोजगार का केन्द्र बन सकें और शहरों की ओर पलायन रुक सके।
आज राजनीति के द्वारा देश का विकास नहीं होगा और न ही व्यवस्था परिवर्तन का नारा लगा कर युवाओं को बरगलाने से ही कोई क्रांति होगी। व्यवस्था परिवर्तन का नारा देने वाले या रामराज्य का नारा देने वाले बेचारे स्वयं व्यवस्था की कमियों का शिकार हो जाते हैं और फिर उनके समर्थक स्वयं को ठगा हुआ सा अनुभव करते हैं। भारत को महाशक्ति बनाने का रास्ता भारत के गाँवों के विकास से जाता है न कि माल, फ्लाई ओवर या सेंसेक्स के रास्ते। आज देश के युवाओं को गाँवों की ओर लौटो का नारा देने की आवश्यकता है। जिस देश के युवा के हाथों को काम मिलेगा, सम्मानजनक जीवन , स्वस्थ वातावरण मिलेगा तभी वह देश के बारे में सोच सकेगा। महानगरों में नारकीय जीवन व्यतीत करने वाला, जीवन भर झुग्गी में रहने वाला और ठेके के लिये नेताओं की चाकरी करने वाला युवा देश को क्या महाशक्ति बनायेगा?
आज बदलते हुए इस परिवेश में राजनीति के अजीर्ण से बचकर समाज और राष्ट्र की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। युवा प्रधान भारत के युवाओं को सक्षम और सशक्त बनाने से ही भारत का सर्वांगीण विकास सम्भव है। आज भारत इतिहास के मुहाने पर खडा है जहाँ से भारत को अपनी दिशा तय करनी है। अपनी सहस्रों वर्ष पुरानी आध्यात्मिक विचारधारा की स्वतंत्र और सत्यांवेषी प्रवृत्ति को समाज और राजनीति में ढालने का अवसर आ गया है। हर राष्ट्र का कुछ मूल तत्व होता है और भारत का मूल तत्व आध्यात्मिकता है। आध्यात्मिकता ही वैश्वीकरण और वैज्ञानिक युग की जिज्ञासा का समाधान दे सकता है जो अंततः प्रकृति पर विजय और उससे मुक्त होने की राह दिखाकर स्वतंत्रता की चरम परिणति तक पहुँचाती है।

