इस्लामी कट्टरता का नया दौर
पाकिस्तान में पिछले दिनों जब प्रमुख प्रांत पंजाब के राज्यपाल सलमान तासीर की हत्या उनके ही अंगरक्षक द्वारा कर दी गयी तो अनेक प्रश्न एक साथ उठ खडे हुए। इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढना अत्यंत आवश्यक है। पाकिस्तान में जिस प्रकार यह हत्या अन्जाम दी गयी है वही अपने आप में सनसनीखेज है और जिस प्रकार इस हत्या के बाद पाकिस्तान के प्रमुख इस्लामी मजहबी संगठन और राजनीतिक दल इस घटना को न केवल सही ठहरा रहे हैं वरन इसे इस्लाम और पैगम्बर की चौदह सौ वर्ष पुरानी परम्परा के अनुक्रम में प्रशंसित कर रहे हैं उससे निश्चय ही यह आवश्यक हो गया है कि इस पूरी घटना को समग्रता में देखा जाये। समग्रता से आशय यह है कि क्या यह घटना पाकिस्तान की अराजक स्थिति का परिचायक है या फिर किसी नये रुझान का आरम्भ है। निश्चय ही इसे केवल कानून व्यवस्था के गिरावट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये विशेष रूप से तब जब कि तालिबान ने इस हत्या की जिम्मेदारी भी ले ली है। हालाँकि इस दावे की सत्यता अभी प्रमाणित नहीं हुई है लेकिन फिर भी इससे कुछ गम्भीर प्रश्न अवश्य खडे हुए हैं। Read more
विकीलीक्स के प्रकाश में हमारी कूट्नीतिक स्थिति
अभी कुछ दिनों पूर्व ही विकीलीक्स ने एक बार फिर अमेरिका के अनेक गोपनीय दस्तावेजों और राजनयिकों के केबल संदेश को सार्वजनिक कर सनसनी मचा दी है। विकीलीक्स ने जिन विषयों को स्पर्श किया है वे काफी व्यापक हैं लेकिन जिन विषयों का सीधे सीधे भारत से सम्बन्ध है उनके प्रकाश में निश्चय ही भारत की कूटनीतिक स्थिति की समीक्षा की जा सकती है। विकीलीक्स से सम्बन्धित जो विषय भारत के लिये मह्त्व के हैं उनमें अधिकतर का सम्बन्ध 26 नवम्बर 2008 को भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण से है। विकीलीक्स से एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो गयी है कि इस आक्रमम के पश्चात जिस तरह से तत्कालीन भारत सरकार ने अपनी कूटनीतिक विजय की आत्मश्लाघा की थी वह देश को गुमराह करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। इस आक्रमण के पश्चात एक तरीके से ऐसा वातवरण बनाया गया कि सरकार के किसी कदम की आलोचना करना बलिदान देने वाले सैनिकों और सामान्य जनों के शवों पर राजनीति करने के समान मान लिया जाता था और उसी भावुकता का लाभ उठाकर तत्कालीन सरकार ने विश्व पटल पर भारत की छवि को क्या स्वरूप दिया यह तो आज विकीलीक्स के खुलासों से स्पष्ट है। Read more
कश्मीर समस्या के विविध आयाम
इन दिनों कश्मीर समस्या एक बार फिर पूरे विकराल् स्वरूप के साथ हमारे समक्ष उपस्थित है। आज कश्मीर समस्या का जो स्वरूप हमें दिखाई दे रहा है उसके अनेक ऐतिहासिक कारण हैं जिनकी चर्चा समय समय पर होती रहती है परंतु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज भी कश्मीर हमारे समक्ष इतिहास के अनसुलझे प्रश्न की तरह मुँह फैलाये खडा है।
कश्मीर समस्या निश्चित रूप से देश की स्वतंत्रता के बाद देश के नेतृत्व की उस मानसिकता का परिचायक ही है कि देश का नेतृत्त्व क़िस प्रकार उन शक्तियों के हाथ में चला गया जो न तो भारत को एक सांस्कृतिक और न ही आध्यात्मिक ईकाई मानते थे। वे तो भारत को एक भूखण्ड तक ही मानते थे जिसका सौदा विदेशी दबाव में या अपनी सुविधा के अनुसार किया जा सकता है। आज कश्मीर के सम्बन्ध में यह बात पूरी तरह समझने की है कि कश्मीर भारत की मूल पहचान और संस्कृति का अभिन्न अंग सह्स्त्रों वर्षों से रहा है। कश्मीर के सम्बन्ध में एक बडी भूल यही होती है कि हम इसे भारत का अभिन्न अंग मानते हुए भी इसे एक राजनीतिक ईकाई भर मान कर संतुष्ट हो जाते हैं जिसका इतिहास 194 से आरम्भ होता है। कश्मीर के प्रति भारत का भावनात्मक लगाव जब तक उसकी ऐतिहासिकता के साथ चर्चा मे नहीं लाया जाता तब तक इसका पक्ष अधूरा रहेगा। इसी पक्ष के अभाव के चलते इस समस्या को पूरी तरह राजनीतिक सन्दर्भ में देखा जाता है और भारत का एक वर्ग कहीं न कहीं जाने अनजाने इस सम्बन्ध में हीन भावना से ग्रस्त होता जा रहा है कि कश्मीर में स्वायत्तता या फिर स्वतंत्रता की माँग पर विचार किया जा सकता है। इस प्रकार कश्मीर समस्या का एक आयाम तो उसे उसके सांस्कृतिक सातत्य में न देखने की भूल है। Read more
लाचार भारत या लाचार नेतृत्व ?
भारत के लिये कूटनीटिक समस्यायें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर के विषय को उठाने के बाद और इसे एक स्वतन्त्र देश का दर्जा देने की माँग उठाने के बाद विश्व के मुस्लिम देशों के संगठन आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कांफ्रेंस ने जम्मू कश्मीर के लिये विशेष राजदूत की नियुक्ति कर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की मुश्किलें और बढा दी हैं। ओआईसी के इस निर्णय का भारत की स्थिति पर दूरगामी प्रभाव पड्ने वाला है। इससे एक ओर तो पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले देश के रूप में विश्व भर में बन रही अपनी पहचान से लोगों का ध्यान हटाकर कश्मीर के विषय को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप का बना सकेगा और इसी के साथ कश्मीर में कार्यरत अलगाववादी संगठन नयी परिस्थितियों में कश्मीर के मुद्दे को पुनर्परिभाषित कर सकेंगे।
पिछले कुछ दिनों से भारत सरकार और कश्मीरी अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के मध्य नये सिरे से बातचीत के लिये प्रयास हो रहे हैं और अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि इस माह के अंतिम सप्ताह में इन दोनों पक्षों में बातचीत का दौर आरम्भ हो सकता है। कश्मीर के विषय पर भारत सरकार हुर्रियत के साथ जो बातचीत करना चाहती है उसके पीछे एक तो अमेरिका का दबाव काम कर रहा है तो वहीं पिछले दिनों पाकिस्तान की सरकार द्वारा गिलगित और बालटिस्तान के क्षेत्र को एक अध्यादेश द्वारा स्वायत्तता देने के बाद भी उसे प्रकारांतर से पाकिस्तान के अधीन कर लेने से भी स्थितियों में कुछ परिवर्तन आया है।
गिलगित और बालटिस्तान क्षेत्र जम्मू कश्मीर का अंग नहीं था वरन जम्मू कश्मीर का उत्तरी क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। भारत पाकिस्तान के विभाजन के उपरांत 1 नवम्बर 1948 को यह क्षेत्र् डोगरा राज्य से अलग हो गया और पाकिस्तान में विलय कर लिया परंतु पाकिस्तान ने इसे पाक अधिकृत कश्मीर का अंग नहीं बनाया और एक विशेष कानून के द्वारा इसे प्रशासित किया। इस पर लागू होने वाला कानून अंग्रेजों के समय का ही कानून था जिसने अंतर्गत इस क्षेत्र के लोगों को किसी भी प्रकार की प्रशासनिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं दी गयी और ये लोग लगभग मार्शल ला की स्थिति में जीने को विवश रहे। पाक अधिकृत कश्मीर ने से अपने क्षेत्र का अंग बनाने से मना कर दिया क्योंकि इसके निवासी शिया और इस्मायली थे और पाक अधिकृत कश्मीर के शासकों का आशंका थी कि इस क्षेत्र के आने से उनका सुन्नी प्रभाव क्षीण हो जायेगा।
1980 के दशक में इस क्षेत्र में जनरल जिया उल हक ने शिया और इस्मायली लोगों का दमन कर यहाँ सुन्नी प्रभाव बढाने का प्रयास किया जिसके चलते इस क्षेत्र में भी शिया सुन्नी संघर्ष हुआ जिससे कि इस दशक में पूरा पाकिस्तान प्रभावित था और खुफिया एजेंसियों का तो कहना है कि जनरल जिया उल हक के विमान की दुर्घटना में इसी क्षेत्र के शिया तत्वों का हाथ था क्योंकि उस समय तक विमान के लिये तकनीकी और सेवाकर्मियों के लिये इसी क्षेत्र के शिया लोगों की भर्ती की जाती थी।
इस घटना के बाद से पाकिस्तान के शासक वर्ग ने गिलगित और बालटिस्तान में कडे कानून और सेंसरशिप के जरिये इस क्षेत्र में किसी राजनीतिक आन्दोलन या यहाँ की सूचनायें बाहर नहीं जाने देने का पूरा प्रयास किया। इसके साथ ही यह पहाडी क्षेत्र पाकिस्तान के लिये रणनीतिक दृष्टि से भी काफी लाभदायक था और कराकोरम पहाडी क्षेत्र इसी क्षेत्र में होने के कारण 1980 के दशक में पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान ने इसी पहाडी क्षेत्र का उपयोग कर चीन, ईरान और उत्तर कोरिया के साथ परमाणु तकनीक का आदान प्रदान किया। 1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत रूस के विरुद्ध पाकिस्तान का उपयोग करते हुए अमेरिका ने पाकिस्तान की परमाणु तस्करी की ओर से आंखें मूँदें रखीं और अमेरिकी कांग्रेस प्रति वर्ष उसे परमाणु के सम्बन्ध में चरित्र प्रमाण पत्र देती रही। इसी के साथ गिलगित और बाल्टिस्तान में जो दमन चक्र चलाया गया उस ओर से भी शेष विश्व ने आँख मूँद ली।
2001 में अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद बदली हुए परिस्थितियों में विशेषकर अब्दुल कदीर खान के परमाणु तस्करी के नेटवर्क के खुलासे के बाद इस्लामी आतंकवादियों के हाथ में परमाणु तकनीक चले जाने के भय से अमेरिका और इजरायल सहित पश्चिमी देशों के पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर नजर रखे जाने से कराकोरम पहाडी क्षेत्र का रणनीतिक मह्त्व बढ गया और साथ ही पिछले अनेक दशक से गिलगित और बालटिस्तान में राजनीतिक और व्यक्तिगत अधिकारों के लिये चल रहे संघर्ष को कुछ हद तक शांत करने के लिये पाकिस्तान ने अब इस क्षेत्र को स्वायत्तता देने का नाटक रचा है जबकि इस बहाने इस क्षेत्र को पाकिस्तान के नियंत्रण में ले लिया गया है। इस क्षेत्र को लेकर पाकिस्तान में अनेक मत हैं और अनेक बार पाक अधिकृत कश्मीर के न्यायालय और पाकिस्तान के न्यायालय में टकराव हो चुका है कि इस क्षेत्र को विवादित माना जाये या फिर पाक अधिकृत कश्मीर का अंग माना जाये। कुल मिलाकर वर्तमान स्थिति यह है कि इसे एक राजनीतिक मुद्दा मान लिया गया है। क्योंकि 1 नवम्बर 1948 को पाकिस्तान में विलय के समय भी पाकिस्तान ने इसे अपना अंग नहीं बनाया था और इसे विवादित क्षेत्र ही माना था जिसके भाग्य का फैसला भविष्य़ में कश्मीर की स्थिति पर निर्भर करेगा।
ऐसी परिस्थिति में एक तो यह क्षेत्र पूरी तरह स्वायत्त है और 15 अगस्त 1947 से पूर्व की स्थिति के अनुसार इस क्षेत्र पर पाकिस्तान का कोई अधिकार नहीं बनता है। लेकिन इस पूरे मामले में भारत सरकार की ओर से जो भी ढीली ढाली प्रतिक्रिया आयी है उससे तो यही लगता है कि देश की संसद ने 1994 में जो प्रस्ताव पारित किया था कि पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेंगे उसके प्रति अब सरकार गम्भीर नहीं है और पाक अधिकृत कश्मीर तो दूर एक अन्य विवादित क्षेत्र के पाकिस्तान का अंग बना लेने पर भी भारत सरकार ने मुखर होकर इसका विरोध नहीं किया।
कश्मीर के मुद्दे को छोडकर गिलगित और बालटिस्तान का पहाडी क्षेत्र और कराकोरम का क्षेत्र रणनीतिक स्थिति से अत्यंत संवेदनशील है ऐसे में चीन की इस क्षेत्र में बढती भूमिका को देखते हुए भी इस क्षेत्र पर पाकिस्तान की प्रशासनिक पकड निश्चित रूप से भारत के लिये चिंता का कारण होना चाहिये परंतु भारत सरकार ने इस विषय को जनता से बचाने का ही प्रयास अधिक किया और मीडिया ने भी इस विषय को अधिक मह्त्व देना उचित नहीं समझा।
1980 के दशक की भाँति एक बार फिर अफगानिस्तान में अमेरिका को पाकिस्तान की आवश्यकता है साथ ही उसके पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और बलूचिस्तान में स्थित अल कायदा और तालिबान के लडाकों और नेतृत्व को समाप्त करने के लिये भी वह पूरी तरह पाकिस्तान पर निर्भर है। अमेरिका की इस लाचारी का लाभ उठाकर पाकिस्तान उसे अपने हित में उसी प्रकार प्रयोग कर रहा है जैसे 1980 के दशक में किया था।
अमेरिका के राष्ट्रपति और उनका प्रशासन भी पाकिस्तान के इस तर्क से सहमत हुआ सा लगता है कि यदि भारत से लगी सीमा पर शांति रहे तो पाकिस्तान को आतंकवाद से लड्ने में अधिक सहायता होगी। इस तर्क के सहारे पाकिस्तान भारत पर कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का दबाव डाल रहा है और बडी चालाकी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे इस्लामिक राजनीति से जोड रहा है।
भारत सरकार ने एक बार फिर हुर्रियत कांफ्रेस के साथ बातचीत का जो निर्णय लिया है उसके सकारात्मक परिणाम मिलने की सम्भावना अत्यंत क्षीण है क्योंकि हुर्रियत कांफ्रेंस एक ओर तो पाकिस्तान के नेताओं के निकट सम्पर्क में है और ओआईसी जैसे संगठनों के साथ मिलकर कश्मीर के मुद्दे को वैश्विक इस्लामी राजनीतिक के साथ जोड रहा है और दूसरी ओर इसी आक्रामक कूट्नीति के सहारे भारत को बातचीत के लिये विवश कर रहा है। ऐसे में पिछले दो दशक से चल रहे इस्लामी आतंकवाद और अलगाववादी आन्दोलन को नया आयाम प्राप्त हो जायेगा और इन तत्वों को लगेगा कि आतंकवाद के बल पर सरकारों को कूटनीतिक मेज पर घसीटा जा सकता है।
11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद जिस प्रकार आतंकवाद की परिभाषा उभर कर आयी थी और विश्व समुदाय में आतंकवाद की पुरानी अवधारणा कि एक के लिये आतंकवादी दूसरे के लिये स्वतंत्रता का संघर्ष करने वाला है ध्वस्त हो गयी थी और कश्मीर से लेकर चेचन्या तक सभी को आत्ंकवादी ही माना जाने लगा था। यह स्थिति अब बदल रही है। जो लोग जार्ज बुश की पराजय और बराक ओबामा की विजय से नये विश्व का उदय देख रहे हैं उन्हें ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद कश्मीर की स्थिति में आये बदलाव की ओर भी ध्यान देना चाहिये।
कश्मीर में उमर अब्दुल्ला की सरकार के गठन के साथ ही जम्मू कश्मीर में एक विशेष प्रकार की राजनीति के दर्शन हमें हो रहे हैं। जम्मू कश्मीर में उमर अब्दुल्ला ने एक नरम अलगाववाद की नीति अपनाकर हुर्रियत कांफ्रेस और पीडीपी का राजनीतिक विस्तार समाप्त करने का प्रयास किया लेकिन इस सरकार के गठन के बाद से ही पीडीपी और हुर्रियत कांफ्रेंस ने किसी न किसी विषय को लेकर रोज कश्मीर की सडकों पर प्रदर्शन और हिंसा को आम कर दिया है ताकि विश्व समुदाय को यह सन्देश दिया जा सके कि कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन चरम पर है और इस क्षेत्र के लोग स्वतंत्रता चाहते हैं। इसी स्थिति के मध्य पाकिस्तान की ओर से सीमा पार घुसपैठ की घटनायें तेज हो गयी हैं और रोज सैन्य बलों के साथ पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों की मुठभेड के समाचार आते हैं लेकिन सामान्य जनता को इससे कोई फर्क नहीं पडता क्योंकि उन्हें अब इस क्षेत्र के प्रति कोई संवेदना नहीं रही और उन्हें पता है कि यहाँ रोज ऐसी घटनायें होती रहती हैं। देश के लोगों की यही संवेदनहीनता भारत सरकार को कश्मीर के मामले पर ढुलमुल् रवैया अपनाने का साहस प्रदान करती है।
पिछले अनेक अवसरों पर हम देख चुके हैं कि हुर्रियत और सरकार के मध्य बातचीत का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता है सिवाय इसके कि हुर्रियत जैसे पाकिस्तान परस्त अलगाववादी संगठन को मान्यता देकर भारत सरकार प्रकारांतर से पाकिस्तान को भी कश्मीर की समस्या का अंग बना लेती है। कुछ लोगों का तर्क है कि यदि बातचीत नहीं तो इस समस्या का निदान क्या है? निश्चित रूप से बातचीत होनी चाहिये लेकिन देश को यह तो पता होना चाहिये कि आखिर सरकार इस बातचीत से हासिल क्या करना चाहती है? केवल किसी के कहने पर या दबाव में बातचीत का अर्थ ही क्या हुआ? क्या बातचीत के द्वारा हुर्रियत के इस तर्क को स्वीकार किया जायेगा कि आतंकवाद के आरोप में जेलों में बन्द लोग राजनीतिक कैदी हैं , या फिर कश्मीर से सेना हटाने के प्रस्ताव को माना जायेगा?
जितनी बार भी हुर्रियत जैसे संगठ्नों के साथ बातचीत का प्रस्ताव किया जाता है निश्चित रूप से उन इस्लामी आतंकवादी संगठनों को सन्देश जाता है कि लगातार आतंकवाद की नीति का परिणाम होता है और आतंकवाद से लड्ते लड्ते अंततः राज्य, सरकार और जनता बातचीत की मेज पर आ ही जाती है और ऐसे थके और हारे लोगों के साथ मनमानी शर्तों पर बातचीत की जा सकती है।
ऐसी स्थिति में जबकि भारत में पिछले वर्ष 26 नवम्बर को मुम्बई पर हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के बाद आज दस महीने व्यतीत हो जाने पर भी भारत सरकार पाकिस्तान को कुछ भी करने के लिये बाध्य नहीं कर पाई जबकि इसके विपरीत पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनेक माध्यमों से उठवाने में सफल रहा और अब भारत ने पाकिस्तान परस्त कश्मीरी अलगाववादी संगठन के साथ बातचीत के प्रस्ताव को मानकर अपनी कूटनीतिक विवशता का परिचय दे दिया है। आज की स्थिति में पाकिस्तान भारत के लिये एजेंडा बना रहा है और भारत उसका पालन करने के लिये विवश है। 110 करोड की जनसंख्या वाला, परमाणु सम्पन्न देश जो महाशक्ति बनने का स्वप्न देख रहा है उसकी यह विवशता देखकर कष्ट आश्चर्यजनक है क्योंकि यह विवशता इस देश के लोगों की नहीं है वरन इस देश के राजनीतिक नेतृत्व की है। यह विवशता तो तब और उजागर होती है जब हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ यदि शांति प्रक्रिया नहीं चली तो उसका अर्थ होगा युद्ध लेकिन शायद प्रधानमंत्री जी भूल जाते हैं कि पाकिस्तान तो भारत के साथ पिछले 62 वर्षों से नित्य प्रति प्रच्छ्न्न युद्ध लड रहा है और हम नये नये तर्कों के सहारे अपनी विवशता, लाचारी और कमजोरी को छिपा रहे हैं।
इजरायल की निन्दा का दौर फिर आरम्भ
पिछले वर्ष इजरायल द्वारा हमास के विरुद्ध गाजा में की गयी कार्रवाई को लेकर समस्त विश्व ने इजरायल की निन्दा की थी। इजरायल की इस कार्रवाई पर संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार परिषद ने जो इस विश्व संस्था की नवोदित संस्था है उसने दक्षिण अफ्रीका के रिचर्ड गोल्ड्स्टोन के नेतृत्व में एक जाँच समिति निर्मित की थी जिसकी जाँच रिपोर्ट बीते दिनों 15 सितम्बर को प्रकाशित हुई। इस जाँच रिपोर्ट को लेकर दो प्रकार की प्रतिक्रियायें आनी स्वाभाविक थीं। एक ओर इजरायल ने जहाँ इस रिपोर्ट को एकतरफा और पूर्वाग्रहपूर्ण बताया है वहीं इजरायल विरोधी इसे इजरायल की निन्दा का एक और हथियार मानकर चल रहे हैं। वैसे अपनी स्थापना के बाद से पिछले 6 दशक में इजरायल की इतनी निन्दा हुई है कि अब इस देश को भी इस निन्दा की परवाह नहीं करनी चाहिये।
गोल्डस्टोन रिपोर्ट को लेकर इजरायल ने जो आपत्तियाँ उठाई हैं उनपर ध्यान दिये बिना इस रिपोर्ट को पूरी तरह स्वीकार कर लेना और इजरायल को युद्ध अपराधी मान लेना न तो नैतिक दृष्टि से उचित है और न ही अकादमिक दृष्टि से ही उचित है। गोल्डस्टोन रिपोर्ट पर विश्व भर में हुई प्रतिक्रिया पूरी तरह एकतरफा और भावुक है जिसमें इजरायल को पहले से ही दोषी सिद्ध किया जा चुका है। इजरायल ने जब गाजा पर कार्रवाई की थी तभी यह मान लिया गया था कि फिलीस्तीनी और हमास निर्दोष है और इजरायल फिलीस्तीन में नरसंहार कर रहा है। इसलिये पूरी तरह स्पष्ट है कि यदि गोल्ड्स्टोन रिपोर्ट में इजरायल पर आरोप न लगाये जाते तो शायद आज जो लोग गोल्डस्टोन की प्रशंसा करते नहीं थकते वही उसे अमेरिका और इजरायल का एजेण्ट सिद्द करने में पीछे नहीं रहते। इस रिपोर्ट को नकारते हुए इजरायल ने जो तर्क दिये हैं उन पर ध्यान तो दिया ही जा सकता है। जिस मानवाधिकार परिषद ने इस जाँच समिति को बनाया था वह पहले ही गाज़ा में इजरायल की कार्रवाई को युद्ध अपराध बताकर निन्दित कर चुकी थी ऐसे में इस परिषद की निष्पक्षता को सन्देह के दायरे से बाहर कैसे माना जा सकता है जब इसने जाँच आयोग बनाने से पूर्व ही इजरायल के सम्बन्ध में अपनी राय व्यक्त कर दी थी।
इसी प्रकार कुछ अन्य बातें भी हैं जिसके चलते इस जाँच रिपोर्ट को जाँच से अधिक एक राजनीतिक वक्तव्य माना जा सकता है। जाँच रिपोर्ट में हमास की ओर से पिछले कुछ वर्षों में फिलीस्तीन से दागे गये 1200 राकेटों का उल्लेख तक नहीं किया गया है और इसी के साथ जिस गाजा में हमास का इतना प्रभाव है वहाँ के लोगों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे जाँच समिति के समक्ष गवाही में किसी भी प्रकार से हमास के विरुद्ध कोई बात कहते जबकि पूरे अभियान में बात सामने आयी थी कि हमास ने सामान्य नागरिकों को आगे कर रखा था ताकि उनके मरने पर इसे नरसंहार बताया जा सके।
जिस प्रकार रिपोर्ट में हमास की उकसाने वाली कार्रवाई और 1200 राकेट अपने क्षेत्र में दागे जाने के बाद भी संयम बनाये रखने की इजरायल के पक्ष को पूरी तरह नजरअन्दाज किया गया है उससे तो यही खतरा उत्पन्न हो गया है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिये राज्यप्रायोजित आतंकवाद से निपटने के लिये आत्मरक्षा की कार्रवाई करना अत्यंत कठिन हो जायेगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार परिषद ने एक बार फिर उस मानसिकता का परिचय दिया है जो पूरी तरह विरोधाभासी है। वर्तमान समय में जब कुछ देश धर्म को एक राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग कर इस नीति को अपनी विदेश नीति का अंग बना रहे हैं तो ऐसे में किसी भी प्रतिरोध पर प्रश्नचिन्ह खडा करने से पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ या मानवाधिकार संगठन यह तो बतायें कि इस इस्लामवादी मानसिकता और इसके पीछे छुपे उद्देश्यों का मुकाबला कैसे किया जाये?
एक ओर समस्त विश्व में वामपंथी और इस्लामवादी बौद्धिक वर्ग गोल्डस्टोन रिपोर्ट पर इतना बावेला मचा रहा है वहीं ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के खुलेआम इजरायल को नष्ट करने की धमकी पर चुप है। अभी कुछ दिन पूर्व ही ईरान के राष्ट्रपति ने यूरोप में हुए यहूदी नरसंहार को एक काल्पनिक और तथ्य से परे बात कहा और इस आधार पर इजरायल के अस्तित्व को चुनौती दी। वास्तव में महमूद अहमदीनेजाद की बात को लेकर वे लोग उत्साहित हो सकते हैं जो वर्षों से इस्लाम के गठबन्धन से अमेरिका और पूँजीवाद को नष्ट करना चाहते हैं लेकिन विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि धार्मिक उन्माद के आधार पर स्थापित की गयी कोई व्यवस्था कितनी विनाशकारी होती है ।
समस्त विश्व में सोवियत रूस के पतन के बाद और वैश्वीकरण के विस्तार के बाद कम्युनिज्म के लिये वैचारिक धरातल पर कुछ बचा ही नहीं और अब कम्युनिज्म का एक ही आधार है अमेरिका विरोध। समस्त विश्व में वामपंथियों ने इस्लामवादी आन्दोलन के साथ मिलकर राजनीतिक इस्लाम को मजबूत करना आरम्भ किया है और भारत में यही कम्युनिष्ट बुद्धिजीवी धीरे धीरे माओवादियों और नक्सलियों के साथ इस्लामवाद और राजनीतिक इस्लाम को सशक्त कर रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में वैश्वीकरण के विस्तार के साथ विचारधाराओं के एजेण्डे भी वैश्विक हो रहे हैं। इसी सन्दर्भ में अब वैश्विक स्तर पर इजरायल और फिलीस्तीन विवाद में इजरायल का विरोध करना वामपन्थी होने का पहला लक्षण है इसलिये इजरायल की निन्दा करते हुए इस्लामवादियों को संतुष्ट रखते हैं। कम्युनिष्टों को लगता है कि अब समय आ गया है कि इस्लाम के आधार पर ब्याजमुक्त अर्थव्यवस्था की अवधारणा का समर्थन किया जाये ताकि पूँजीवाद को ध्वस्त किया जा सके।
वैश्विक स्तर पर वामपंथियों का इजरायल विरोध काफी पुराना है लेकिन भारत में इसके बारे में अधिक चर्चा तब से होने लगी जबसे 1991 में भारत ने इजरायल के साथ राजनयिक सम्बन्ध आरम्भ किये। भारत में कम्युनिज्म और इस्लाम का गठबन्धन काफी पुराना है और कम्युनिष्टों को सदा से यही लगा कि भारत में यदि कम्युनिज्म को स्थापित करना है तो भारत का मूल हिन्दू स्वरूप नष्ट करना होगा और इसलिये उन्होंने सेक्युलरिज्म की आड में भारत के इतिहास को पराजय की मानसिकता से भर दिया और इस्लाम को एक विजेता के धर्म के रूप में स्थापित किया। इसी गठबन्धन के चलते इजरायल के साथ रणनीतिक समानता होते हुए भी भारत को उसे राजनयिक दर्जा देने में 4 दशक से भी अधिक समय लग गया। अब इजरायल को राजनयिक दर्जा मिलने के बाद कम्युनिष्ट इस विषय को राजनीतिक और बौद्धिक दोनों मंचों पर एकसाथ उठाते हैं। पिछले दिनों सम्पन्न लोकसभा चुनाव में केरल में अनेक मुस्लिम संगठ्नों ने खुलकर कम्युनिष्टों का साथ दिया और वर्तमान केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर को हराने के लिये कम्युनिष्ट और मुस्लिम संगठन गोलबन्द हुए थे क्योंकि उन पर आरोप था कि वे इजरायल समर्थक हैं।
विश्व स्तर पर और भारत में इजरायल की निन्दा के फैशन को कम्युनिष्ट और इस्लामवादी प्रभाव के रूप में आँकना चाहिये। गोल्ड्स्टोन रिपोर्ट को लेकर यूरोप में जो प्रतिक्रिया आयी उससे स्पष्ट है कि यूरोप में कम्युनिष्ट प्रभाव क्षीण हो रहा है। भारत में अब भी बडी मात्रा में कम्युनिष्ट विचार के लेखक और पत्रकार हैं जो विचारधारा के स्तर पर इजरायल की निन्दा करते हैं लेकिन उसका आधार केवल इस्लामवादी आन्दोलन को सशक्त करना और उनके साथ एकता प्रदर्शित करना होता है। वैसे भारत में पश्चिम की तर्ज पर अनेक उदारवादी-वामपंथी भी हैं जो अपनी सार्वजनिक छवि को ध्यान में रखते हुए इजरायल विरोधी दिखना पसन्द करते हैं और व्यक्तिगत रूप से इजरायल की प्रशंसा करते हैं और उसकी प्रगति का पूरा लाभ उठाते हैं। यह वर्ग इजरायल की निन्दा किसी वैचारिक प्रतिबद्धता से अधिक राजनीतिक रूप से सही होने की ललक के कारण करता है परंतु जो कम्युनिष्ट इजरायल की निन्दा करते हैं वे बौद्धिक वास्तव में इस्लामवाद के साथ हैं और राजनीतिक इस्लाम का वर्चस्व बढता हुआ देखना चाहते हैं। यह वही वर्ग है जो भारत में हिन्दुत्व को भी गाली देते नहीं थकता, परंतु नक्सलवाद को व्यवस्था परिवर्तन का एक आन्दोलन मानता है।
भारत के सन्दर्भ में इजरायल के साथ सम्बन्धों का क्या महत्व है इस बात पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिये न कि इस बात पर कि इजरायल के बारे में समस्त विश्व का मुस्लिम समाज क्या सोचता है? भारत को अपनी सामरिक, रणनीतिक और विदेश नीति सम्बन्धी प्राथमिकतायें निर्धारित करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उसका हित किसमें है न कि अरब के मुसलमानों का हित किसमें है। आखिर इतने वर्षों में भारत के किसी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ने इजरायल की यात्रा नहीं की, संयुक्त राष्ट्र संघ में सदैव इजरायल विरोधी प्रस्ताव का समर्थन किया लेकिन भारत में 15 प्रतिशत से भी अधिक मुस्लिम जनस्ंख्या होने के बाद भी उसे आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कांफ्रेंस की सदस्यता नहीं मिली तो इसी कारण कि यह संगठन भारत के सभी प्रयासों के बाद भी इसे मुसलमानों का प्रतिनिधि नहीं मानता। इसी प्रकार इजरायल- अरब संघर्ष में अरब देशों का साथ देने के बाद भी ओआईसी ने सदैव कश्मीर मसले पर पाकिस्तान का पक्ष लिया क्यों क्योंकि यह संगठन मुद्दों को धर्म के आधार देखता है और भारत को गैर इस्लामिक देश मानकर उसे अपने से बाहर रखता है। इसके विपरीत भारत ने इजरायल के विषय को अपनी राष्ट्र्रीय नीति के बजाय एक धार्मिक विषय बना दिया और इस पूरे मामले को वोट बैंक के साथ जुड्ने दिया।
भारत के लिये समय आ गया है कि वह अपनी नीतियाँ अपने राष्ट्रीय हितों के सन्दर्भ में बनाये न कि किसी के तुष्टीकरण के लिये। आज इजरायल के साथ निकटतम और सामरिक सम्बन्ध या रक्षा समझौता ही इस्लामी आतंकवाद और पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद का प्रतिरोध है।
वैसे भी विचाधारा के स्तर पर जिस प्रकार कम्युनिष्ट और इस्लामवादी एकसाथ आ रहे हैं उसे देखते हुए इस बात की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आने वाले वर्षों में चीन, पाकिस्तान, ईरान और उत्तरी कोरिया एक खतरे के रूप में दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया में सामने आ जायें। क्योंकि आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध में चीन ने इस प्रकार खुलकर कभी भाग नहीं लिया कि उसे इस्लामी जगत के अविश्वास या घृणा का पात्र बनना पडे।
भारत में जो लोग आँखमूदकर इजरायल की निन्दा को सत्य मान लेते हैं उन्हें भारत सहित विश्व स्तर पर बन रहे कम्युनिष्ट इस्लामवादी गठजोड पर भी नजर रखनी चाहिये।

