इस्लामी कट्टरता का नया दौर
पाकिस्तान में पिछले दिनों जब प्रमुख प्रांत पंजाब के राज्यपाल सलमान तासीर की हत्या उनके ही अंगरक्षक द्वारा कर दी गयी तो अनेक प्रश्न एक साथ उठ खडे हुए। इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढना अत्यंत आवश्यक है। पाकिस्तान में जिस प्रकार यह हत्या अन्जाम दी गयी है वही अपने आप में सनसनीखेज है और जिस प्रकार इस हत्या के बाद पाकिस्तान के प्रमुख इस्लामी मजहबी संगठन और राजनीतिक दल इस घटना को न केवल सही ठहरा रहे हैं वरन इसे इस्लाम और पैगम्बर की चौदह सौ वर्ष पुरानी परम्परा के अनुक्रम में प्रशंसित कर रहे हैं उससे निश्चय ही यह आवश्यक हो गया है कि इस पूरी घटना को समग्रता में देखा जाये। समग्रता से आशय यह है कि क्या यह घटना पाकिस्तान की अराजक स्थिति का परिचायक है या फिर किसी नये रुझान का आरम्भ है। निश्चय ही इसे केवल कानून व्यवस्था के गिरावट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये विशेष रूप से तब जब कि तालिबान ने इस हत्या की जिम्मेदारी भी ले ली है। हालाँकि इस दावे की सत्यता अभी प्रमाणित नहीं हुई है लेकिन फिर भी इससे कुछ गम्भीर प्रश्न अवश्य खडे हुए हैं। Read more
देश की सेक्युलर राजनीति के पुनर्मूल्याँकन का समय ?
पिछले वर्ष देश में हुए आम चुनावों के बाद से सामान्य तौर पर एक नारा देश की सेक्युलर शक्तियाँ लगा रही हैं कि अब भारत बदल गया है और लोग विकास चाहते हैं और पहचान और साम्प्रदायिक राजनीति से तंग आ चुके हैं। यह बाद कहते समय जो बात इन तत्वों के ध्यान में रहती है वह यह कि अब विश्व में वैश्वीकरण का युग है और विश्व में एक क्षेत्र को दूसरे से पूरी तरह अलग थलग नहीं रखा जा सकता। ऐसे में एक प्रश्न सहज रूप से उठता है कि जो कुछ रुझान समस्त विश्व मे हमें देखने को मिल रहा है उस पृष्ठभूमि में ही यदि भारत की राजनीति को समझने का प्रयास किया जाये तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सम्मुख हमारे उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर हमें देना ही होगा। इन प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि सेक्युलर परिभाषा और राजनीति का स्वरूप क्या होना चाहिये? इसे एक विडम्बना ही कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से जिस प्रकार यूपीए सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में और फिर अपने दूसरे कार्यकाल में अभी तक पूरी तरह पश्चिम की शक्तियों के प्रभाव में अपनी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति को क्रियांवित करने का प्रयास किया है ठीक उसके विपरीत आतंकवाद और इस्लाम व मुस्लिम जनता के साथ सम्बन्धों को परिभाषित करने में इस माड्ल को अपनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। Read more
हिन्दू आतंकवाद के मिथक का पर्दाफाश
बी शांतनु
हिन्दी अनुवाद- अमिताभ त्रिपाठी
http://satyameva-jayate.org/2010/07/19/myth-of-hindutva-terror/
आज कल एक नया भूत सामने लाया गया है और वह है हिन्दुत्व आतंकवाद ( उर्फ हिन्दू आतंकवाद)। सम्भव है यह शब्द आपने पहले भी सुना हो , सम्भव है कि आपको इस पर क्रोध आया हो लेकिन आप क्रोधित होकर अपने कार्य में लग गये होंगे। सम्भव है कि आपने यह सोचने का प्रयास भी नहीं किया होगा कि यह हिन्दुत्व आतंकवाद है क्या? अभी कुछ दिन पूर्व मैं कुछ लोगों के मध्य था और जब उन्होंने यह शब्द सुना तो वे क्रुद्ध हो गये शायद इससे भी अधिक क्रुद्ध हों लेकिन वे अपने कार्य में लग जायेंगे।
अभी पिछले सप्ताह एक जागरूक पाठक ने आउटलुक की हिन्दू आतंकवाद सम्बन्धी आवरण कथा की ओर मेरा ध्यान दिलाया। इस कहानी को लेकर अपनी जल्दबाजी की संक्षिप्त प्रतिक्रिया में मैने लिखा, “ इस लेख को भयंकर ढंग से हिन्दू आतंक का शीर्षक दिया गया है परंतु यह नहीं बताया गया है कि यह हिन्दू सिद्धांतों और हिन्दू परम्पराओ से किस प्रकार प्रेरित है। इसी प्रकार कुछ स्थानों पर हिन्दुत्व का भी सन्दर्भ लिया गया है परंतु इसके प्रयास नहीं हुए हैं कि हिन्दुत्व से उनका आशय क्या है और लेखक के अनुसार इसका अर्थ क्या है? “ लेकिन इसके उपरांत मैंने इस कहानी को फिर से पढा और मुझे पता लगा कि इसे बिकाऊ बनाने के लिये सनसनीखेज बनाया गया है। लेकिन इस लेख में इसके तथ्यों पर चर्चा की जायेगी।
यदि हम आउटलुक की कहानी पर लौटें हालाँकि न तो इस विषय पर यह पहली कथा है और न ही अंतिम होगी लेकिन इस कथा की समाप्ति इस कथन के साथ हुई कि जब सीबीआई सारे बिखरे हुए सूत्रों को एकसाथ जोडेगी तभी हिन्दुत्व आतंकवाद का समग्र चित्र सामने आ सकेगा। 2000 शब्दों के इस लेख को स्मृति कोप्पिकर, देबर्षि दासगुप्त और स्निग्धा हसन ने सहयोग दिया है “ हिन्दू आतंकवाद एक वास्तविकता है फिर भी भारत इस वास्तविकता को नाम नहीं देना चाहता”।
यह कथा मई में प्रवीन स्वामी के आउटलुक के ही लेख “ The Rise of Hindutva Terror” | पहले लेख की समीक्षा करना अधिक उचित होगा। प्रवीन स्वामी की यह रिपोर्ट आन्ध्र प्रदेश में हैदराबाद मे मक्का मस्जिद पर आक्रमण के सिलसिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक देवेन्द्र गुप्ता को उनके राजनीतिक सहयोगियों विष्णु प्रसाद और चन्द्रशेखर पाटीदार के साथ इस आक्रमण के लिये योजना बनाने के सन्देह में पकड्ने पर आधारित थी। Read more
कहीं हम आडम्बरी तो नहीं होते जा रहे हैं?
पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ महाविद्यालयों के पत्रकारिता से जुडे छात्रों के मध्य विदेश नीति और भारत की सामरिक चुनौतियों से सम्बन्धित विषय पर मुझे इन छात्रों को सम्बोधित करना था। कार्यक्रम के उपरांत राजस्थान की एक पत्रकारिता छात्रा ने अनौपचारिक वार्तालाप में अनेक प्रश्न किये लेकिन एक प्रश्न के उत्तर से ही मुझे यह लेख लिखने की प्रेरणा हुई। उस छात्रा ने कहा कि वह अपने जीवन में पहली बार घर से बाहर अकेले निकली है और उसे बताया गया है कि पत्रकारिता एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ लडकियों को काफी कठिनाई होती है और उन्हें अनेक समझौतों के लिये तैयार रहना चाहिये। उसने मुझसे सलाह माँगी कि उसे क्या करना चाहिये? मैंने बदले में उससे प्रश्न किया कि जब उसने पहली बार घर से बाहर कदम निकाले होंगे तो निश्चय ही उसके मन में अधिक आशंकायें रही होंगी जो धीरे धीरे कम ही हुई होंगी। सम्भव है कि पहले लगा हो कि किसी लडकी का घर से बाहर निकलना और फिर पत्रकारिता के लिये प्रयास करना ही नैतिकता के अनेक प्रश्नों से सरोकार रखता हो लेकिन अब उसके सामने यही प्रश्न है कि वह पत्रकारिता में लड्की होते हुए अपने मूल्यों और आदर्शों के साथ् सांमजस्य बिठाकर कैसे चले? इसका जो समाधान मेरे पास था मैंने उस छात्रा को बताया और वह यह कि आदर्श का व्यावहारिकता के साथ सांमजस्य होना चाहिये और व्यावहारिकता का आदर्श के साथ। दोनों का ही अतिवाद व्यक्ति को अलग थलग कर देता है। जैसे आदर्श का व्यावहारिकता के साथ सांमजस्य नहीं होने से व्यक्ति दोहरा चरित्र का जीवन व्यतीत करने लगता है उसी प्रकार व्यावहारिकता में आदर्श का पुट नहीं होने से भी सफलता स्थाई नहीं होती।
व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का अपना आदर्श और मूल्य होते हैं और यह व्यक्तिगत स्तर पर कठोर और सामूहिक स्तर पर लचीला होता जाता है इसलिये प्रत्येक व्यक्ति अपनी परम्परा और संस्कार के आधार पर अपना आदर्श निर्धारित करता है। समाज में कार्य करते हुए इस आदर्श का व्यावहारिकता के साथ समायोजन करने से तात्पर्य यह है कि यदि किसी की परम्परा और संस्कार के आधार पर माँसाहार करना, शराब पीना या फिर धूम्रपान करना आदर्श जीवन के विपरीत है तो यदि उस व्यक्ति को ऐसे लोगों के साथ रहने से कुछ सीखने को मिलता है या प्रगति होती है तो निश्चय ही सांमजस्य किया जाना चाहिये। इसी के साथ व्यावहारिकता को भी आदर्श के साथ सांमजस्य करना चाहिये और कुछ सार्वभौमिक मूल्य और आदर्श हैं जिनका पालन होना चाहिये। निश्चित रूप से आज भी समाज में लडकियों का कार्यक्षेत्र में जीवन अनेक कष्टदायक अनुभव दे जाता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि लडकियों को घर की चारदीवारी से बाहर नहीं निकलना चाहिये और सभी क्षेत्रों में अपना कौशल नहीं दिखाना चाहिये। ज्यों ज्यों लडकियों ने सार्वजनिक जीवन में अपनी सक्रियता बढाई है उसी अनुपात में पुरूषों के मन में उनकी प्रति कुण्ठा कम होने लगी है। यह कुण्ठा धीरे धीरे और कम होगी जैसे जैसे स्त्रियों का आत्मविश्वास बढता जायेगा।
इस विषय पर सोचते हुए मुझे देश की आज की अनेक समस्याओं का एक सूत्र भी पकड में आ गया। आदर्श और नैतिकता की सापेक्ष व्याख्या नहीं होने से हमारा समाज एक दोहरे चरित्र और आडम्बर का शिकार हो गया है।
हमने सार्वजनिक जीवन में आदर्श और नैतिकता के इतने कठोर मानदण्ड निर्धारित कर रखे हैं कि यह जानते हुए भी कि कोई भी व्यक्ति उनका पालन नहीं करता और हर व्यक्ति का दोहरा चरित्र है हम यह आभास लेकर प्रसन्न रहते हैं कि सर्वत्र आदर्श और नैतिकता का पालन हो रहा है।
वास्तव में आदर्श और नैतिकता के कुछ मूलभूत नियम हैं जो सार्वभौमिक हैं और जिनका पालन करने की अपेक्षा सभी धर्मों, विचारधारा और व्यक्तिगत जीवन से सार्वजनिक जीवन तक के लोगों से की जाती है। परंतु इन मूलभूत तत्वों के अतिरिक्त रहन सहन, पहनावा, खान पान, आचार व्यवहार यह पूरी तरह देश काल परिस्थितियों के सापेक्ष होता है लेकिन कुछ वर्षों में आदर्श और नैतिकता की बहस इन्हीं पर आकर टिक गयी है।
वैश्वीकरण के इस युग में जबकि स्थानीयता और वैश्विक दृष्टिकोण के मध्य एक ट्कराव की सी स्थिति दिखती है तो निश्चय ही हमें यह समझना होगा कि वे कौन से तत्व हैं जिनका प्रचलन समाज के लिये घातक हो सकता है और कौन से तत्व ऐसे हैं जिन्हें आत्मसात करना चाहिये।
हरियाणा के विधानसभा चुनावों में यह जानकर मुझे अत्यंत कष्ट हुआ कि भाजपा ने पश्चिमी संगीत सहित अनेक पश्चिमी चलन को प्रतिबन्धित करने का प्रस्ताव अपने घोषणापत्र में किया है। यह सोच एक जबर्दस्त भ्रम का परिणाम है। कुछ वर्ष पूर्व मुझे हरियाणा जाने का अवसर मिला और वहाँ एक गाँव मुंडोग़ढी है जहाँ 100 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या है। इस क्षेत्र में पूरी तरह शरियत का कानून चलता है और टीवी प्रतिबन्धित है, लड्कियों का स्कूल जाना प्रतिबन्धित है इसी के साथ अन्य प्रतिबन्ध भी हैं। हरियाणा अत्यंत परम्परावादी क्षेत्र है जहाँ अब भी पंचायत का राज्य चलता है। लेकिन अब वह अवसर आ गया है कि हिन्दू समाज अपनी अनेक सामाजिक जडताओं से बाहर आये क्योंकि 700 वर्षों की पराधीनता के काल में अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बचाये रखने के लिये कुछ कठोर सामाजिक नियम बनाये गये थे ताकि आक्रमणकारियों के साथ मिल कर हम अपनी पह्चान न खो दें परंतु अब अवसर आ गया है कि ऐसी जडताओं को तोडा जाये और हिन्दू धर्म की सबसे बडी सेवा यही है कि अन्धविश्वास, सामाजिक जड्ता और परम्परा के मध्य अंतर करना सीखा जाये।
यदि गंगा न रहे, गायत्री न रहे,गाय न रहे, चार धाम न रहे, योग और आयुर्वेद न रहे , गीता का सन्देश न रहे तो मानना पडेगा कि हिन्दू परम्परा नष्ट हो रही है और जो भी विचारधारा इनका अस्तित्व स्वीकार नहीं करती और स्वयं को श्रेष्ठ मनवाने का उपक्रम करती है ऐसी किसी भी विचारधारा से हिन्दू धर्म को खतरा है। । जिन हिन्दुओं के पूर्वजों ने हजारों वर्षों की साधना और तपस्या से आध्यात्मिकता का सिद्धांत दिया और आध्यात्मिक स्तर पर स्वतंत्रता का ज्ञान दिया उसे सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर कैसे पालन किया जाता था यह सब कुछ हम अपनी हजारों वर्षॉं की पराधीनता के चलते भूल चुके हैं और सेमेटिक धर्मों की भाँति रहन-सहन, खान-पान, आचार व्यवहार, पहनावे के आधार पर अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान नष्ट होने का खतरा भाँपने लगे हैं।
जिस प्रकार देश में वैश्वीकरण के विरुद्ध एक व्यापक बह्स चलायी जा रही है उसमें तथ्य कम और आधुनिकता और परिवर्तन को आत्मसात कर पाने की अक्षमता के चलते असुरक्षा की भावना अधिक दिखाई पड रही है। भारत में वैश्वीकरण के आधार पर परिवर्तन की आहट 1985 के आस पास से ही दिखने लगी थी और तब से क्रमबद्द तरीके से मैंने प्रत्येक परिवर्तन के विरुद्ध तर्क सुने कि यह भारत को सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से खोखला करने का अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र है। पहले कम्प्यूटर आया तो कहा गया कि अब भारत में बेरोजगारों की फौज खडी हो जायेगी क्योंकि क्लर्क का काम मशीनें करेंगी। आज कल्पना करिये कि यदि कम्प्यूटर न हो तो रेल आरक्षण, बैंक से पैसा निकालना या जमा करना कितना कठिन होता। मुझे याद है कि मैं बचपन में जब बैंक जाता था तो मुझे तीन से चार घण्टे लगते थे।
इसी प्रकार- वैश्वीकरण और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आने पर जब महिलायें अनेक प्रकार की नौकरी करने लगीं तो कहा गया कि यह भारत के परिवार तंत्र को तोडने का अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र है। आज तो महानगरों में यदि पति पत्नी दोनों न कमायें तो घर चलाना मुश्किल होता है और लोग सहजता से चाहते हैं कि पत्नी भी नौकरी करे अब तो कस्बों और गाँवों में भी यह चलन आम है। लेकिन इन दोनों के बाद भी भारतीय संस्कृति नष्ट तो नहीं हुई। इसी प्रकार टीवी क्रांति, फैशन शो से लेकर इंटरनेट तक यही बहस आम है कि भारतीय संस्कृति अब गयी कि तब गयी।
वास्तव में बहुत वर्षॉं की पराधीनता के कारण हमारी असुरक्षा की भावना अत्यंत अधिक है और हमारा आत्मविश्वास अत्यल्प है। न चाहते हुए भी हिन्दू समाज मुस्लिम समाज की भाँति आचरण कर रहा है जो आधुनिकता का विरोध करते हुए हर घटनाक्रम के पीछे अमेरिका और इजरायल का हाथ देखता है। मुस्लिम समाज की इस मानसिकता का कारण भौतिक विकास में उनका पिछडना है। केवल धर्म को ही केन्द्र में रखने और शरियत और क़ुरान के आधार पर ही चलते रहने के आग्रह से वे पश्चिम के विकास की गति को पकड नहीं सके और आज इस हीन भावना से निकलने के लिये अनेक प्रयास कर रहे हैं जो उनमें कुण्ठा और हिंसा भर रहा है।
हिन्दू समाज को इस हीन भावना से स्वयं को बचाने की आवश्यकता है। जींस, टीशर्ट पहनने से, उन्मुक्त जीवन जीने से , स्वतंत्रता के प्रति आग्रह रखने से कोई संस्कृति कभी नष्ट नहीं होती। समाज में नैतिक शिक्षा देने, चारित्रिक निर्माण करने, लोगों को आदर्श का पाठ पढाने के लिये प्रयास समाज में होते रहते हैं और मूल भूत मूल्यों और आदर्शों को छोडकर अन्य बाहरी तत्व परिवर्तित होते रहते हैं और जो इन परिवर्तनों को जितना शीघ्र अपना कर उन्हें अपने अनुकूल और स्वयं को उनके अनुकूल बना लेता है वही अपनी पहचान के साथ प्रगति कर पाता है।
आज हम अपनी ऊर्जा उन मूलभूत तत्वों की रक्षा के लिये नहीं लगा रहे हैं जो न केवल भारत के लिये वरन मानवता के लिये आवश्यक है और वह है आध्यात्मिकता के सिद्धांत को किस प्रकार समाज और राजनीति के आचरण में ढाला जाये। वैश्वीकरण का यह प्रवाह किसी एक देश का षडयंत्र है या नहीं यह मह्त्वपूर्ण नहीं है मह्त्वपूर्ण है कि क्या इसे रोकने की क्षमता हमारे पास है तो फिर इसका प्रतिरोध करने में समय नष्ट करने के स्थान पर इसे अपने अनुरूप ढालने का आन्दोलन क्यों नहीं चलाया जाता?
आखिर आज से सौ वर्ष पूर्व यदि कोई समुद्र पार कर जाता था तो उसका धर्म भ्रष्ट हो जाता था। वह व्यवस्था भी काल सापेक्ष थी लेकिन यदि स्वामी विवेकानन्द ने समुद्र पार नहीं किया होता तो भारत में पुनर्जागरण भी नहीं होता। इसी प्रकार आज से सौ वर्ष पूर्व एक जाति दूसरी जाति का छुआ नहीं खाती थी और यह भी धर्म और संस्कृति से जुडा विषय था लेकिन अब इस नियम में काफी ढिलाई आ गयी है तो भी तो न तो हिन्दू धर्म नष्ट हुआ और न ही हमारी संस्कृति।
वास्तव में भारत की विविधता को देखते हुए हर आंचलिकता और क्षेत्रीयता का अपना महत्व है लेकिन परिस्थितियों के आधार पर इनमें भी तो परिवर्तन आता रहता है।
लेकिन आज वैश्वीकरण के स्तर पर हो रहे इन परिवर्तनों के चलते आदर्श और नैतिकता का व्यावहारिकता के साथ सांमजस्य आवश्यक है। क्योंकि ऐसा नहीं होने से ही आज व्यक्तिगत स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक हम ढोंग का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जैसे व्यक्तिगत जीवन में यदि कार में खरोंच लग जाती है तो लोग खरोंच लगाने वाले को पीट पीट कर मार डालते हैं लेकिन यदि उनसे उनका आदर्श पूछा जाये तो वह महात्मा गाँधी को ही बतायेंगे क्योंकि उन्हें भी पता है कि आदर्श को जीवन में ढाला नहीं जाता इसलिये उसे इतना ऊँचा रखो कि उसका व्यावहारिक जीवन से कोई लेना देना ही न हो।
इसी मानसिकता का दर्शन हमें सर्वत्र होता है। इसी कारण व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक जीवन में भारी विरोधाभास होता है। आज सब कुछ बाजारवाद से ही संचालित है इसलिये मुनाफा कमाने वाले जानते हैं किस चीज का प्रचार करने से तथाकथित आदर्श और नैतिकता का आभास ध्वस्त होगा और उसे बचाने के लिये कौन लोग सामने आयेंगे। यही कारण है कि बीते कुछ वर्षों में देश के वास्तविक मुद्दों पर चर्चा होने के स्थान पर अनेक ऐसे मुद्दों पर चर्चा होती है जिससे दोनों पक्षों को मुनाफा होता है। आखिर धारा 377 को देश में तूल किसने दिया यदि इस विषय पर इतनी बहस न होती तो कोई नहीं जान पाता कि यह क्या बला है? इसी प्रकार सच का सामना धारावाहिक को लोकप्रियता भी तो इसी मानसिकता ने दी। ऐसा नहीं है कि ऐसे लोग जान बूझकर विरोध करते हैं या बाजारवाद को लाभ पहुँचाते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि अपनी ऊर्जा कहाँ लगाई जाये कि वास्तविक फल प्राप्त हो। एक बार इन बाहरी कारणों से धर्म और संस्कृति के नष्ट होने की असुरक्षा की मानसिकता छोड दी जाये तो ही वास्तव में वास्तविक खतरों से लडा जा सकता है।
स्वतंत्रता व्यक्ति की मूलभूत आकाँक्षा होती है और वह उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है और अवसर मिलते ही अपने आस पास के प्रत्येक बन्धन तोड देना चाहता है। यह युग स्वतन्त्रता का युग है जो भी मान्यता, मिथक जिज्ञासा उत्पन्न करेगी और स्वतंत्रता को बाधित करेगी व्यक्ति उस ओर जाने का प्रयास करेगा। इसलिये आज समाज को इस बात पर विचार करना चाहिये कि स्वतंत्रता और उच्श्रृखलता के बीच सीमा रेखा क्या हो? स्वतंत्रता के मानक बनाये जायें जो सभी को स्वीकार्य हों। लेकिन इन सबसे भी पहले अपने समय की और अपने पूर्वजों की परम्परा को टूटते हुए देखकर हमें यह कदापि नहीं मानना चाहिये कि अब जो परिवर्तन होगा वह विनाशकारी होगा। क्योंकि हर पुरानी पीढी अपनी नयी पीढी से यही कहती है कि हमारे समय में आदर्श और नैतिकता चरम पर थी और अब तो सब नष्ट हो गया। बालीवुड में ऐसी फिल्में पिछले दो तीन दशक से बन रही हैं। अब अवसर है कि हम विचार करें कि हमें अपनी शक्ति और ऊर्जा कहाँ लगानी है? कौन हमारा शत्रु है और किससे हमें खतरा है? यह विचार करते समय हमें यही ध्यान में रखना चाहिये कि हमारी अगली पीढी किस प्रकार के वातावरण में अपने धर्म, संस्कृति का पालन करते हुए प्रगति और विकास कर सकेगी
आतंकवाद विरोधी मुस्लिम पहल के निहितार्थ
31 मई दिन शनिवार, दिल्ली के रामलीला मैदान पर प्रमुख इस्लामी संगठनों की पहल पर एक आतंकवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन एक बार फिर सहारनपुर स्थित प्रसिद्ध मदरसा दारूल उलूम देवबन्द की पहल पर आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में मुख्य रूप से दारूल उलूम देवबन्द, जमायत उलेमा ए हिन्द, जमायत इस्लामी, नदवातुल उलेमा लखनऊ और मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्यों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में देश भर के विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधित्व का दावा किया गया। दारूल उलूम देवबन्द के मुख्य मुफ्ती हबीबुर्रहमान द्वारा तथाकथित फतवे पर हस्ताक्षर किये गये जिसके प्रति सभी उपस्थित लोगों ने सहमति व्यक्त की और इस फतवे के अनुसार किसी भी प्रकार की अन्यायपूर्ण हिंसा की निन्दा की गयी और जेहाद को रचनात्मक और आतंकवाद को विध्वंसात्मक घोषित किया गया। आयोजकों के दावे के अनुसार इस सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से तीन लाख लोगों ने भाग लिया। सम्मेलन में आने वालों में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लोग शामिल थे।
इससे पूर्व सहारनपुर स्थित प्रमुख इस्लामी शिक्षा केन्द्र और तालिबान के प्रमुख सदस्यों मुला उमर और जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर के प्रेरणास्रोत रहे दारूल उलूम देवबन्द ने 25 फरवरी को भी देश भर के विभिन्न मुस्लिम पंथों के उलेमाओं को आमंत्रित कर आतंकवाद के विरुद्ध फतवा जारी किया था। उस पहल को अनेक लोगों ने ऐतिहासिक पहल घोषित किया था और एक बार फिर रामलीला मैदान पर हुई आतंकवाद विरोधी सभा को एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है। परंतु जिस प्रकार फरवरी माह में हुए उलेमा सम्मेलन के निष्कर्षों पर देश में आम सहमति नहीं थी कि ऐसी पहल का इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैला रहे लोगों पर क्या प्रभाव होगा उसी प्रकार का प्रश्न एक बार फिर आतंकवाद विरोधी सम्मेलन से भी उभरता है।
इस सम्मेलन में फतवे की भाषा और वक्ताओं का सुर पूरी तरह उलेमा सम्मेलन की याद दिलाता है। सम्मेलन में पूरा जोर इस बात पर था कि किस प्रकार यह सिद्ध किया जाये कि इस्लाम और पैगम्बर की शिक्षायें आतंकवाद को प्रेरित नहीं करती और इस्लाम एक शांतिपूर्ण धर्म है। इसके साथ एक बार फिर जेहाद को इस्लाम का अभिन्न अंग घोषित करते हुए उसे आतंकवाद से पृथक किया गया। इसमें ऐसा नया क्या है जिसको लेकर इस सम्मेलन या फतवे को ऐतिहासिक पहल घोषित किया जा रहा है। जब से इस्लामी आतंकवाद का स्वरूप वैश्विक हुआ है तब से इस्लामी बुध्दिजीवी और धर्मगुरु इस्लाम को शांतिपूर्ण धर्म बता रहे हैं और जेहाद को एक शांतिपूर्ण आन्तरिक सुधार की प्रक्रिया घोषित कर रहे हैं परंतु उनके कहे का कोई प्रभाव उन आतंकवादी संगठनों पर नहीं हो रहा है जो जेहाद और इस्लाम के नाम पर आतंकवाद में लिप्त हैं। वास्तव में एक बार फिर इस सम्मेलन ने हमारे समक्ष एक बडा प्रश्न खडा कर दिया है कि क्या इस्लामी संगठन, धर्मगुरु या फिर बुद्धिजीवी इस्लामी आतंकवाद का समाधान ढूँढने के प्रति वाकई गम्भीर हैं। उनके प्रयासों की गहराई से छानबीन की जाये तो ऐसा नहीं लगता।
वास्तव में इस्लामी आतंकवाद को एक सामान्य आपराधिक घटना के रूप में जो भी सिद्ध करने का प्रयास करता है वह इसे प्रोत्साहन देता है। इस्लामी आतंकवाद एक वृहद इस्लामवादी आन्दोलन का एक रणनीति है और इस आन्दोलन का उद्देश्य राजनीतिक इस्लाम का वर्चस्व स्थापित करना है। समस्त समस्याओं का समाधान इस्लाम और कुरान में है, विश्व की सभी विचारधारायें असफल सिद्ध हो चुकी हैं और इस्लाम ही सही रास्ता दिखा सकता है, पश्चिम आधारित विश्व व्यवस्था अनैतिकता फैला रही है और उसके मूल स्रोत में अमेरिका है इसलिये अमेरिका का किसी भी स्तर पर विरोध न्यायसंगत है, इस्लामी आतंकवाद जैसी कोई चीज नहीं है यह समस्त विश्व में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार का परिणाम है, आज मीडिया इस्लाम को बदनाम कर रहा है, फिलीस्तीन में मुसलमानों के न्याय हुआ होता तो और इजरायल का साथ अमेरिका ने नहीं दिया होता तो इस्लामी आतंकवाद नहीं पनपता। ऐसे कुछ तर्क राजनीतिक इस्लाम के हैं जो इस्लामवादी आन्दोलन का प्रमुख वैचारिक अधिष्ठान है और इन्हीं तर्कों के आधार पर इस्लाम की सर्वोच्चता विश्व पर स्थापित करने का प्रयास हो रहा है। क्या किसी भी इस्लामी संगठन ने इन तर्कों या उद्देश्यों से अपनी असहमति जताई है। इसका स्पष्ट उत्तर है कि नहीं।
31 मई को रामलीला मैदान में जो तथाकथित आतंकवाद विरोधी रैली हुई उसमें भी जिस प्रकार के तेवर में बात की गयी वह यही संकेत कर रहा था कि इस रैली में मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा को ही प्रोत्साहित किया गया और अमेरिका के विरोध में जब भी वक्ताओं ने कुछ बोला तो खूब तालियाँ बजीं। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका शैतान है या नहीं यहाँ प्रश्न यह है कि एक ओर आतंकवाद को इस्लाम से पृथक कर और फिर इस्लामी आतंकवाद के मूल में छिपी अवधारणा को बल देकर इस्लामी संगठन किस प्रकार आतंकवाद से लड्ना चाहते हैं। किसी तर्क का सहारा लेकर यदि आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराये जाने का प्रयास हो तो फिर आतंकवाद की निन्दा करना एक ढोंग नहीं तो और क्या है। आज बडा प्रश्न जो हमारे समक्ष है वह राजनीतिक इस्लाम की महत्वाकांक्षा और इस्लामवादी आन्दोलन है जो इस्लाम में ही सभी समस्याओं का समाधान देखता है। वर्तमान समय में अंतरधार्मिक बहसों में भाग लेने वाले और ऐसी बहसें आयोजित कराने वाले मुस्लिम बुद्धिजीवी भी आतंकवाद के सम्बन्ध में ऐसी अस्पष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं कि उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है। ऐसे ही एक मुस्लिम विद्वान हैं डा. जाकिर नाईक उनके कुछ उद्गार सुनकर कोई भी आश्चर्यचकित हो सकता है। इस सम्बन्ध में कुछ यू ट्यूब के वीडियो प्रस्तुत हैं। जिन्हें देखकर कोई भी सोचने पर विवश हो सकता है कि मुस्लिम बुध्दिजीवी किस प्रकार इस्लामवादी आन्दोलन का अंग हैं और अंतर है तो केवल रणनीति का है। http://www.youtube.com/watch?v=ZMAZR8YIhxI
http://www.youtube.com/watch?v=KAdwy5IJzj4&feature=related
http://www.youtube.com/watch?v=_MtddCCuaC8&feature=related
http://www.youtube.com/watch?v=ZMAZR8YIhxI&feature=related
31 मई के सम्मेलन के सन्दर्भ में जाकिर नाइक का उल्लेख करना इसलिये आवश्यक हुआ कि आज उन्हें एक नरमपंथी और उदारवादी मुसलमान माना जा रहा है जो बहस में विश्वास करता है परंतु उनके भाव स्पष्ट करते हैं कि आज आतंकवाद की समस्या को एक प्रतिक्रिया के रूप में लिया जा रहा है और इसके लिये मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा का सृजन किया जा रहा है। मुस्लिम उत्पीडन की इस अवधारणा का भी वैश्वीकरण हो गया है। एक ओर जहाँ इजरायल और फिलीस्तीन का विवाद समस्त विश्व के इस्लामवादियों के लिये आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराने का सबसे बडा हथियार बन गया है वहीं स्थानीय स्तर पर भी मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा रची जाती है और इसका शिकार बनाया जाता है देश के पुलिस बल और सुरक्षा एजेंसियों को।
रामलीला मैदान में जो भी पहल की गयी उसकी ईमानदारी पर सवाल उठने इसलिये भी स्वाभाविक हैं कि इस सम्मेलन या रैली में एक बार भी इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले वैश्विक और भारत स्थित संगठनों के बारे में इन मुस्लिम धर्मगुरुओं ने अपनी कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की। इन तथाकथित शांतिप्रेमियों ने एक बार भी सिमी, इण्डियन मुजाहिदीन, लश्कर, जैश का न तो उल्लेख किया और न ही उनकी निन्दा की या उनके सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट की। वैसे आज तक ओसामा बिन लादेन के उत्कर्ष के बाद से विश्व के किसी भी इस्लामी संगठन ने उसके सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की और अमेरिका पर किये गये उसके आक्रमण को मुस्लिम उत्पीडन की प्रतिक्रिया या फिर आतंकवादी अमेरिका पर आक्रमण कह कर न्यायसंगत ही ठहराया। सम्मेलन में जयपुर में आतंकवादी आक्रमण में मारे गये लोगों की सहानुभूति में भी कुछ नहीं बोला गया और पूरा समय इसी में बीता कि इस्लाम को आतंकवाद से कैसे असम्पृक्त रखा जाये। ऐसे में एक बडा प्रश्न हमारे समक्ष यह है कि आतंकवाद के विरुद्ध इस युद्ध में हम इन इस्लामी संगठनों की पहल को लेकर कितना आश्वस्त हों कि इससे सब कुछ रूक जायेगा। क्योंकि समस्या के मूल पर प्रहार नहीं हो रहा है।
25 फरवरी को दारूल उलूम देवबन्द ने उलेमा सम्मेलन किया और एक माह के उपरांत ही मध्य प्रदेश में सिमी के सदस्य पुलिस की गिरफ्त में आये और मई की 13 दिनाँक को जयपुर में आतंकवादी आक्रमण हो गया। जुलाई 2006 को मुम्बई में स्थानीय रेल व्यवस्था पर हुए आक्रमण के बाद अब तक 9 श्रृखलाबद्ध सुनियोजित विस्फोट हो चुके हैं और इन सभी विस्फोटों में भारत के मुस्लिम संगठनों और सदस्यों की भूमिका रही है। इससे स्पष्ट है भारत में मुसलमान वैश्विक जेहादी नेटवर्क से जुड गया है और वह मुस्लिम उत्पीडन की वैश्विक और स्थानीय अवधारणा से प्रभावित हो रहा है। जब तक इस्लामी संगठन इस अवधारणा के सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करते और आतंकवाद के स्थान पर आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध फतवा नहीं जारी करते उनकी पहल लोगों को गुमराह करने के अलावा और किसी भी श्रेणी में नहीं आती।
इस्लामी आतंकवाद आज इस मुकाम पर पहुँच गया है जहाँ से उससे लड्ने के लिये एक समन्वित प्रतिरोध की आवश्यकता है और ऐसी पहल जो पूरे मन से न की गयी हो या जिसमें ईमानदारी का अभाव हो उससे ऐसी प्रतिरोधक शक्ति कमजोर ही होती है जिसका विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है। हमारे देश की छद्म धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी-उदारवादी लाबी ऐसे प्रयासों को महिमामण्डित कर प्रस्तुत करती है ताकि इस्लामी आतंकवाद के मूल स्रोत, विचारधारा और प्रेरणा पर बह्स न हो सके। ऐसे प्रयासों के मध्य हमें अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है और साथ ही इस पूरी समस्या को एक समग्र स्वरूप में व्यापक इस्लामवादी आन्दोलन के रणनीतिक अंग के रूप में भी देखने की आवश्यकता है।

