भाजपा की समस्या है क्या?
बीते तीन चार माह में इस बात पर काफी चर्चा हुई है कि अब भाजपा का क्या होगा? लोकसभा चुनावों का परिणाम आते ही जिस प्रकार सर्वत्र यह विषय चर्चा के केन्द्रबिन्दु में है यह दो बातों की ओर संकेत करता है। एक देश में एकदलीय शासन की सम्भावना से लोग आशंकित हैं तो वही देश में पिछले डेढ दशक में विचारधारा के आधार पर आये परिवर्तन का यह संकेत है। तीन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम आने से यह चर्चा फिर प्रासंगिक हो उठी है।
देश की स्वतंत्रता के उपरांत कांग्रेस पार्टी ने जिस विचारधारा को अपनाया वह पूरी तरह कम्युनिज्म, सेक्युलरिज्म पर केन्द्रित रही। शीतयुद्ध के काल में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ने विदेश नीति में एक छ्द्म निर्गुट नीति के आधार पर एक काल्पनिक व्यवस्था नव स्वतंत्र अरब देशों और अफ्रीका के देशों के साथ खडा करने का प्रयास किया। लेकिन यह भी यथार्थ के ठोस धरातल पर आधारित नहीं थी और नेहरू जी की इन्हीं रूमानी नीतियों के कारण भारत में कम्युनिज्म और सेक्युलरिज्म को देश के निर्माण का आधार बनाया गया। जबकि इसके विपरीत देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू इतिहास के जानकार होते हुए भी भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन की मूल चेतना को समझने में असफल रहे। भारत का स्वतंत्रता संघर्ष हिन्दू नवजागरण की अभिव्यक्ति थी जिसका आधार बंकिम चन्द्र चटर्जी के आनन्दमठ, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती के ठोस धरातल पर आधारित था। इस पूरे आन्दोलन की चेतना के मूल में एक ही आकाँक्षा निहित थी कि भारत को महमूद गजनवी से पूर्व के भारत की पहचान से जोडा जाये। कांग्रेस ने देश की स्वतंत्रता के उपरांत इसके विपरीत नीतियाँ अपनाईं और तुर्की के कमाल अतातुर्क की तर्ज पर पण्डित नेहरू को लगा कि धर्म भारत के विकास को अवरुद्ध कर देगा इस कारण देश का नया स्वरूप सेक्युलरिज्म के आधार पर हो। यह शब्द संविधान में भले ही बाद में जोडा गया हो लेकिन स्वतंत्रता के समय से ही स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि को ठीक सन्दर्भ में नहीं समझा गया। गान्धी जी ने अपना पूरा आन्दोलन भक्ति आन्दोलन की तर्ज पर चलाया और राम को देश की आध्यात्मिक एकता का सूत्र बनाकर उसे तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ जोड दिया लेकिन हिन्दू मुस्लिम समस्या को लेकर वे भी उलझ गये।
1970 के दशक से देश में लगातार कांग्रेस विरोधी राजनीति के विकल्प के आते रहने से राजनीतिक स्तर पर तो कांग्रेस विरोध का ध्रुव बन रहा था लेकिन वैचारिक स्तर पर विकल्प 1980 के दशक में खडा होना उस समय आरम्भ हुआ जब कांग्रेस ने नरम हिन्दुत्व का आधार छोडकर मुस्लिम तुष्टीकरण का रास्ता ग्रहण कर लिया। इसी प्रतिक्रिया में राममन्दिर आन्दोलन ने आकार ग्रहण करना आरम्भ किया। फिर भी राममन्दिर आन्दोलन में केवल एक ही पक्ष नहीं था।
वास्तव में आज भाजपा की विवशता का कारण यही है कि राममन्दिर आन्दोलन से जुडी अपनी पहचान को भुलाने के लिये वह आतुर है। भाजपा का विस्तार राममन्दिर आन्दोलन के साथ हुआ और इस विस्तार के अनेक आयाम हैं। शहरी क्षेत्रों में इस आन्दोलन से अधिकतर हिन्दू अल्पसंख्यकवाद के चलते असुरक्षा की भावना से जुडे थे तो ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के हिन्दू इस आन्दोलन के साथ आध्यात्मिक परम्परा के आधार पर जुडे थे। यही वह बिन्दु है जो आज भाजपा के संभ्रम का कारण है और इसी कारण हिन्दुत्व की अनेक व्याख्यायें हो रही हैं।
भारत की लाखों वर्ष पुरानी पहचान का आधार उसकी सांस्कृतिक एकता नहीं वरन आध्यात्मिक एकता है। संस्कृति तो रहन- सहन, खान पान, आचार व्यवहार के आधार पर बनती है जिसके सम्बन्ध में भारत में अत्यंत विविधता है फिर भी इस विविधता में एकता का कारण आध्यात्मिक संचेतना का केन्द्रबिन्दु एक होना है। देश में कोई भी भाषा बोलने वाला, कोई भी वस्त्र पहनने वाला, किसी भी प्रकार का आचार व्यवहार करने वाला एक सिद्धांत को अवश्य मानता है कि सभी मार्ग एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं और वह है आत्मतत्व। गूढ दार्शनिक सिद्धांतों को गाँव के लोग इतनी सरलता से अपनी कहावतों में कह जाते हैं जिस पर ग्रंथों की रचना की जा सकती है। भारत में हमारे पूर्वजों ने इस् गूढ दार्शनिक सिद्धांत को युगानुकूल और व्यावहारिक जीवन में प्रायोगिक बनाने के लिये अनेक वे नियम बनाये जिनका मूल उद्देश्य ही यह है कि व्यक्ति का जीवन इस प्रकार सुगठित हो कि वह इस सत्य को कभी न भूले कि यह जीवन अंतिम सत्य नहीं है। आयुर्वेद, अष्टाँग योग, चारों धाम, गाय, गंगा, गायत्री सभी इसी एक सत्य के साथ साक्षात्कार कराते हैं। परंतु देश में स्वतंत्रता के बाद स्वयं को सेक्युलरिज्म के दायरे में लाने के लिये हिन्दूवादी शक्तियों ने सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय हिन्दुत्व के सम्बन्ध में आने के बाद रटना आरम्भ कर दिया कि हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म दो अलग- अलग चीजें है और हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति जबकि सामान्य समाज में हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को पर्याय माना जाता है। इसी कारण हिन्दुत्व धीरे धीरे एक राजनीतिक अवधारणा बनती गयी और सामान्य हिन्दू समाज को इसमें मूल हिन्दू चेतना के गुण नहीं दिखे और जिसके जो मन में आया वह हिन्दुत्व की व्याख्या करता गया और अब हिन्दुत्ववादियों ने ही हिन्दुत्व को मखौल बना दिया है और मीडिया में आये दिन हिन्दुत्व का मजाक उडाया जाता है।
वास्तव में इसके पीछे कुछ कारण हैं। एक तो भारत को हिन्दू राष्ट्र मानते हुए भी उसकी आध्यात्मिक गूढता और उसके औपनिषदिक दर्शन के आधार पर राजनीति और समाज को संगठित करने का प्रयास नहीं हुआ और इससे भी दुखद यह कि पिछले कुछ सौ वर्षों में हिन्दू समाज ने आत्मग्लानि और पराजित मानसिकता का जो भाव अपने भीतर व्याप्त कर लिया है हिन्दुत्व आन्दोलन भी उसी ग्रंथि का शिकार हो गया है और वर्तमान समस्याओं का समाधान सेमेटिक धर्म और जीवन दर्शन के आधार पर देखा जाने लगा है। जैसे भारत की आध्यात्मिक साधना व्यक्ति को भौतिक जीवन से पलायन की शिक्षा देती है, इससे व्यक्ति कायर हो जाता है, इस विचारधारा पर चलकर राष्ट्रवाद के लिये कार्य सम्भव नहीं है। इसी के साथ एक पुस्तक , एक पैगम्बर, धार्मिक अनुयायियों की एकरूपता और एक जैसी जीवन पद्धति को ही आदर्श मानकर हिन्दू धर्म की व्याख्या इसी सन्दर्भ में होने लगी और सेमेटिक परम्परा को आदर्श मानने से कहीं न कहीं सेमेटिक धर्मों की भाँति धर्म का अर्थ न्याय की स्थापना के बजाय दूसरे धर्म के प्रति घृणा को हिन्दू धर्म की एकता का आधार बनाने की भावना विकसित होने लगी।
जनसंघ की स्थापना से लेकर राममन्दिर आन्दोलन तक हिन्दू धर्म के मूल तत्वों की स्थापना के लिये प्रयास करने के स्थान पर उसे संविधान के दायरे में लाने, कम्युनिष्ट सिद्धांत के समानांतर दर्शन विकसित करने की होड और फिर सेक्युलरिज्म का विरोध करने के स्थान पर अपने हिदुत्व को सेक्युलरिज्म के दायरे में लाने के चलते वैचारिक स्तर पर काफी गड्ड मड्ड हुई। हिन्दू समाज को संगठित करने का दावा करने वाली शक्तियों ने तो कभी हिन्दू को एक ईकाई माना ही नहीं। यदि ऐसा होता तो भाजपा जाति, अवर्ण, सवर्ण , पिछडा, दलित, आदिवासी, जनजाति ,उत्तर दक्षिण की राजनीति न करती वरन भारत की आध्यात्मिक एकता को अपनी राजनीति का आधार बनाती। आज वैचारिक स्पष्टता न होने का ही परिणाम है कि जो विचारधारा की रट लगाते हैं वे जानते ही नहीं कि इस विचारधारा को सामाजिक और राजनीतिक रूप से कैसे क्रियांवित किया जाये। आज तो विचारधारा और हिन्दुत्व की बात केवल अपना भाव बढाने या फिर किसी की नजर में अच्छा बने रहने के लिये की जाती है।
वास्तव में भाजपा ने हिन्दुत्व का नारा तो लगाया लेकिन हिन्दू एकता का प्रयास नहीं किया। वही गलती की जो पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने की थी कि अनेक सुन्दर शब्द गढे और स्वप्न देखे लेकिन आधार का पता ही नहीं था और परिणाम आज सामने है। इसी प्रकार हिन्दुत्व की बात तो खूब हुई पर हिन्दुत्व है क्या और उसे कैसे साकार करना है न तो इसका पता है और न ही कोई कार्यक्रम। इसी कारण जिसके जो मन में आये बोलता है और वही हिन्दुत्व हो जाता है। यह वैचारिक दीवालियापन पूरी तरह स्पष्ट है कि पाकिस्तान के विभाजन के लिये नेहरू और पटेल को दोषी ठहराया जा रहा है और मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्युलर बताया जा रहा है क्योंकि जो लोग भी जिन्ना की प्रशंसा कर रहे हैं उनके लिये भाजपा और कांग्रेस में एक ही अंतर है कि कांग्रेस का नेतृत्त्व गाँधी परिवार के हाथ में है और वहाँ उनके लिये कोई स्थान कभी नहीं था इसी कारण ये लोग जनसंघ के साथ आये। क्योंकि इन्हें पाकिस्तान बनाने वालों की मानसिकता से कोई समस्या नहीं है।
लेकिन आज समाज भाजपा को हिन्दू पक्ष के रूप में देखना चाहता है और इसके लिये सबसे पहले विचारधारा की स्पष्टता लानी होगी। आज विचारधारा के सम्बन्ध में भाजपा या हिन्दुत्ववादियों की स्थिति उस बालक की तरह है जो परीक्षा में प्रश्नों का उत्तर देता है तो न तो वह उसे समझ पाता है और न ही परीक्षा पुस्तिका जाँचने वाला।
कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद जिस प्रकार भाजपा के भविष्य़ को लेकर चर्चा हो रही है उससे स्पष्ट है कि अब कम्युनिज्म के पतन के बाद सेक्युलरिज्म का खोखला स्वरूप सामने आ गया है वैसे भी यूरोप ने कभी भी अपनी ईसाई पहचान को लेकर क्षमा भाव नहीं रखा और मुस्लिम देशों में तो लोग जानते ही नहीं कि सेक्युलरिज्म किस चिडिया का नाम है लेकिन भारत में हिन्दू पहचान को भुलाने के लिये सेक्युलरिज्म का ढॉंग चलता रहा। कम्युनिज्म के पतन के बाद धर्म की पहचान का आग्रह सतह पर आ गया है। इसी के साथ विश्व में एक नया परिवर्तन भी आ रहा है और वह है वैश्व्वीकरण का। आने वाले एक दशक के परिवर्तन की आहट मिलनी आरम्भ हो गयी है। पहले इण्टरनेट ने राष्ट्र , राज्य और सरकार की सीमायें तोड दीं और अब आई पी एल जैसे टूर्नामेंट सिद्ध कर रहे हैं कि बहुराष्ट्रवाद और वैश्वीकरण का सिद्धांत ही भविष्य़ है।
इस युग का सिद्धांत है स्वतंत्रता। स्वतंत्रता के सिद्दांत को स्थापित करने के लिये एकरूपता, खान पान, रहन सहन, आचार व्यवहार और कुछ हद तक चरित्र के सिद्धांत भी देश काल परिस्थितियों के सापेक्ष रखने होंगे। इस युग में व्यक्ति स्वतंत्र होना चाहता है सूचना का अबाध स्रोत इसी तथ्य को इंगित करता है कि व्यक्ति अपनी स्वतंत्र चेतना विकसित करना चाहता है और स्वतंत्रता पर किसी प्रकार का हस्तक्षेप उसे सहन नहीं है। वह किसी एक विचार या व्यक्ति के साथ बँधा रहना नहीं चाहता। लेकिन इसका समाधान स्वतंत्रता का हनन नहीं वरन हिन्दू धर्म के सिद्धांत का प्रचार ही है। वास्तव में स्वतंत्रता के इस काल में ही हिन्दुत्व की प्रासंगिकता अधिक है।
आज हिन्दू धर्म के वास्तविक स्वरूप को सामने लाने की आवश्यकता है न कि किसी सेमेटिक धर्म के प्रकाश में उसकी व्याख्या करने की। धर्म की पहचान के प्रति बढ्ते आग्रह के चलते अवसर आ गया है कि हिन्दू धर्म को जीवन पद्धति कहना बन्द किया जाये और वैश्वीकरण के इस काल में इसे सार्वभौमिक धर्म बनने की ओर विकसित किया जाये जो कि व्यक्ति को स्वतन्त्र होते रहने की प्रेरणा देते हुए अंततः प्रकृति से भी मुक्त हो जाने का क्रियात्मक विधान भी बताता है।
सैद्धांतिक रूप से हिन्दुत्व की आध्यात्मिक गम्भीरता के साथ ही हिन्दू अपनी पहचान को लेकर भी आतुर है। ज्यों ज्यों भारत में मध्य वर्ग सशक्त हो रहा है और वैश्वीकरण के चलते शहर और गाँव का भेद कम हो रहा है। गाँव के निवासी भी अपने जीवन को भौतिक आधार पर विकसित करना चाहते हैं इस कारण परम्परा के स्थान पर हिन्दू धर्म के मूल को संरक्षित रखते हुए विकास और स्वतंत्रता के साथ उसका समायोजन करना होगा परंतु यह धारणा पूरी तरह भ्रांति पर आधारित है कि हिन्दू स्वाभिमान, हिन्दू रक्षा और हिन्दू धर्म का विषय आधुनिकता के साथ मेल नहीं खाता। इसके विपरीत वास्तविकता तो यह है कि वर्तमान हिन्दू पीढी अधिक स्पष्ट और आक्रामक है जो हिन्दू को विश्व में एक शक्ति के रूप के रूप में देखने की आकाँक्षी है। भौतिक उन्नति की आकाँक्षा के बाद भी अवचेतन मन की यही आकाँक्षायें सुप्त हुई हैं समाप्त नहीं और इसमें एक प्रमुख आकाँक्षा भारत को महमूद गजनवी के पूर्व के भारत की चेतना से जोडना है।
भाजपा को यदि प्रासंगिक बने रहना है तो उसे हिन्दू राजनीतिक दल बनना होगा और नयी परिस्थितियों में अपना विकास करना होगा जिसमें आधुनिकता, विकास और जीवन स्तर के उत्थान की अभिलाषा के साथ हिन्दुओं के अवचेतन मन को साकार करने के लिये पूरी ईमानदारी के साथ विश्वास पूर्वक नयी राजनीतिक परिभाषा गढनी होगी। लेकिन इसके लिये आवश्यक है कि भाजपा अपने कार्यक्रम , नीतियों और हिन्दुत्व पर विश्वास करना सीखे। भाजपा को समझना होगा कि कांग्रेस यथास्थितिवादी राजनीतिक दल है और भाजपा अवचेतन मन और सपनों की पार्टी है। जब जब भाजपा यथास्थिति को अपनाने का प्रयास करेगी इसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा। भाजपा को सपनों को साकार करना और अवचेतन मन की आकाँक्षा को पूर्ण करने का राजनीतिक समीकरण ढूँढना होगा अन्यथा इसका ह्रास ही होता जायेगा। दुखद पक्ष तो यह है कि भाजपा हर पराजय के बाद कुछ नया बहाना ढूँढ कर स्वयं को और अपने समर्थकों को दिलासा देती है और सत्य से भागना चाहती है।
भाजपा को सेक्युलरिज्म के दायरे से बाहर आकर आधुनिकता के साथ हिन्दुत्व को समायोजित करना होगा जो कि हिन्दू आग्रह पर आधारित हो न कि तुष्टीकरण पर।
इस जनादेश के निहितार्थ क्या हैं?
2009 की 15वीं लोकसभा के चुनाव परिणाम आ चुके हैं और इन अप्रत्याशित चुनाव परिणामों ने सबके अनुमानों को धता बता दिया लेकिन इन चुनाव परिणामों के निहितार्थ को पढ्ने का प्रयास कुछ टीवी चैनल विशेष रूप से कर रहे थे। कुछ तो इसे कांग्रेस का अभ्युदय, गान्धी परिवार का करिश्मा और कुछ तो इसे भारत में व्यापक परिवर्तन की आहट के रूप में देख रहे हैं। यदि सरसरी तौर पर देखा जाये तो स्थितियाँ ऐसी ही लगती हैं।
चुनाव परिणाम से मुझे केवल एक आश्चर्य हुआ कि चुनाव के दौरान अनेक स्थानों पर प्रवास के दौरान मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मँहगाई एक बडा मुद्दा है और इस कारण लोगों का आक्रोश स्वाभाविक रूप से सत्तासीन दल के साथ होगा। लेकिन 2004 की भाँति इस बार जनादेश की विचित्र गुत्थी है। जैसे 2004 में जिन क्षेत्रों में इंडिया शाइनिंग का प्रभाव था और जहाँ इंडिया शाइनिंग का सकारात्मक प्रभाव होना चाहिये था वहीं त्तत्कालीन सत्तासीन एनडीए को भारी नुकसान उठाना पडा उसी प्रकार इस बार भी मँहगाई, बेरोजगारी की मार होते हुए भी सत्तासीन दल को उसका नुकसान नहीं हुआ। दोनों चुनावों के इस विचित्र परिणाम से एक बात स्पष्ट है कि भाजपा और कांग्रेस की छवि जनता के बीच कुछ पृथक है। जनता ने 1996 के बाद 1998 में और फिर 1999 में भाजपा को अवसर दिया और उसके बाद उसे दण्डित करना आरम्भ कर दिया। भाजपा ने पिछले चुनाव में और इस चुनाव में अपनी पहचान, अपने मुद्दे छोड कर कांग्रेस बनने का प्रयास किया और ऐसे में लोगों ने भगवा कांग्रेस को नकार कर तिरंगा कांग्रेस को अपनाया। यह बात और है कि भाजपा अपनी पराजय का कारण इसे कभी नहीं मानेगी।
इस चुनाव में कांग्रेस की विजय के कुछ और भी कारण हैं। कांग्रेस को पूरे देश में 3% मतों का लाभ हुआ है और पूरे देश में बहुकोणीय संघर्ष के कारण इस अंतर ने कमाल कर दिया। इस लेख में मैं चुनाव के आँकडों की समीक्षा कर पाठकों को बोझिल नहीं बनाना चाहता और हमारी चर्चा का विषय यह है कि क्या देश में कोई ऐसा परिवर्तन हो रहा है जिसकी आहट हमें इस जनादेश में तलाशनी चाहिये।
एक प्रसिद्ध टीवी चैनल की हिन्दी वेबसाइट पर एक ख्यातिलब्द्ध पत्रकार ने इस जनादेश की ब्याख्या करते हुए कहा कि भारत में पीढी का बदलाव हो रहा है और देश की आजादी से देश के सुपर पावर बनने की आकाँक्षा के बीच की कडी वह पीढी जिसने अपनी आँखों से आजादी की लडाई देखी थी वह बदल चुकी है और अब इस बदलाव को कांग्रेस और भाजपा दोनों को समझना होगा। इस अनुमान और कथन के अपने निहितार्थ हैं। वास्तव में ऐसा कोई बदलाव अस्तित्वमान है या इसका आभास देकर भारत को सुपर पावर के बहाने उसकी पहचान और संस्कृति से काटने का प्रयास किया जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में नयी पीढी में एक परिवर्तन पूरे देश में आया है कि किसी भी क्षेत्र में, किसी भी जाति का और किसी भी सामाजिक स्तर का युवक यथास्थितिवादी न होकर अपना जीवन स्तर ऊपर उठाना चाहता है, सूचना के माध्यमों के चलते वह अपनी पिछली पीढी की तुलना में कहीं कम जड है और उसका अधिक ध्यान इस बात पर केन्द्रित है कि अधिक से अधिक धनोपार्जन कैसे किया जाये लेकिन इसमें से अधिकाँश ऐसे युवक हैं जो गाँवों में रहते है और नहीं जानते कि भारत सुपर पावर कैसे बन सकता है क्योंकि आज भी उनके घरों में बिजली कुछ घण्टों के लिये आती है और स्थानीय स्तर पर शिक्षा की उचित व्यस्था न होने से अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने की आकाँक्षा को मन में ही मारना पडता है( गाँवों में 20-22 की अवस्था में युवक पिता बन जाते हैं) । उनके लिये वोट का आधार यह नहीं है कि भारत की विश्व बिरादरी में क्या स्थिति है बल्कि यह है कि किस राजनीतिक दल के साथ लगने से उनका आर्थिक लाभ हो सकता है। वहीं इसके विपरीत नयी पीढी के वे लोग जो साधन सम्पन्न हैं और विचारधारा के बारे में जानते समझते हैं और भारत के सुपर पावर बनने का ख्वाब पालते हैं वे अपने व्यवसाय, धनोपार्जन और छोटे से परिवार में ऐसे लिप्त रहते हैं कि वोट के लिये लम्बी लाइन में खडे होने को तौहीन समझते हैं और वोट देने के बजाय मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखना अधिक पसन्द करते हैं।
इसलिये जो लोग इस जनादेश को देश में व्यापक विचारधारागत परिवर्तन का आधार मानते हैं वे एक बात पूरी तरह भूल जाते हैं कि आखिर वह कौन सा कारण है कि पिछले कुछ वर्षों से जिस राज्य में जिसकी सरकार रहती है वही जीतती है। इसका एक अत्यंत सूक्ष्म कारण है और उस कारण को सभी राजनीतिक दलों ने भाँप लिया है। जो भी सरकार सत्ता में होती है इसी नयी पीढी को अपने साथ जोडती है और आर्थिक लाभ के द्वारा इन्हें संतुष्ट रखती है और यह पीढी इस मायने में अधिक सतर्क है कि किसी एक दल या विचारधारा से बँधने के स्थान पर अपने लाभ पर ध्यान केन्द्रित रखती है। धन के इस विकेन्द्रीकरण का परिणाम है कि वास्तविक विकास नहीं होने पर भी विकास का वातावरण बना रहता है।
देश में आये इस बदलाव पर अध्ययन करने की हमारी आकाँक्षा पिछले कुछ वर्षों में तब हुई जबसे मीडिया में यह बहस आरम्भ हुई कि देश में विकास अब चुनाव का मुद्दा हो गया है जबकि देश के अनेक हिस्सों में तथाकथित विकास उस मात्रा में हमें दिखता नहीं जैसी उसकी चर्चा होती है। जैसे उत्तर प्रदेश में अब भी बुन्देलखण्ड ऐसा क्षेत्र है जहाँ पीने को पानी नहीं है, बिजली नहीं है ऐसे ही मध्य प्रदेश के अनेक क्षेत्र हैं जहाँ स्थिति में अधिक सुधार नहीं है अर्थात जो भी सरकार इस फार्मूले के आधार पर विकास करे और अपने विशेष काडर पर आश्रित होने के स्थान पर धन के विकेन्द्रीकरण को अपना कर विकास का आभास देती रहे तो उसे कोई खतरा नहीं है। समस्या केवल तब आती है जब कानून व्यवस्था की स्थिति अत्यंत खराब हो जाती है और व्यापार के प्रतिकूल माहौल हो जाता या फिर अधिक धन को सुरक्षित रखना कठिन हो जाता है और फिरौती, अपहरण जैसी घटनायें बढ जाती हैं जैसे लालू प्रसाद के कार्यकाल में हुआ और नितीश कुमार को विजय मिली और फिर मुलायम सिंह यादव के विरुद्ध मायावती की सरकार उत्तर प्रदेश में बनी।
जो लोग देश में नयी पीढी में परिवर्तन की बात कर रहे हैं उन्हें नहीं पता कि इस बार के चुनाव में भी कांग्रेस को जनादेश भारत को सुपर पावर के रूप मे देखने की आकाँक्षा या फिर स्वयं को अतीत से काटने की आकाँक्षा वालों ने नहीं बल्कि कर्जा माफी से प्रभावित किसानों, नरेगा में 100 दिन का रोजगार मिलने से शहरों की ओर पलायन से बचे लोगों ने दिया है। इसलिये इस जनादेश को लेकर देश की दशा दिशा के बारे में अधिक चिंतन मनन उचित नहीं होगा। क्योंकि भारत अत्यंत विविधताओं से युक्त देश है और यहाँ अतीत का ज्ञान और पहचान का स्वाभिमान संस्कारों से मिलता है जो अतीन्द्रिय मानस में छुपा रहता है और जैसे जैसे सामाजिक स्तर और आर्थिक स्तर उच्च होता जाता है यह संस्कार मुखरित होकर सामने आता है। जहाँ तक भारत को उसके अतीत से जोडने की आकाँक्षा का प्रश्न है तो ऐसे आन्दोलन सदैव ही देश में चलते रहे हैं और आगे भी ऐसे आन्दोलन चलते रहेंगे और इस आकाँक्षा को किसी राजनीतिक दल की जय पराजय से जोडकर देखना उचित नहीं होगा।
इस चुनाव के बाद जिस प्रकार कांग्रेस के नेता राहुल गान्धी को पूरी तरह करिश्माई नेता मान लिया गया है वह कहीं न कहीं जल्दबाजी को प्रदर्शित करता है। हमें नहीं भूलना चाहिये कि 1984 में स्वर्गीय राजीव गान्धी को 400 से अधिक लोकसभा सीटें मिली थीं फिर भी पाँच वर्ष के भीतर ही वह देश के सबसे अलोकप्रिय नेता बन गये थे जबकि दिशा और दृष्टि उनके पास भी थी। इतिहास आज फिर अपने को दुहरा रहा है। राहुल गान्धी को एक दुधारी तलवार मिली है और उन्हें देखना होगा कि वे अपने अति उत्साही सलाहकारों से सावधान रहें क्योंकि भारत का विकास उसके अतीत की पहचान, सभ्यता और संस्कृति की कीमत पर नहीं हो सकता। इसलिये राहुल गान्धी के बारे में कोई निष्कर्ष निकालने से पूर्व मैं कुछ दिनों तक प्रतीक्षा करना अधिक पसन्द करूँगा क्योंकि इस जनादेश की अपेक्षा स्वयं कांग्रेस को भी नहीं थी और यह बहुकोणीय मुकाबले से उपजी जीत कहीं अधिक है। भारत की जनता के स्वभाव को देखते हुए यह नहीं भूलना चाहिये कि देश के अन्दर और बाहर अनेक चुनौतियाँ ऐसी हैं जिनका सामना कांग्रेस और राहुल गान्धी को करना है और इन चुनौतियों के दौरान ही दोनों की परीक्षा होगी।
कांग्रेस को भारी पड सकती है हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा
यह कोई संयोग है या फिर सोचा समझा प्रयास कि जिस दिन सेंसेक्स इतना नीचे चला गया कि शेयर बाजार में छोटा निवेश करने वालों की दीपावाली अभिशप्त हो गयी और प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, आर.बी.आई के गवर्नर के तमाम आश्वासनों के बाद भी शेयर बाजार के गिराव थमा नहीं और सर्वत्र हाहाकार मच रहा था कि अचानक महाराष्ट्र के एण्टी टेररिस्ट स्क्वेड ने 29 सितम्बर को मालेग़ाँव में हुए बम विस्फोट की गुत्थी सुलझा लेने का दावा करते हुए इस मामले में पहली बार किसी हिन्दू को गिरफ्तार किया। आतंकवादी घटना में हिन्दू की गिरफ्तारी उतनी चौंकाने वाले नहीं है जितनी उसकी टाइमिंग। अभी कुछ दिन पहले ही केन्द्रीय कैबिनेट की एक विशेष बैठक आयोजित कर बजरंग दल पर प्रतिबन्ध लगाने की चर्चा की गयी और पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में सरकार के अनेक घटक दलों की जबर्दस्त माँग के बाद भी सरकार ऐसा नहीं कर पायी। इसके बाद राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक बुलायी गयी और उस बैठक में साम्प्रदायिकता को विशेष मुद्दा बनाया गया और बैठक में कुछ सदस्यों ने बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग दुहरायी। राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक से पूर्व लेखक ने बैठक के पीछे छुपी मंशा पर सवाल उठाये थे।
वास्तव में देश में बढ रहे इस्लामी आतंकवाद को लेकर जिस प्रकार एक ऐसा माहौल बन रहा है कि उसमें घटनायें करने वाले मुस्लिम ही हैं तो ऐसे में सेकुलरिज्म का दम्भ भरने वाले राजनीतिक दलों के सामने यह गम्भीर प्रश्न खडा हो गया है कि वह इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध इस लडाई को सेकुलर सिद्दांतों के दायरे में रह कर कैसे लडें? दूसरा धर्मसंकट इन दलों के समक्ष मुस्लिम वोटबैंक है। 2006 में जब मुम्बई में लोकल रेल व्यवस्था को निशाना बनाया गया था और बडी संख्या में मुम्बई की मुस्लिम बस्तियों और मुस्लिम उलेमाओं को पुलिस ने निशाने पर लिया था और पूछताछ की थी तो मुस्लिम नेताओं, बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं ने मिलकर संसद भवन में एनेक्सी में आतंकवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया और केन्द्र सरकार के प्रतिनिधियों के बीच आतंकवाद के नाम पर इस्लाम को बदनाम करने और निर्दोष मुसलमानों को फँसाने की प्रवृत्ति की आलोचना की और सरकार से आश्वासन लिया कि सरकार आतंकवाद के मुद्दे पर मुस्लिम भावनाओं का आदर करेगी। यह पहला अवसर था जब भारत के स्थानीय मुस्लिम समाज की भूमिका आतंकवादी घटनाओं में सामने आयी थी। इसके बाद से आतंकवाद को लेकर सेकुलरिज्म के सिद्धांतों के अनुपालन और संतुलन साधने के प्रयासों के तहत हिन्दू आतंकवाद का आभास सृजित कर एक नयी अवधारणा स्थापित करने का प्रयास आरम्भ हो गया। यदि 2006 के बाद हुई आतंकवादी घटनाओं के पश्चात सेकुलरपंथी राजनेताओं और राजनीतिक दलों के बयानों पर दृष्टि डाली जाये तो स्पष्ट होता है कि अनेक बार आतंकवादी घटनाओं की निष्पक्ष जाँच और हिन्दू संगठनों के षडयंत्र का कोण भी इनके बयानों में आने लगा। इसी के साथ अनेक मुस्लिम संगठन तो खुलकर कहने लगे कि ऐसे आतंकवादी आक्रमण हिन्दू संगठनों द्वारा इस्लाम को बदनाम करने के लिये प्रायोजित किये जा रहे हैं।
जैसे-जैसे देश में आतंकवादी आक्रमण बढते रहे आतंकवाद के विरुद्द कार्रवाई में सेकुलरिज्म के सिद्धांत का पालन करने के लिये और संतुलन साधने के लिये हिन्दू आतंकवाद का आभास सृजित किया जाने लगा। यही नहीं तो इस्लामी आतंकवाद के समानान्तर एक हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा को पुष्ट करने के लिये हिन्दूवादी संगठनों के एक व्यापक नेटवर्क की बात की जाने लगी जो सुनियोजित ढंग से आतंकवाद फैलाने के लिये उसी प्रकार कार्य कर रहे हैं जैसे सिमी या अन्य इस्लामी आतंकवादी संगठन। इसके लिये देश के कुछ जाने माने टीवी चैनलों ने तो प्रचार का एक अभियान चलाया है और अपनी झूठी और खोखली दलीलों के द्वारा सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि हिन्दूवादी संगठनों के प्रयासों से देश में आतंकवाद का एक नेटवर्क चल रहा है जिसमें महाराष्ट्र का एक सैन्य स्कूल बम बनाने का प्रशिक्षण दे रहा है। सीएनएन- आईबीएन ने कुछ दिनों पहले इसे खोजी पत्रकारिता का नाम देकर कुछ वर्षों पूर्व नान्देड में हुए बम विस्फोट से लेकर पिछले माह कानपुर में हुए बम विस्फोट तक पूरे घटनाक्रम को एक सुनियोजित नेटवर्क का हिस्सा बताकर हिन्दू आतंकवाद को मालेगाँव से पहले ही पुष्ट कर दिया था।
मालेग़ाँव के मामले में एक साध्वी सहित कुछ लोगों की गिरफ्तारी के मामले पर भी कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के समाचार चैनल पर जिस तरह समाचार से अधिक कांग्रेस का एजेण्डा चलाया जा रहा है उससे स्पष्ट है कि यह पूरा मामला केवल जाँच एजेंसियों तक सीमित नहीं है और इसे लेकर एक प्रकार का प्रचार युद्ध चलाया जा रहा है। जिस प्रकार न्यूज 24 ने साध्वी की गिरफ्तारी के साथ ही चैनल पर हिन्दू आतंकवाद बनाम इस्लामी आतंकवाद की बहस चलायी और सभी समाचार चैनलों मे अग्रणी भूमिका निभाकर स्वयं ही न्यायाधीश बन कर फैसला सुना दिया उससे स्पष्ट है कि यह पूरा खेल कांग्रेस के इशारे पर हो रहा है।
एंटी टेररिस्ट स्कवेड अभी तक जिन तथ्यों के साथ सामने आया है उस पर कुछ प्रश्न खडे होते हैं। आखिर अभी तक साध्वी और उनके साथ गिरफ्तार लोगों के ऊपर मकोका के तहत मामला क्यों दर्ज नहीं किया गया है और यह मामला भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत ही क्यों बनाया गया है जबकि आतंकवादियों के विरुद्ध मकोका के अंतर्गत मामला बनता है। इससे स्पष्ट है कि संगठित अपराध की श्रेणी में यह मामला नहीं आता। आज एक और तथ्य सामने आया है जो प्रमाणित करता है कि मालेगाँव विस्फोट में आरडीएक्स के प्रयोग को लेकर महाराष्ट्र पुलिस और केन्द्रीय एजेंसियों के बयान विरोधाभासी हैं। महाराष्ट्र पुलिस का दावा है कि वह घटनास्थल पर पहले पहुँची इस कारण उसने जो नमूने एकत्र किये उसमें आरडीएक्स था तो वहीं महाराष्ट्र पुलिस यह भी कहती है कि विस्फोट के बाद नमूनों के साथ छेड्छाड हुई तो वहीं केन्द्रीय एजेंसियाँ यह मानने को कतई तैयार नहीं हैं कि इस विस्फोट में आरडीएक्स का प्रयोग हुआ उनके अनुसार इसमें उच्चस्तर का विस्फोटक प्रयोग हुआ था न कि आरडीएक्स। इसी के साथ केन्द्रीय एजेंसियों ने स्पष्ट कर दिया है कि मालेग़ाँव और नान्देड तथा कानपुर में हुए विस्फोटों में कोई समानता नहीं है। अर्थात केन्द्रीय एजेंसियाँ इस बात की जाँच करने के बाद कि देश में हिन्दू आतंकवाद का नेटवर्क है इस सम्बन्ध में कोई प्रमाण नहीं जुटा सकी हैं। अब क्या सीएनएन-आईबीएन अपने दुष्प्रचार के लिये क्षमा याचना करेगा?
साध्वी के मामले में एटीएस के अनेक दावे कमजोर ही हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि महाराष्ट्र सरकार और केंन्द्र सरकार की रुचि इस विषय़ में अधिक थी कि मालेगाँव विस्फोट के तार किसी न किसी प्रकार हिन्दूवादी संगठनों से जुडें और यह सिद्ध किया जा सके कि ये संगठन आतंकवाद का एक नेटवर्क चला रहे हैं और इसी आधार पर इन संगठनों को प्रतिबन्धित कर मुस्लिम समाज को यह सन्देश दिया जा सके कि हमें आपकी चिंता है और हम आतंकवाद को लेकर संतुलन की राजनीति करते हुए सेकुलरिज्म के सिद्धांत का पालन कर रहे हैं। यह अत्यंत हास्यास्पद स्थिति सरकार और जाँच एजेंसियों के लिये है कि वे अब तक साध्वी और उनके साथियों को लेकर आधे दर्जन से अधिक संगठनों के नाम गिना चुके हैं परंतु अभी तक एक भी ऐसा ठोस प्रमाण सामने नहीं ला सके हैं कि इन संगठनों का आतंकवादी गतिविधियों में कोई हाथ है। पहले हिन्दू जागरण मंच का सदस्य बताया गया, फिर दुर्गा वाहिनी, फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद , फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाने वाला बताया गया अब पुलिस कह रही है कि इन्होंने अलग संगठन बनाया था। एटीएस ने भोपाल और ग्वालियर में सभी सम्बन्धित संगठनों के लोगों से पूछताछ की जो साध्वी के निकट थे परंतु अभी तक पुलिस को ऐसा कोई साक्ष्य हाथ नहीं लगा है जो यह सिद्ध कर सके कि हिन्दूवादी संगठन आतंकवाद का प्रशिक्षण देते हैं या फिर आतंकवादी नेटवर्क चला रहे हैं।
एटीएस ने साध्वी और उनकी तीन साथियों को इस आधार पर गिरफ्तार किया है कि विस्फोट में प्रयुक्त हुई मोटरसाइकिल साध्वी के नाम थी और साध्वी ने विस्फोट से पूर्व साथी आरोपियों के साथ करीब सात घण्टे मोबाइल पर बात की थी जो कि प्रमाण है। अब ये प्रमाण कितने ठोस हैं इसका पता तो न्यायालय में चार्जशीट दाखिल होने पर लग जायेगा। लेकिन इस पूरे अभियान से एक बात निश्चित है कि हिन्दू आतंकवाद का आभास सृजित करने का प्रयास कांग्रेस उसके सहयोगी दल और उसके सहयोगी टीवी चैनल ने किया है और इस प्रचार युद्ध में अपनी पीठ भले ही ठोंक लें परंतु जिस प्रकार आतंकवाद की लडाई को कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने भोथरा करने का प्रयास किया है वह अक्षम्य अपराध है।
कांग्रेस के लिये मीडिया प्रबन्धन करने वालों के लिये यह एक बुरी खबर है कि ब्लाग पर या विभिन्न समाचार पत्रों में इस घटना पर टिप्पणी करने वालों का तेवर यह बताता है कि इस विषय पर युवा और बुद्धिजीवी समाज जिस प्रकार ध्रुवीक्रत है वैसा पहले कभी नहीं था। कांग्रेस शायद अब भी एक विशेष मानसिकता में जी रही है जहाँ उसे लगता है कि देश उसके बपौती है और देशवासियों के विचारों पर भी उसका नियंत्रण है। इसी भावना के बशीभूत होकर कांग्रेस के एक बडे नेता के न्यूज चैनल न्यूज 24 पर आतंकवाद पर बहस के दौरान कांग्रेसी नेता राशिद अल्वी बार बार बासी तर्क दे रहे थे कि स्वाधीनता संग्राम में कांग्रेस का योगदान रहा है और कुछ दल विशेष अंग्रेजों का साथ दे रहे थे। यह तर्क सुनकर हँसी ही आ सकती है कि एक ओर तो कांग्रेस के राजकुमार तकनीक और युवा भारत की बात करते हैं तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के नेता अब भी स्वाधीनता पूर्व मानसिकता में जी रहे हैं। आज सूचना क्रांति के बाद लोगों को यह अकल आ गयी है कि वे वास्तविकता और प्रोपेगेण्डा में विभेद कर सकें। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की गिरती इमारतों के बाद समस्त विश्व में इस्लामी आतंकवाद को लेकर जो बहस चली है उसके बाद किसी भी युवक को यह बताने की आवश्यकता नहीं है को आतंकवाद का धर्म, स्वरूप और उसकी आकाँक्षायें क्या है? आज शायद कांग्रेस और उसके सहयोगी भूल गये हैं कि देश की 60 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या 30 या उससे नीचे आयु की है और उसने 1990 के दशक के परिवर्तनों के मध्य अपनी को जवान किया है। उसने आर्थिक उदारीकरण देखा है, सूचना क्रांति के बाद विश्व तक अपनी पहुँच देखी है, उसने कश्मीर से जेहाद के नाम पर भगाये गये हिन्दुओं की त्रासदी देखी है और देखा है राम जन्मभूमि आन्दोलन जिसने भारत की राजनीति की दिशा बदल दी।
आज वही पीढी निर्णायक स्थिति में है जिसके विचार अपने से पहली की पीढी के बन्धक नहीं है। इस पीढी ने अपनी पिछली पीढी के विपरीत सब कुछ अपने परिश्रम से खडा किया है और इसलिये उसे स्वयं पर भरोसा है और वह व्यक्ति के विचारों के आधार पर उसका आकलन करती है न कि किसी खानदान का वारिस होने के आधार पर।
समाज में जो मूलभूत परिवर्तन हुआ है उसके प्रति पूरी तरह लापरवाह कांग्रेस और उसके सेक्यूलर सहयोगी हिन्दू आतंकवाद का आभास सृजित कर इसका आरोप हिन्दू संगठनों पर मढना चाहते हैं परंतु शायद वे लोग भूल जाते हैं कि हिन्दुत्व का विचार केवल किसी संगठन तक सीमित नहीं है। इसका सीधा सम्बन्ध युवा भारत के सपने से है। आज देश विदेश में ऐसे लोगों की संख्या अत्यंत नगण्य है जो इस्लामी आतंकवाद को संतुलित करने के लिये हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा का समर्थन करेंगे। इसका उदाहरण हमें पिछले गुजरात विधानसभा में मिल चुका है जब कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी द्वारा गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी को मौत का सौदागर कहने और कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा हिन्दू आतंकवाद की बात करने के कारण इस पार्टी को मुँह की खानी पडी। एक बार फिर चुनावों से पहले कांग्रेस हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा को सृजित कर रही है। क्योंकि कांग्रेस को लगता है कि देश में हिन्दुओं का एक बडा वर्ग है जो उसकी सेक्युलरिज्म की परिभाषा से सहमत है। कांग्रेस ऐसे हिन्दुओं और मुसलमानों को साधने के प्रयास में एक खतरनाक खेल खेल रही है जिसका परिणाम देश में साम्प्रदायिक विभाजन के रूप में सामने आयेगा।
मालेगाँव विस्फोट को लेकर जाँच एजेंसियाँ तो अपना कार्य कर रही हैं और शीघ्र ही सत्य सामने आ जायेगा परंतु जिस प्रकार कांग्रेस इस्लामी लाबी के दबाव में आकर कार्य कर रही है वह देश के भविष्य़ के लिये शुभ संकेत नहीं है। क्योंकि हिन्दू आतंकवाद की बात करके कांग्रेस और उसके सहयोगी दल भले ही अस्थाई तौर पर प्रसन्न हो लें परंतु अभी बहस में अनेक प्रश्न उठेंगे और सेक्युलरिज्म का एकांगी स्वरूप, मानवाधिकार संगठनों का अल्पसंख्यक परस्त चेहरा भी बह्स का अंग बनेंगे।
अफजल की फांसी
भारत के लोकतान्त्रिक ढ़ाँचे के सर्वोच्च संस्थान संसद पर आक्रमण कर भारतीय सम्प्रभुता को चुनौती देने वाले आतंकवादियों में से एक मो. अफजल को फांसी की प्रस्तावित 20 अक्टूबर की तिथि को फिलहाल टालने के साथ ही अफजल को माफ करवाने के प्रयास भी तेज कर दिये गये हैं. अफजल को माफी दिलाने का पहला स्वर जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री की ओर से आया जब उन्होंने प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को राज्य में शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के हित में अफजल को माफ करने की माँग की. जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री गुलाम नबी आजाद की इस अपील के बाद जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमन्त्री फारूख अब्दुल्ला ने भी ऐसी ही माँग की तथा उनका साथ राज्य की सत्ताधारी पी.डी.पी की नेत्री महबूबा मुफ्ती ने भी दिया.
राज्य के कतिपय नेताओं के बयान से उत्साहित अफजल के परिजनों से देश की राजधानी आकर स्वयं राष्ट्रपति से मिलने का निर्णय लिया है. जम्मू कश्मीर के इन नेताओं और अफजल के परिजनों की यह माँग कुछ अर्थों में कार्य करती दिख रही है और कुछ अपुष्ट सूत्रों के अनुसार अफजल की फांसी की प्रस्तावित तिथि 20 अक्टूबर को फिलहाल टाल देने का निर्णय लिया जा चुका है. इस निर्णय के बाद कुछ प्रश्न अवश्य उठ खड़े हुये हैं.
जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री ने अफजल की फांसी को टालने या क्षमा करने का जो प्रमुख तर्क दिया था वह यह था कि फांसी की प्रस्तावित तिथि 20 अक्टूबर रमजान महीने का अन्तिम शुक्रवार है और इस तिथि को अफजल को फांसी देने से राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति तो बिगड़ेगी ही साथ ही पाकिस्तान के साथ चल रही शान्ति प्रक्रिया भी प्रभावित होगी. जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री का यह तर्क समस्त विश्व के इस्लामी आतंकवादियों की उस रणनीति की बहुत बड़ी विजय है जिसे उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में विश्व के अनेक क्षेत्रों में अपनाया है. यह रणनीति है राज्य की संस्थाओं या जनमत निर्माण करने वाले संगठनों या व्यक्तियों को आतंकित करना या हिंसा का भय दिखाकर उन्हें अपना निर्णय बदलने पर विवश करना.
2004 में हालैण्ड के प्रसिद्ध लेखक और फिल्म निर्देशक थियो वान गाग की एम्सटर्डम में दिन दहाड़े की गई क्रूर हत्या इस रणनीति का अहम हिस्सा थी जब अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर पश्चिमी विश्व को इस्लाम की आलोचना से डराकर रोका गया था. इसी प्रकार ब्रिटेन में जुलाई 2005 में परिवहन ढाँचे पर हमला कर इस्लामी आतंकवादियों ने प्रत्यक्ष रूप से इस देश को धमकाया फिर फ्रांस में दंगों के माध्यम से जनता को कम से कम क्षति पहुँचाकर सरकारी सम्पत्ति को निशाना बनाकर फ्रांस की जनता और सरकार में ईराक के सम्बन्ध में देश की भूमिका पर बहस आरम्भ करने को विवश किया था.
2003 में अमेरिका द्वारा ईराक पर किये गये हमले के बाद ईराक में अनेक देशों की सेनाओं को देश छोड़ने के लिये बाध्य करने के लिये इस्लामी आतंकी संगठनों ने अनेक देशों के नागरिकों या सैनिकों का अपहरण कर इन देशों को अपनी विदेश नीति बदलने पर विवश किया. अभी पिछले महीने फिलीस्तीन में अमेरिका के दो पत्रकारों का अपहरण कर उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेने की शर्त पर छोड़ दिया गया.
विश्व में इस्लामी आतंकवादियों की इस नई नीति को गम्भीरता से लिये जाने की आवश्यकता है विशेषकर उन परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में कि इस्लामी आतंकवादियों का एजेण्डा पूरी तरह स्पष्ट है कि वे हिंसा के सहारे विभिन्न देशों की नीतियों को अपने अनुसार संचालित करना चाहते हैं.
इस्लामी आतंकवादियों के इस कार्य में सबसे बड़ा सम्बल उन राजनीतिक शक्तियों और बुद्धिजीवियों से मिलता है जो मुस्लिमों पर अत्याचार के इस्लामी आतंकवादियों के अपप्रचार को सहयोग प्रदान करते हुये आतंकवादियों के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई का विरोध मानव अधिकारियों के नाम पर करते हैं तथा आतंकवादियों के पक्ष में सहानुभूति के वातावरण का निर्माण करते हैं. इस्लामी आतंकवाद के इस युग में सबसे बड़ी आवश्यकता आतंकवादियों की रणनीति को पूरी तरह समझकर उसमें सहयोग करने वाले तत्वों को पहचानकर उन्हें बेनकाब करने की है.
मो. अफजल की फांसी की सजा की माफी का अभियान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत में भी ऐसा बौद्धिक राजनीतिक वर्ग है जो अपने निहित स्वार्थों के लिये इस्लामी आतंकवादियों के प्रति पूरी सहानुभूति रखता है. इस्लामी आतंकवादियों की यह नई रणनीति विश्वव्यापी जेहाद को नया आयाम स्वरूप प्रदान करते हुये इसका प्रतिरोध करने के लिये कुछ विशेष वैश्विक रणनीति की आवश्यकता की ओर संकेत करती है.
आतंकियों को सजा दिलाने या उनके प्रति कठोरता से पेश आने के मामले में अमेरिका और यूरोप के देशों की अपेक्षा कहीं अधिक नरम देश की छवि बना चुका भारत यदि मो. अफजल जैसे आतंकवादियों की सजा इस्लामवादियों के दबाव में टालने या क्षमा करने की नई प्रवृत्ति का विकास करता है तो निश्चय ही यह देशवासियों की पराजय और भात पर शरियत और इस्लाम का शासन स्थापित करने की आकांक्षा रखने वाले इस्लामादियों की विजय होगी.
अफजल की फांसी की माफी के मायने
भारत के लोकतान्त्रिक ढ़ाँचे के सर्वोच्च संस्थान संसद पर आक्रमण कर भारतीय सम्प्रभुता को चुनौती देने वाले आतंकवादियों में से एक मो. अफजल को फांसी की प्रस्तावित 20 अक्टूबर की तिथि को फिलहाल टालने के साथ ही अफजल को माफ करवाने के प्रयास भी तेज कर दिये गये हैं. अफजल को माफी दिलाने का पहला स्वर जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री की ओर से आया जब उन्होंने प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह को राज्य में शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के हित में अफजल को माफ करने की माँग की. जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री गुलाम नबी आजाद की इस अपील के बाद जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमन्त्री फारूख अब्दुल्ला ने भी ऐसी ही माँग की तथा उनका साथ राज्य की सत्ताधारी पी.डी.पी की नेत्री महबूबा मुफ्ती ने भी दिया.
राज्य के कतिपय नेताओं के बयान से उत्साहित अफजल के परिजनों से देश की राजधानी आकर स्वयं राष्ट्रपति से मिलने का निर्णय लिया है. जम्मू कश्मीर के इन नेताओं और अफजल के परिजनों की यह माँग कुछ अर्थों में कार्य करती दिख रही है और कुछ अपुष्ट सूत्रों के अनुसार अफजल की फांसी की प्रस्तावित तिथि 20 अक्टूबर को फिलहाल टाल देने का निर्णय लिया जा चुका है. इस निर्णय के बाद कुछ प्रश्न अवश्य उठ खड़े हुये हैं.
जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री ने अफजल की फांसी को टालने या क्षमा करने का जो प्रमुख तर्क दिया था वह यह था कि फांसी की प्रस्तावित तिथि 20 अक्टूबर रमजान महीने का अन्तिम शुक्रवार है और इस तिथि को अफजल को फांसी देने से राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति तो बिगड़ेगी ही साथ ही पाकिस्तान के साथ चल रही शान्ति प्रक्रिया भी प्रभावित होगी. जम्मू कश्मीर के मुख्यमन्त्री का यह तर्क समस्त विश्व के इस्लामी आतंकवादियों की उस रणनीति की बहुत बड़ी विजय है जिसे उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में विश्व के अनेक क्षेत्रों में अपनाया है. यह रणनीति है राज्य की संस्थाओं या जनमत निर्माण करने वाले संगठनों या व्यक्तियों को आतंकित करना या हिंसा का भय दिखाकर उन्हें अपना निर्णय बदलने पर विवश करना.
2004 में हालैण्ड के प्रसिद्ध लेखक और फिल्म निर्देशक थियो वान गाग की एम्सटर्डम में दिन दहाड़े की गई क्रूर हत्या इस रणनीति का अहम हिस्सा थी जब अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर पश्चिमी विश्व को इस्लाम की आलोचना से डराकर रोका गया था. इसी प्रकार ब्रिटेन में जुलाई 2005 में परिवहन ढाँचे पर हमला कर इस्लामी आतंकवादियों ने प्रत्यक्ष रूप से इस देश को धमकाया फिर फ्रांस में दंगों के माध्यम से जनता को कम से कम क्षति पहुँचाकर सरकारी सम्पत्ति को निशाना बनाकर फ्रांस की जनता और सरकार में ईराक के सम्बन्ध में देश की भूमिका पर बहस आरम्भ करने को विवश किया था.
2003 में अमेरिका द्वारा ईराक पर किये गये हमले के बाद ईराक में अनेक देशों की सेनाओं को देश छोड़ने के लिये बाध्य करने के लिये इस्लामी आतंकी संगठनों ने अनेक देशों के नागरिकों या सैनिकों का अपहरण कर इन देशों को अपनी विदेश नीति बदलने पर विवश किया. अभी पिछले महीने फिलीस्तीन में अमेरिका के दो पत्रकारों का अपहरण कर उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेने की शर्त पर छोड़ दिया गया.
विश्व में इस्लामी आतंकवादियों की इस नई नीति को गम्भीरता से लिये जाने की आवश्यकता है विशेषकर उन परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में कि इस्लामी आतंकवादियों का एजेण्डा पूरी तरह स्पष्ट है कि वे हिंसा के सहारे विभिन्न देशों की नीतियों को अपने अनुसार संचालित करना चाहते हैं.
इस्लामी आतंकवादियों के इस कार्य में सबसे बड़ा सम्बल उन राजनीतिक शक्तियों और बुद्धिजीवियों से मिलता है जो मुस्लिमों पर अत्याचार के इस्लामी आतंकवादियों के अपप्रचार को सहयोग प्रदान करते हुये आतंकवादियों के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई का विरोध मानव अधिकारियों के नाम पर करते हैं तथा आतंकवादियों के पक्ष में सहानुभूति के वातावरण का निर्माण करते हैं. इस्लामी आतंकवाद के इस युग में सबसे बड़ी आवश्यकता आतंकवादियों की रणनीति को पूरी तरह समझकर उसमें सहयोग करने वाले तत्वों को पहचानकर उन्हें बेनकाब करने की है. मो. अफजल की फांसी की सजा की माफी का अभियान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत में भी ऐसा बौद्धिक राजनीतिक वर्ग है जो अपने निहित स्वार्थों के लिये इस्लामी आतंकवादियों के प्रति पूरी सहानुभूति रखता है. इस्लामी आतंकवादियों की यह नई रणनीति विश्वव्यापी जेहाद को नया आयाम स्वरूप प्रदान करते हुये इसका प्रतिरोध करने के लिये कुछ विशेष वैश्विक रणनीति की आवश्यकता की ओर संकेत करती है.
आतंकियों को सजा दिलाने या उनके प्रति कठोरता से पेश आने के मामले में अमेरिका और यूरोप के देशों की अपेक्षा कहीं अधिक नरम देश की छवि बना चुका भारत यदि मो. अफजल जैसे आतंकवादियों की सजा इस्लामवादियों के दबाव में टालने या क्षमा करने की नई प्रवृत्ति का विकास करता है तो निश्चय ही यह देशवासियों की पराजय और भात पर शरियत और इस्लाम का शासन स्थापित करने की आकांक्षा रखने वाले इस्लामादियों की विजय होगी.

