देश की सेक्युलर राजनीति के पुनर्मूल्याँकन का समय ?

पिछले वर्ष देश में हुए आम चुनावों के बाद से सामान्य तौर पर एक नारा देश की सेक्युलर शक्तियाँ लगा रही हैं कि अब भारत बदल गया है और लोग विकास चाहते हैं और पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति से तंग आ चुके हैं। यह बाद कहते समय जो बात इन तत्वों के ध्यान में रहती है वह यह कि अब विश्व में वैश्वीकरण का युग है और विश्व में एक क्षेत्र को दूसरे से पूरी तरह अलग थलग नहीं रखा जा सकता। ऐसे में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है कि जो कुछ रुझान समस्त विश्व मे हमें देखने को मिल रहा है उस पृष्ठभूमि में ही यदि भारत की राजनीति को समझने का प्रयास किया जाये तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सम्मुख हमारे उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर हमें देना ही होगा। इन प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि सेक्युलर परिभाषा और राजनीति का स्वरूप क्या होना चाहिये? इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार यूपीए सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में और फिर अपने दूसरे कार्यकाल में अभी तक पूरी तरह पश्चिम की शक्तियों के प्रभाव में अपनी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति को क्रियांवित करने का प्रयास किया है ठीक उसके विपरीत आतंकवाद और इस्लाम व मुस्लिम जनता के साथ सम्बन्धों को परिभाषित करने में इस माड्ल को अपनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। Read more

क्या वरुण ने कुछ गलत कहा?

March 19, 2009 · Filed Under हिन्दुत्व · 5 Comments 

पिछले चौबीस घण्टों में वरुण गान्धी चर्चा में आ गये हैं। कारण ऐसा कि कुछ लोग उससे सहमत हो सकते हैं और कुछ लोग नहीं। लेकिन वरुण गान्धी के जिस भाषण को लेकर चर्चा है और उन्हें चुनाव आयोग का नोटिस भी मिल चुका है उसे लेकर अनेक प्रतिक्रियायें हैं। भाजपा जहाँ इस मामले में फूँकफूँककर कदम आगे बढा रही है वहीं समाज में इसे लेकर दो तरह का विचार है। एक खेमा तो ऐसा है जो इसे राजनीतिक दृष्टि से उचित नहीं मानता वहीं एक ऐसा वर्ग भी है जो इसे लेकर अत्यंत उत्साहित है। अनेक समाचार पत्रों की वेबसाइट पर यह विभाजन स्पष्ट दिखाई दे सकता है। भाजपा आधिकारिक रूप से इसे भले ही वरुण गान्धी और चुनाव आयोग के मध्य मामला मानती हो पर सामान्य रूप से पार्टी को वरुण के इस तेवर से अधिक दिक्कत नहीं दिखती। लेकिन वरुण गान्धी के ऊपर जिस प्रकार देश के प्रमुख दलों और मीडिया ने प्रहार आरम्भ कर दिया है उसने देश में एक बार फिर सेक्युलरवाद के एकांगी स्वरूप को स्पष्ट किया है।

कांग्रेस ने वरुण के बयान को सेक्युलर सिद्धांतों के विपरीत और नरेन्द्र मोदी से कहीं अधिक खतरनाक बताया है। इसी के साथ मीडिया भी सेक्युलर सिद्धांत का हवाला देकर वरुण पर पिल पडा ऐसा लगा मानों अभिमन्यु को कौरवों ने चक्रव्यूह में घेर लिया हो। वरुण ने अपने बयान की सफाई देते हुए मीडिया के सामने अपने उन दोनों बयानों का सच रखा जिसे मीडिया लगातार दिखा रहा है। एक भाषण जो उन्होंने सार्वजनिक रूप से दिया उसके बारे में उनका कहना है कि इसमें उनकी आवाज के साथ छेड्छाड की गयी है और दूसरे भाषण में जिसमें असामाजिक तत्वों को उन्होंने चेतावनी दी है उसे उन्होंने स्वीकार किया है। अधिक संतोषजनक बात यह है कि अपने तेवर और मुद्दों को लेकर वरुण ने मीडिया के दबाव में आये बिना उसे बरकरार रखा। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या वरुण ने कुछ गलत कहा? ऐसा नहीं लगता। क्योंकि वरुण ने कुछ सवाल उठाये हैं जो पिछले अनेक वर्षों से चर्चा में रहे है और उनमें से एक है देश में हिन्दुओं के मध्य बढ रही असुरक्षा की भावना। वरुण गान्धी ने स्पष्ट किया कि वे एक सीमांत क्षेत्र से आते हैं और यहाँ कुछ मोहल्ले हथियारों की तस्करी का अड्डा बन चुके हैं जो देश की सुरक्षा के लिये खतरा हैं। इसके साथ ही वरुण के भाषण में वोटबैंक के चलते हिन्दुओं के मुद्दे से परे रहने की प्रवृत्ति भी रेखाँकित होती है। वरुण गान्धी ने केवल देश के ऐसे क्षेत्र की समस्या को वाणी दी है जहाँ सामाजिक संतुलन बिगड रहा है और हिन्दुओं की अनदेखी की जा रही है।

जिस प्रकार वरुण गान्धी के भाषण को मुद्दा बनाया जा रहा है उसके पीछे दो कारण स्पष्ट रूप से दिखाई देते है। एक तो राजनीतिक दृष्टि से भाजपा को घेरने के लिये इसे तूल दिया जा रहा है ताकि चुनाव को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत किया जा सके और भाजपा को साम्प्रदायिक सिद्ध किया जा सके। यह बात और है कि ऐसी रणनीति सदैव भाजपा के विरोधियों को भारी पड्ती है। इसके साथ ही इस पूरे मामले के द्वारा वरुण गान्धी के मनोबल को तोड्ने का प्रयास हो रहा है ताकि उसे हतोत्साहित किया जा सके जिससे या तो वह अपनी लय छोड दे या मुद्दा छोड दे। दूसरे प्रयास के प्रति कोई भी रणनीति वरुण गान्धी को स्वयं बनानी होगी और यही उनकी परीक्षा होगी कि राजनीति में वे कितना आगे जायेंगे। वैसे इतना तय है कि वरुण ने अपने तेवरों से दिखा दिया है कि उन्हें मुद्दों की समझ भी है और देश के प्रति उन्हें चिंता भी है और वोटबैक की गुलाम राजनीति की जड्ता को तोड्ने का जो साहस उन्होंने दिखाया है उससे उनकी लोकप्रियता में वृद्धि ही होने वाली है।

वैसे कांग्रेस और अन्य दलों का वरुण गान्धी पर आरोप और भी हास्यास्पद तब लगता है जब इन राजनीतिक दलों का इतिहास हम देखते हैं। शाहबानो के मामले में मुस्लिम समाज के दबाव के आगे संविधान में संशोधन करना, बिहार के विधानसभा चुनावों में लोक जनशक्ति के अध्यक्ष रामविलास पासवान का ओसामा बिन लादेन जैसे दिखने वाले व्यक्ति को लेकर प्रचार करना, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के शासनकाल में एक मंत्री का डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के सिर पर एक करोड का इनाम घोषित करना, केन्द्र की सरकार के कैबिनेट मंत्री ए.आर. अंतुले का पाकिस्तान के सुर में बोलते हुए एटीएस प्रमुख की हत्या पर सवाल खडे करना, मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह का जामिया विश्वविद्यालय के कुलपति का आतंकवाद के आरोपी छात्र के लिये विश्वविद्यालय से धन एकत्र करने सम्बन्धी अभियान का समर्थन करना, केन्द्र सरकार के सहयोगी दलों का सिमी की खुले आम पैरवी करना आखिर साम्प्रदायिकता की श्रेणी में क्यों नहीं आता?
जब मुस्लिम संगठन खुले आम सरकार द्वारा मोहनचन्द्र शर्मा को अशोक चक्र दिये जाने का विरोध करते हैं और बाटला हाउस मुठभेड की सीबीआई से जाँच की माँग करते हैं तो इसे साम्प्रदायिक क्यों नहीं माना जाता। क्या केवल इसलिये कि यह माँग मुस्लिम समाज कर रहा है। जब रामविलास पासवान खुले आम बांग्लादेशी घुसपठियों को नागरिकता देने की माँग करते हुए राष्ट्रविरोधी बात करते हैं तो न तो मीडिया में बहस होती है और न सेक्युलरवादी शोर मचाते हैं केवल इसलिये कि यह मामला मुसलमानों से जुडा है। जब अरुन्धती राय खुले आम कश्मीर को भारत का अंग मानने से इंकार करती हैं तो इस पर बहस नहीं होती और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताया जाता है। क्योंकि अरुन्धती राय वामपंथी हैं और सदैव मुसलमानों के हित में बोलती हैं। क्या केवल साम्प्रदायिकता हिन्दुओं की रक्षा और सम्मान से जुडे विषयों को उठाने में ही झलकती है?

यदि इस देश में मुस्लिम समाज अपनी शिकायत सरकार से उलेमा एक्सप्रेस चला कर कर सकता है और मुस्लिम उत्पीडन का रोना रोकर आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार युवकों के लिये मुआवजे की माँग कर उन्हें महिमामंडित कर सकता है और उन्हें ऐसा करने की पूरी छूट मिलती है तो फिर हिन्दुओं से जुडे विषय उठाने पर इतना हो हल्ला क्यों? वरुण गान्धी ने बिलकुल ठीक कहा है कि हिन्दुओं से जुडी बात करने पर या हिन्दू स्वाभिमान का विषय उठाने वालों को साम्प्रदायिक घोषित करने का राजनीतिक षडयंत्र देश में चल रहा है और सेक्युलरवाद के नाम पर इसे बढाया जा रहा है। नेताओं और मीडिया को यह बात समझनी चाहिये कि पीलीभीत में वरुण गान्धी और गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ परिस्थितियों की उपज हैं जो हिन्दुओं की रक्षा करना चाहते हैं और अभी तक भारत के संविधान ने हिन्दुओं की रक्षा को अपराध घोषित नहीं किया है।

भारत क्यों हार रहा है कूटनीतिक लडाई?

भारत की सरकार की ओर से नित नये दावे किये जा रहे हैं कि भारत ने पाकिस्तान के विरुद्ध समस्त विश्व में एक ऐसा माहौल बनाया कि उस आक्रामक कूटनीति के आगे उसे भारत के आगे घुटने टेकने पडे। परंतु यह अर्धसत्य है और इस तथ्य से भारत सरकार भी भलीभाँति परिचित है। भारत ने पिछले वर्ष नवम्बर में मुम्बई पर हुए आक्रमण को अमेरिका पर 11 सितम्बर 2001 को हुए आतंकवादी आक्रमण के समानांतर करार दिया और उसी लहजे में पाकिस्तान को चेतावनी दी । Read more

मालेगाँव मामले में जाँच हो रही है या कुछ और?

November 25, 2008 · Filed Under अवर्गीकृत · Comment 

29 सितम्बर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगाँव में हुए विस्फोट के पश्चात जिस प्रकार जाँच के बहाने हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा का सृजन करने का प्रयास हुआ है उसके अपने निहितार्थ हैं और अब तक यदि पूरे घटनाक्रम में बयानबाजी से लेकर मीडिया ट्रायल को ध्यान से देखा जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह जाँच नहीं कुछ और है और यह कुछ और क्या है इसका निर्णय आप कुछ तथ्यों के आधार पर स्वयं करें।

29 सितम्बर को मालेगाँव विस्फोट में महाराष्ट्र एटीएस की ओर से जाँच की प्रक्रिया आरम्भ ही की गयी थी कि 5 अक्टूबर को एनसीपी के नेता शरद पवार ने घोषणा कर दी कि आतंकवादी मामलों में मुसलमानों को बदनाम किया जाता है लेकिन हिन्दू आतंकी गुटों पर कार्रवाई नहीं हो रही है। इससे दो बातें स्पष्ट हैं कि एक तो शरद पवार ने जाँच से पूर्व ही घोषित कर दिया कि मालेगाँव विस्फोट हिन्दुओं ने किया है और वे आतंकवादी हैं। इसके बाद तो जाँच मात्र औपचारिकता ही रह गयी थी जिसकी दिशा स्पष्ट थी। शरद पवार के बयान के एक सप्ताह पश्चात मालेगाँव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा को एटीएस ने पूछताछ के लिये सम्पर्क किया। इसी के साथ महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर.पाटिल भी समाचार माध्यमों से कहते रहे कि आरोपियों के विरुद्ध ठोस साक्ष्य हैं।

इसके बाद आरम्भ हुआ जाँच की प्रक्रिया के दौरान कुछ चुनी हुई खबरों को लीक करने का दौर। सबसे पहले एटीएस ने भारत के सबसे तेज हिन्दी न्यूज चैनल को कान में बताया कि साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित ने अपनी पूछताछ और नार्को टेस्ट में एक धर्मगुरु और हिन्दू संगठन के बडे नेता का नाम लिया है। इसके बाद मीडिया को इस बात का लाइसेंस मिल गया कि वह किसी भी धर्माचार्य को ललकारे और उसे कटघरे में खडा कर दे। इस पूरी कसरत में स्टार न्यूज और एनडीटीवी की भूमिका अग्रणी रही।

एटीएस द्वारा धर्माचार्य का नाम लेकर संशय की स्थिति निर्माण करने के पीछे प्रयोजन कुछ भी रहा हो परंतु इस बहाने देश के कुछ बडे संतों को पूरे मामले में घसीटने का प्रयास हुआ। इसी बीच एटीएस ने मीडिया को बताया कि इस विस्फोट के आरोपियों के उन विस्फोटों से सम्बन्ध होने की जाँच की जा रही है जिसमें मुसलमान ही मारे गये हैं और यह विस्फोट हैं समझौता ट्रेन विस्फोट, मक्का मस्जिद विस्फोट, अजमेर शरीफ विस्फोट। इस विषय को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया कि सन्देह के आधार पर सम्बन्धित एजेंसियों या राज्य सरकारों की पुलिस की जाँच को अंतिम निष्कर्ष मान कर प्रस्तुत किया और एनडीटीवी ने तो अपने कार्यक्रम हम लोग में तो बकायदा इन विस्फोटों को हिन्दू आतंकवादियों पर चस्पा करते हुए हिन्दू आतंकवाद पर बहस ही आरम्भ कर दी। अब प्रश्न यह है कि इन विस्फोटों की पूरी जाँच होने से पूर्व इसे कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा और दयानन्द पांडे के माथे मढने के पीछे मंतव्य क्या था? जब इन विस्फोटों की जाँच करने के लिये सम्बन्धित राज्यों की पुलिस ने कर्नल पुरोहित से सम्पर्क किया तो पता लगा कि इन विस्फोटों अर्थात समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद विस्फोट और अजमेर विस्फोट से इन आरोपियों का कोई सम्बन्ध नहीं है। इस पूरे मामले में जिस प्रकार एटीएस ने अति सक्रियता दिखाई और जाँच को मीडिया केन्द्रित रखा उससे स्पष्ट है कि एटीएस निष्पक्ष रूप से कार्य करने को स्वतंत्र नहीं है। इस बीच एटीएस का बयान देना फिर खण्डन करने का दौर भी चलता रहा। यहाँ तक कि समझौता एक्सप्रेस में आरडीएक्स से विस्फोट करने की कहानी आयी और फिर उसका खण्डन एटीएस ने किया।

इन बयानबाजियों के बाद पूरी कहानी में मोड आया जब मालेगाँव विस्फोट के दायरे को बढा कर कुछ वर्ष पूर्व हुए बम विस्फोटों की सीबीआई जाँच को भी इसके साथ जोड दिया गया। यह प्रयास भी यही सिद्ध करता है कि अब इतनी सक्रियता क्यों? आखिर इन मामलों की जाँच पहले क्यों नहीं की गयी और यदि की गयी तो क्या अब उस जाँच पर भरोसा नहीं रह गया।

वास्तव में एटीएस और उनके राजनीतिक आकाओं के सामने एक समस्या है कि इस पूरी जाँच को ये लोग दो स्तर पर प्रयोग करना चाहते थे। एक तो देश में हिन्दू आतंकवाद का एक सुव्यवस्थित नेटवर्क दिखाने का प्रयास ताकि न्यायालय में इसे साक्ष्य बनाया जा सके और सामान्य जनता को दिखाया जा सके कि देश में हिन्दू आतंकवाद है। वास्तव में आतंकवाद की परिभाषा है और इसके अनुसार आतंकवाद के लिये एक नेट्वर्क होना चाहिये, उसकी वित्तीय सहायता होनी चाहिये, आतंकवादियों के प्रशिक्षण के लिये लोग और हथियार होने चाहिये, आतंकवादियों को हथियार मिलने चाहिये और उसे उपलब्ध कराने वाले लोग चाहिये। यही कारण है कि एटीएस ने इन तथ्यों के लिये साक्ष्य प्राप्त करने में गोपनीयता बरतने के स्थान पर मीडिया को समय समय पर लीक किया और कुछ समाचार चैनलों और समाचार पत्रों को इस आधार पर कपोलकल्पित कहानियाँ बनाने का पूरा अवसर दिया।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में जो सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है वह यह कि जिस प्रकार कुछ राजनीतिक दल और मीडिया संस्थान हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा सृजित करने में दिन रात लगे हुए हैं उसके अपने निहितार्थ हैं।

अब कुछ समाचार चैनलों की अति सक्रियता पर दृष्टि डालें। स्टार न्यूज, एनडीटीवी और न्यूज 24 ने इस विषय में अति सक्रियता दिखाई। इसमें न्यूज 24 और एनडीटीवी की बात तो समझ में आती है कि एक तो कांग्रेस के बडे नेता का चैनल है और दूसरे का सम्बन्ध कम्युनिस्ट पार्टी से है। परंतु स्टार न्यूज की सक्रियता इस लिये महत्वपूर्ण है कि यहाँ पूरा जिम्मा इस चैनल में सबसे बडे पद पर बैठे एक सदस्य ने उठा रखा है जो एक समुदाय विशेष से हैं। इन सज्जन के बारे में बताया जाता है कि जब दिल्ली में जामिया नगर में एनकाउंटर हुआ था तो इन्होंने सभी मीडिया के लोगों को एसएमएस कर आग्रह किया था कि इस पूरे मामले में संयम रखें और जामिया नगर का नाम न लें और न ही जामिया मिलिया विश्वविद्यालय का नाम लें क्योंकि इससे स्थान और संस्थान बदनाम होता है। इसके साथ ही उनका तर्क था कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन यही सिद्धांत तब गायब हो गया जब मालेग़ाँव में हिन्दू आरोपी बनाये गये। ये सज्जन पूरे मामले में व्यक्तिगत रूचि लेकर न्यूज फ्लैश चलाने से लेकर स्क्रिप्ट बनाने तक का पूरा विषय स्वयं देखते हैं और पूरे चैनल को इनका निर्देश है कि मालेगाँव मामले को विशेष कवरेज दिया जाये। इन सज्जन की व्यक्तिगत रूचि थी कि साध्वी की दीक्षा को इन्होंने आतंकवाद से जोड्ने का प्रयास किया। साध्वी प्रज्ञा के गुरु को ललकारा और कहा कि वे भाग खडे हुए हैं। जबकि बाद में इन्हीं संत ने अपनी प्रेस कांफ्रेस में बताया कि वे कथाओं में व्यस्त थे और उनकी कथाओं का सीधा प्रसारण कुछ टीवी चैनल पर भी हो रहा था। इसी प्रकार इन सज्जन ने श्री श्री रविशंकर को भी इस पूरे मामले में घसीटने का प्रयास किया।

आज यदि स्टार न्यूज को ध्यान से देखा जाये तो यह बात साफ तौर पर दिखाई देती है कि इस चैनल की मालेग़ाव विस्फोट की जाँच में विशेष रूचि है। यह मामला अत्यंत संवेदनशील है कि यदि किसी चैनल के शीर्ष पद पर बैठा कोई व्यक्ति पत्रकारिता के सिद्धांतों के अतिरिक्त किसी अन्य भाव से प्रेरित है तो यह बात निश्चय ही चौंकाने वाली है।

स्टार न्यूज ने मकोका अदालत में मालेगाँव विस्फोट के 7 आरोपियों की पेशी पर जिस प्रकार स्वयं अदालत से पहले निर्णय सुना दिया और संवाददाता शीला रावल ने मकोका अदालत में साध्वी के आरोपों पर सुनवाई से पूर्व ही अपना निर्णय सुना दिया और कह दिया कि ये आरोप निराधार हैं और इन्हें सिद्ध करना साध्वी और अन्य आरोपियों के लिये आसान नहीं होगा। यह जल्दबाजी क्यों जबकि मकोका अदालत इन आरोपों पर सुनवाई मंगलवार को करेगी। सारे चैनल जब साध्वी के आरोपों पर एटीएस को घेर रहे थे उस समय स्टार न्यूज का एटीएस की पैरवी करना कुछ सन्देह पैदा करता है। आखिर स्टार न्यूज ने यही पुलिस प्रेम जामिया नगर एनकाउंटर में क्यों नहीं दिखाया था? यही नहीं यदि मीडिया का कार्य सूचनाओं को सामने लाना ही है तो एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के बारे में कुछ समाचार माध्यमों में सनसनीखेज तथ्य आने पर इस बारे में कोई खोज क्यों नहीं हुई कि जब वे रोजा इफ्तार में कांग्रेस की पार्टी में शामिल हुए। अपने पुत्र के सऊदी अरब के व्यवसाय में वे कांग्रेसी नेताओं के सम्पर्क का लाभ उठाते हैं और इससे भी बडी बात कि वे पहले रा ( रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) में थे और कन्धार विमान अपहरण में अपनी लापरवाही के चलते वहाँ से हटा दिये गये थे। बाद में काफी लाबिंग के बाद वे महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख बने। अब सारे न्यूज चैनल जो हिन्दू आतंकवाद से सम्बन्धित सारी खोजी पत्रकारिता कर रहे हैं इस मामले में कोई खोज क्यों नहीं करते जबकि यह अत्यंत गम्भीर तथ्य हैं।

मालेगाँव विस्फोट की पूरी जाँच ने भारत में एक नये युग का पदार्पण किया है और इससे देश में राजनीतिक, बौद्धिक और मानवाधिकार के स्तर पर एक स्पष्ट ध्रवीकरण देखने को मिल रहा है। आज देश में सेक्युलरिज्म के नाम पर राजनीति कर रहे दल, कुछ मीडिया संस्थान, मानवाधिकार संगठन और बुद्धिजीवी लोग पूरी तरह मुस्लिम परस्त और एकांगी हो गये हैं। इस जाँच ने एक बडा जटिल सवाल खडा किया है कि हिन्दू जिसका इस विश्व में केवल एक देश है और बहुसंख्यक होकर भी अपने देश में बेबस है तो वह क्या करे? आखिर बिडम्बना देखिये कि देश में जेहाद के नाम पर इस्लाम और अल्लाह के नाम पर इस्लामी आतंकवादी मन्दिरों, संसद और बाजारों में आक्रमण करते हैं और निर्दोष हिन्दुओं का खून बहाते हैं और फिर सरकार इस्लामी आतंकवाद से लड्ने के स्थान पर हिन्दुओं को अपमानित, लाँक्षित और प्रताडित करती है। इस विषम स्थिति का क्या करें कि दोनों ओर से हिन्दुओं को ही मरना है आतंकवादी आक्रमण मुसलमान करें, जेहाद वे करें, चिल्ला चिल्ला कर कहें कि हम इस्लाम और अल्लाह के नाम पर हिन्दुओं को मार रहे हैं तो मुस्लिम समाज को खुश करने के लिये और इस्लाम की छवि सुधारने के लिये हिन्दुओं को प्रताडित किया जाये। ऐसा न्याय और आतंकवाद के विरुद्ध ऐसी लडाई विश्व के किसी कोने में न तो लडी गयी और न भविष्य में लडी जायेगी। अमेरिका और यूरोप ने अपने देशों पर हुए आक्रमणों के बाद इस्लामी आतंकवाद का उत्तर ईसाई आतंकवाद की अवधारणा सृजित कर नहीं दिया और न ही इजरायल ने इस्लामी आतंकवाद के समानान्तर यहूदी आतंकवाद को सृजित किया फिर भारत में ऐसा आत्मघाती कदम क्यों?

आज इस विषय पर बहस होनी चाहिये कि सेक्युलर दल और मीडिया ऐसा केवल वोट बैंक की राजनीति के चलते कर रहे हैं या फिर इसके पीछे कोई अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है। अभी एक दिन पूर्व कुछ समाचार पत्रों ने समाचार प्रकाशित किया कि खुफिया एजेंसियाँ उन संतों और संगठनों पर नजर रखे हुए हैं जिनमे इजरायल के साथ अच्छे सम्बन्ध हैं क्योंकि उन्हें शक है कि कहीं एक लोग इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद से तो नहीं जुडे हैं। अर्थात भारत को एक सक्षम, सशक्त और सम्पन्न बनाने के गैर सरकारी प्रयासों के लिये समाज में शंका का भाव उत्पन्न किया जा रहा है।

जिस देश में सेक्युलरिज्म के नाम पर कोयम्बटूर बम धमाकों के आरोपी को सरकार के आदेश पर जेल में पंच सितारा सुविधायें दी जाती हैं। जिस देश में फिलीस्तीनी नेता और सैकडों यहूदियों को इंतिफादा में मरवाने वाले यासिर अराफात के नाम पर केरल के विधानसभा चुनावों में वोट माँगे जाते हैं उसी देश में खुफिया एजेंसियों को आदेश दिया जाता है कि इजरायल के साथ सम्बन्ध रखने वालों पर नजर रखी जाये।

मालेगाँव विस्फोट की जाँच को इसके व्यापक दायरे में समझने की आवश्यकता है यह विषय वोट बैंक की राजनीति से भी बडा है और ऐसा प्रतीत होता है कि शरियत के आधार पर विश्व पर शासन करने की आकाँक्षा से प्रेरित इस्लामवादी आन्दोलन ने भारत की व्यवस्था में अपनी जडें जमा ली हैं और व्यवस्था उनका सहयोग कर रही है और देश में हर उस प्रयास और संस्था को कमजोर करने का प्रयास हो रहा है जो इस्लामवादी और जेहादी आन्दोलन को चुनौती दे सकता है।

सेकुलरिज्म के बहाने आतंकवाद का समर्थन?

September 28, 2008 · Filed Under वामपंथ · 1 Comment 

सेकुलरिज्म के बहाने आतंकवाद का समर्थन? अमिताभ त्रिपाठी

पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के बौद्धिक प्रकोष्ठ ने आतंकवाद के विषय पर एक सार्थक चर्चा का आयोजन किया और इस कार्यक्रम में पार्टी के राष्ट्रीय महाचिव अरुण जेटली ने जो विचार रखे उसमें एक बात अत्यन्त मौलिक थी कि देश एक ऐसी स्थिति में आ गया है जहाँ देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल काँग्रेस ने अपने वर्षों की परम्परा जो राष्ट्रवाद और सेकुलरिज्म के संतुलन पर आधारित थी उसे तिलाँजलि देकर अब सेकुलरिज्म को ही अपना लिया है और वह भी ऐसा सेकुलरिज्म जो इस्लामी कट्टरवाद की ओर झुकाव रखता है। यह बात केवल काँग्रेस के सम्बन्ध में ही सत्य नहीं है पूरे देश में विचारधारा के स्तर पर जबर्दस्त ध्रुवीकरण हो रहा है और स्वयं को मुख्यधारा के उदारवादी-वामपंथी बुद्धिजीवी कहने वाले लोग सेकुलरिज्म के नाम पर इस्लामी कट्टरवाद को प्रोत्साहन दे रहे हैं।
पिछले कुछ महीनों में देश के अनेक भागों में हुए आतंकवादी आक्रमणों के बाद यह बहस और मुखर हो गयी है विशेषकर 13 सितम्बर को दिल्ली में हुए श्रृखलाबद्ध विस्फोटों के बाद मीडिया ने इस विषय पर बहस जैसा वातावरण निर्मित किया तो पता चलने लगा कि कौन किस पाले में है? प्रिंट मीडिया के अनेक पत्रकारों ने इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किये और दिल्ली विस्फोटों में उत्तर प्रदेश के आज़मगढ का नाम आने पर एक बहस आरम्भ हुई जिसके अनेक पहलू सामने आये। एक तो इलेक्ट्रानिक मीडिया का एक स्वरूप सामने आया जिसने काफी समय से अनुत्तरदायित्वपूर्ण पत्रकारिता का आरोप झेलने के बाद पहली बार आतंकवाद को एक अभियान के रूप में लिया और इसके अनेक पहलुओं पर विचार किया। इसी बह्स में अनेक चैनलों ने अनेक प्रकार की बहस की और सर्वाधिक आश्चर्यजनक बह्स कभी पत्रकारिता के स्तम्भ रहे और पत्रकार द्वारा संचालित चैनल का दावा करने वाले राजदीप सरदेसाई के सीएनएन-आईबीएन के चैनल पर देखने को मिली। प्रत्येक शनिवार और रविवार को विशेष कार्यक्रम प्रसारित करने वाले राजदीप सरदेसाई ने आतंकवाद पर एक विशेष सर्वेक्षण के परिणामों की व्याख्या के लिये यह कार्यक्रम आयोजित किया। सीएनएन- आईबीएन और हिन्दुस्तान टाइम्स के संयुक्त प्रयासों से किये गये इस सर्वेक्षण में जो कुछ चौंकाने वाले पहलू थे उनमें दो मुख्य थे- एक तो सर्वेक्षण के अंतर्गत दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, अहमदाबाद, हैदराबाद के लोगों से यह पूछना कि उनकी दृष्टि में किस मात्रा में उनकी पुलिस साम्प्रदायिक है और दूसरा काँग्रेस, भाजपा और पुलिस अधिकारी को बहस में बुलाकर उनके ऊपर विशेष राय के लिये प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर को रखना। यही नहीं 27 सितम्बर को दिल्ली में मेहरौली में हुए बम विस्फोट के बाद जब सीएनएन-आईबीएन ने अपने न्यूजरूम में इन्हीं जावेद अख्तर को बुलाया तो इससे स्पष्ट संकेत लगाना चाहिये कि इस चैनल के मन में आतंकवाद को लेकर क्या है?

किस आधार पर राजदीप सरदेसाई जावेद अख्तर को देश का ऐसा चेहरा मानते हैं जो पूरी तरह निष्पक्ष है और आतंकवाद पर इनकी नसीहत किसी पक्षपात से परे है जबकि इनकी पत्नी ने कुछ ही महीनों पहले कहा था कि उन्हें मुम्बई में फ्लैट नहीं मिल पा रहा है क्योंकि इस देश में मुसलमानों के साथ भेदभाव होता है। जिस शबाना आज़मी के पास मुम्बई के विभिन्न स्थानों पर सम्पत्ति है उसे अचानक लगता है कि उन्हें इस देश में मुसलमान होने की कीमत चुकानी पड रही है और जो बात पूरी तरह निराधार भी सिद्ध होती है ऐसे शबाना आजमी के पति पूरे देश के लिये एक निष्पक्ष दार्शनिक कैसे बन गये? पूरी बह्स के बाद जब राजदीप सरदेसाई ने आतंकवाद के समाधान के लिये जावेद अख्तर से समाधान पूछा तो उनका उत्तर था कि सभी प्रकार के आतंकवाद से लडा जाना चाहिये फिर वह भीड का आतंकवाद हो, राज्य का आतंकवाद हो या फिर और कोई आतंकवाद हो। पूरी बहस में राजदीप सरदेसाई और जावेद अख्तर देश भर में हो रहे जिहादी आतंकवाद के विचारधारागत पक्ष पर चर्चा करने से बचते रहे। जब मुम्बई के पूर्व पुलिस प्रमुख एम एन सिंह ने कहा कि कडा कानून और खुफिया तंत्र भी 50 प्रतिशत ही आतंकवाद से लड सकता है और शेष 50 प्रतिशत की लडाई विचारधारा के स्तर पर लड्नी होगी। इस पर जावेद अख्तर साहब उसी पुराने तर्क पर आ गये कि यदि सिमी पर प्रतिबन्ध लगे तो बजरंग दल पर भी प्रतिबन्ध लगना चाहिये।

राजदीप सरदेसाई की बहस एक विचित्र स्थिति उत्पन्न करती है। जरा कुछ बिन्दुओं पर ध्यान दीजिये। वे आतंकवाद के विरुद्ध कौन सी सरकार बेहतर लडी यह आँकडा प्रस्तुत करते हैं और कहते हैं कि 26 प्रतिशत लोग यूपीए को बेहतर मानते हैं और 28 प्रतिशत लोग एनडीए को। अब राजदीप सरदेसाई भाजपा के राजीव प्रताप रूडी से पूछते हैं कि आप में भी जनता को अधिक विश्वास नहीं है कि आप इस समस्या से बेहतर लडे। सर्वेक्षण में 46 प्रतिशत लोग मानते है कि कोई भी वर्तमान राजनीतिक दल आतंकवाद से प्रभावी ढंग से नहीं लड रहा है। जरा विरोधाभास देखिये कि एक ओर देश के मूर्धन्य पत्रकार राजदीप सरदेसाई पुलिस का इस आधार पर सर्वेक्षण करते हैं कि वह कितनी साम्प्रदायिक है और भाजपा पर आरोप लगाते हैं कि पोटा कानून का अल्पसंख्यकों के विरुद्ध दुरुपयोग होता है तो वहीं कहते हैं कि आप भी तो आतंकवाद से बेहतर ढंग से नहीं लड पाये। लेकिन राजदीप सरदेसाई हों या जावेद अख्तर हों वे उस खतरनाक रूझान की ओर ध्यान नहीं देते कि जिस देश के 46 प्रतिशत लोगों का विश्वास अपने नेताओं से इस सन्दर्भ में उठ जाये कि वे उनकी रक्षा करने में समर्थ हैं तो इसके परिणाम आने वाले समय में क्या हो सकते हैं?

इससे पहले राजदीप सरदेसाई ने अपने चैनल पर कुछ सप्ताह पूर्व आतंकवाद पर ही एक बहस आयोजित की थी और किसी मानवाधिकार कार्यकर्ता के साथ किरण बेदी और अरुण जेटली को भी आमंत्रित किया था और स्वयं को उदारवादी और लोकतांत्रिक सिद्ध करते हुए पुलिस को अपराधी तक सिद्ध करने का अवसर बहस में मानवाधिकार कार्यकर्ता को दिया था। अब प्रश्न है कि पुलिस को अधिकार भी नहीं मिलने चाहिये, जिहाद पर चर्चा भी नहीं होनी चाहिये, सेकुलरिज्म के नाम पर इस्लामी कट्टरवाद को बढावा दिया जाना चाहिये, देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं की बात उठाने वाले को आतंकवादियों के बराबर खडा किये जाने के प्रयासों को महिमामण्डित किया जाना चाहिये, मानवाधिकार के नाम पर आतंकवादियों की पैरोकारी होनी चाहिये, आतंकवाद के आरोप में पकडे गये लोगों के मामले में सेकुलरिज्म के सिद्धांत का पालन होना चाहिये। इन परिस्थितियों में कौन सा देश आतंकवाद से लड सकता है यह फार्मूला तो शायद राजदीप सरदेसाई और जावेद अख्तर के पास ही होगा।

आज सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि हमारे चिंतन और व्यवहार में राष्ट्र के लिये कोई स्थान नहीं है और इसका स्थान उन प्रवृत्तियों ने ले लिया है जो राष्ट्र के सापेक्ष नहीं हैं। आश्चर्य का विषय है कि जिस उदारवाद का पाठ हमारे बडे पत्रकार दुनिया के सबसे बडे उदारवादी लोकतंत्र अमेरिका से पढते हैं वे क्यों भूल जाते हैं कि अमेरिका में राज्य के अस्तित्व और उसके ईसाई मूल के चरित्र पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं खडा किया जाता और इन दो विषयों पर पूरे देश में सहमति है इसी कारण 11 सितम्बर 2001 को आतंकवादी आक्रमण के बाद आम सहमति हो या फिर अभी आये आर्थिक संकट के मामले में सहमति हो इस बात को आगे रखा जाता है कि राज्य कैसे सुरक्षित रहे? 11 सितम्बर के आक्रमण के बाद कुछ कानूनों को लेकर उदारवादी-वामपंथियों ने अमेरिका में भी काफी हो हल्ला मचाया था पर राज्य की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गयी न कि उदारवादी-वामपंथियों को फिर भारत में ऐसा सम्भव क्यों नहीं है? निश्चय ही इसका उत्तर अरुण जेटली की इसी बात में है कि अब काँग्रेस में राष्ट्रवाद के लिये कोई स्थान नहीं है और उसका झुकाव सेकुलरिज्म की ओर है जो इस्लामी कट्टरवाद से प्रेरित है।

लेकिन चिंता का विषय यह है कि केवल काँग्रेस ही इस भावना के वशीभूत नहीं है देश में बुद्धिजीवियों का एक बडा वर्ग सेकुलरिज्म और पोलिटिकल करेक्टनेस की ओर झुक रहा है और आतंकवाद ही नहीं राष्ट्रवाद से जुडे सभी विषयों पर विभ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहा है। यही कारण है कि इस्लामी आतंकवाद की चर्चा करते समय अधिकाँश पत्रकार यह भूल जाते हैं कि यह एक वैश्विक आन्दोलन का अंग है और वे इसे 1992 में अयोध्या में बाबरी ढाँचे के ध्वस्त होने से जोडकर चल रहे हैं। लेकिन यह तर्क निरा बकवास है इस देश में मुस्लिम वर्ग के साथ कोई ऐसा अन्याय नहीं हुआ है कि वह हथियार उठा ले। आज समस्त विश्व में इस अवधारणा को प्रोत्साहन दिया जा रहा है कि अमेरिका द्वारा इजरायल को दिये जा रहे समर्थन से अल कायदा जैसे संगठन उत्पन्न हुए। यदि ऐसा है तो ब्रिटेन, स्पेन, बाली में मुस्लिम समाज के साथ क्या अन्याय हुआ था? दक्षिणी थाईलैण्ड में बौद्धों ही पिछले दो वर्ष से हत्यायें क्यों हो रही हैं। आज भारत में सेकुलरिज्म के नाम पर जिस प्रकार इस्लामी आतंकवाद के लिये तर्क ढूँढे जा रहे हैं इसका स्वरूप भी वैश्विक है।

जिस प्रकार 11 सितम्बर 2001 की घटना को विश्व भर के उदारवादी-वामपंथियों ने सीआईए और मोसाद का कार्य बताया था उसी प्रकार भारत में 2002 में गोधरा में रामसेवकों को ले जा रही साबरमती ट्रेन में इस्लामवादियों द्वारा लगायी गयी आग के लिये हिन्दू संगठनों को ही दोषी ठहरा कर षडयंत्रकारी सिद्धांत का प्रतिपादन इसी बिरादरी के भारत के लोगों ने किया । जिस प्रकार विदेशों में सक्रिय इस्लामी आतंकवादी फिलीस्तीन और इजरायल विवाद, इराक में अमेरिका सेना की उपस्थिति और ग्वांटेनामो बे में इस्लामी आतंकवादियों पर अत्याचार को आतंकवाद बढने का कारण बता रहे है उसी प्रकार भारत में 1992 में अयोध्या में बाबरी ढाँचा गिराया जाना, 2002 में गुजरात के दंगे और प्रत्येक आतंकवादी आक्रमण के बाद निर्दोष मुसलमानों को पकडा जाना और उन्हें प्रताडित किये जाने को भारत में इस्लामी आतंकवादी घटनाओं का कारण बताया जा रहा है। आज भारत में हिन्दू संगठनों को इस्लामी आतंकवाद का कारण बताया जा रहा है तो विश्व स्तर पर अमेरिका के राष्ट्रपति बुश और इजरायल को लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं है।

आज विश्व स्तर पर इस्लामी आतंकवाद के आन्दोलन का सहयोग बौद्धिक प्रयासों से, मानवाधिकार के प्रयासों से, मुसलमानों को उत्पीडित बताकर और षडयंत्रकारी सिद्धान्त खोजकर किया जा रहा है। पिछले वर्ष ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने अपने देश में यूरोप और अन्य देशों के उन विद्वानों को आमंत्रित किया जो मानते हैं कि नाजी जर्मनी में यहूदियों का नरसंहार हुआ ही नहीं था और यह कल्पना है जिस आधार पर यहूदी समस्त विश्व को ब्लैकमेल करते हैं।

आज विश्व स्तर पर चल रहे इन प्रयासों के सन्दर्भ में हमें इस्लामी आतंकवाद की समस्या को समझना होगा। आज उदारवादी-वामपंथी बनने के प्रयास में हमारा बुद्धिजीवी समाज आतंकवादियों के हाथ का खिलौना बन रहा है।

आज जिस प्रकार सेकुलरिज्म के नाम पर भारत को कमजोर किया जा रहा है उसकी गम्भीरता को समझने का प्रयास किया जाना चाहिये। आखिर जो लोग मुस्लिम उत्पीडन का तर्क देते हैं और कहते हैं कि बाबरी ढाँचे को गिरता देखने वाली पीढी जवान हो गयी है और उसने हाथों में हथियार उठा लिये हैं या 2002 के दंगों का दर्द मुसलमान भूल नहीं पा रहे हैं तो वे ही लोग बतायें कि भारत विभाजन के समय अपनी आंखों के सामने अपनों का कत्ल देखने वाले हिन्दुओं और सिखों के नौजवानों ने हाथों में हथियार उठाने के स्थान पर अपनी नयी जिन्दगी आरम्भ की और देश के विकास में योगदान दिया। रातोंरात घाटी से भगा दिये गये, अपनों की हत्या और बलात्कार देखने के बाद भी कश्मीर के हिन्दुओं की पीढी ने हथियार नहीं उठाये और आज भी नारकीय जीवन जीकर अपने ही देश में शरणार्थी बन कर भी आतंकवादी नहीं बने क्यों? बांग्लादेश और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का दर्जा पाने वाले हिन्दू पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर आ गये पर उनकी दशा सुनकर कोई विश्व के किसी कोने में हिन्दू आत्मघाती दस्ता नहीं बना क्यों? इस प्रश्न का उत्तर ही इस्लामी आतंकवाद की समस्या का समाधान है।

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