दिग्विजय सिंह के हिंदू आतंकवाद का सच

पिछले कुछ माह से कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह अपने कुछ तथाकथित बयानों को लेकर चर्चा में हैं। हालाँकि उनके बयान या उनकी राय कोई नयी नहीं है लेकिन जिस प्रकार पिछले माह सम्पन्न हुए कांग्रेस के महाधिवेशन में दिग्विजय सिंह को अपनी बात कहने का अवसर दिया गया और इसके लिये कांग्रेस के मंच का उपयोग हुआ उसके बाद इस बात के लिये कोई शंका नहीं रहा गयी कि जो कुछ कांग्रेस महासचिव कह रहे हैं वह उनकी व्यक्तिगत राय भर नहीं है और इसके लिये उन्हें कांग्रेस के आला कमान का वरदह्स्त प्राप्त है। Read more

भाजपा क्यो हैं भ्रम में?

यह लेख जब मैं लिख रहा हूँ तो कोई भी मुझसे यह प्रश्न अत्यंत सहजता से कर सकता है कि क्या मैं भाजपा के राजनीतिक स्वास्थ्य की कामना करते हुए स्वयं को निष्पक्ष मान सकता हूँ तो निश्चय ही कोई तटस्थ हुये बिना भी निष्पक्ष हो सकता है। बौद्धिक वर्ग में तटस्थता जैसी कोई वस्तु नहीं होती क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी विचार का पोषण अवश्य करता है और बौद्धिक व्यक्ति का दायित्व यह होता है कि वह निष्पक्ष होकर अपने पक्ष रखे। इसी धर्म का पालन करते हुए वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा की राजनीतिक दशा और दिशा की समीक्षा करने का प्रयास इस लेख में कर रहा हूँ। Read more

कश्मीर समस्या के विविध आयाम

इन दिनों कश्मीर समस्या एक बार फिर पूरे विकराल् स्वरूप के साथ हमारे समक्ष उपस्थित है। आज कश्मीर समस्या का जो स्वरूप हमें दिखाई दे रहा है उसके अनेक ऐतिहासिक कारण हैं जिनकी चर्चा समय समय पर होती रहती है परंतु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज भी कश्मीर हमारे समक्ष इतिहास के अनसुलझे प्रश्न की तरह मुँह फैलाये खडा है।

कश्मीर समस्या निश्चित रूप से देश की स्वतंत्रता के बाद देश के नेतृत्व की उस मानसिकता का परिचायक ही है कि देश का नेतृत्त्व क़िस प्रकार उन शक्तियों के हाथ में चला गया जो न तो भारत को एक सांस्कृतिक और न ही आध्यात्मिक ईकाई मानते थे। वे तो भारत को एक भूखण्ड तक ही मानते थे जिसका सौदा विदेशी दबाव में या अपनी सुविधा के अनुसार किया जा सकता है। आज कश्मीर के सम्बन्ध में यह बात पूरी तरह समझने की है कि कश्मीर भारत की मूल पहचान और संस्कृति का अभिन्न अंग सह्स्त्रों वर्षों से रहा है। कश्मीर के सम्बन्ध में एक बडी भूल यही होती है कि हम इसे भारत का अभिन्न अंग मानते हुए भी इसे एक राजनीतिक ईकाई भर मान कर संतुष्ट हो जाते हैं जिसका इतिहास 194 से आरम्भ होता है। कश्मीर के प्रति भारत का भावनात्मक लगाव जब तक उसकी ऐतिहासिकता के साथ चर्चा मे नहीं लाया जाता तब तक इसका पक्ष अधूरा रहेगा। इसी पक्ष के अभाव के चलते इस समस्या को पूरी तरह राजनीतिक सन्दर्भ में देखा जाता है और भारत का एक वर्ग कहीं न कहीं जाने अनजाने इस सम्बन्ध में हीन भावना से ग्रस्त होता जा रहा है कि कश्मीर में स्वायत्तता या फिर स्वतंत्रता की माँग पर विचार किया जा सकता है। इस प्रकार कश्मीर समस्या का एक आयाम तो उसे उसके सांस्कृतिक सातत्य में न देखने की भूल है। Read more

देश की सेक्युलर राजनीति के पुनर्मूल्याँकन का समय ?

पिछले वर्ष देश में हुए आम चुनावों के बाद से सामान्य तौर पर एक नारा देश की सेक्युलर शक्तियाँ लगा रही हैं कि अब भारत बदल गया है और लोग विकास चाहते हैं और पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति से तंग आ चुके हैं। यह बाद कहते समय जो बात इन तत्वों के ध्यान में रहती है वह यह कि अब विश्व में वैश्वीकरण का युग है और विश्व में एक क्षेत्र को दूसरे से पूरी तरह अलग थलग नहीं रखा जा सकता। ऐसे में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है कि जो कुछ रुझान समस्त विश्व मे हमें देखने को मिल रहा है उस पृष्ठभूमि में ही यदि भारत की राजनीति को समझने का प्रयास किया जाये तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सम्मुख हमारे उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर हमें देना ही होगा। इन प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि सेक्युलर परिभाषा और राजनीति का स्वरूप क्या होना चाहिये? इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार यूपीए सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में और फिर अपने दूसरे कार्यकाल में अभी तक पूरी तरह पश्चिम की शक्तियों के प्रभाव में अपनी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति को क्रियांवित करने का प्रयास किया है ठीक उसके विपरीत आतंकवाद और इस्लाम व मुस्लिम जनता के साथ सम्बन्धों को परिभाषित करने में इस माड्ल को अपनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। Read more

हिन्दू आतंकवाद का मिथक

देश में इन दिनों आतंकवाद पर चर्चा जारी तो है पर इसका स्वरूप और परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। आज आतंकवाद को हिन्दुत्व और हिन्दू के साथ जोडकर प्रस्तुत किया जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से इस तरह के समाचार समाचार पत्रों और टीवी मीडिया में आये हैं कि देश में अनेक मस्जिदों और मुस्लिम क्षेत्रों में हुए आक्रमणों में कुछ हिन्दू तत्वों का हाथ रहा है। इन समाचारों को आधार बनाकर और कुछ छुटपुट पुरानी घटनाओं जैसे बम बनाने के प्रयास आदि को मिलाकर कुछ प्रमुख पत्रिकाओं ने हिन्दुत्व आतंकवाद, हिन्दू आतंकवाद , भगवा आतंकवाद जैसे मिथक और अवधारणायें चलाने का अभियान चलाया है।
विशेष रूप से आउटलुक पत्रिका के ऐसे कुछ लेखों में बतायी गयी घटनाओं की तकनीकी व्याख्या और समीक्षा भी आगे के आलेख में की जायेगी परंतु यहाँ हिन्दू आतंकवाद की परिभाषा और उससे जुडे मिथक के राजनीतिक और विचारधारागत पहलू पर चर्चा की जायेगी।

हिन्दू आतंकवाद की इस परिभाषा और इस मिथक को समग्र रूप से हम तब तक नहीं समझ सकते जब तक इसके पीछे के विचारधारागत आग्रह को नहीं समझ सकते। जिन लोगों को ऐसे आक्रमणों के लिये आरोपी बनाया गया है उनके मामले में न्यायिक प्रक्रिया चल रही है इसलिये उस पर चर्चा करना उचित नहीं होगा। चर्चा का विषय यह है कि क्या इन घटनाओं के आधार पर हिन्दू आतंकवाद , हिन्दुत्व आतंकवाद या भगवा आतंकवाद की बात करना उचित है? Read more

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