भारत क्यों हार रहा है कूटनीतिक लडाई?
भारत की सरकार की ओर से नित नये दावे किये जा रहे हैं कि भारत ने पाकिस्तान के विरुद्ध समस्त विश्व में एक ऐसा माहौल बनाया कि उस आक्रामक कूटनीति के आगे उसे भारत के आगे घुटने टेकने पडे। परंतु यह अर्धसत्य है और इस तथ्य से भारत सरकार भी भलीभाँति परिचित है। भारत ने पिछले वर्ष नवम्बर में मुम्बई पर हुए आक्रमण को अमेरिका पर 11 सितम्बर 2001 को हुए आतंकवादी आक्रमण के समानांतर करार दिया और उसी लहजे में पाकिस्तान को चेतावनी दी । Read more
दक्षिण एशिया पर अल कायदा का साया
पाकिस्तान की सूचना मंत्री शेरी रहमान ने जब अपने देश की संसद में इस बात की आशंका व्यक्त की कि अल कायदा, तालिबान के साथ मिलकर अफगानिस्तान और कश्मीर में सक्रिय जेहादी तत्व पाकिस्तान को अस्थिर कर उसका शासन अपने हाथ में लेने का षडयन्त्र रच रहे हैं तो इस सनसनीखेज बयान को भारत में विश्लेषकों द्वारा अधिक महत्व नहीं दिया गया। परंतु यह बात अतयंत महत्व की है और यह बयान उस कठोर वास्तविकता की ओर संकेत करता है जिस ओर पाकिस्तान ही नहीं अफगानिस्तान और भारत सहित सम्पूर्ण दक्षिण एशिया बढ रहा है।
पाकिस्तान की सरकार के एक महत्वपूर्ण मंत्री की ओर से ऐसे बयान आने के पीछे दो तात्कालिक कारण हैं एक तो पिछले माह जिस प्रकार पाकिस्तान की राजधानी के अति सुरक्षा क्षेत्र में प्रधानमंत्री निवास और संसद भवन तक तालिबान और अल कायदा के संयुक्त प्रयासों से एक महत्वपूर्ण होटल को निशाना बना कर उसे पूरी तरह बर्बाद कर दिया गया और इस प्रयास में लगभग एक टन विस्फोटक का प्रयोग किया गया। यह एक ऐसी घटना थी जो संकेत करती है कि पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन किस प्रकार संसाधन सम्पन्न और संस्थात्मक हो चुके हैं।
इसी के साथ एक और पृष्ठभूमि शेरी रहमान के बयान के पीछे है। अल कायदा का मीडिया प्रकोष्ठ काफी दिनों से चुप था और आतंकवाद और अल कायदा पर पैनी नजर रखने वाले अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ भी इस बात से आश्चर्यचकित थे कि 11 सितम्बर को प्रति वर्ष कर्मकाण्ड के तौर पर वीडियो या आडियो टेप जारी करने वाला अल कायदा इस बार चुप क्यों रहा? इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह माना जा रहा था कि अल कायदा का मीडिया प्रकोष्ठ जिसे अल सहाब कहते हैं उसका प्रमुख और अमेरिका का धर्मांतरित नागरिक गदाहन उर्फ अज्जाम अल अमेरिकी इस वर्ष के आरम्भ में पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान में हुए एक बम हमले में मारा गया था जो अमेरिका नीत गठबन्धन सेना ने किया था। उस हमले के बाद अल कायदा के अल सहाब की निष्क्रियता से मान लिया गया कि अल कायदा का प्रचार तंत्र टूट चुका है। परंतु इन आशंकाओं के विपरीत गदाहन ने अल कायदा के सन्देश प्रकाशित करने वाली वेबसाइट पर 4 अक्टूबर को एक सन्देश प्रकाशित किया और इस सन्देश में अफगानिस्तान और पाकिस्तान सहित भारत को भी शामिल करते हुए पूरे दक्षिण एशिया के मुजाहिदीनों का आह्वान करते हुए कहा कि इस पूरे क्षेत्र में जेहाद की गति को तीव्र करें।
इस सन्देश में भारत और कश्मीर का भी उल्लेख किया गया है और क्रूसेडर, यहूदी शत्रुओं के साथ उनके सहयोगियों का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान की सरकार और खुफिया एजेंसी पर आरोप लगाया गया है कि वह अमेरिका और उसके सहयोगियों के कहने पर कश्मीर में जेहाद को कमजोर कर रही है। इसके साथ ही काबुल में भी जेहाद को असफल करने का आरोप क्रूसेडर और हिन्दू भारत पर लगाया है। इस पूरे सन्देश में भारत का उल्लेख विशेष रूप से कश्मीर में जेहाद के सन्दर्भ में किया गया है पर कश्मीर के साथ इस बार भारत का अलग से उल्लेख कर हिन्दू भारत पर विजय का यह पहला कदम बताया गया है। सन्देश में पाकिस्तान की कश्मीर सम्बन्धी नीतियों का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन तहरीके तालिबान को सतर्क किया गया है कि पाकिस्तान की सरकार उसे बरगलाकर उसके साथ युद्ध विराम करना चाहती है और इस सम्बन्ध में सरकार का तर्क है कि उत्तर पश्चिमी प्रांत में विद्रोहियों और आतंकवादियों से निपटने में सेना को लगाने से कश्मीर से सेना हटानी पड रही है जिससे कश्मीर का जेहाद प्रभावित हो रहा है। इसलिये तहरीके तालिबान को पाकिस्तान सरकार के साथ किसी भी प्रकार का भी समझौता करने से सावधान किया गया है।
अल कायदा के इस नवीनतम सन्देश में अमेरिका में आई आर्थिक मन्दी का भी उल्लेख किया गया है और इसे जेहाद की बडी विजय मानते हुए मुजाहिदीनों का आह्ववान किया गया है कि यह जेहाद का उचित अवसर है कि जब झूठे देवताओं की पूजा करने वालों से विश्व को मुक्ति दिलायी जा सकेगी और नयी विश्व व्यवस्था के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा।
इस सन्देश में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ का त्यागपत्र और नये राष्ट्रपति असिफ अली जरदारी का भी उल्लेख है और नये सेनाध्यक्ष परवेज कियानी का भी नाम लिया गया है। परंतु इस सन्देश का जो सबसे मह्त्वपूर्ण पक्ष है वह है पूरे दक्षिण एशिया के लिये जेहाद की बात करना।
वास्तव में यह बात सुन कर आश्चर्य हो सकता है कि शायद अल कायदा ने अपनी प्राथमिकतायें बदल दी हैं और अब मध्य पूर्व, अरब देशों और अमेरिका और यूरोप के स्थान पर उसका निशाना दक्षिण एशिया बन गया है। परंतु ऐसा नहीं है। अल कायदा के मुख्य सरगना ओसामा बिन लादेन ने जब 1998 में इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट की स्थापना की थी और ईसाइयों तथा यहूदियों के विरुद्ध विश्वस्तर पर जेहाद के लिये मुसलमानों का आह्वान किया था तभी से यह संगठन एक सोची समझी केन्द्रित योजना के साथ चल रहा है। अल कायदा ने अपने अंतिम लक्ष्य खिलाफत की स्थापना के लिये और विश्व स्तर पर मध्यकालीन इस्लामिक साम्राज्य प्राप्त करने के लिये सर्वप्रथम अफगानिस्तान में अपना राज्य स्थापित किया फिर संस्थात्मक ढंग से शरियत के शासन को चर्चा का विषय बनाया। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर आक्रमण कर जेहाद का वैश्वीकरण किया और फिर योजनाबद्ध ढंग से समस्त विश्व में स्थानीय स्तर पर इस्लामी राज्य प्राप्त करने के लिये चल रहे आन्दोलनों को एक नेटवर्क के अधीन लाने का प्रयास किया और इस प्रयास में उसे यूरोप अरब और उत्तरी अफ्रीका के अनेक देशों में सफलता भी मिली जहाँ अनेक इस्लामी उग्रवादी संगठन इंटरनेशनल इस्लामिक फ्रंट का हिस्सा बन गये।
अफगानिस्तान से भगाये जाने के बाद अल कायदा के शीर्ष नेतृत्व ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर कबाइली क्षेत्रों में शरण ली और दो विशेष योजनाओं पर कार्य आरम्भ किया। एक तो अगले दशक के लिये अल कायदा का नेतृत्व विकसित करना और अफगानिस्तान के बाद दूसरे किसी राज्य की तलाश करना जिस पर नियंत्रण स्थापित कर अपने इस्लामीकरण के एजेण्डे के साथ विचारधारा को भी आगे बढाया जा सके। इस दिशा में काम करते हुए अल कायदा और तालिबान ने पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी प्रांत और अफगानिस्तान के कुछ क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढाना आरम्भ किया और इस दौरान उसकी ओर से आतंकवादी घटनाओं को भी अंजाम दिया जाता रहा। 2005 में स्पेन की राजधानी मैड्रिड में धमाका और फिर 2006 में लन्दन में धमाका करने में यह नेटवर्क सफल रहा। इसके अतिरिक्त अनेक बडे षडयंत्र असफल भी किये जाते रहे। अफगानिस्तान से पाकिस्तान में छुपने के बाद अल कायदा का जेहाद स्पष्ट रूप ले रहा है और अब यह उन अरब देशों के शासकों को भी निशाना बना रहा है जो उसकी नजर में इस्लामी आधार पर शासन नहीं चला रहे हैं।
वास्तव में अल कायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन और अयमान अल जवाहिरी जिस मुस्लिम ब्रदरहुड के संस्थापक सैयद कुत्ब, उसके भाई मोहम्मद कुत्ब और फिलीस्तीनी इस्लामी चिंतक अब्दुल्ला अज्जाम से प्रेरणा लेते हैं उनके जेहाद की व्याख्या पूरी तरह इस्लाम के शुद्धीकरण और शरियत आधारित शासन के लिये युद्धात्मक जेहाद की आज्ञा देता है और इसके लिये उन मुसलमानों के साथ भी जेहाद जायज है जो विशुद्ध इस्लाम के आदेश का पालन नहीं करते। इसी प्रयास का परिणाम है कि पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत में अपना नियंत्रण स्थापित करने के बाद अल कायदा और तालिबान ने पाकिस्तान की सरकार के विरुद्ध जेहाद तीव्र कर दिया है।
अल कायदा ने अपने एजेण्डे के आधार पर जो योजना बनाई है उसके आधार पर वह सफल हो रहा है। अल कायदा न केवल जेहाद के नाम पर विश्व भर के एक बडे वर्ग के मुसलमानों को ईराक, अफगानिस्तान और लड्ने के लिये प्रेरित कर सका है वरन सूचना क्रांति का भरपूर उपयोग कर विश्व स्तर पर मुस्लिम उत्पीडन की एक काल्पनिक अवधारणा का सृजन कर उसे भरपूर प्रचारित भी किया है और इस प्रचार के चलते अल कायदा ने विश्व भर में मुसलमान बुद्धिजीवियो, वामपंथी विचारकों और युवा मुसलमानों के मन में एक वैश्विक चिंतन का बीजारोपण किया है जो स्थानीय समस्याओं को वैश्विक सन्दर्भ से जोड कर मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा का समर्थन करता है।
पाकिस्तान की सरकार की वरिष्ठ मंत्री ने जब जेहादी तत्वों से पाकिस्तान की स्थिरता को खतरा बताया तो इसके पीछे यही भाव छुपा था।
पाकिस्तान में स्थित अल कायदा नेतृत्व के प्रचार का प्रभाव समस्त दक्षिण एशिया पर पड्ने लगा है। भारत में इंडियन मुजाहिदीन ने जिस प्रकार विस्फोटों से पहले ईमेल भेजकर प्रचार का नया हथकण्डा अपनाया था उसकी समानता अल कायदा की इसी रणनीति से की जा सकती है। भारत में पुलिस ने जिस प्रकार साफ़्टवेयर इंजीनियर को इस प्रचार अभियान के सदस्यों के रूप में चिन्हित किया है उससे तो इस बात में सन्देह ही नहीं रह जाता कि पढे लिखे मुस्लिम युवक अल कायदा के विचारों से प्रभावित हो रहे हैं। अपने नवीनतम सन्देश में जिस प्रकार अल कायदा ने दक्षिण एशिया में मुजाहिदीनों को जेहाद के लिये प्रेरित किया है उससे स्पष्ट है कि अल कायदा के निशाने पर अब पूरा दक्षिण एशिया है।
यह पहला अवसर नहीं है जब अल कायदा ने खुलकर जेहाद के सन्दर्भ में भारत, हिन्दू और कश्मीर का उल्लेख किया है। इससे पूर्व ओसामा बिन लादेन और अयमान अल जवाहिरी अनेक बार हिन्दू, भारत और कश्मीर का उल्लेख कर चुके हैं।
समस्त विश्व में जेहाद के आधार पर खिलाफत साम्राज्य का स्वप्न देख रहे अल कायदा की योजनाओं के बारे में कभी समग्र स्तर पर चिंतन नहीं किया गया। विशेष कर भारत में इस विषय पर कभी चिंतन ही नहीं हुआ और पहले 11 सितम्बर 2001 के अमेरिका पर हुए आक्रमण को अल कायदा बनाम अमेरिका का संघर्ष माना गया और इस बात पर अभिमान किया जाता रहा कि भारत का एक भी मुसलमान जेहाद के लिये कभी लड्ने नहीं गया परंतु अल कायदा के प्रयासों से मुस्लिम चिंतन में, उग्रवादी संगठनों की कार्यशैली में और स्थानीय मुस्लिम उग्रवाद के व्यापक जेहादी स्वप्न के साथ जुड कर वैश्विक स्तर पर एजेंडे को लेकर आ रही समानता की अवहेलना की गयी।
पाकिस्तान की सरकार की महत्वपूर्ण मंत्री शेरी रहमान का यह आकलन इस सन्दर्भ में भी ध्यान देने योग्य है कि भारत के प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह के साथ बातचीत में अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डब्लू बुश ने कहा था कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति असिफ अली जरदारी के ऊपर आतंकवाद के सम्बन्ध में अधिक विश्वास न करें क्योंकि वह अत्यंत कमजोर हैं और आतंकवाद को रोक पाना उनके वश में नहीं है। यह बात पूरी तरह सत्य है और इसका उदाहरण हमारे समक्ष है कि किस प्रकार कश्मीर के मामले पर अमेरिका के दबाव में उन्होंने कुछ और बयान दिया और कश्मीर और पाकिस्तान के दबाव के चलते फिर उस बयान से मुकर गये।
पाकिस्तान की स्थितियाँ इस प्रकार की हैं कि वहाँ कश्मीर में जेहाद का मुद्दा अब हुक्मरानों के हाथ से फिसलकर पूरी तरह जेहादियों के हाथ में आ गया है वह फिर इस्लामी आतंकवादी संगठन हों, पाकिस्तान की सेना के जेहाद परस्त तत्व हों या फिर आईएसआई के जेहादी तत्व सब मिल कर पाकिस्तान में समानांतर शक्ति बन गये हैं। इन तत्वों की अल कायदा और तालिबान से सहानुभूति है और यही कारण है कि पाकिस्तान सरकार आतंकवाद से आधे अधूरे मन से लड रही है।
दक्षिण एशिया में जेहादी तत्वों के मंसूबों को देखते हुए इस पूरे अभियान के लिये नये सिरे से रणनीति बनाने की आवश्यकता है। कुछ लोग इस बात को लेकर अत्यंत उत्साहित हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव में यदि बराक ओबामा कि विजय होती है तो वे पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अल कायदा और तालिबान के सफाये के लिये विशेष प्रयास करेंगे परंतु हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिये कि अमेरिका के राष्ट्रपति का प्रयास अपने देश पर पाकिस्तान या अफगानिस्तान की धरती से होने वाले किसी बडे आक्रमण को रोकना होगा न कि दक्षिण एशिया में जेहाद की विचारधारा को पनपने से रोकना होगा। इस कार्य के लिये हमें अब कोई दीर्घगामी रणनीति अपनानी होगी। यदि अल कायदा के प्रचार अभियान को नहीं रोका जा सका तो भारत में मुसलमानों के एक बडे वर्ग को जेहाद में लिप्त होने से नहीं रोका जा सकेगा।
चुनाव के बाद पाकिस्तान
पाकिस्तान में चुनाव समाप्त हो चुके हैं और मिली जुली सरकार के गठन की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है। पाकिस्तान के चुनावों के उपरांत जो चित्र उभरा है उसके अनुसार पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज गुट को क्रमशः 87 और 66 सीटें प्राप्त हुई हैं इसी के साथ पश्तून बहुल इलाके की पार्टी अवामी नेशनल पार्टी को 10 सीटें प्राप्त हुई हैं जिसके पास 2002 में एक भी सीट नहीं थी। इसी प्रकार 2002 के चुनाव में नवाज की पार्टी के पास केवल 18 सीटें थी जो कि अब 66 पहुँच गयी है। इस प्रकार इस चुनाव में यदि किसी पार्टी को सर्वाधिक लाभ हुआ है तो वह नवाज शरीफ की पार्टी को। पाकिस्तान के चुनाव में आये इस विशेष रुझान की ओर हमें ध्यान देने की आवश्यकता है। नवाज शरीफ की पार्टी जहाँ नवाज के ग्रहनगर पँजाब में बहुत अच्छा प्रदर्शन करने में सफल रही तो वहीं पकिस्तान पीपुल्स पार्टी को बेनजीर भुट्टो के सिन्ध में उतनी सफलता नहीं मिली और उन्हें सहानुभुति का भी विशेष लाभ नहीं मिला। आखिर इस रुझान का कारण क्या हो सकता है। एक तो असिफ अली जरदारी की छवि के चलते पीपीपी को नुकसान हुआ है और उन्हें पँजाब में मुँह की खानी पडी.और दूसरा एक बडा कारण जिसकी ओर लोकमंच के पिछ्ले आलेख में संकेत किया गया था जब नवाज शरीफ पकिस्तान लौटे थे कि बेनजीर भुट्टो का मुशर्रफ से हाथ मिलाना और आतंकवाद तथा धर्मिक कट्टरता के सम्बन्ध में अमेरिका की भाषा बोलना नवाज शरीफ के लिये अधिक सम्भावनाओं का द्वार खोलेगा।
पाकिस्तान के चुनावों पर यदि बारीक निगाह डाली जाये तो पकिस्तान की जनता का मतदान की मतदान की एक विशेष परिपाटी रही है। उनके लिये आम जीवन के मुद्दों पर पर परवेज मुशर्रफ की सरकार के झूठे दावे और बिजली, पानी और रोजगार की बढती समस्या एक प्रमुख मुद्दा था तो दूसरी ओर देश में बढती आतंकवादी घटनाओं के लिये मुशर्रफ की नीतियों को दोषी ठहराया जाना था। पकिस्तान की जनता आतंकवाद से त्रस्त तो है परंतु इस विषय में अपने अनुसार नीतियों का संचालन चाह्ती है न कि अमेरिका के निर्देषों पर। पकिस्तान के मतदाताओं की इसी अभिरुचि का लाभ नवाज शरीफ की पार्टी को विशेष रूप से मिला। पाकिस्तान में अजीब जनादेश या यूँ कहें कि खण्डित जनादेश का प्रमुख कारण पीपीपी का पूरा विश्वास अर्जित न कर पाना और पकिस्तान पीपुल्स पार्टी नवाज गुट क़ा अधिक सशक्त विकल्प बनकर उभरना रहा। इसी प्रकार पश्तून इलाके में विशेष प्रभाव रखने वाली अवामी नेशनल पार्टी भी 2002 में कट्टरपथियों के हाथों पूरी तरह पराजित होने के बाद 10 गुना लाभ अर्जित कर 10 सीटें प्राप्त करने में सफल रही । यह रूझान भी इस तथ्य को प्रतिबिम्बित करता है कि पश्तून इलाके में अभी उदारवादी और वामपंथी रूझान वाली इस पार्टी का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ है। इस बार इस पार्टी ने विशेष रूप से कबायली इलाके के लिये नया नाम पश्तूनिस्तान या ऐसे ही मिलता जुलता नाम और इस पूरे प्रांत के लिये स्वायत्त्ता की मांग को अपना चुनावी एजेंडा बनाया था। यह अपील पूरी तरह काम कर गयी और इस पार्टी को लोगों ने काफी जनादेश दिया।
अब जबकि जनादेश आ चुका है और नयी सरकार के गठन की तैयारी हो रही है तो यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि साथ आने वाले घटक दलों के एजेन्डे क्या रहे हैं और वे आपस में किस आधार पर गठबन्धन सरकार को चला सकते हैं। पकिस्तान पीपुल्स पार्टी की दिवंगत नेत्री बेनजीर भुट्टो ने अमेरिका के इशारे पर राष्ट्र्पति परवेज मुशर्रफ के साथ एक समझौता कर लिया था और उसके अनुसार उन्हें प्रधानमंत्री और मुशर्रफ को राष्ट्र्पति बने रहना था। चुनाव के दौरान बेनजीर की हत्या से अमेरिका की इस नीति को कुछ धक्का लगा क्योंकि अब पकिस्तान की राजनीति में नवाज शरीफ का प्रभाव बढ. गया जो अमेरिका कभी नहीं चाह्ता था। क्योंकि अमेरिका का मानना है कि नवाज शरीफ धार्मिक पार्टियों के साथ अत्यंत सहज हैं और इस्लामी सिद्धांतों में विश्वास रखते हुए सेकुलर राजनीति के लिये उपयुक्त नहीं हैं या दूसरे शब्दों में उन्हे राजनीति के इस्लामीकरण से विशेष परहेज नहीं है। सरकार गठन के उपरांत जो विषय सबकी उत्सुकता का होगा वह यह कि आखिर नये प्रधानमंत्री फहीम मक्दूम सभी सहयोगी दलों के निहित स्वार्थों के मध्य संतुलन कैसे बैठाते हैं।
एक ओर प्रमुख घटक दल पीपीपी को जहाँ अमेरिका से कोई एतराज नहीं है तो वहीं नवाज शरीफ की पार्टी आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध को अपनी शर्तों पर लड.ना चाह्ती है और आतंकवादी गुटों के सफाये में तो अमेरिका का सहयोग चाह्ती है परंतु पकिस्तान के इजराइल के साथ सम्बन्धों को लेकर भी नवाज शरीफ की पार्टी का रूख साफ है कि इस यहूदी देश के साथ पकिस्तान के सम्बन्ध नहीं होने चहिये। इसके अतिरिक्त नवाज की पार्टी की एक और मांग प्रधानमंत्री फहीम को धर्मसंकट में डाल सकती है और वो यह कि राष्ट्रपति मुशर्रफ द्वारा पिछ्ले वर्ष लागू किये गये आपातकाल के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को हटाने के उनके निर्णय को बदल कर उन्हें फिर से अपने पद पर स्थापित करने की मांग भी नवाज की पार्टी की है। आगे चलकर इस मांग पर भी फहीम को निर्णय लेना होगा जो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति संस्था के मध्य टकराव का कारण बन सकता है। पीपीपी तो कम से कम यह टकराव नहीं ही चाहेगी।
सरकार के लिये एक और विषय जो धर्मसंकट का हो सकता है वह एक और सहयोगी अवामी नेशनल पार्टी की मांग को स्वीकार करना कि पश्तून इलाके का नया नामकरण हो और उसे स्वायत्त्ता प्रदान की जाये। इस मांग का विरोध न केवल पँजाबी बहुल लोग करेंगे वरन इससे सेना के पँजाबी प्रभुत्व को भी दीर्घगामी स्तर पर नुकसान हो सकता है इस कारण ऐसे किसी भी प्रस्ताव का सेना भी विरोध कर सकती है जिससे भविष्य में बलोचिस्तान और सिन्ध की स्वायत्त्ता की मांग भी उठ सकती है।
सरकार के गठन से पूर्व इन विरोधाभासों के बाद एक और बात जो अत्यंत महत्वपूर्ण होगी वह यह कि राष्ट्रपति मुशर्रफ इस परिवर्तन को किस प्रकार लेते हैं और नयी सरकार के प्रति क्या रवैया अपनाते हैं। यदि वे सरकार के साथ सहयोग कर चलते हैं तो भी नवाज शरीफ की पार्टी उन्हें किनारे लगाने का प्रयास करेगी क्योंकि नवाज शरीफ का राजनीतिक भविष्य राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के पाकिस्तान की राजनीति में प्रभाव कम होने पर ही निर्भर है जिस मात्रा में मुशर्रफ कमजोर होंगे उसी मात्रा में नवाज शरीफ का राजनीतिक भविष्य उज्ज्वल होगा। पाकिस्तान की नयी सरकार के लिये सबसे बडा काम नवाज शरीफ की राजनीतिक योजना को समझना और उसके साथ संतुलन स्थापित करना होगा। पाकिस्तान की नयी सरकार को तीन राजनीतिक व्यक्तित्वों के साथ सांमजस्य बिठाना है। नवाज शरीफ, असिफ अली जरदारी और फहीम मकदूम। तीनों ही व्यक्तित्व सरकार बनने के उपरांत अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास करेंगें। ऐसे में पीपीपी में जरदारी और फहीम दो शक्ति केन्द्र बनकर उभरने की सम्भावना है जो पार्टी के दीर्घकालिक हितों के लिये ठीक नहीं होगा।
कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पकिस्तान की जनता ने अपने नेताओं को एक अवसर प्रदान किया है जहाँ से वे पकिस्तान को लोकतंत्र की ओर ले जा सकते हैं और आशा का सूरज दिखा सकते हैं। अब यह देखने की बात होगी कि ये नेता इस अवसर का लाभ उठा पाते हैं या फिर पकिस्तान के लोकतंत्र का वही पुराना हश्र होता है। क्योंकि जिस प्रकार के बयान पुरानी सरकार के मंत्रियों के आ रहे हैं उससे लगता है कि वे इस गठबन्धन के अंतर्विरोधों से इस सरकार के शीघ्र गिरने के स्वप्न अभी से देखने लगे हैं।
बेनजीर की हत्या के मायने
बेनजीर भुट्टो की पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने जब निर्णय लिया कि उनकी नेता रावलपिंडी के लियाकत बाग में 27 दिसम्बर 2007 को चुनाव प्रचार के सम्बन्ध में बड़ी रैली को सम्बोधित करेंगी तो उनकी पार्टी के कार्यकर्ता अत्यन्त सशंकित थे और उन्होंने पाकिस्तान के पत्रकारों को बताया था कि उनकी नेता काफी बड़ा जोखिम लेने जा रही हैं। उनकी आशंका निर्मूल सिद्ध नहीं हुई और रैली के बाद कार में बैठते समय एक आत्मघाती हमलावर के द्वारा गोलीबारी और फिर बम धमाके में पाकिस्तान की दो बार प्रधानमन्त्री रह चुकी और तीसरी बार सत्ता संभालने की ओर अग्रसर 54 वर्षीया बेनजीर भुट्टो मारी गईं।
बेनजीर भुट्टो की हत्या किसने की और इसके पीछे मकसद क्या है? यह विषय समझना कोई कठिन नहीं है। 1999 के बाद निर्वासन झेल रही भुट्टो जब 8 वर्षों बाद अपने देश की धरती पर लौटीं तो उससे पूर्व ही पाकिस्तान में तालिबानी कमाण्डर बैतुल्लाह महसूद ने उन पर आत्मघाती हमले की चेतावनी दी थी। यह चेतावनी कोई कोरा गप्प नहीं सिद्ध हुआ और 18 अक्टूबर को श्रीमती भुट्टो के कराची आते ही भीषण आत्मघाती आक्रमण से उनका स्वागत हुआ। इस आक्रमण में श्रीमती भुट्टो तो बाल-बाल बच गईं परन्तु 140 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस आत्मघाती आक्रमण के पश्चात निश्चित हो गया कि श्रीमती भुट्टो की राह आसान नहीं है। इस आक्रमण के बाद श्रीमती भुट्टो ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को एक पत्र लिखकर सरकार, सेना और खुफिया एजेन्सी के आठ लोगों के नाम गिनाये जिनसे उन्हें खतरा था। श्रीमती भुट्टो ने बैतुल्लाह महसूद को एक मोहरा बताया और असली खिलाड़ियों को जनरल जिया उल हक के समय का बताया जो जनरल जिया के समर्थक और उनकी विचारधारा में पगे रहे हैं। यह वह असली सवाल है जिसका हल खोजा जाना है कि अब जबकि अल-कायदा के अफगानिस्तान स्थित कमाण्डर ने बेनजीर की हत्या की जिम्मेदारी ले ली है तो इस हत्या का पाकिस्तान की राजनीति और दक्षिण एशिया की राजनीति पर क्या असर होने वाला है?
पाकिस्तान आज एक विचित्र हालात से गुजर रहा है। जिस देश ने अफगानिस्तान से रूस को हटाने के लिये मुजाहिदीनों को तैयार किया, कश्मीर में आतंकवाद को एक जिहादी रंग दिया, पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन को हवा देकर भारत को रिसते हुये घाव देने की नीति का खाका खींचा और फिर उसका अनुपालन किया। 1980 के दशक में पाकिस्तान ने जिहाद और आतंकवाद को अपनी नीति का प्रमुख अंग बना लिया और प्रत्येक शासन फिर वह 1988-89 में बेनजीर भुट्टो का ही क्यों न रहा हो उसने कश्मीर में आतंकवाद को जारी रखने और जिहादी तत्वों के प्रश्रय में या फिर कहें कि सेना और खुफिया विभाग के जिहादीकरण की नीति में लगा रहा। जिहादीकरण की इस नीति से पाकिस्तान भारत पर लगातार दबाव बनाने में सफल रहा और शीतयुद्ध में अमेरिका का विश्वसनीय साथी बना रहा। रूस के विरूद्ध अमेरिका को भी इस जिहादीकरण की आवश्यकता थी। परन्तु यह जिहाद उनके लिये विश्व पटल या देशों के साथ पारस्परिक लेनदेन में एक बड़ा बिन्दु मात्र था और इस जिहादीकरण को न तो पाकिस्तान और न ही अमेरिका व्यापक इस्लामी क्रान्ति के रूप में देख रहा था। इसके ठीक उलट 1990 के दशक में ओसामा बिन लादेन ने जिहाद को व्यापक रूप से ब्याख्यायित कर समस्त विश्व में शरियत के आधार पर शासन तथा इस्लाम के विश्वव्यापी प्रभाव के साथ इसे जोड़ दिया। अब जिहादीकरण की यह नीति पाकिस्तान और अमेरिका के हाथों से निकलकर कट्टर इस्लाम समर्थकों के हाथों में आ गई जिनके लिये जिहाद का अर्थ विश्व में इस्लाम की प्रभुत्व स्थापना, शरियत के आधार पर शासन संचालन है। इस क्रम में शुद्धतावादी इस्लामवादियों के निशाने पर वे मुस्लिम बहुल देश हैं जहाँ का शासन मुसलमानों के हाथ में होते हुये भी शरियत के आधार पर संचालित नहीं हो रहा है। मध्य पूर्व के अनेक देशों सहित पाकिस्तान भी इसी श्रेणी में आता है।
बेनजीर भुट्टो की हत्या से एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो गई है कि पाकिस्तान में स्थिति न केवल राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के नियन्त्रण से बाहर हो चुकी है वरन् पाकिस्तान में आन्तरिक स्तर पर स्पष्ट विभाजन है। सेना, सरकार, खुफिया एजेन्सियों और कबाइली क्षेत्रों में अनेक ऐसे तत्व हैं जो जिहादी तत्वों के साथ सहानुभूति रखते हैं और 11 सितम्बर 2001 की बदली हुई परिस्थितियों में पाकिस्तान का अमेरिका का साथ देना और आधुनिकता की ओर जाना पसन्द नहीं आ रहा है।
आज पाकिस्तान के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि पाकिस्तान अपने इस विभाजन से किस प्रकार बाहर आये और आधुनिकता को अंगीकार करे। बेनजीर भुट्टो और परवेज मुशर्रफ के बीच कटु सम्बन्धों को मिठास में बदलकर अमेरिका ने दोनों के बीच समझौता करवा दिया और पाकिस्तान में लोकतन्त्र का मार्ग प्रशस्त करते हुये एक कामचलाऊ रास्ता निकाला जिसमें परवेज मुशर्रफ राष्ट्रपति बने और उन्होंने अपनी वर्दी उतारी और 8 जनवरी 2008 को आम चुनाव कराने की घोषणा की। सब कुछ अमेरिका की योजना के अनुरूप ही चल रहा था कि अल-कायदा ने बेनजीर भुट्टो को निशाना बनाकर पाकिस्तान के शासकों को सन्देश दिया है कि वह अमेरिका की किसी नीति सफल नहीं होने देगा और पाकिस्तान को लोकतन्त्र और आधुनिकता के रास्ते पर जाने में हरसम्भव अवरोध उत्पन्न करेगा। श्रीमती भुट्टो की हत्या के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक शून्यता आ गई है। इससे परवेज मुशर्रफ की स्थिति और कमजोर होगी और पाकिस्तान में ऐसा नेतृत्व उभरने में समय लगेगा जो पश्चिमी साँचे में ढला हो और आधुनिकता की बात करता हो। वैसे भी यह बात ध्यान देने की है कि अमेरिका नेतृत्व को थोपकर देश को पटरी पर नहीं ला सकता। जब तक पाकिस्तान का आन्तरिक विभाजन कम नहीं होगा यह समस्या बढ़ती जायेगी और आन्तरिक विभाजन कम होने की सम्भावना फिलहाल तो नहीं दिखती।
पाकिस्तान के इस संकट का भारत पर प्रत्यक्ष असर तो नहीं पड़ेगा परन्तु पड़ोसी देश में कट्टरपंथियों के बढ़ते प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रह सकेगा। सर्वप्रथम तो जिहादवाद का व्यापक इस्लामी क्रान्ति का स्वरूप भारत में उन तत्वों को प्रेरित करेगा जो जिहादवादी आन्दोलन से सहानुभूति रखते हैं और पाकिस्तान जिस मात्रा में असफल राज्य बनता जायेगा उसी मात्रा में जिहाद का आन्दोलन वैश्विक रूप से अधिक मुखर और आक्रामक होता जायेगा। क्योंकि अब अल-कायदा अपने आन्दोलन को वैश्विक स्वरूप देने के लिये संगठित राज्य की खोज में है जो उसके पास अफगानिस्तान की पराजय के बाद से नहीं है।
बेनजीर की हत्या के पीछे केवल राजनीतिक मकसद नहीं है वरन् यह एक व्यापक आन्दोलन का हिस्सा है। आज आवश्यकता जिहाद की मानसिकता और पाकिस्तान के आन्तरिक विभाजन से मिलने वाली इसकी खुराक पर लगाम लगानी होगी। इसके लिये पाकिस्तान में लोकतन्त्र और आधुनिकता के लिये काम कर रहे लोगों को सशक्त करने का प्रयास भारत को विशेष तौर पर करना होगा। भारत अब अमेरिका के भरोसे हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकता उसे पाकिस्तान के सम्बन्ध में तटस्थता की अपनी नीति का त्याग कर पाकिस्तान में हस्तक्षेप करना होगा।
पाकिस्तान में महिला कानून
पाकिस्तान में महिलाओं की स्थिति में सुधार के निमित्त प्रस्तावित महिला अधिकार बिल 2006 पर गतिरोध अभी बरकरार है प्रमुख विपक्षी दलों के बीच इस कानून को लेकर सहमति बनाने के प्रयास विफल रहे और वर्तमान स्वरूप में प्रमुख विपक्षी दल ने ने इसे अस्वीकार कर दिया. प्रस्तावित बिल की प्रति प्राप्त करने के बाद मजलिसे मुत्तेहदा अमल के महासचिव मौलाना फजुर्ररहमान ने पाकिस्तान मुस्लिम लीग के अध्यक्ष चौधरी सजात सहित उलेमाओं और सरकार के प्रतिनिधियों से इस बावत विचार विमर्श किया और उसके बाद विपक्षी दलों के इस गठबन्धन ने इसे अस्वीकार कर दिया. कट्टरपंथी इस्लामी गठबन्धन मजलिसे अमल के अनुसार प्रस्तावित कानून पूरी तरह कुरान और सुन्ना के विपरीत है. इस संगठन का कहना है कि पिछले दो दिनों में सरकार ने दो ड्राफ्ट भेजे हैं और वे दोनों ही कुरान और सुन्ना के विपरीत हैं उधर पाकिस्तान मुस्लिम लीग के नेता चौधरी सुजात ने इसे पूरी तरह कुरान सम्मत बताते हुये इस सम्बन्ध में उलेमाओं की सहमति का भी दावा किया है. ज्ञातव्य हो कि प्रस्तावित महिला अधिकार कानून के अन्तर्गत प्रसिद्ध इस्लामी हदूद कानून को संशोधित किया जाना है जिसमें बलात्कार पीड़ित महिला को अपराध सिद्ध करने के लिये चार पुरूष साक्षियों को लाना पड़ता है अन्यथा महिला को ही दण्डित किया जाता है.

